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Parveen Shakir: Her Couplets from Different Gazals; Part 6; परवीन शाकिर : विभिन्न गज़लों से लिए गए शेर

प्रोफेसर मक्खन लाल, न्यू एज इस्लाम

29 दिसंबर 2021

परवीन शाकिर को ग़ज़लों की रानी कहा जाता है । उन्होंने एक से बढ़कर एक शेर कहे । ऊपर प्रकाशित संकलन में सभी गज़लों और नज़मों को समाहित करना तो संभव नहीं था । अतः उनके कुछ अच्छे चुनिन्दा शेर यहा अलग से संकलित किए गये हैं ।

मुतफ़र्रिक़ शेर

चली है थाम के बादल के हाथ को ख़ुशबू

हवा के साथ सफ़र का मुक़ाबला ठहरा

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ख़ुशबू बता रही है कि वो रस्ते में है

मौजे हवा के हाथ में इसका सुराग है

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हमें खबर है हवा का मिजाज़ रखते हो

मगर ये क्या, के ज़रा देर को रुके भी नहीं

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तू बदलता है तो बेसाख्ता मेरी आँखे

अपने हाथों की लकीरों से उलझ जाती हैं

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लो! मैं ऑंखें बंद किये लेती हूँ, अब तुम रुख़सत हो

दिल तो जाने क्या कहता है, लेकिन दिल का क्या कहना

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मैं जब भी चाहूँ, उसे छू के देख सकती हूँ

मगर वो शख्स़ के लगता है अब भी ख़्वाब ऐसा

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हाल पूछा था उसने अभी

और आंसू रवां हो गये

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हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ

दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं

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वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा

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मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी

वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

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अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है

जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की

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चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया

इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया

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इतने घने बादल के पीछे

कितना तन्हा होगा चाँद

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अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं

अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

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कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उसने

बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की

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इक नाम क्या लिखा तिरा साहिल की रेत पर

फिर उम्र भर हवा से मेरी दुश्मनी रही

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दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं

देखना है खींचता है मुझ पे पहला तीर कौन

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वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी

इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

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कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी

दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

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हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा

क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा

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यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर

जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना

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बारहा तेरा इंतिज़ार किया

अपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह

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वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया

बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की

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अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई

और बिखर जाऊँ तो मुझ को न समेटे कोई

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कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी

मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी

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बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात की

और हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए

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बहुत से लोग थे मेहमान मेरे घर लेकिन

वो जानता था कि है एहतिमाम किस के लिए

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काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में

मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई

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कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आए

और कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी

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उस के यूँ तर्क-ए-मोहब्बत का सबब होगा कोई

जी नहीं ये मानता वो बेवफ़ा पहले से था

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अपने क़ातिल की ज़ेहानत से परेशान हूँ मैं

रोज़ इक मौत नए तर्ज़ की ईजाद करे

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पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता है

फैलता जाता है फिर आँख के काजल की तरह

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जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें

बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए

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मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई

वो शख़्स आ के मिरे शहर से चला भी गया

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हाथ मेरे भूल बैठे दस्तकें देने का फ़न

बंद मुझ पर जब से उस के घर का दरवाज़ा हुआ

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हारने में इक अना की बात थी

जीत जाने में ख़सारा और है

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बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की

चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी

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काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

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कभी कभार उसे देख लें कहीं मिल लें

ये कब कहा था कि वो ख़ुश-बदन हमारा हो

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कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है

चिड़ियों को बहुत प्यार था उस बूढे शजर से

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मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो

मुझे मेरी रज़ा से माँगता है

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जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा

उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

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तू बदलता है तो बे-साख़्ता मेरी आँखें

अपने हाथों की लकीरों से उलझ जाती हैं

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अब्र बरसे तो इनायत उस की

शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है

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कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की

उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की

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गवाही कैसे टूटती मुआमला ख़ुदा का था

मिरा और उस का राब्ता तो हाथ और दुआ का था

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कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े

तेरा मे'यार बदलता है निसाबों की तरह

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तुझे मनाऊँ कि अपनी अना की बात सुनूँ

उलझ रहा है मिरे फ़ैसलों का रेशम फिर

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मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर

हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

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मसअला जब भी चराग़ों का उठा

फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

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ये क्या कि वो जब चाहे मुझे छीन ले मुझ से

अपने लिए वो शख़्स तड़पता भी तो देखूँ

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अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ

इक ज़रा शेर कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ

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न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है

कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया

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उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा

रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की

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चेहरा ओ नाम एक साथ आज न याद आ सके

वक़्त ने किस शबीह को ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया

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एक मुश्त-ए-ख़ाक और वो भी हवा की ज़द में है

ज़िंदगी की बेबसी का इस्तिआरा देखना

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यूँ देखना उस को कि कोई और न देखे

इनआम तो अच्छा था मगर शर्त कड़ी थी

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ज़ुल्म सहना भी तो ज़ालिम की हिमायत ठहरा

ख़ामुशी भी तो हुई पुश्त-पनाही की तरह

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जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे

चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे

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तिरी चाहत के भीगे जंगलों में

मिरा तन मोर बन कर नाचता है

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नहीं नहीं ये ख़बर दुश्मनों ने दी होगी

वो आए आ के चले भी गए मिले भी नहीं

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किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल

बहाने से मुझे भी टालता है

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जिस जा मकीन बनने के देखे थे मैं ने ख़्वाब

उस घर में एक शाम की मेहमान भी न थी

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रस्ते में मिल गया तो शरीक-ए-सफ़र न जान

जो छाँव मेहरबाँ हो उसे अपना घर न जान

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क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला

ज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला

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वो मेरे पाँव को छूने झुका था जिस लम्हे

जो माँगता उसे देती अमीर ऐसी थी

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अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई

बहुत दिनों से तो ये हौज़ साफ़ भी न हुआ

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रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना था

ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया

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तेरे पैमाने में गर्दिश नहीं बाक़ी साक़ी

और तिरी बज़्म से अब कोई उठा चाहता है

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ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तो

तेरे कहने में रहा करती है

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ख़ुद अपने से मिलने का तो यारा न था मुझ में

मैं भीड़ में गुम हो गई तन्हाई के डर से

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दिल अजब शहर कि जिस पर भी खुला दर इस का

वो मुसाफ़िर इसे हर सम्त से बर्बाद करे

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रफ़ाक़तों के नए ख़्वाब ख़ुशनुमा हैं मगर

गुज़र चुका है तिरे ए'तिबार का मौसम

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ये हवा कैसे उड़ा ले गई आँचल मेरा

यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी

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पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन

दस्त-बस्ता शहर में खोले मिरी ज़ंजीर कौन

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बोझ उठाते हुए फिरती है हमारा अब तक

ऐ ज़मीं माँ तिरी ये उम्र तो आराम की थी

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तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ

ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ साथ

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शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद

कूचा-ए-जाँ में सदा करती है

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आमद पे तेरी इत्र ओ चराग़ ओ सुबू न हों

इतना भी बूद-ओ-बाश को सादा नहीं किया

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वक़्त-ए-रुख़्सत आ गया दिल फिर भी घबराया नहीं

उस को हम क्या खोएँगे जिस को कभी पाया नहीं

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मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तन्हाई में

बे-रिदाई को मिरी फिर दे गया तश्हीर कौन

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मक़्तल-ए-वक़्त में ख़ामोश गवाही की तरह

दिल भी काम आया है गुमनाम सिपाही की तरह

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जंग का हथियार तय कुछ और था

तीर सीने में उतारा और है

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पलट कर फिर यहीं आ जाएँगे हम

वो देखे तो हमें आज़ाद कर के

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(प्रोफ़ेसर मक्खन लाल एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरातत्ववेत्ता, इतिहासकार हैं। आप कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सीनियर फ़ैलो, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्यापक, दिल्ली विरासत अनुसन्धान एवं प्रबंधन संस्थान के संस्थापक निदेशक, विश्व पुरातत्व कॉंग्रेस के कोषाध्यक्ष और एकादमिक प्रोग्राम के कोर्डिनेटर रहे हैं। आपके विभिन्न विषयों पर 200 शोध पत्र छप चुके हैं तथा 23 किताबें आ चुकी हैं। इनकी साहित्य में विशेष रुचि है।)

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URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/parveen-shakir-different-gazals-part-6/d/126054

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