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Hindi Section ( 22 Jun 2021, NewAgeIslam.Com)

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False Authority of Men over Women: Part 6 स्त्री और उन पर पुरुषों की झूठी फ़ज़ीलत: भाग-6

मौलवी मुमताज़ अली की माया नाज़ तसनीफ हुकूके निसवां

उर्दू से अनुवादन्यू एज इस्लाम

विरासत के विभाजन में शरई हिस्सेदारी मर्दों की फजीलत का सुबूत नहीं बल्कि महिलाओं की फजीलत की दलील हैं। हम आरोप उनको देते थे दोष अपना निकल आया। हज़रत आदम को पहले पैदा करने के आधार पर जो तर्क स्थापित की गई है वह इस प्रकार की बात है जैसे बच्चे खिसियाने हो कर बाते करते हैं। हम कहते हैं कि खुदा पाक को यह मंज़ूर नहीं था कि महिला एक दम भी बिना खिदमत गुज़ार के रहने की जहमत उठाए। इसलिए उसके आराम के लिए सबसे पहले आदम को पैदा किया फिर उसकी बीवी को।

अगर सही में पुछा जाए तो यह अकीदा कि पहले आदम पैदा हुए। फिर हव्वा ईसाईयों और यहूदियों का अकीदा है। इस्लाम धर्म में इसकी कोई असलियत नहीं है। कुरआन से आदम और इसके जोड़े के पैदाइश में कोई अग्रिम और देरी साबित नहीं है। पुरुषों के लिए एक समय में चार महिलाओं का निकाह जायज़ होना और इसके वपरीत जायज़ ना होना केवल गलत बयानी और वर्चस्व की बात है। मुश्किल यह है कि लोग शब्दों की पैरवी पर मरते हैं और बजाए इसके मानी सुखन और हकीकत मुरादे इलाही तक ले जाएं इस्तेलाहों की बहस पसंद करने हैं और मुखालिफ को चुप कर देना बहस का उद्देश्य समझते हैं। लोगों ने कुरआन मजीद में पढ़ा कि फनकिहू माँ ताबा लकुम मिन निसा मसना व सलासा व रुबाअ और खुश हो गए कि कुरआन मजीद में चार बीवियां तक निकाह में लाने की इजाजत साफ़ मौजूद है। हालांकि अगर ज़रा गहरी निगाह से देखा जाए तो कुरआन मजीद से कोई इस प्रकार की साफ़ इजाजत नहीं निकलती बल्की एक समय में एक से अधिक निकाह करना बिलकुल जायज़ साबित होता है और इसका प्रतिबद्ध करने वाला हराम कार ठहरता है।

सर्वप्रथम तो यह आयत बहुत ही संक्षिप्त है। खुदा का यह आदेश यह नहीं दर्शाता है कि चार महिलाओं से इस तरह शादी करना जायज़ है कि उनका एक बार में विवाह हो। या इस तरह से कि एक की मृत्यु के बाद दूसरा होता है और दूसरे की मृत्यु के बाद तीसरा विवाह होता है और तीसरे की मृत्यु के बाद चौथे और चौथे विवाह के बाद विवाह का पूर्ण निषेध हो। या यह मुरादे इलाही हो कि अगर इत्तेफाक से किसी शारीरिक विकलांगता से बीवी अपने कर्तव्यों को पूरा करने के काबिल ना रहे तो दुसरा निकाह और उसके विकलांग होने पर तीसरा निकाह। इस सादृश्य के अनुसार विवाह तक जायज़ रखे गए हों या शायद यह उद्देश्य हो कि पहली पत्नी को तलाक़ दे कर दूसरी और दूसरी को तलाक़ दे कर तीसरी और तीसरी को तलाक दे कर चौथी बीवी से निकाह किया जा सकता है इससे अधिक निकाह जायज़ नहीं हैं। या शायद कुरआनी उद्देश्य यह हो कि दूसरी शादी पहली बीवी की या उसके अजीजों की रज़ा मंदी की शर्त से अमल में आना चाहिए। चूँकि उल्लेखनीय आयत में कोई अम्र ऐसा नहीं जिससे उन अलग अलग अर्थ में से कोई अर्थ वाहिदुल तसरीह हो सकें इसलिए हम इस आयत को मुजमल करार देते हैं जो मुफीदे कतइयत नहीं हो सकती। और बिना वजह वह किसी हुक्म शरई के लिए नस नहीं है। हमारे उलेमा इसको स्वीकार करें या ना करें मगर हमें विश्वास है कि अग्लब एह्तिमाल यह है कि पहली बीवी और उसके करीबियों की रजामंदी शर्त है। इस यकीन के लिए रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अमल हमारे लिए काफी दलील है। सहीह बुखारी की एक हदीस है जिसका खुलासा ए मज़मून यह है कि हज़रत अली ने हजरत फातमा की मौजूदगी में इरादा किया था कि अबू जेहल की लड़की से जिसने इस्लाम कुबूल कर लिया था निकाह कर लें। इसलिए उस लड़की के रिश्तेदारों ने जनाब रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इस बात की इजाजत तलब की। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बहुत गुस्सा आया और आपने मिम्बर पर बैठ कर खुतबा पढ़ा जिसमें बयान किया कि यह लोग मुझसे इजाजत चाहते हैं कि मेरी बेटी के होते हुए किसी को अपनी निकाह में दे सो मैं नहीं इजाजत देता। नहीं इजाजत देता, नहीं इजाजत देता। हाँ अली को ऐसा ही करना मंज़ूर है तो मेरी बेटी को तलाक दे दे और दूसरी बीवी कर ले यह मेरी लखते जिगर है। जो इससे बुराई करेगा वह मुझसे बुराई करेगा जो इसको सताएगा वह मुझको सताए गा। इस हदीस से साफ ज़ाहिर होता है कि कुछ लोगों ने कुरआनी हुक्म से यह समझा था कि दुसरे निकाह के लिए इजाजत जैसा की उपर ज़िक्र किया गया हासिल करना आवश्यक है। और रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इन्कारे शदीद से साबित होता है कि इजाजत देना ना देना दुसरे पक्ष की अपनी ख़ुशी पर निर्भर है अगर इलाही हुक्म के बिना रज़ा मंदी पहली बीवी की रज़ा निकाहे सानी की इजाजत देता तो जनाब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह कार्य मआज़ अल्लाह खिलाफे हुक्मे खुदावन्दी ठहरेगा। इसके अलावा हम निकाह के बाब में साबित करेंगे हमारे उलमा मुहद्देसीन ने जायज़ रखा है कि बरवक्त निकाहे औरत यह शर्त कर ले कि पति निकाह सानी नहीं करेगा। इस शर्त का जवाज़ खुद ज़ाहिर करता है कि दुसरा निकाह पहली बीवी की रजामंदी पर निर्भर है। अगर यह रजामंदी शर्त ना होती तो वह निकाह भी ऐसी शर्त ठहरानी जायज़ ना होती। और न वह निकाह के बाद शरअन वाजिबुल निफाज़ होती।

इसलिए कुरआन मजीद से कोई इजाजत साधारणतः चार निकाहों की जिस तरह लोगों ने समझ रखा है नहीं निकलती। बल्की मसला आम निकाह के बाब में कुरआन मजीद का बिलकुल खामोशी साबित होता है।

दुसरे इस आयत में साफ़ अदल की सख्त और तामील न किये जाने लायक शर्त लगाई गई है और फरमाया है कि अगर खौफ हो कि अदल ना हो सकोगे तो केवल एक निकाह लाज़िम है। अब सवाल यह है कि अदल में कौन कौन से मामले दाखिल हैं और इंसान से अदल का होना असंभव है या नहीं। कायलीन तो अजदवाज नान व नफका और दुसरे मसारिफ व मकाने सुकूनत व शब बाशी की नौबत में मसावात मतलूब के मुद्दई हैं और हम इन मामलों में मोहब्बते कल्बी व हमदर्दी भी जो असल उसूले निकाह है दाखिल हैं। हम इस बात के भी मुद्दई हैं कि इस किस्म का अदल इंसान से असंभव है। हमारे विरोधी एतिराज़ करते हैं कि जो मामला तामील के काबिल ही न हो उसके जवाज़ के ज़िक्र से क्या फायदा मिलता है और अगर कुछ फायदा नहीं तो हुक्मे इलाही बेकार ठहरता है। हमारा जवाब यह है कि निकाह की असली गरज यह है कि इंसान अपने लिए तमाम उम्र के वास्ते अपना सच्चा हमदर्द व मोनिस व गमगुसार पैदा करे जो उसके साथ रंज व राहत में शरीक होने वाला और दुनिया के बखेड़ों से फारिग होने के बाद उसकी तसकीने कल्ब का ज़रिया हो। (जारी)

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