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False Authority of Men over Women: Part 4 महिलाएं और उन पर पुरुषों की झूठी फ़ज़ीलत: भाग-4

मौलवी मुमताज़ अली की माया नाज़ तसनीफ हुकूके निसवां

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

दूसरे, स्त्री की रचना ऐसी है कि कोई भी कठिन कार्य जिसमें वर्षों की मेहनत और घर और परिवार से पूर्ण अलगाव की आवश्यकता होती है, उसे महिला के कर्तव्यों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार की सेवाओं से महिलाओं को बरी रखना उनकी ऊँची शान को जतलाना और इस बात को जाहिर करता है कि चाहे पुरुष महिलाओं से आराम पाने के लिए हैं और महिलाएं पुरुषों से। और महिलाओं का आराम व आशाइश अल्लाह ने अधिक मुकद्दम समझा।

तीसरा, हम सामान्य रूप से पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता के प्रति आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन हम आश्वस्त हैं कि पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई व्यक्तिगत अंतर नहीं है। केवल अस्थायी कारणों से, कभी-कभी कुछ महिलाएं कुछ महिलाओं पर वरीयता लेती हैं, कुछ पुरुष कुछ पुरुषों पर वरीयता लेते हैं, कुछ पुरुष कुछ महिलाओं पर वरीयता लेते हैं, और कुछ महिलाएं कुछ पुरुषों पर वरीयता लेती हैं। इसलिए, कुछ लोगों की श्रेष्ठता से एक पुरे वर्ग की श्रेष्ठता दुसरे पुरे वर्ग पर अनिवार्य नहीं आती। बात यह है कि जिस तरह नबी बनने वाले पुरुषों की श्रेष्ठता या गुण महिलाओं से श्रेष्ठ साबित होंगे, उसी तरह यह तर्क गैर-नबी पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई वास्तविक अंतर साबित नहीं करेगा, जो कि पुरुष वर्ग की श्रेष्ठता के प्रमाण में थोड़ी भी मदद कर सकता। क्या जो सम्मान हज़रत आमना को हासिल है कि उनके गर्भ में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने परवरिश पाई या जो श्रेष्ठता हर नबी की मां को इस बात से हासिल हुई कि उसके गर्भ से नबी पैदा हुआ और दुनिया भर की तमाम महिलाओं को हासिल हो सकती है। हरगिज़ नहीं। यह सम्मान जिन खुश नसीब महिलाओं के लिए पहले दिन से निश्चित की गई थी वह उन्हें ही मिली। क्या हुआ कि दुनिया की और औरतें भी इस महिला वर्ग से हैं जिसमें से वह थीं। इसी तरह क्या यह सहीह हो सकता है कि जो सम्मान अम्बिया हजरत अहदीस से अता हुई उस सम्मान के किसी भाग को दुनिया के तमाम मर्द ख़ास अपनी तरफ मंसूब करें केवल इस वजह से कि हमारी सुरत शक्ल नाक कान भी नबियों के से हैं। ला हौला वाला कुव्वता इल्ला बिल्लाह। کار پاکاں راقیاس ازخود مگیر ۔ورنشتن گرچہ ماندشیر وشیر

मनकूल तर्कों का जवाब :

उपरोक्त अकली तर्क के बाद जो कुछ मनकूल कथन बयान किये जाते हैं उनकी या कुछ असलियत ही नहीं या उनसे वह मतलब नहीं निकलता जो इन कथनों से प्रमाण लाने वाले निकालना चाहते हैं।

कुरआन से पुरुषों के गुणों का सबसे बड़ा प्रमाण वह आयत है जिसमें कहा गया है: الر جال قوامون علی النسا بما فصل اللہ بعضہم علی بعض وبما انفقو من امو الہم जिसका अर्थ है कि पुरुष महिलाओं पर शासन करते हैं क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को दूसरों पर श्रेष्ठता दी है और उन्होंने अपना धन खर्च किया है। इस आयत की तफसीर में मुफस्सिर लिखते हैं कि मनुष्य में दो प्रकार के गुण होते हैं। एक विचारधारा की ताकत और इल्म की ताकत मजबूत होने की वजह से उनको बिल्जात हासिल है। दूसरी यह श्रेष्ठता कि पुरुष महिलाओं को मसारिफ जैसे रोटी कपड़ा आदि देते हैं। मगर हमको इस तफसीर के साथ इत्तेफाक नहीं है क्योंकि पहला तो यह कि कव्वामका अनुवाद हाकिम शब्द के तौर पर करना हमारी राय में सहीह नहीं है और सिवाए मौलाना शाह अब्दुल कादिर के किसी ने यह अनुवाद इख्तियार नहीं किया। शाह रफीउद्दीन साहब ने कव्वाम का अनुवाद कयाम रखने वाला किया है। उनके पिता शाह वलीउल्लाह साहब रहमतुल्लाह अलैह ने तदबीर कार कुनिंदा अनुवाद किया है। एक और फ़ारसी अनुवाद में जो साअदी के अनुवाद के नाम से प्रसिद्ध है कव्वामका अनुवाद कारगुजार किया गया है। दुसरे इस अनुवाद से यह ज़ाहिर नहीं होता कि कुछ को कुछ पर श्रेष्ठता देने का क्या अर्थ अगर पहले कुछ से कुछ पुरुष मुराद हैं और दुसरे कुछ से कुछ महिलाएं तो सब पुरुषों की श्रेष्ठता सब महिलाओं पर साबित नहीं है अगर दोनों जगह पुरुषों की तरफ इशारा है तो इस बात के कहने से कुछ पुरुष कुछ पुरुषों पर श्रेष्ठता रखते हैं। पुरुषों की श्रेष्ठता महिलाओं पर किस तरह साबित हो सकती है। तीसरे अगर बाज़ुहुममें ज़मीर हुमइंसानों की तरफ राजेअ समझें और पहले बाज़ से इस तरह कुल महिलाऐं मुराद हों तब भी इस आयत से पुरुषों की कोई असली व खल्की व फितरी श्रेष्ठता साबित नहीं होती क्योंकि पहले इससे यह मालुम नहीं होता कि किस बात में फजीलत है। दुसरे अगर यह समझा जावे कि आयत के पहले हिस्से में नजर और इल्म की ताकत मुराद है और दुसरे हिस्से में नान व नफ्का देने की श्रेष्ठता मुराद है तो तब यह एतेराज़ होगा कि यह फ़ज़ीलत इस नैतिक अंतर पर आधारित नहीं है जो एक महिला को एक पुरुष से अलग करता है। इसलिए, हम इस कारण को फ़ज़ीलत के कारणों में शामिल नहीं कर सकते। शिक्षा और प्रशिक्षण से उत्पन्न ज्ञान या उदारता या अन्य विशेषताओं के मामले में स्त्री पर पुरुष की श्रेष्ठता एक और बात है और स्त्री पर पुरुष की श्रेष्ठता पुरुष होने की दृष्टि से दूसरी बात है। पहला अधिग्रहित है और दूसरा प्राकृतिक है। कई महिलाएं ऐसी होंगी जिनके पास सैद्धांतिक पुरुषों की तुलना में ये अर्जित गुण अधिक होंगे, और उस स्थिति में इन महिलाओं की पुरुषों पर श्रेष्ठता होगी। क्या कोई यह कह सकता है कि अबू जहल की कुव्वते नजरिया इल्मिया की शक्ति हजरत खातूने जन्नत खदीजतुल कुबरा की तुलना में अधिक थी? या अबू लहब में यह गुण हज़रत फातमा से अधिक थीं। या तमाम पुरुष उनका हिस्सा कसीर इरफाने इलाही और खुदा शनासी की सिफत में राबिया बासरी से वरीयता और श्रेष्ठता रखता है। सामान रूप से देखा जाए तो बाप बेटों को गुज़ारा देता है। आका नौकर को खर्च देता है फिर क्या इससे यह परिणाम निकाल सकते हैं कि आका को नौकर पर व्यक्तिगत श्रेष्ठता है। हरगिज़ नहीं अगर ज़माने के इत्तेफाक से आका नौकर और नौकर उसका आका हो जाए तो यह फजीलत बिलकुल उलटी हो जाएगी। हालांकि ऐसा होना जाती होने के लवाज़िम के खिलाफ है। पस इस आयत से मर्दों की बिलकुल फजीलत साबित नहीं होती।

ज़िक्र किये गए आयत के शब्द बिलकुल स्पष्ट हैं। कौम मुबालगे का सेगा है जो शख्स कारोबार के इंतज़ाम और मामलों के एहतिमाम की वजह से बैठने की मोहलत न पाता हो और उसके अधिकतर औकात कयाम में गुजरते हों वह कव्वाम कहलाता है चूँकि मर्दों को मईशत हासिल करने के लिए दूर दूर देशों में फिरना। (जारी)

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