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Hindi Section ( 30 May 2022, NewAgeIslam.Com)

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Raja Rammohan Roy Was a Great Reformer and Thinker of Bengal राजा राम मोहन राय: एक महान समाज सुधारक और चिंतक

सुहैल अरशद, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

27 मई, 2022

राजा राम मोहन राय उन्नीसवीं सदी में बंगाल के एक महान सामाजिक और धार्मिक सुधारक गुज़रे हैं। वह बांग्ला और संस्कृत के अलावा अरबी उर्दू और फ़ारसी पर भी दक्षता रखते थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के अलावा इस्लाम और इसाइयत का भी गहरा अध्ययन किया था और इस नतीजे पर पहुंचे थे कि वहदानियत (खुदा का एक होना) तमाम धर्मों की रूह है। उन्होंने हिन्दू धर्म में दाखिल हो जाने वाले मुशरिकाना अकीदों को दूर करने के लिए उपनिषद को बंगला भाषा में अनुवाद किया ताकि बंगाल के हिंदुओं को उनकी असल मज़हबी परम्परा से अवगत कराया जा सके। राजा राम मोहन राय की वेदांत या उपनिषद में ख़ास दिलचस्पी थी। उपनिषद के अध्ययन के बाद इस हकीकत से वाकिफ हुए कि उपनिषद का मुख्य संदेश तौहीद है। उपनिषद या वेदों में मूर्ति पूजा की शिक्षा नहीं दी गई है लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि हिन्दू समाज में मूर्ति पूजा जड़ पकड़ चुकी है। और तौहीद में इस्मान रखने के बजाए वह देवी देवताओं में ईमान रखते हैं। इसके अलावा उन्होंने ऐसे रस्म व रिवाज अविष्कार कर लिए हैं जिनका उल्लेख वेदों या उपनिषदों में नहीं है। इसलिए राम मोहन राय ने हिन्दू धर्म को मुशरिकाना अकीदों से पाक करने का बीड़ा उठाया। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने वैचारिक और व्यवहारिक दोनों स्तर पर तहरीक चलाई।

न्यूयॉर्क में अपने कयाम के दौरान राजा राम मोहन राय ने 1793 में वेदांत सेनेटर स्थापित किया। देश वापस होने के बाद उन्होंने वेदांत कालेज स्थापित किया। जहां छात्र वेदांत का विस्तृत अध्ययन करते थे और यहाँ से फारिग होने के बाद वह खालिस वेदांती अर्थात तौहीद परस्त हो जाते थे।

उस दौर में उपनिषद और वेदांत बंगला भाषा में आसानी से उपलब्ध नहीं थे। राजा राम मोहन राय ने उपनिषद का अनुवाद बंगला भाषा में किया। बाद में इनका अनुवाद अंग्रेजी भाषा में भी हुआ। चूँकि उस जमाने में फ़ारसी ना के दफतरी भाषा थी बल्कि अवाम की भाषा भी थी इसलिए उपनिषद की शिक्षा और इसके फलसफे को आम हिंदुओं तक पहुंचाने के लिए उन्होंने फ़ारसी में तोहफतुल मुवह्हिदीन नामक किताब लिखी। इसकी प्रस्तावना उन्होंने अरबी में लिखी। इस किताब का भी बाद में अंग्रेजी में अनुवाद हुआ। इस किताब में राजा राम ने इस हकीकत को स्पष्ट करने की कोशिश की कि हिंदुओं की बुनियादी मज़हबी किताब वेद में बुत परस्ती की शिक्षा नहीं दी गई। उस समय हिंदुओं के एक वर्ग ने उन पर आरोप लगाया कि वह इस्लाम से प्रभावित हो कर मूर्ति पूजा का विरोध कर रहे हैं जबकि हकीकत यह थी कि वह वेदों और उपनिषदों के फलसफे की बुनियाद पर मूर्ति पूजा का का रद्द कर रहे थे। वह मुसलमान नहीं थे बल्कि वेदांती हिन्दू थे।

हालांकि अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल में संस्कृत पाठशालाएं मौजूद थीं मगर उन पाठशालाओं में वेदांत और वेदों की शिक्षा नहीं दी जाती थी। उनकी जगह न्याय, ग्रामर और काव्य पढ़ाए जाते थे। इसलिए राम मोहन राय ने केन उपनिषद, मंडक उपनिषद, कठ उपनिषद और ईश उपनिषद का अनुवाद बंगला में किया। इन अनुवादों के माध्यम से बंगाल के हिंदुओं में वेदांत के एकेश्वरवाद में दिलचस्पी पैदा हुई। इस सिलसिले की एक कड़ी राजा राम मोहन राय की एक फ़ारसी किताब हिन्दू खुदा परस्ती के बचाव में थी जो 1817 में लिखी गई। इस किताब में उन्होंने इस हकीकत पर ज़ोर दिया कि वेदांत खुदा परस्ती की वकालत करता है नाकि बुत परस्ती कि। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि वेदांत की खुदा परस्ती ही असल हिन्दू मत है। उसी साल उन्होंने वेदों के निज़ामें तौहीद का दिफ़ाअ नामक किताब लिखी। उस किताब में उन्होंने वेदांत के तौहीद के फलसफे पर रौशनी डाली।

राजा राम मोहन राय ने हिन्दू मज़हब में मुशरिकाना अकीदों की जड़ भी तलाश करने की कोशिश की क्योंकि जब तक किसी बीमारी के कारण का पता न लगाया जाए तब तक उसका इलाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने ईश उपनिषद के प्रस्तावना में लिखा:

बहुत से इल्म वाले बरहमन मूर्ति पूजा की अर्थहीनता से आगाह हैं और खालिस इबादत और बंदगी की प्राकृति से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं लेकिन चूँकि मूर्ति पूजा पर आधारित रस्म व रिवाज, मज़हबी तकरीबात और तह्वारों में उनकी आमदनी और माद्दी खुशहाली का राज़ छुपा है इसलिए वह केवल यह कि बुत परसित को हर तरह के हमलों से सुरक्षा प्रदान करते हैं बल्कि अपनी ताकत भर इसको बढ़ावा देते हैं और इस तरह से अवाम से उनके मज़हबी सहीफों के इल्म को पोशीदा रखते हैं।

बहर हाल यह भी एक हकीकत है कि केवल ब्राह्मणों ने ही नहीं बल्कि कुछ हिन्दू विचारकों और वेदांत के आलिमों ने भी बुत परस्ती की वकालत की। जैसे अठारहवीं शताब्दी के महान हिन्दू संत श्री राम कृष्ण परमहंस ने एक मौके पर फरमाया था

----“मूर्ति पूजा में गलत क्या है। वेदांत में कहा गया है कि जहां भी वजूद, नूर और मोहब्बत है वहाँ ब्रह्मा जलवा फगन है। इसलिए ब्राह्मण के सिवा किसी चीज का वजूद नहीं।

श्री राम कृष्णा ने बुत परस्ती का जवाज़ उपनिषद से ही पेश किया। हिन्दू मज़हब के दुसरे आलिमों का भी यही अकीदा था कि मूर्ति खुदा पर ध्यान या मुराकबे में मरताज़ की मदद करती है---और यह इर्तेकाज़ बाद में उसे निर्गुण ब्रहमां अर्थात हकीकी वजूद की तरफ रहनुमाई करती है।

वेदांत के बहुत से उलमा मुतलक हस्ती और फर्द की रूह के बीच रिश्ते की प्रकृति पर मतभेद रखते हैं। उनमें संवियत परस्त भी हैं और गैर संवियत परस्त भी। हिन्दू मत के महान मुफक्किर व मुफस्सिर शंकराचार्य का ईमान है कि वजूद एक है और मा सिवा सब फरेब और तिलिस्म है। और वह अपने इस अकीदे के लिए जवाज़ वेदांत से ही लाते हैं। दूसरी तरफ जो लोग संवियत में विश्वास रखते हैं अर्थात जो लोग ईमान रखते हैं की मुतलक हस्ती एक है और तमाम कायनात उसकी तखलीक है वह भी अपने अकीदे के लिए वेदांत कू ही बुनियाद बनाते हैं।

गैर संवियत परस्तों का अकीदा है कि हकीकी इश्क और मुराकबे के जरिये से फर्द की ज़ात जाते हकीकी का इतिसाल हासिल कर सकती है जबकि संवियत परस्तों का अकीदा है कि फर्द की ज़ात बंदे की हैसियत से अपने वजूद को बरकरार रखते हुए इबादत और मुकम्मल खुद सपुर्दगी के जरिये से निजात या निर्वान हासिल कर सकती है। तीसरा वर्ग उन वेदांतियों का है जो यह अकीदा रखते हैं कि किसी देवी या देवता को हकीकी ज़ात की केवल अलामत मां कर उसकी पूजा कर के वह निजात या हकीकी ज़ात से इतिसाल हासिल कर सकते हैं। इस अकीदे को विष्ट अद्वेतवाद कहते हैं। यह तीनों वर्ग अपने अपने अकीदे के लिए जवाज़ वेदांत से ही लाते हैं।

राम मोहन राय ने इन अकीदों को सिरे से अस्वीकार कर दिया और कहा कि हकीकी ज़ात निराकार है और इसलिए उससे किसी आकार को जोड़ना वेदांत की रूह के विपरीत है। उनका ईमान था कि इस कायनात का खालिक व मालिक एक गैर मखलूक ज़ाते हकीम है। उन्होंने शंकराचार्य और दुसरे गैर संवियत परस्तों अर्थात वह्दतुल वजूद के पैरुकारों के इस अकीदे का भी रद्द किया कि यह कायनात गैर हकीकी या एक तिलिस्म है। कुरआन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यह कायनात हकीकी और ठोस वजूद रखती है। यह तिलिस्म या नज़र का फरेब नहीं है।

अपने तौहीद के नजरिये को बढ़ावा देने के लिए राजा राम मोहन राय ने 1828 में ब्रहमो समाज की बुनियाद डाली जो वेदांत के फलसफे पर आधारित था। उन्होंने इस मज़हब के लिए बाकायदा हम्द सना का सहीफ़ा तसनीफ किया। ब्रहमो समाज एक खुदा में यकीन रखता है और इश्क, पूर्ण सरेंडर और बंदगी के जरिये से निजात की राह दिखाता है।

उन्होंने हिन्दू समाज से सती की रस्म को भी समाप्त करने के लिए तहरीक चलाई। उन्होंने हिंदुओं में आधुनिक शिक्षा के बढ़ावे के लिए प्रेसीडेंसी कालेज और इस्काट्स चर्च के स्थापना में भी योगदान दिया। संक्षिप्त यह कि राजा राम मोहन राय ने हिन्दू समाज में मज़हबी और समाजी सुधार की राह हमवार की। इस तरह उन्होंने बंगाल में हिंदू निशाते सानिया की शमा रौशन की।

Urdu Article: Raja Rammohan Roy Was a Great Reformer and Thinker of Bengal راجہ رام موہن رائے:ایک عظیم سماجی مصلح اور مفکر

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/raja-rammohan-roy-reformer-thinker-bengal/d/127132

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