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Hindi Section ( 1 Feb 2022, NewAgeIslam.Com)

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The Verses of Jihad in Quran: Meaning and Context – Part 11 कुरआन मे जिहाद की आयतें: अर्थ व मफहूम, शाने नुजुल और पृष्ठभूमि

बदरुद्दूजा रज़वी मिस्बाही, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

भाग-11

سَنُلْقِیْ  فِیْ  قُلُوْبِ  الَّذِیْنَ  كَفَرُوا  الرُّعْبَ  بِمَاۤ  اَشْرَكُوْا  بِاللّٰهِ  مَا  لَمْ  یُنَزِّلْ  بِهٖ  سُلْطٰنًاۚ-وَ  مَاْوٰىهُمُ  النَّارُؕ-وَ  بِئْسَ  مَثْوَى  الظّٰلِمِیْنَ (آل عمران  ۱۵۱)

(तुम घबराओ नहीं) हम अनक़रीब तुम्हारा रोब काफ़िरों के दिलों में जमा देंगे इसलिए कि उन लोगों ने ख़ुदा का शरीक बनाया (भी तो) इस चीज़ बुत को जिसे ख़ुदा ने किसी क़िस्म की हुकूमत नहीं दी और (आख़िरकार) उनका ठिकाना दौज़ख़ है और ज़ालिमों का (भी क्या) बुरा ठिकाना है

(2) وَعَدَكُمُ اللّٰهُ مَغَانِمَ كَثِیْرَةً تَاْخُذُوْنَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هٰذِهٖ وَ كَفَّ اَیْدِیَ النَّاسِ عَنْكُمْۚ-وَ لِتَكُوْنَ اٰیَةً لِّلْمُؤْمِنِیْنَ وَ یَهْدِیَكُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِیْمًاۙ(الفتح۲۰)

ख़ुदा ने तुमसे बहुत सी ग़नीमतों का वायदा फरमाया था कि तुम उन पर काबिज़ हो गए तो उसने तुम्हें ये (ख़ैबर की ग़नीमत) जल्दी से दिलवा दीं और (हुबैदिया से) लोगों की दराज़ी को तुमसे रोक दिया और ग़रज़ ये थी कि मोमिनीन के लिए (क़ुदरत) का नमूना हो और ख़ुदा तुमको सीधी राह पर ले चले

इस क़िस्त की पहली आयत में अल्लाह पाक ने मुसलमानों की इस्तेकामत और तस्कीन के लिए फरमाया है कि तुम कुफ्फार और मुशरेकीन की आरज़ी फतह और कामयाबी से परेशान न हो हम जल्द ही उनके दिलों में तुम्हारा रोब और हैबत डाल देंगे जिस से वह मैदान छोड़ कर भाग खड़े होंगे।

गजवात की तारीख से वाकिफियत रखने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि गजवा ए उहद में पहले मुसलमान काफिरों पर ग़ालिब आ गए थे और वह फातेहाना शान के साथ आगे बढ़ रहे थे, लेकिन तीर अंदाजों की गफलत और मोर्चा छोड़ देने की वजह से उनकी फतह हार में बदल गई। नतीजा यह हुआ कि रिवायत के मतभेद के साथ 108 या 74 की संख्या में अंसार और मुहाजेरीन सहाबा शहीद हो गए। खुद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ाते बाबरकत लहू लुहान हो गई। आपके नीचे का दांत शहीद हो गया। आपके मुबारक लब पर भी जख्म आए। अम्र बिन कमिया ने एक पत्थर इस जोर से मारा कि खूद की दो कड़ियाँ मुबारक रुखसार में धंस गईं। दुश्मन के खोदे हुए खुफिया गढ़ों में से एक गढ़े में आप गिर गए। हज़रत अली और हज़रत तलहा रज़ीअल्लाहु अन्हुमा ने सहारा दे कर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खड़ा किया। हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह ने अपने दांतों से खूद की कड़ियाँ एक के बाद एक निकालीं जिससे खुद उनके दो दांत गिर गए। हज़रत अबू सईद खुदरी के वालिद हज़रत मालिक बिन सनान ने चेहरे मुबारक से खून चूस कर निकाला हालत यह हुई कि हज़रत खालिद बिन वलीद (जो उस वक्त इस्लाम नहीं लाए थे) के हमले से इस्लामी लश्कर में अफरा तफरी मच गई और कुफ्फार और मुशरेकीन दुबारा संगठित हो कर हमलों पर हमले करने लगे। अबू सुफियान (उस वक्त इस्लाम नहीं लाए थे) और उनके साथ मैदान में घूम घूम कर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, हज़रत अबूबकर और हज़रत उमर की लाशें तलाशते फिर रहे थे। अबू सुफियान ने कहा सब मारे गए क्योंकि अगर जिंदा होते तो जरुर जवाब देते। हज़रत उमर कहां बर्दाश्त करने वाले थे बोल पड़े, अल्लाह के दुश्मन! तू झूट बोलता है हम सब यही पर हैं। फिर कुछ देर तक दोनों के बीच मुकालमा जारी रहा। फिर ऐसे समय में जब कि मुसलमान हजीमत से दोचार थे, उहद के दामन में उनकी लाशें बिखरी हुई थीं और कुछ ज़ख्मों से चूर तड़प रहे थे कुफ्फार व मुशरेकीन बिना किसी वजह और सबब के भाग खड़े हुए। कुफ्फार मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए इसकी वजह यह है कि अल्लाह पाक ने यकायक कुफ्फार व मुशरेकीन के दिलों में मुसलमानों का ऐसा रोब और ऐसी हैबत पैदा फरमा दी कि उनके कदम मैदाने जंग से उखड़ गए और उन्होंने मक्का की राह ली जैसा कि अल्लाह पाक फरमाता है: سَنُلْقِیْ  فِیْ  قُلُوْبِ  الَّذِیْنَ  كَفَرُوا  الرُّعْبَ الی آخرہ (آل عمران 151

अब मुफ़स्सेरीन के बीच इसमें मतभेद है कि अल्लाह पाक का यह वादा (काफिरों के दिलों में मुसलमानों का रोब पैदा करना) यौमे उहद के साथ विशेष है या सारे वक्तों में आम है?

अक्सर मुफ़स्सेरीन का कौल यह है कि यह वादा यौमे उहद के साथ ख़ास है इसलिए कि इससे पहले की आयतें गजवा ए उहद के बारे में ही नाजिल हुई हैं। फिर इस कौल के कायलीन ने उहद के दिन मुशरेकीन के दिलों में मुसलमानों के रोब के इलका की कैफियत बयान फरमाई है और इसकी दो वजहें बयान की हैं। पहला यह कि कुफ्फार जब मुसलामानों पर ग़ालिब आ गए और उन्हें शिकस्त से दोचार कर दिया तो अल्लाह पाक ने उनके दिलों में मुसलमानों का रोब व जलाल पैदा कर दिया और वह बिना किसी वजह और सबब के वहाँ से भाग खड़े हुए, जैसा कि अभी बताया गया कि अबू सुफियान पहाड़ पर चढ़े और कहा: أین ابن ابی کبشہ (حضور علیہ الصلوۃ والسلام) أین ابن ابی قحافہ، أین ابن الخطاب؟ हज़रत उमर ने अबू सुफियान की बातों का जवाब दिया जिस से अबू सुफियान पर लरज़ा तारी हो गया और अबू सुफियान को पहाड़ से उतरने और मुसलमानों की तरफ मज़ीद पेशकदमी की हिम्मत नहीं हो सकी और वह मक्का की तरफ यह कह कर भाग खड़े हुए कि आइंदा साल यहाँ फिर आएँगे।

दूसरी वजह यह है कि कुफ्फार व मुशरेकीन ने जब मक्का की राह ली तो रास्ते में एक जगह पर यह लोग ठहर गए और उनमें दुबारा पलट कर फैसला कुन हमला करने के विषय पे बहस हो रही थी। यह इस पर बरहम थे कि ग़ालिब आने के बावजूद हमने मुसलमानों को छोड़ दिया यहाँ तक कि जब उन लोगों ने पलट कर दुबारा हमला करने और मुसलमानों को जड़ से उखाड़ फेंकने का पक्का इरादा कर लिया तो अल्लाह पाक ने उनके दिलों में मुसलामानों का रोब व जलाल पैदा कर दिया और वह दुबारा हमला करने के बजाए मक्का वापस हो गए।

कुछ मुफ़स्सेरीन ने यह फरमाया है कि यह वादा यौमे उहद के साथ ख़ास नहीं है बल्कि यह आम है इन हज़रात का स्टैंड यह है कि हालांकि वाकिया यौमे उहद को पेश आया लेकिन अल्लाह पाक जल्द ही मुसलमानों की हैबत कुफ्फार व मुशरेकीन के दिलों में पैदा फरमा देगा यहाँ तक कि वह मग्लूब और मकहूर होंगे और दीने इस्लाम को तमाम दिनों पर गलबा हासिल हो जाएगा और अल्लाह पाक ने अपना वादा पूरा कर दिखाया सदियों तक मुसलमान इस दुनिया के शासक रहे और दीने इस्लाम को तमाम दीनों और मज़हबों पर गलबा हासिल रहा।

(1) तफसीरे कबीर मा तहतुल आयह (2) तफसीरे अबी सऊद मा तहतुल आयह

इस आयत के तहत मुफ़स्सेरीन ने दूसरी बहस यह की है कि क्या जमीअ कुफ्फार के दिलों में अल्लाह पाक मुसलमानों का रोब पैदा फरमा देगा? या ख़ास उन कुफ्फार व मुशरेकीन के दिलों में जो उहद के दिन मुसलमानों से बरसरे पैकार रहे कुछ उलमा इसकी तरफ गए हैं कि यह आयत अपने ज़ाहिर पर महमूल है और इससे आम कुफ्फार व मुशरेकीन मुराद हैं और जमीअ मुफ़स्सेरीन का स्टैंड यह है कि इससे केवल वह कुफ्फार मुराद हैं जिन्होंने उहद के दिन बड़ी बेदर्दी के साथ मुसलमानों का खून बहाया (तफसीरे कबीर मा तहतुल आयह)

जमीअ मुफ़स्सेरीन के इस कौल से यह साफ़ ज़ाहिर है कि "سنلقی فی قلوب الذین کفروا الرعب" से हमारे देश या रुए जमीन के मौजूदा कुफ्फार व मुशरेकीन मुराद नहीं हैं।

इस आयत के दुसरे जुज़: مَاۤ  اَشْرَكُوْا  بِاللّٰهِ  مَا  لَمْ  یُنَزِّلْ  بِهٖ  سُلْطٰنًا से अल्लाह पाक ने कुफ्फार व मुशरेकीन के दिलों में मुसलमानों का रोब डालने की इल्लत बयान फरमाई है कि यह शिर्क की दिलदादा कौम है अल्लाह पाक ने इंसान को अशरफुल मख्लुकात बनाया है फ़ाज़िल मफज़ूल की परस्तिश करे न तो अक्ल इसे कुबूल करती है और न फितरत इसकी इजाज़त देती है अल्लाह पाक ने तमाम तर कुवत व अज़मत इंसान की फितरत में पैदा कर रखा है इसके बावजूद वह अपने से कमतर मखलूक की परस्तिश व इबादत करे, उसे अपना राज़िक और हाकिम माने यह ऐसे ही है जैसे शाहीन हो कर कुंजश्के फरोमाया की गुलामी इख्तियार करे। हासिल यह है कि खुदा की इबादत में किसी और को शरीक करना यह सबसे बड़ा ज़ुल्म है और ज़ाहिर है कि यह सबसे बड़ा जुर्म है और जब जुर्म बड़ा है तो सज़ा भी बड़ी होनी चाहिए जैसा कि अल्लाह पाक ने इस आयत के अखीर में इसका ज़िक्र फरमाया है।

وَعَدَكُمُ اللّٰهُ مَغَانِمَ كَثِیْرَةً تَاْخُذُوْنَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هٰذِهٖ وَ كَفَّ اَیْدِیَ النَّاسِ عَنْكُمْۚ-وَ لِتَكُوْنَ اٰیَةً لِّلْمُؤْمِنِیْنَ وَ یَهْدِیَكُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِیْمًاۙ( الفتح ۲۰) (2)

सुरह फतह की इस आयत में अल्लाह पाक ने मुसलमानों को बहुत ज़्यादा ग़नीमत अता करने का वादा फरमाया है और यह फरमाया है कि बहुत सी गनीमतों को हम ने तुम्हें जल्द अता कर दिया है इससे वह माले ग़नीमत मुराद है जो फतह ए खैबर के नतीजे में मुसलमानों के हाथ आया जिसका ज़िक्र अल्लाह पाक ने सुरह तौबा की आयत 19 में किया है फरमाता है: وَّ مَغَانِمَ كَثِیْرَةً یَّاْخُذُوْنَهَاؕ-وَ كَانَ اللّٰهُ عَزِیْزًا حَكِیْمًا और बहुत सी गनीमतें जिन को लें और अल्लाह इज्जत व हिकमत वाला है। (कंज़ुल ईमान)

सुरह फतह की इस आयत (20) में मगानिमे कसीरहसे वह गनीमतें मुराद हैं जो अल्लाह पाक ने कयामत तक मुसलमानो के हक़ में विशेष समय में मुकद्दर कर रखा है और کف ایدی الناس عنکمसे वह कौन लोग मुराद हैं जिनके हाथों को अल्लाह ने मुसलमानों तक पहुंचने से रोक दिया है और मुसलमानों की जान व माल इज्जत व आबरू की उनसे हिफाज़त की है?

इसमें दो कौल है पहला यह है कि इससे अहले खैबर और उनके हलीफ बनू असद और बनू गतफान मुराद हैं जिनमें अहले खैबर ही की संख्या सत्तर हज़ार की है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हुदैबिया से लौटे हुए एक महीने का भी समय नहीं हुआ था कि आपको खैबर के यहूदियों की नकल व हरकत की खबर मिली उन्होंने विशेषतः कबीला बनू गतफान के चार हज़ार जंगजू बहादुरों को भी अपने साथ यह कह कर मिला लिया था कि अगर मदीना फतह हो गया तो खैबर की पैदावार का आधा हिस्सा हमेशा बनू गतफान को देते रहेंगे लेकिन अल्लाह पाक ने उनके दिलों में मुसलमानों का रोब पैदा फरमा दिया और उन्होंने समझौता तोड़ दिया।

और दुसरा कौल यह है कि इससे अहले मक्का के हाथ मुराद हैं (तफसीर रुहुल बयान मा तहतुल आयह (2) तफसीर अबी सउद मा तहतुल आयह) सुलह हुदैबिया की दफआत की रौ से दोनों फरीक इसके पाबंद थे कि दस साल तक एक दुसरे के खिलाफ कोई जंगी इकदाम नहीं करेंगे इससे मुसलमानों को यह फायदा हासिल हुआ कि उन्हें यहूदियों के खिलाफ इकदाम करने के लिए एक अच्छा मौक़ा हाथ आ गया यहूद ए खैबर की कल्पना कि अब उन्हें अहले मक्का की पुश्त पनाही हासिल नहीं हो सकेगी बहुत जल्द हौसला हार बैठे और मुसलमानों के मुकाबले की ताब न ला कर शिकस्त से दोचार हुए इस तरह हुदैबिया के मुआहेदे के नतीजे में मुसलमानों के लिए आसानी के साथ खैबर की राह हमवार हो गई और यह हकीकत ज़ाहिर हो गई कि सुलह हुदैबिया मुसलामानों की शिकस्त नहीं बल्कि अज़ीम फुतुहात का दीबाचा और पेश खेमा है।

وَلِتَكُونَ آيَةٗ لِّلۡمُؤۡمِنِينَ وَيَهۡدِيَكُمۡ صِرَٰطٗا مُّسۡتَقِيمٗا: इस मुबारक आयत का मदलूल व मंतूक ताजील और कफ अर्थात हुदैबिया से लौटने के तुरंत बाद अल्लाह पाक ने जो तुम्हें खैबर की फतह अता फरमाई और उसके नतीजे में जो तुम्हें कसीर गनीमतें अता कीं और दुश्मन की दस्तरस को तुमसे रोक कर तुम्हारी हिफाज़त फरमाई इसमें मोमिनीन के लिए निशानी है। इस निशानी से मुसलमानों को इसकी पहचान हो जाएगी कि सुलह हुदैबिया की दफआत बज़ाहिर मुसलमानों की कमज़ोरी की तरफ इशारा करते हैं लेकिन वह दरपर्दा बड़ी बड़ी फुतुहात का पेशखेमा हैं। खैबर की फतह जिसका एक शानदार नमूना है और अभी मक्का भी फतह होगा हरम के दरवाजे मुसलमानों के लिए खुल जाएंगे, अरब व अजम इस्लाम के ज़ेरे नगी होंगे इस तरह हुजुर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम ने हहुदैबिया से वापसी के समय सहाबा से जो वादा फरमाया था कि यह सुलह तुम्हारे लिए खुली फतह है इसकी सदाकत मुसलमानों पर धीरे धीरे स्पष्ट होती चली जाएगी और यह आयते मुबारका मुसलमानों को सिराते मुस्तकीम अर्थात हर हाल में अल्लाह पर तवक्कुल और उस पर एतिमाद की राह दिखाए गी।

जारी----------

[To be continued]

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मौलाना बदरुद्दूजा रज़वी मिस्बाही, मदरसा अरबिया अशरफिया ज़िया-उल-उलूम खैराबाद, ज़िला मऊनाथ भंजन, उत्तरप्रदेश, के प्रधानाचार्य, एक सूफी मिजाज आलिम-ए-दिन, बेहतरीन टीचर, अच्छे लेखक, कवि और प्रिय वक्ता हैं। उनकी कई किताबें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे कुछ मशहूर यह हैं, 1) फजीलत-ए-रमज़ान, 2) जादूल हरमयन, 3) मुखजीन-ए-तिब, 4) तौजीहात ए अहसन, 5) मुल्ला हसन की शरह, 6) तहज़ीब अल फराइद, 7) अताईब अल तहानी फी हल्ले मुख़तसर अल मआनी, 8) साहिह मुस्लिम हदीस की शरह

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