सुलतान शाहीन, संस्थापक व
संपादक, न्यू एज इस्लाम
५ अगस्त २०१६
जनाब मौलाना
ख़ालिद रशीद फिरंगी महली साहब,
मैं पिछले कुछ दिनों से टीवी
चैनलों पर आपको एक शांतिपूर्ण मज़हब के तौर पर इस्लाम का बचाव करते हुए, तथाकथित इस्लामी राज्य को “गैर इस्लामी” करार देते हुए और ऐसे जज़्बात और
राय का इज़हार करते हुए देख रहा हूँ जिससे मैं पूरी तरह से सहमत हूँ। लेकिन मुझे इस
बात पर हैरत है कि जब खुद साख्ता खलीफा (यानी खुद से बने खलीफा जिसे मुसलमानो ने
तस्लीम ना क्या हो) अल बगदादी और उनके अनुयायी बार बार यह कहते हैं कि “इस्लाम कभी एक दिन के लिए भी अमन का मज़हब नहीं रहा है, और यह हमेशा से जंग और विवादों का मज़हब रहा है “तो आप और आपकी तरह दुसरे उलेमा क्यों पूर्ण रूप से चुप्पी
साध लेते हैं।

Khalid
Rashid Firangi Mahali, All-India Muslim Personal Law Board general secretary.
(TOI file photo)
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मैंने कभी भी आप को या किसी दुसरे
आलिम को लखनऊ के एक प्रभावी नदवी आलिम सलमान नदवी से सवाल करते हुए नहीं देखा, जब जुलाई २०१४ में वह सबसे पहले ऐसे भारतीय आलिम के तौर पर सामने
आए जिन्होंने इसी तथाकथित खलीफा अल बगदादी को अमीरुल मोमिनीन और विश्व मुस्लिम समुदाय
का रहनुमा स्वीकार करते हुए उनके प्रति निष्ठा और आज्ञाकारिता का सन्देश भेजा। और यह
कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उनका नाम अब उन विद्वानों की सूची में गिना जाता है
जिन्से भारत के ऐसे मुस्लिम युवा प्रभावित हुए जो तथाकथित इस्लामिक खिलाफत से जुड़ गए और कुछ तथाकथित इस्लामिक स्टेट के लिए हिजरत भी
कर चुके हैं।
मैंने उस समय भी आपको मशहूर
मुबल्लिग (उपदेशक) डॉक्टर जाकिर नाईक से प्रश्न करता हुआ नहीं पाया जब उन्होंने यह
कहा कि “सारे मुसलमानों को आतंकवादी होना चाहिए” या जब उन्होंने ने यह कहा कि: “कुरआन मुसलमानों को लौंडियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की
अनुमति देता है।“ आप सब उस समय भी खामोश रहे जब
जाकिर नाईक ने निम्नलिखित घृणित बातें बयान कीं: “पश्चिम में लोग सूअर का गोश्त
खाते हैं और इस वजह से उनका बर्ताव भी सूअरों जैसा हो जाता है। पुरी दुनिया में
केवल सूअर ही ऐसे जानवर हैं जो अपने दोस्तों को अपने पार्टनर्स के साथ लैंगिक
संबंध बनाने की दावत देते हैं। और पश्चिमी लोग भी ऐसा ही करते हैं।”
तुलनात्मक अध्ययन या इंटरफेथ बातचीत
की आड़ में दुसरे धर्मों की अपमान करने में जाकिर नाईक माहिर हैं। बल्कि जब इस बात
का खुलासा हुआ कि उनकी तकरीरों से दुनिया भर में आतंकवाद का रास्ता अपनाने वाले
विभिन्न लोग अनिवार्य रूप से प्रभावित हुए हैं, लेकिन मैंने देखा कि मुस्लिम उलेमा
का लगभग पूरा समुदाय उनके बचाव में खड़ा है।
इससे भी बुरा तो तब हुआ जब आप
और दुसरे उलेमा उस समय खामोश रहे जब हैदराबाद के मौलाना अब्दुल अलीम इस्लाही ने
मुसलमानों से इस्लामी रियासत के लिए दुआ करने की गुजारिश की। एक प्रेस रिलीज़ में
जो कि ऑन लाइन उपलब्ध है उन्होंने कहा कि: “उनकी (इस्लामी रियासत) की कार्यवाही
की निंदा को मसलहत नहीं कहा जा सकता है और इसे इस्लाम के खिलाफ समझा जाएगा।
उन्होंने मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के ख्वाब को पूरा करने की कोशिश की है और उनके
हौसले ने ख़िलाफ़त की कल्पना में एक नई ज़िन्दगी डाल दी है। (ख़िलाफ़त के) उनके एलान ने
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और ख़िलाफ़त के बारे में मौलाना अबुल आला मौदूदी की मजबूत
आलेखों और भाषणों पर वरीयता प्राप्त कर लिया है और उन्होंने ख़िलाफ़त की अवधारणा को व्यावहारिक
रूप दिया है---- उनोने स्वप्निल
राजनीतिक जीवन में एक नए जीवन को जन्म दिया है और इससे निश्चित रूप से मज़हबी
मुसलमानों को ख़ुशी हुई होगी इसलिए कि कम व बेश एक सौ साल के बाद ख़िलाफ़त का कयाम
अमल में आया है। दुसरे शब्दों में इस्लामी ख़िलाफ़त अब केवल कल्पना नहीं है बल्कि
ऐसा लगता है कि यह एक वास्तविकता का रूप विकल्प कर चुकी है।“
इससे अधिक परेशानी की बात यह है
की आप और दुसरे उलमा उस मौके पर भी खामोश रहे जब मौलाना अब्दुल अलीम इस्लाही ने एक
मुदल्लल फतवा दिया जिसमें उनहोंने कुरआनी आयतों और हदीसों का हवाला देते हुए यह
साबित करने की कोशिश की है कि जब मुसलामानों को इस बात का अंदाजा हो जाए कि वह गैर
मुस्लिमों की तरफ से हमले की ज़द में हैं जिन्हें वो “मुल्हिद”, “बुत परस्त” या काफिर व मुशरिक भी कहते हैं, तो इस्लाम घिरे हुए मुसलमानों को उनके खिलाफ जंग करने
और बेबसी के साथ बैठे ना रहने का आदेश देता है।

Photo used
for representational purpose only.
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“कुरआन की रौशनी में ताकत के प्रयोग” नामक एक पुस्तिका जिसे डॉक्टर निजातुल्लाह सिद्दीकी
के लेख के जवाब में लिखा गया था, उसमे मौलाना अब्दुल अलीम इस्लाही इस्लाम के नाम पर हिंसा से
दस्तबरदारी ज़ाहिर करते हुए लिखते हैं:
जो कुछ भी निजातुल्लाह सिद्दीकी
साहब ने लिखा है उसका खुलासा यह है कि...... “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि
हिंदुत्वा के अलमबरदार क्या कर सकते हैं, उनके खिलाफ कोई कदम उठाना या
ताकत के इस्तेमाल से उनका मुकाबला करना शरई दृष्टिकोण से गलत और मुसलमानों के लिए
हानिकारक होगा”.
“जिहाद हिंसा नहीं है” के शीर्षक से एक भाग के पृष्ठ
१०/११ में वह लिखते हैं, “कुरआन व हदीस की रौशनी में
जुर्म के लिए सज़ा को हिंसा का नाम देना अत्यंत गलत बात है। यह एक गैर इस्लामी
अवधारणा है। सच तो यह है कि अपराध के प्रतिबद्ध से अपराधियों को रोकने के लिए दी
गई सजा हिंसा और अत्याचार नहीं बल्कि भलाई पर आधारित कार्य और एक नेमत है”।
तथापि ‘हिंसा’ का चाहे जो भी अर्थ हो, डॉक्टर निजातुल्लाह सिद्दीकी का यह कहना कि हिंसा
केवल दो स्थिति में जायज़ है बहुत बड़ी गलती है और ऐसा कहना हुजुर की नबूवत के मकसद
को सख्त धचका पहुँचाने के बराबर है। सुरह तौबा की आयत नम्बर २९ देखें।
“ ऐ मुसलमानों! तुम अहले किताब में से उन लोगों के साथ
(भी) जंग करो जो ना अल्लाह पर ईमान रखते हैं ना आख़िरत के दिन पर और ना उन चीजों को
हराम जानते हैं जिन्हें अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हराम
करार दिया है और ना ही दीने हक़ (अर्थात इस्लाम) विकल्प करते हैं, यहाँ तक कि वह (इस्लाम के हुक्म के सामने) ताबे और
मग्लूब (हार) हो कर अपने हाथ से खिराज अदा करें” (कुरआन: ९:२९)
।
“इस आयत में इन तीन प्रकार के लोगों के खिलाफ जंग करने का
आदेश दिया गया है यहाँ तक कि वह जिजया अदा करें: एक) वो जो खुदा और कयामत के दिन
पर ईमान नहीं लाते, दोसरे) वो जो उन चीजों को हराम
नहीं मानते जिन्हें खुदा और उसके रसूल ने हराम करार दिया है, तीसरे) वो जो अपने मज़हब के तौर पर इस्लाम को स्वीकार
नहीं करते”.
इस आयत का हवाला अक्सर पेश किया
जाता है जो कि उदारवादी इस्लाम का आधार है “ला इक्राहा फिद्दीन” (दीन में कोई जब्र नहीं है) [कुरआन २:२५६]। लेकिन जिस तरह
मौलाना इस्लाही ने इसके अर्थ को उलट कर बयान किया है उस पर गौर व फ़िक्र करना ज़रूरी
है। वह कहते हैं “इसका अर्थ यह नहीं है कि अहले कुफ्र को उनके कुफ्र के साथ
ज़मीन पर पूर्ण रूप से आज़ाद छोड़ दिया जाए और उन्हें जवाबदेह ना बनाया जाए। अगर यह
सच है तो, जब हम यह कहते हैं कि खुदा के
मज़हब (दीन) को दुनिया पर गलबा हासिल करने के लिए नाज़िल किया गया है, तो इससे क्या मुराद लेते हैं?”
“वही (अल्लाह) है जिसने अपने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
को हिदायत और दीने हक़ के साथ भेजा ताकि इस (रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को हर
दीन (वाले) पर ग़ालिब कर दे चाहे मुशरेकीन को बुरा लगे।“ (कुरआन, ९:३३)
“फिर इस आयत का मतलब क्या होगा और जिहाद की फरजियत की अहमियत
व मुताबिकत क्या रह जाए गी”?
और (ऐ हक़ वालों!) तुम उन (कुफ्र
व तागुत के सरगनों) के साथ (इंकलाबी) जंग करते रहो, यहाँ तक कि (दीन दुश्मनी का) कोई फितना (बाकी) ना रह जाए और
सब दीन (अर्थात बंदगी और ज़िन्दगी के निज़ाम) अल्लाह ही का हो जाए, फिर अगर वह बाज़ आ जाएं तो बेशक अल्लाह उस (अमल) को जो
वह अंजाम दे रहे हैं, खूब देख रहा है। (८:३९)

The Islamic State is making efforts to recruit Indian youths to carry
out terror attacks in Iraq, Syria and even within India
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“जिस तरह इस्लाम कुबूल करने की
दावत देना वाजिब और फर्ज़ है उसी तरह बातिल दीनों पर इस्लाम को ग़ालिब करने और कुफ्र
व शिर्क वालों को अधीनस्थ बनाने में संघर्ष करना भी फ़र्ज़ हैं। अल्लाह ने जो
जिम्मेदारी शहादते हक़ और दीन के इज़हार के शीर्षक से मुसलमानों पर डाली है वह केवल
नसीहत और दावत व तबलीग से अदा होने वाली नहीं है वरना गज्वात और सराया की आवश्यकता
नहीं आती।
“जिहाद दीन पर गलबा हासिल करने
के लिए और बुराई के केन्द्रों को रोकने के लिए फर्ज़ किया गया है। इस काम की अहमियत
को सामने रखते हुए, खुदा के नाम पर जिहाद की अहमियत
पर कुरआन व हदीस में ज़ोर दिया गया है। यही कारण है कि सभी कुफ्फार (काफिरों) के
खिलाफ जंग के बारे में स्पष्ट आदेश मुसलमानों के लिए नाज़िल किये गए हैं।
“उसी तरह जंग किया करो जिस तरह वह सब के सब (इकट्ठे हो कर)
तुमसे जंग करते हैं” (अल कुरआन- ९:३६)
पृष्ठ १७ पर मौलाना इस्लाही
लिखते हैं:
“जान लो कि बेशक कुफ्फार से जिहाद उन देशों में फ़र्जे किफाया
है उलेमा की इत्तेफाक से. फ़र्जे किफाया का अर्थ यह है कि जब इसको इतने लोग अंजाम
दें जो काफी हो तो बाकी लोग गुनाहगार नहीं होंगे और अगर सब लोग जिहाद छोड़ दें तो
सब के सब गुनाहगार होंगे”.
मौलाना इस्लाही का पूरा लेख
हिंदुत्वा ताकतों से लड़ने के लिए भारतीय मुसलमानों को एक दावत पर आधारित है। लेकिन
मौलाना फिरंगी महली साहब आप तमाम उलेमा से किसी ने भी इस तरह मौलाना अब्दुल अलीम
इस्लाही का जवाब नहीं दिया और ना ही आपने डॉक्टर जाकिर नाईक की निंदा की और ना ही
मौलाना सलमान नदवी की निंदा की। उस समय भी आपने उनको जवाब नहीं दिया जब यह बात
सबको पता चल गयी कि इन्डियन मुजाहेदीन की जमात मौलाना इस्लाही से प्रभावित है।
शायद आपकी परेशानी यह है कि आप मौलाना इस्लाही की बातों पर विश्वास करने के अलावा
और कुछ नहीं कर सकते। मौलाना इस्लाही या जाकिर नाईक जो कुछ भी कह रहे हैं बुनियादी
तौर पर मौजूदा इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित है, और यह वही इस्लामी शिक्षा है जिनकी आप सब ने शिक्षा प्राप्त
की और अपने मदरसों और युनिवर्सिटियों में जिनकी शिक्षा देते हैं। तो फिर किस तरह
आप सब इसकी निंदा कर सकते हैं।
आज की तारीख में इस्लामी फिकह
की सबसे प्रमाणिक किताब “الموسوعہ الفقہیہ الکویتیہ” (अल्मौसुआ अल फिक्हिय्या अल
कुवैतिय्याह) है जिसे सभी मकातिबे फ़िक्र (वर्ग)
के उलेमा के इत्तेफाक से अर्ध शताब्दी की कोशिशों के बाद कुवैत में तैयार किया गया, जिसका उर्दू नुस्खा दिल्ली में २३ अक्टूबर २००९ ई० को
उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने जारी किया था, इसमें जिहाद की परिभाषा इस तरह
की गई है: “इस्लाह में जिहाद एक गैर ज़िम्मी (गैर मुस्लिम जो इस्लामी
सलतनत में रहे और जज़िया ना दे) काफिर के खिलाफ एलाए कलिम्तुल्लाह (कलमे की
बुलंदी) के लिए लड़ने का नाम है जब वह इस्लाम की दावत का इनकार कर दे।“ ज़ाहिर है कि मौलाना इस्लाही अपने श्रेष्ठतावाद, अलगाववाद इस्लाम के लिए जिस सर्वसम्मति का दावा करते
हैं वह गलत नहीं है। इस्लाम को दुसरे सभी दीनों पर ग़ालिब करना निश्चित रूप से अतीत
और हाल के सभी उलेमा का उद्देश्य है। राजनीतिक इस्लाम के सारे असहिष्णुता और
अलगाववाद की शुरुआत यहीं से होती है। जब कोई फिकह इस्लामी की मोटी किताबों का
अध्ययन करे तभी उसे यह पता चल सकता है कि आप उलेमा के लिए किसी भी सार्थक तरीके से
अपने जिहादी सिद्धांतकारों का रद्द करना संभव नहीं है। गैर मुस्लिम मीडिया के सामने
अमन और बहुलतावाद के झूटे बयान देना भी तकय्या के सिद्धांत के तहत जायज़ है, जो कि बुनियादी तौर पर इस कुरआनी आयत से लिया गया है: “मुसलामानों को चाहिए कि ईमान वालों को छोड़ कर काफिरों को
दोस्त ना बनाएं और जो कोई ऐसा करे गा उसके लिए अल्लाह (की दोस्ती में) से कुछ नहीं
होगा इसके सिवा कि तुम उनके शर से बचना चाहो, और अल्लाह तुम्हें अपनी ज़ात (के
गज़ब) से डराता है, और अल्लाह ही की तरफ लौट कर
जाना है, “३:२८।
तक्य्या बुनियादी तौर पर शिया
फिकह का हिस्सा था लेकिन अब ऐसा लगता है अहले सुन्नत ने भी अब बाखबर सवाल पूछने
वाले वैश्विक मीडिया के हमले के तहत इसे अपना लिया है।
उस समय तक कुछ भी नहीं बदलेगा
जब तक आप सारे उलेमा अपनी मौजूदा पोजीशन से आगे नहीं बढ़ते और हिंसापूर्ण और
अलगाववादी, असहिष्णु और श्रेष्ठतावादी
इस्लामी शिक्षाओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो जाते, जो कि आज इस्लामी फिकही अदब की शकल में मौजूद है और
अमन और बहुलतावाद पर आधारित एक नई इस्लामी फिकह तैयार करने में हम आम लोगों की
सहायता नहीं करते। बेशक इस्लाम एक शांतिपूर्ण, बहुलतावादी, आध्यात्मिक और सारे लोगों के
लिए मुहब्बत का मज़हब है। इस्लाम धर्म वाकई शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की शिक्षा देता
है। लेकिन आज की इस्लामी फिकह जो मदरसों और युनिवर्सिटियों में पढ़ाई जाती है उसमें
यह शिक्षाएं नहीं हैं। जिस इस्लामी फिकाह और जिन शिक्षाओं का अध्ययन आप उलेमा ने
किया है और जिसकी शिक्षा आप हमारे मासूम बच्चों को देते हैं वह श्रेष्ठता वाद पर
आधारित है। इस्लाम आज संकट का शिकार है। इल्मी तौर पर इस्लाम आज आतंकवाद का दुसरा
नाम बन गया है।
मौलाना फिरंगी महली साहब!
त्वरित रूप से गफलत के ख्वाब से बेदार हो जाईए और कम से कम अब फायदामंद कोशिश
आरम्भ कीजिये। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम आप अपने शांतिपूर्ण एलानों के
माध्यम से दुनिया को धोका देना बंद कर दीजिये। अब हम इंटरनेट की दुनिया में जी रहे
हैं। तमाम इल्म के ज़खीरे उँगलियों पर उपलब्ध हैं। अब हर कोई एक आलिम है। आप लोगों
से कुछ भी नहीं छुपा सकते।
इस्लामी रियासत ईराक, सीरिया में और यहाँ तक कि भारत के अंदर आतंकवादी हमले
करने के लिए भारतीय युवाओं को भर्ती करने की कोशिश कर रही है।
सच कहूँ तो आप जब इसे “गैर इस्लामी रियासत” कहते हैं तो आप किसी को धोका
नहीं दे रहे हैं, कम से कम हमारे उन बच्चों को
धोका नहीं दे रहे हैं जो तथाकथित इस्लामी रियासत से दूर भाग रहे हैं। वह समझदार और
पढ़े लिखे हैं और वह सब सच्चाई से वाकिफ हैं। जब आप आतंकवाद के खिलाफ कोई फतवा जारी
करने पर मजबूर होते हैं या जब आप टीवी पर आते हैं तो आप बहुलतावाद, शांतिपूर्ण सह अस्तित्व, अच्छी दोस्ती, और मुसीबत आदि के समय सब्र की
नसीहत पर आधारित मक्की आयतों की तिलावत करते हैं। लेकिन आप अपने मदरसों में तफ़सीर
जलालैन जैसी तफ़सीर की किताबें पढ़ाते हैं, जिसे तफ़सीर में सबसे अधिक
प्रमाणिक किताब माना जाता है। इस किताब में नासिख व मंसूख के सिद्धांतों को बयान
किया गया है जो बड़े पैमाने पर उलेमा के यहाँ मकबूल हैं, जिसमें शांतिपूर्ण मक्की आयतों को जंग की शिक्षा पर
मदनी आयतों के माध्यम से मंसूख करार दिया गया है। बुनियादी तौर पर यह सिद्धांत
कुरआन की निम्नलिखित आयतों पर आधारित है जिसमें अल्लाह का फरमान है। “हम जब कोई आयत मंसूख कर देते हैं या उसे फरामोश करा देते
हैं (तो बहर सूरत) इससे बेहतर या वैसी ही (कोई और आयत) ले आते हैं, क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह हर चीज पर (पूरी)
कुदरत रखता है?”
केवल तथाकथित तलवार उठाने वाली
आयत जलालैन के अनुसार अत्याचार के स्थिति में अमन और सब्र की शिक्षा देने वाली कम
से कम 19 मक्की आयतों को मंसूख करती है। इस आयत में अल्लाह का फरमान है:
“फिर जब हुरमत वाले महीने गुज़र जाएं तो तुम (हस्बे एलान)
मुशरिकों को कत्ल कर दो जहां कहीं भी तुम उनको पाओ और उन्हें गिरफ्तार कर लो और
उन्हें कैद कर दो और उन्हें (पकड़ने और घेरने के लिए) हर घाट की जगह उनकी टाक में
बैठो, पस अगर वह तौबा कर लें और नमाज़
कायम करें और ज़कात अदा करने लगें तो उनका रास्ता छोड़ दो। बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने
वाला मेहरबान है।“ (९:५)
जलालुद्दीन अब्दुल रहमान बिन
अबी बकर अल सुयूती (१४४५-१५०५) आयत ९:७३ “ऐ नबी (मुअज्ज़म) आप काफिरों और
मुनाफिकों से जिहाद करें और उनपर सख्ती करें, और उनका ठिकाना जहन्नम है, और वह बुरा ठिकाना है” की व्याख्या करते हुए लिखते हैं: मुसलमानों के मजबूत होने
तक जंग टाल दी गई थी। उनकी दलील यह है कि “जब मुसलमान कमज़ोर थे, खुदा ने उनको सब्र करने का आदेश दिया था।“ प्रसिद्ध कुरआन के मुफस्सिर जिन्हें
युनिवर्सिटियों, सभी मदरसों और इस्लामी उलुम के
सभी शोबों में पढाया जाता है वह इब्ने कसीर हैं (१३०१-१३७२)। वह कहते हैं कि तलवार
वाली आयत (९:५) ने इस्लाम के पैगम्बर और किसी भी बुत परस्त के बीच हर समझौते और हर
सुलह को तोड़ दिया है। और इसी तरह एक और महान कुरआन के मुफस्सिर इब्ने जौज़ी (मृतक
१३४०) कहते हैं कि तलवार वाली आयत का उद्देश्य “कुरआन में हर अमन समझौते को
मंसूख करना है”।
इसके बाद ऐसी बहुत सारी हदीसें
(नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तथाकथित कथन) हैं जिन्हें आतंकवादी सिद्धांत
निर्माता आतंकवाद का औचित्य पेश करने के लिए प्रयोग करते हैं और मौलाना फिरंगी
महली आप और आप जैसे उलेमा इसे वही के बराबर मानते हैं।
मिसाल के तौर पर, इस संदर्भ उस हदीस का अध्ययन करते हैं जिसे सबसे अधिक
बड़े पैमाने पर नक़ल किया जाता है: “मुझे उस समय तक पूरी इंसानियत
से जिहाद करने का आदेश दिया गया है जब तक वह इस बात की गवाही नहीं दे दें कि
अल्लाह के अलावा कोई माबूद नहीं और मोहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, और नमाज़ कायम ना करें और ज़कात अदा ना करें। अगर वह
ऐसा करते हैं तो उन्होंने मुझ से अपनी जान और माल की अमान हासिल कर ली, सिवाए उसके जो इस्लामी नियमों की गिरफ्त में आया और
उनका हिसाब अल्लाह पाक के साथ होगा।“
हवाला: सहीह बुखारी (जिल्द-१ की
किताब २, हदीस नम्बर २४, पृष्ठ ४०२) और सहीह मुस्लिम, ३१:५९१७), हदीस की इन दो किताबों को सारे
उलेमा सबसे अधिक प्रमाणिक मानते हैं।
इस हदीस पर मेरा एतिराज़ यह है
कि: क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कुरआन की स्पष्ट नसीहतों के खिलाफ
कुछ कह सकते हैं या कुछ कर सकते हैं? जैसा कि उपर्युक्त हदीस से यह
ज़ाहिर होता है कि आप कुरआन के आलमी पैगाम की खिलाफवर्जी कर रहे हैं, इसलिए कि कुरआन में अल्लाह का फरमान है “ला इक्राहा फिद्दीन” (दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं)।
[२:२५६] और इस तरह अमन और बहुलतावादी और सह अस्तित्व पर आधारित बहुत सारी मक्की
आयतें हैं जिनमें मुसलमानों को अत्याचार का सामना करते समय सब्र करने की शिक्षा दी
गई है? मेरा यह कहना है कि नबी
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऐसा कुछ भी नहीं कह सकते जो इस कुरआन के सार्वभौमिक घोषणा
की खिलाफवर्जी हो जो खुदा का कलाम है और जिसे अल्लाह ने उनके उपर उतारा है।
लेकिन मौलाना फिरंगी महली आप और
आप जैसे उलेमा इस हदीस के बारे में यह कहेंगे कि: “यह हदीस उतनी ही अच्छी है जितनी
कुरआन की कोई आयत है, और चूँकि यह भी जंग के समय में
मज़हबी आज़ादी, बहुलतावाद और सहअस्तित्व की
पिछली आयतों के बाद नाज़िल होने वाली दूसरी आयतों की तरह है इसी लिए इसने केवल
उल्लेखनीय आयत को ही मंसूख नहीं किया बल्कि इससे पहले मक्का में उस समय नाज़िल होने
वाली बहुत सी दूसरी शांतिपूर्ण आयतों को भी मंसूख कर दिया है जब दीने इस्लाम की
बुनियाद रखी जा रही थी। “आप सब ऐसा इसलिए कहेंगे कि अबू
मुस्लिम अल अस्फहानि जैसे मोअतज़ेला (अकलियत पसंद) उलेमा के अलावा, विश्व स्तर पर शोहरत याफ्ता तमाम प्रसिद्ध
मुफ़स्सेरीने कुरआन ने यही बात कही है। आप इब्ने जरीर अल तबरी की (जामेउल बयान
६४६/७), इब्ने कसीर (२०७/१ और ७७४/२), जलालैन (तफसीरे जलालैन में कई जगहों पर ५१ मंसूख
आयतों का उल्लेख है) अल कुर्तुबी (अल जामेउल हकम अल कुरआन १५७/१०) आदि की दुसरे
दर्जे की इस्लामी अदब, तफसीर और तशरीहात पढ़ते हैं और
इन ताफ्सिरों में आँख बंद करके विश्वास करते हैं, और आप अपने मदरसों में तफ़सीर इब्ने कसीर की शिक्षा देते
हैं।
क्या आप जानते हैं कि भारत में
कितने बच्चों ने अपने मां बाप को काफिर कहना शुरू कर दिया है? और इसकी वजह भी माकूल है। आप तमाम काफिरों और
मुशरिकों के खिलाफ कत्ल के मानों में बच्चों को जिहाद की शिक्षा देते हैं और
उन्हें अमन और बहुलतावाद अपनाने और कुफ्फार और मुशरिकों के साथ सहअस्तित्व का आदेश
देते हैं। मेहरबानी करके इमानदार बन जाइए, आप या तो तथाकथित काफिरों और
बुत परस्तों के खिलाफ जंग की दावत दें जैसा कि मौलाना अब्दुल अलीम इस्लाही, खलीफा अबू बकर अल बगदादी और दुसरे जिहादी नजरिया साज़
करते हैं या फिर हिंसावाद और श्रेष्ठतावाद पर आधारित इस्लामी फिकह को तर्क करें और
हम आम मुसलमानों को अमन और बहुलतावाद, सह अस्तित्व और अबदी निजात के
लिए एक सहीह रस्ते की हैसियत के तमाम धर्मों की कुबूलियत पर आधारित एक व्यापक फिकह
तैयार करने दें।
आपका मुखलिस,
एक फिकरमंद मुसलमान
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सुलतान शाहीन दिल्ली की एक बहु
भाषीय, विकासवादी इस्लामी वेब साईट NewAgeIslam.com के संस्थापक और संपादक हैं। वह
इस्लाम को दुनिया पर वर्चस्व हासिल करने का कोई राजनीतिक सिद्धांत नहीं बल्कि अबदी
निजात के लिए कई रास्तों में से एक रूहानी रास्ता मानते हैं
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