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Hindi Section ( 21 Jul 2022, NewAgeIslam.Com)

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Debunking Islamophobic and Jihadi Myths about 26 Wartime Verses: Part 1 on Verse 9:5 कुरआन मजीद की 26 जंगी आयतों के बारे में इस्लामोफोबिक और जिहादियों की गलतफहमियों का खात्मा: पहली क़िस्त आयत 9:5 पर

कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

26 मार्च 2022

प्रमुख बिंदु:

1. आयत 9:5 मुसलमानों और मुशरिकीने मक्का के बीच जंग के एतेहासिक संदर्भ में नाज़िल हुई थी।

2. आयत 9:5 का लागू होना वर्तमान स्थिति पर अनुकूल नहीं जहां ऐसा कानून मौजूद है जो धार्मिक अत्याचार की अनुमति नहीं देती।

3. आयत 9:5 में शब्द मुशरिकीन से मुराद वह लोग हैं जिन्होंने अमन समझौते का उल्लंघन किया और मुसलमानों पर हमला किया।

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कुछ लोगों ने हाल ही में कुरआन करीम की 26 आयतों पर आपत्ति जताई है, इसके बावजूद कि वह मुसलमानों और मुशरिकीने मक्का के बीच जंग के एतेहासिक संदर्भ में नाज़िल हुई थी। इस हकीकत के बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से उनकी अपीलें रद्द कर दी गईं, कुछ सोशल मीडिया उपभोक्ता इन आयतों के बारे में गुमराह करने वाले मालूमात फैलाते रहते हैं। दीनियात की एक आम छात्रा होने की हैसियत से, मैंने इन आयतों के बारे में अपनी तहकीक और समझ की बुनियाद न्यू एज इस्लाम वेबसाईट पर प्रकाशित लेखों और व्याख्या पर रखी है। मैं उम्मीद करती हूँ कि अधिक से अधिक लोग सच्चाई के बारे में और अवगत हो जाएंगे और गलत जानकारी फैलाने से बचेंगे, क्योंकि झूट बोलना तमाम धर्मों और अकीदों के निज़ामों में मना है।

उस 26 आयतों में पहले हम सुरह तौबा की आयत 5 पर बातचीत करेंगे जिसे सबसे अधिक संदर्भ से हट कर पेश किया जाता है। आयतें करीमा में अल्लाह पाक इरशाद फरमाता है:

फिर जब हुरमत के चार महीने गुज़र जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ पाओ (बे ताम्मुल) कत्ल करो और उनको गिरफ्तार कर लो और उनको कैद करो और हर घात की जगह में उनकी ताक में बैठो फिर अगर वह लोग (अब भी शिर्क से) बाज़ आऎं और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दे तो उनकी राह छोड़ दो (उनसे ताअरूज़ न करो) बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है (सुरह तौबा आयत 5)

उपर्युक्त आयत सुरह तौबा की आयत है जिसे अच्छी तरह समझने के लिए सबसे पहले जरुरी है कि इस सुरह के शाने नुज़ूल अर्थात इस सुरह के नाज़िल होने के कारण और बैकग्राउंड को समझें ताकि इस आयत के संबंध में जो गलत फहमियाँ फैलाई जा रही हैं उन्हें दूर किया जा सके।

मदरसा अरबिया अशरफुल उलूम खैराबाद, जिला मउ, यूपी (इंडिया) के सीनियर उस्ताद मौलाना बदरुद्दुजा रजवी मिस्बाही ने 26 आयतों के बारे में जो बदगुमानियां फैलाई जा रही हैं उसके संबंध में सोलह किस्तों पर आधारित एक बहुत उम्दा और जामेअ सीरीज लिखी है जिसे न्यू एज इस्लाम पर तीनों भाषाओं में प्रकाशित किया जा चुका है। वह अपने लेख में लिखते हैं:

सुरह बकरा की प्रारम्भिक 30 या 40 आयतों का नुज़ूल मक्का फतह के बाद 9 हिजरी में हुआ मुसलमानों ने अल्लाह पाक की इजाज़त और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इत्तेफाक से मुशरिकीने मक्का और दुसरे अरब कबीलों से जंग बंदी का समझौता कर रखा था जिसकी पासदारी दोनों पक्षों पर जरूरी थी मुसलमान इस वादे पर अमल करते रहे लेकिन बनू ज़मरा और बनू किनाना को छोड़ कर दुसरे मुशरिकीने मक्का और अरब कबीलों ने वादा तोड़ा जिसका ज़िक्र सुरह तौबा की आयत नंबर 4 में सराहत के साथ मौजूद है यहाँ तक कि सुलह हुदैबिया के आखरी समझौते को भी उन्होंने पीछे डाल दिया जिसकी दफआत बज़ाहिर मुसलमानों की कमजोरी की तरफ इशारा करती थीं। इस विकसित दौर में गैर मुस्लिम दुनिया भी वादों का एहतेराम करती है और वादे को पूरा करने को हर हाल में लाज़िम करार देती है और इस्लाम में तो पूरा करने को की सख्त ताकीद की गई है कुरआन मजीद में जा बजा अहद व पैमान पर अमल आवरी (वादा पूरा करने) का हुक्म दिया गया है और यहाँ तक फरमाया गया है कि तुम अहद पूरा करो बेशक अहद (वादे के बारे में) से सवाल होगा। وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا ( بنی اسرائیل ، آیت: 34

लेकिन ज़ाहिर है कि जब एक पक्ष वादा तोड़ने पर उतर आता है तो वादा खुद बखुद साकित हो जाता है यानी वादा टूट जाता है और यही यहाँ पर भी हुआ, जब मुशरिकीने मक्का की अहद शिकनी सामने आ गई तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अबुबकर रज़ीअल्लाहु अन्हु को 9 हिजरी में हज के मौके पर हज का अमीर बना कर मक्का मुकर्रमा रवाना फरमाया और उनके पीछे अजबा (ऊंटनी) पर सवार कर के हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु को भी मक्का मुकर्रमा भेजा अबू बकर सिद्दीक रज़ीअल्लाहु अन्हु ने यौमे तर्विया (8/ जिल हिज्जा) को खुतबा इरशाद फरमाया जिसमें आप ने मनासिके हज बयान फरमाए और यौमे नहर 10/ जिल हिज्जा) को हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने जुमरा उक्बा के पास खड़े हो कर मुशरिकीने मक्का को खिताब करते हुए फरमाया: ऐ लोगों! मैं तुम्हारी तरफ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरिस्तादा बन कर आया हूँ मुशरिकीन ने कहा: आप हमारे लिए क्या पैगाम ले कर आए हैं? इसके जवाब में हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने सुरह तौबा की शुरूआती 30 या 40 आयतें तिलावत फरमाई और फरमाया कि मैं तुम्हारे पास चार बातों का हुक्म ले कर आया हूँ (1) इस साल के बाद कोई मुशरिक काबा शरीफ के पास न आए (2) कोई शख्स नंगा हो कर काबा शरीफ का तवाफ़ न करे (3) जन्नत में सिवाए अहले ईमान के कोई दाखिल नहीं होगा (4) हर ज़िम्मी के अहद को पूरा किया जाएगा (तफसीर अबी सऊद: 4, पेज: 4

बताए गए विवरण से यह साफ़ हो गया कि आयत नंबर 5 में जिन मुशरिकीन को अशहुरे हरम के बाद मारने या उनसे जंग करने का हुक्म दिया गया है इससे आम कुफ्फार व मुशरिकीन मुराद नहीं हैं बल्कि इसका संबंध उन मुशरिकीने अरब से है जिन्होंने मुसलमानों से न केवल यह कि अहद शिकनी की बल्कि दावते इस्लाम की पामाली के लिए अपनी तमाम नापाक कोशिशें लगा दीं जैसा कि فاقتلوا المشرکینकी तफसीर में साहबे तफसीर अबी सऊद फरमाते हैं: الناکثین خاصۃ فلایکون قتال الباقین مفھوما من عبارۃ النص بل من دلالتہ [तफसीर अबी सऊद जिल्द: 4, पेज 43] (अर्थात इससे केवल वह मुशरिकीन मुराद हैं जिन्होंने अहद शिकनी की। रही बात बाकी मुशरिकीन की तो उनसे किताल करना मुराद नहीं जैसा कि नस की इबारत से स्पष्ट है बल्कि द्लालातुल नस से भी स्पष्ट है)

और कुरान की तफसीर जिसे तफसीरे मदारिक कहा जाता है, (हिंदुस्तान के मदरसों में भी पढाया जाता है) इसमें भी ये बात लिखी है कि इस आयत में मुशरिकिन से मुराद वो लोग हैं जिन्होंने अहद व पैमान (यानी अमन का वादा जो किया था) उसे तोड़ दिया और मुसलमानों पर हमला किये थे الذین نقضوکم و ظاھروا علیکم [तफसीर अल नफ्सी, जिल्द:2 पेज:116, अस्हुल मुताबे मुंबई]

बल्की इस सूरत में अव्वल से आखिर तक खिताब उन्हीं कुफ्फार व मुशरिकीन के साथ है जिन्होंने अपने अहद की पासदारी नहीं की जैसा कि इससे अगली आयत की तफसीर में तफसीर अबी सउद के लेखक फरमाते हैं: المراد بالمشرکین الناکثون لان البراءۃ انما ھی فی شانھم [एज़न पेज:44]

इन मुस्तनद और मोतबर तफ्सीरात से यह साफ़ हो गया कि सुरह तौबा की इस आयते मुबारका में जो मुशरिकीन व कुफ्फार को क़त्ल करने और वह जहां मिलें वहाँ उन्हें मारने और धर पकड़ का जो हुक्म दिया गया है उससे आम कुफ्फार व मुशरिकिन और बिराद्राने वतन (यानी हिंदुस्तान के हमारे हिन्दू भाई) मुराद नहीं हैं जैसा कि वसीम रिज़वी और इस्लाम दुश्मन तत्व प्रोपेगेंडा कर रहे हैं बल्कि इससे ख़ास गुज़रे हुए ज़माने के वह मुशरिकीने मक्का और अरब कबीले मुराद हैं जिन्होंने मुसलमानों के साथ क़त्ल व गारत गिरी, धोका धड़ी और अहद शिकनी जैसे भयानक अपराध का प्रतिबद्ध किया कुरआन हरगिज़ इस अम्र का दाई नहीं है कि बिलावजह चलते फिरते निर्दोष या दुसरे लोगों पर कलाशंकोफ़ से गोलियां बरसाई जाएं और सैंकड़ों बच्चों को यतीम और औरतों के सरों से सुहाग की रिदाएँ छीन ली जाएं कुरआन तो इसका दाई है कि अगर एक इंसान ने बिलावजह किसी भी इंसान की जान ले ली चाहे वह किसी भी मज़हब का इत्तेबा करने वाला हो तो गोया कि वह रुए जमीन के तमाम इंसानों का कातिल है और अगर किसी ने किसी भी मजलूम व मकहूर कमज़ोर और नातवां इंसान की जान बचाई तो गोया कि उसने रुए ज़मीन के तमाम इंसानों की जान बचाने का काम किया कुरआन फरमाता है: مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًاۚ

जिसने कोई जान क़त्ल की बिना जान के बदले या ज़मीन में फसाद फसाद के तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल किया और जिसने एक जान को जिला लिया उसने गोया सब लोगों को जिला लिया (कन्जुल ईमान) बल्कि अगर कहीं पर सहीह तरह इस्लामी हुकूमत का निज़ाम नाफ़िज़ हो तो वहाँ पर गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक की जान व माल और अधिकार इतने ही सुरक्षित हैं जितने कि मुस्लिम अक्सरियत की जान व माल और अधिकार सुरक्षित हैं उन्हें भी अपने मज़हब पर अमल करने और इबादत खाने की तामीर का वही हक़ हासिल है जो मुस्लिम बहुसंख्यक को हासिल है जो जैसा कि हुजूर सैयद आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया مَنْ قَتَلَ مُعَاهِدًا فِي غَيْرِ كُنْهِهِ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ" (अल मुस्तदरक लिल हाकिम, जिल्द:2 पेज:142, किताब कस्मुल फइ, दारुल मार्फा, बैरुत, लेबनान)

जिसने किसी मुआहिद को बिना अपराध क़त्ल किया उस पर जन्नत हराम है

और एक और जगह पर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं مَنْ قَتَلَ نفسا مُعَاهَدۃ لَمْ يَرَحْ رَائِحَةَ الْجَنَّةِ، وَإِنَّ رِيحَهَا لیوجَدُ مِنْ مَسِيرَةِ خمسمائۃ عام ‏"‏‏.‏(جمع الجوامع للسیوطی، ج: 9، ص: 721، دار السعادۃ،)

जिस शख्स ने किसी मुआहिद (वो शख्स जिसने आपके साथ अमन व शान्ति से रहने का वादा किया है उसको) को क़त्ल किया वह जन्नत की खुशबु नहीं पा सकेगा बावजूद यह कि जन्नत कि खुशबु पांच सौ बरस की दूरी से सूंघी जाती है। और अहद व पैमान के बाद इसे तोड़ देने वाले की सरज़िंश हुजूर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम इस अंदाज़ में कर रहे हैं: اِن الغادِر یُنصب لہ لواء یوم القیامۃ فیقول ھذہ غدرۃ فلان بن فلان" ( جمع الجوامع للسیوطی، ج: 8، ص: 370، دار السعادۃ،) बेशक वादा तोड़ने के लिए कयामत के रोज़ निशान खड़ा किया जाएगा उसने फलां बिन फलां से उज्र किया।

और एक मुसलमान कातिल से मकतूल ज़िम्मी के वारिसीन के खून बहा कुबूल कर लेने की तस्दीक के बाद कातिल को आज़ाद करते हुए हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने इरशाद फरमाया: من کان لہ ذمتنا فدمہ کدمنا و دیتہ کدیتنا [अल सुनन अल कुबरा, जिल्द:8, पेज:63, किताबुल जराह अल हदीस: 15934 दारुल क़ुतुब अल इल्मिया बैरुत लेबनान]

जो हमारा ज़िम्मी हो उसका खून हमारे खून की दियत हमारी दियत की तरह है।

देखें: https://www.newageislam.com/debating-islam/badruddoja-razvi-misbahi-new-age-islam/the-verses-jihad-meaning-denotation-reason-revelation-background-part-2/d/124657

इस्लामी स्कालर गुलाम गौस सिद्दीकी न्यू एज इस्लाम के एक मुस्तकिल कालम निगार हैं। मौसूफ़ अतिवादी और आतंकवादी नज़रियात का जवाब देने के लिए जाने जाते हैं। वह अपने लेख में आइएस आइएस, तालिबान, और दुसरे अतिवादी समूहों के नज़रियात का अक्सर मुंह तोड़ जवाब लिखते रहते हैं वह अपने एक लेख में लिखते हैं:

यह आयत और उन (मुशरिकीन] को जहां भी पकड़ो क़त्ल कर डालो...” (2:191) मक्का के उन लोगों के लिए नाजिल हुई थी जिन्होंने लगभग 14 सालों तक मुसलमानों पर अत्याचार के पहाड़ तोड़े और उन्हें तकलीफें पहुँचाइ। इस आयत के अगले हिस्से में अल्लाह पाक इरशाद फरमाता है कि अल्लाह की राह में केवल उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं और ज़्यादती न करो (2:191) और इसके ठीक बाद वाली आयत में अल्लाह पाक इरशाद फरमाता है कि फिर अगर वह बाज़ आ जाएं तो बेशक अल्लाह निहायत बख्शने वाला मेहरबान है (2:192)। अर्थात यह जो मक्का के ज़ालिमीन हैं जो मुसलमानों पर उनके दीन इस्लाम की वजह से ज़ुल्म करते हैं अपने ज़ुल्म से बाज़ आ जाएं तो अल्लाह पाक उन्हें बख्श देगा और फिर अल्लाह पाक मुसलमानों से भी यह हुक्म देता है कि फिर अगर वह बाज़ आ आ जाएं तो सिवाए जालिमों के किसी पर ज़्यादती रवा नहीं (2:193)

इस तफसील से यह बात अच्छी तरह मालुम हो चुकी है कि सुरह तौबा की आयत 5 का नुज़ूल मुशरिकीने मक्का के अत्याचार को रोकने के लिए हुआ था। इस आयत से यह नतीजा निकालना कि कुरआन आज के दौर के अमन पसंद गैर मुस्लिम शहरियों के क़त्ल की वकालत करता है बिलकुल झूट और बेबुनियाद बात है। यह तो केवल एक प्रोपेगेंडा है जो इस्लाम और मुस्लिम दुश्मन तत्व फैला रहे हैं और इसमें भरपूर मदद करने वाले वह अतिवादी गिरोह हैं जो अपने आप को दौलते इस्लामिया तो कभी तालिबान और कभी अल कायदा कहलाते हैं। इन अतिवादी गिरोहों ने ऐसी आयतों को इस तरह पेश किया कि अवाम से एक इस्लामोफोबिक तहरीक ने जन्म लिया और फिर इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी का प्रोपेगेंडा शुरू हुआ। कुरआन व सुन्नत ने कभी भी किसी आम निहत्थे अमन पसंद शहरियों के क़त्ल की हिमायत नहीं की और इस धारणा को समझना हो, इस्लाम के मिज़ाज को समझना हो, इस्लामोफोबिक बुद्धिजीवियों को इतनी बात पर गौर कर लेना काफी होगा कि आखिर बच्चों, बूढ़ों, निहत्थे शहरियों, राहिबों और मुशरिका औरतों को हालते जंग में भी मारने से क्यों रोका गया? वजह बिलकुल साफ़ है कि यह अफराद नाज़ुक होते हैं और इनमे अत्याचार करने की सलाहियत नहीं होती। इस बात पर भी गौर करें कि इस्लाम का हुक्म यह है कि दुश्मन की औरतों को जंग की हालत में भी नहीं मारा जाएगा, लेकिन एक शर्त भी लगा दी गई कि अगर जालिमों की औरतें अपने मर्दों के साथ मिल कर अत्याचार करने पर आमादा हो जाएं तो फिर औरतों को भी ज़ुल्म से रोका जाएगा। मतलब साफ़ है कि इस्लाम ज़ुल्म को पसंद नहीं करता बल्कि अमन को पसंद करता है, और जहां जहां ज़ुल्म होता रहेगा वहाँ अमन व सलामती नहीं

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कनीज़ फातमा आलिम व फाज़िला हैं और न्यू एज इस्लाम वेबसाईट की नियमित कालम निगार हैं

English Article: Debunking Islamophobic and Jihadi Myths about 26 Wartime Verses: Part 1 on Verse 9:5

Urdu Article:  Debunking Islamophobic and Jihadi Myths about 26 Wartime Verses: Part 1 on Verse 9:5 قرآن مجید کی 26 جنگی آیات کے بارے میں اسلاموفوبک کی غلط فہمیوں کا ازالہ :پہلی قسط آیت 9:5 پر

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/debunking-islamophobic-myths-wartime/d/127536

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