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Hindi Section ( 4 Feb 2022, NewAgeIslam.Com)

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The Verses of Jihad in Quran: Meaning and Context – Part 14 कुरआन में जिहाद की आयतें: अर्थ व मफहूम, शाने नुज़ूल और पृष्ठभूमि

बदरुद्दूजा रज़वी मिस्बाही, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

भाग-14

وَإِذَا ضَرَبْتُمْ فِي الْأَرْضِ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَقْصُرُوا مِنَ الصَّلَاةِ إِنْ خِفْتُمْ أَن يَفْتِنَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ إِنَّ الْكَافِرِينَ كَانُوا لَكُمْ عَدُوًّا مُّبِينًا (النساء، 101(

अनुवाद: और जब तुम जमीन में सफर करो तो तुम पर गुनाह नहीं कि कुछ नमाज़ें कस्र से पढ़ो अगर तुम्हें डर हो कि काफिर तुम्हें तकलीफ देंगे बेशक कुफ्फार तुम्हारे खुले दुश्मन हैं (कंज़ुल ईमान)

)فَكُلُوْا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلٰلًا طَیِّبًا وَّ اتَّقُوا اللّٰهَؕ-اِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِیْمٌ۠ (أنفال 69(

अनुवाद: तो खाओ जो ग़नीमत तुम्हें मिली हलाल पाकीज़ा और अल्लाह से डरते रहो बेशक अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है (कंज़ुल ईमान)

सुरह निसा आयत 101 के तहत यह जान लेना आवश्यक है कि दुश्मन का खौफ नमाज़ में कस्र की शर्त नहीं है। बल्कि यह बयाने हाल के लिए है। आयत के नुज़ूल के वक्त सफर डर से खाली नहीं होते थे। इसलिए बयाने हाल की गर्ज़ से यहाँ खौफ का ज़िक्र किया गया है। इसलिए शर्ते कस्र वह सफर है जिसे फुकहा ने बयान फरमाया है चाहे वह जिहाद के लिए हो या तिजारत का सफर हो या किसी और उद्देश्य से वह सफर किया गया हो।

इस्लाम के मुजाहिदों को जिन मामलों की हाजत दरपेश होती है उनमें से एक मामला यह है कि वह दुश्मन के खौफ और उससे जंग के वक्त नमाज़ किस तरह अदा करें? इसी अहम मसले को अल्लाह पाक ने इस आयत से बयान फरमाया है।

शब्द कस्रतख्फीफ़ की तरफ इशारा करता है। इसलिए कि आयत में इसकी सराहत नहीं है कि कस्र से क्या मुराद है? रिकातों की मिकदार और उनकी संख्या में कस्र जैसे चार रिकातों वाली नमाज़ को दो रिकात पढ़ना या नमाज़ की अदायगी की कैफियत में कस्र जैसे इशारे से नमाज़ पढ़ना? इसलिए इस आयत में मुफ्स्सेरीन के दो अकवाल हैं:

(1) इस आयत में कस्र से मुराद रिकातों की संख्या में कस्र है। जम्हूर मुफ़स्सेरीन का यही कौल है। फिर जम्हूर के बीच इसमें मतभेद है कि इस आयत में सलाह से सलाते खौफ मुराद है। कुछ इस बात के कायल हैं कि इससे सलाते सफर मुराद है। इस तकदीर पर हर वह नमाज़ जो हज़र में चार रिकात पढ़ी जाती है वह सफर में केवल दो रिकात पढ़ी जाएगी। जैसे जुहर, असर और इशा की नमाज़ें मगरिब और फज्र की नमाज़ इसमें दाखिल नहीं है अर्थात इन नमाज़ों में कस्र नहीं है। और कुछ का कौल यह है कि इस आयत में सलाते सफर अर्थात मुसाफिर की नमाज़ मुराद नहीं है बल्कि सलाते खौफ मुराद है। हज़रत इब्ने अब्बास, हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह और एक जमात का यही कौल है। हज़रत इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि अल्लाह पाक ने तुम्हारे नबी मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जुबान पर नमाज़े हज़र को चार रिकात, नमाज़े सफर को दो रिकात और नामाज़े खौफ को एक रिकात फर्ज़ करार दिया है। (मुस्लिम जिल्द 1 किताबुस्सलातुल मुसाफिर व कस्र 241)

इमाम अबू जकरिया यहया बिन शरफ नव्वी रहमतुल्लाह अलैह इस हदीस के तहत फरमाते हैं कि सलफ की एक जमात ने इस पर अमल किया है कि खौफ के वक्त एक रिकात नमाज़ अदा की जाएगी। इमाम हसन बसरी और इशहाक बिन राहविया का यही मज़हब है। लेकिन इमाम आज़म अबू हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफई और जम्हूर का मज़हब यह है कि नमाज़े खौफ नमाज़े अमन की तरह है अर्थात हज़र में चार रिकात और सफर में दो रिकात पढ़ी जाएगी। एक रिकात उनके नजदीक किसी भी हाल में रवा नहीं है। इन हज़रात ने इस हदीस का यह जवाब दिया है कि इस हदीस में एक रिकात से मुराद वह रिकात है जो हालते खौफ में इमाम के साथ अदा की जाती है और दूसरी अलग से पढ़ी जाती है। (शरह मुस्लिम लिल नव्वी: किताबुस्सलात अल मुसाफिर व कसरुहा 241) यह दोनों कौल इस पर मुतफर्रे हैं जब कि कस्र से मुराद रिकातों की संख्या में तकलील हो (कमी हो)।

(2) दूसरा कौल यह है कि इस आयत में कस्र से मुराद रिकात अदा करने की कैफियत में तख्फीफ़ है। और तख्फीफ़ यह है कि नमाज़ में इशारे पर इक्तेसार किया जाए। अर्थात रुकूअ और सजदा इशारे से किया जाए और इख्तिसार के साथ नमाज़ पढ़ी जाए। इस सूरत में चल चल कर नमाज़ पढ़ना जायज है। और खून से लत पत हो कर भी नमाज़ पढ़ना जायज़ है। यह वह नमाज़ होती है जो जंग के मैदान में तलवारों के साए में अदा की जाती है। जबकि जंग का मैदान गर्म होता है, हर चार जानिब से तलवारें लहरा रही होती हैं, दुश्मन की कारी ज़र्ब से कब जिस्म खून से लत पत हो जाए? या कब जान चली जाए? इसकी कोई खबर नहीं होती है। ऐसे समय में यह नमाज़ पढ़ी जाती है।

साहबे तफसीर कबीर ने इस कौल (रिकात की अदायगी में कमी) को जईफ करार दिया है।

इस आयत में शब्द कस्र को सफर के मुद्दत में चार रिकात की नमाज़ को दो रिकात पढ़े जाने पर महमूल करना ही औला है। इसकी दलील वह हदीस है जो हज़रत याअला बिन उमय्या से मरवी है। हज़रत याअला बिन उमय्या फरमाते हैं कि मैंने हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु से अर्ज़ किया कि अल्लाह फरमाता है: فلیس علیکم جناح أن تقصروا من الصلاة اِن خفتم۔۔۔ الی آخر الآیةजब तुम जमीन में सफर करो तो तुम पर गुनाह नहीं है कि तुम कुछ नमाज़ें कस्र से पढ़ो अगर तुम्हें डर हो कि काफिर तुम्हें तकलीफ देंगे। और अब तो लोग अमन में हैं (अर्थात अब दुश्मन का कोई खौफ नहीं है फिर कस्र क्यों जरूरी है?)। हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया: इस हुक्म से मुझे भी इसी तरह ताज्जुब हुआ जैसे तुम्हें ताज्जुब हुआ, तो मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इसके बारे में पूछा तो आपने फरमाया: "صَدَقَة لَصَدّقَ اللہُ بِھا عَلیکُم فاقْبِلُوا صَدْقَتہ" यह अल्लाह ने तुम्हें सदका अता फरमाया है इसलिए उसका सदका कुबूल करो! (मुस्लिम जिल्द अव्वल सलातुल मुसाफिरीन व कसरुहा 241)। साहबे तफसीर कबीर ने इसकी और भी दलीलें दी हैं फरजआ (तफसीर कबीर मा तहतुल आयह)

नमाज़े खौफ किस तरह अदा की जाएगी उसके लिए फिकह की किताबें देखें! (अल रजवी)

*انّ الکافرینَ کانوا لکم عدوا مبینا*: यह मा कबल के मज़मून की इल्लत है अर्थात इस जुज़ में कुफ्फार व मुशरिकीन के अपेक्षित फितने की वजह बयान की गई है कि कुफ्फार व मुशरिकीन तुम्हारे खुले दुश्मन हैं।

रिसालत के जमाने में कुफ्फार हमेशा मुसलमानों को तकलीफ पहुँचाने के दर पे रहते थे और मुसलमानों की मशगूलियत का वह कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देते थे यहाँ तक कि नमाज़ में भी वह मुसलमानों पर हमला करने के मंसूबे बनाया करते थे। इसलिए इस आयत में मुसलमानों को तंबीह किया गया कि उनसे हमेशा होशियार और चौकन्ना रहना! उन्हें तुमसे दिली दुश्मनी और रंजिश है यह किसी भी समय तुम्हें आज़माइश से दोचार कर सकते हैं।

यह अदावत आज भी ज़ाहिर है। गैर मुस्लिम सुपर ताकतें आज भी मुसलमानों को अपने हिंसा का निशाना बना रही हैं। सोशल मीडिया पर कमज़ोर और बिना हाथ पैर के मुसलमानों पर ऐसे ऐसे रूह को तड़पा देने वाले वीडियो देखने में आ रहे हैं जिससे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जुनूनी भीड़ जब चाहती है राह चलते निर्दोष मुसलमानों को मार मार कर हालाक कर डालती है और अपराधियों को सज़ा क्या उनसे पूछ ताछ भी नहीं होती। क्या इन मज़ालिम से यह ज़ाहिर नहीं होता है कि दुनिया मुसलमानों को अपना दुश्मन समझ रही है।

)۲(فَكُلُوْا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلٰلًا طَیِّبًا وَّ اتَّقُوا اللّٰهَؕ-اِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِیْمٌ۠(أنفال، 69(

इस आयत में मुसलमानों को माले ग़नीमत के खाने का हुक्म दिया गया है। इस आयत का शाने नुज़ूल यह है कि सहाबा माले ग़नीमत के लेने से बाज़ आ गए थे तो उस वक्त अल्लाह पाक ने यह आयत नाजिल फरमाई और मुसलमानों को बताया कि माले ग़नीमत तुम्हारे लिए मुबाह है। और यह भी कहा गया है कि इस आयत में मासे मुराद फिदया है जिसका उल्लेख इससे पहले की आयत में है। इस तकदीर पर आयत का मफहूम यह होगा कि वह फिदया जुमला गनाइम में से है और वह भी तुम्हारे लिए हलाल और मुबाह है। (तफसीर इब्ने सऊद अल जुज़ उल राबेअ सफहा 36)

असीराने बद्र जब कैदी बना कर बारगाहे रिसालत मे लाए गए तो हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने उनके बारे में सहाबा से मशवरा किया। कुछ सहाबा जिन में हज़रत अबुबकर सिद्दीक रज़ीअल्लाहु अन्हु सबसे उपर हैं, ने मशवरा दिया कि यह हमारे खानदान के लोग हैं उनके क़त्ल से क्या फायदा? हो सकता है यह आगे चल कर ईमान ले आएं, इसलिए इनसे फिदिया ले कर इन्हें छोड़ दिया जाए और इनकी जान बख्शी की जाए। और कुछ सहाबा जिनमें हज़रत उमर फारुक रज़ीअल्लाहु अन्हु सबसे उपर थे, ने मशवरा दिया कि इन्हें क़त्ल कर दिया जाए। इन्होने हमें बड़ी तकलीफ दी हैं। इसलिए यह इसके हकदार हैं कि इनकी गर्दने उड़ा दी जाएं। इनके फिदया की हमें कोई जरूरत नहीं है। बल्कि हर कुराबतदार अपने कुराबतदार को क़त्ल करे! अली अकील को, हमजा अब्बास को और खुद मैं अपने फलां रिश्तेदार को क़त्ल करूँ। लेकिन अल्लाह के रसूल ने हज़रत अबूबकर के मशवरे पर अमल किया और उन सबको जो सत्तर की संख्या में थे अक्सर कुरैश के इज्जतदार लोगों में से थे फिदया ले कर छोड़ दिया। इसी फिदया के बारे में इस आयत में हुक्म दिया गया है कि यह भी जुमला गनाइम में से है और तुम्हारे लिए मुबाह है।

बाद में अल्लाह पाक ने आयत नाज़िल फरमा कर हज़रत उमर फारुक और उनके मवाफिकीन की राय की ताईद फरमाई है। सुरह अनफ़ाल की आयत 67 इसी की तरफ इशारा करती है। (अल रजवी)

जारी----------

[To be continued]

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मौलाना बदरुद्दूजा रज़वी मिस्बाही, मदरसा अरबिया अशरफिया ज़िया-उल-उलूम खैराबाद, ज़िला मऊनाथ भंजन, उत्तरप्रदेश, के प्रधानाचार्य, एक सूफी मिजाज आलिम-ए-दिन, बेहतरीन टीचर, अच्छे लेखक, कवि और प्रिय वक्ता हैं। उनकी कई किताबें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे कुछ मशहूर यह हैं, 1) फजीलत-ए-रमज़ान, 2) जादूल हरमयन, 3) मुखजीन-ए-तिब, 4) तौजीहात ए अहसन, 5) मुल्ला हसन की शरह, 6) तहज़ीब अल फराइद, 7) अताईब अल तहानी फी हल्ले मुख़तसर अल मआनी, 8) साहिह मुस्लिम हदीस की शरह

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