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Has Religion Lost Its Relevance In The Modern Society? क्या आधुनिक समाज में मज़हब अपना महत्व खो चुका है?

अमन के मज़हबज़मीन पर अत्यधिक खून खराबे का कारण बने हैं।

प्रमुख बिंदु:

बीसवीं शताब्दी ने खुदा के नाम पर कुछ अत्यंत वहशियाना नरसंहार का अनुभव किया है।

सेरेब्रेनिका का नरसंहार 1992 में हुआ था।

रवांडा का नरसंहार 1994 में सामने आया था।

1971 में बांग्लादेश में मुसलमानों के हाथों मुसलमानों का नरसंहार मज़हब के नाम पर हुआ।

म्यांमार के मुसलमानों को 2017 में बुद्ध मत के अनुयायिओं ने क़त्ल किया था।

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न्यू एज इस्लाम स्टाफ राइटर

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

30 नवंबर 2021

ज़मीन पर इंसानी ज़िन्दगी के शुरू से ही मज़हब इंसान के लिए रूश्द व हिदायत का बुनियादी स्रोत रहा है। खुदा की कल्पना इंसान को बका का रूहानी माध्यम और जीवन का एक उद्देश्य प्रदान करता है। प्राचीन समय में इंसान को एक विरोधी प्रकृति ने घेर लिया था जिससे लड़ने की ताकत नहीं थी। इसलिए, इंसान एक अदृश्य शक्ति पर निर्भर था जो शत्रुतापूर्ण प्रकृति के विरुद्ध सहायता और सुरक्षा प्रदान करती थी। धीरे धीरे, मानव समाज वैज्ञानिक और बौद्धिक तौर पर विकास करता गया और कुदरत और जंगली जानवरों जैसी दुश्मन ताकतों, प्राकृतिक आपदा और बीमारियों से बचाने के लिए नए यंत्र और तकनीक की वजह से अपने अस्तित्व के लिए अधिक से अधिक आत्मनिर्भर होता गया। तथापि, खुदा की कल्पना इंसान के लिए रूहानी उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण रही। उसने किसी को अपने वैज्ञानिक और तकनीकी यंत्रों से अधिक ताकतवर पाया क्योंकि अधिकतर इसके वैज्ञानिक और तकनीकी यंत्र और प्रकृति या प्राकृतिक आपदा को काबू नहीं कर सकते थे। इससे उसका एक अदृश्य शक्ति के वजूद पर विश्वास मजबूत हुआ जो कायनात और उनकी जिन्दगियों और मामलों पर हुकूमत करती है। अम्बिया और मुरसलीन ने खुदा के तसव्वुर में यकीन को मजबूत बनाने में अपना किरदार अदा किया। इसलिए जैसे जैसे समय गुजरता गया और विज्ञान और तकनीक ने तरक्की की, मज़हब की अहमियत बढ़ती गई क्योंकि मज़हब को सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर देखा जाता था। मज़हब ने भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति द्वारा निर्मित आध्यात्मिक खालीपन को भर दिया।

तथापि, चूँकि कोई भी दो इंसान किसी एक मसले पर एकमत नहीं थे, इसलिए उनमें मतभेद भी था कि उनके लिए कौन सा मज़हबी तरीका बेहतर है। इससे विभिन्न मज़हबी राहें और नज़रियात सामने आए। और हर मज़हब या मज़हबी नजरिये के पैरुकार अपने अपने मज़हबी नजरिये की सच्चाई की जमानत देते हैं। यह अंततः सभ्यता के टकराव से अकीदे के टकराव का कारण बना। हालांकि हर मजहब ने अमन का मज़हब होने का दावा किया, लेकिन वही मज़हब खूंरेजी, क़त्ल गारत गरी और तबाही व बर्बादी का भी कारण बना। मानव इतिहास के पन्ने विभिन्न धर्मों के अनुयायिओं की तरफ से किये गए क़त्ल व गारत और खूंरेजी की तफसीलात से भरे पड़े हैं।

अधिक पीछे जाने की आवश्यकता नहीं। अगर हम खुदा के नाम पर होने वाले कत्ले आम का इतिहास देखें तो हमें दुनिया के विभिन्न धर्मों में इंसानों के कत्ले आल की तफसीलात मिलती हैं। रवांडा का 1994 का नरसंहार खुदा के नाम पर किया जाने वाला सबसे घिनावना कार्य था जब अपराधियों का दावा था कि खुदा उनके साथ है। इस नरसंहार में 500000 से अधिक तौलस्ती कबीले का नरसंहार किया गया और कैथोलिक चर्च को इस नरसंहार का जिम्मेदार ठहराया गया।

1971 में पूर्वी पाकिस्तान में मज़हब के नाम पर एक और बड़ा नरसंहार हुआ। लम्बे समय से नज़र अंदाज़ और राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमानों ने पश्चिमी पाकिस्तान से आज़ादी का एलान करते हुए बांग्लादेश के नाम से एक आज़ाद देश बनाया। पाकिस्तानी फ़ौज ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमला किया और पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का नरसंहार किया। कहा जाता है कि लगभग 500000 लोग अपने ही मुसलमान भाइयों के हाथों मारे गए। यह नरसंहार इतिहास की बदतरीन नस्ल कुशी में से एक है। पाकिस्तान फ़ौज की शिकस्त के बाद बांग्लादेश में बिहारी या उर्दू बोलने वाले मुसलमानों की नस्ल कुशी बदले के तौर पर हुई। बंगाली बोलने वाले मुसलमानों ने लाखों उर्दू बोलने वाले मुसलमानों का कत्ले आम किया। और लाखों उर्दू बोलने वाले मुसलमान अब भी बांग्लादेश में पाकिस्तानी मुहाजिर के तौर पर रह रहे हैं हालांकि वह मुसलमान हैं।

मुसलमानों की एक और बड़ी नस्ल कुशी म्यांमार में हुई जहां बुद्ध मत के मानने वालों की अक्सरियत है। उन्हें डर था कि मुसलमान एक दिन उन पर गलबा पा सकते हैं और उनके मज़हब बुद्ध मत को खतरा लाहिक हो सकता है क्योंकि उन्होंने बारहवीं शताब्दी में मुसलमानों की आमद के बाद भारत में बुद्ध मत को तबाह कर दिया था। इसलिए उन्होंने मुसलमानों को राजनीतिक और आर्थिक तौर पर कमज़ोर करने की कोशिश की। 1960 के बाद के दशकों में म्यांमार में मुसलमानों को पिछड़ा करने के लिए कई कदम उठाए गए और अंततः 2017 में म्यांमार की फ़ौज ने बुद्ध भिक्षुओं की मिली भगत से लाखों रोहंगीय मुसलमानों का नरसंहार किया। यह एक विडम्बना है कि इंसानों की तो बात छोड़ दें बुद्ध मत किसी भी जानदार को मारने से मना करता है। लेकिन बुद्ध मत के अनुयायिओं ने मुसलमानों के नरसंहार में बढ़ चढ़ कर भाग लिया और सोचा कि खुदा उनके साथ है।

1992 में सेरेब्रेनिका का नरसंहार भी ईसाईयों और मुसलमानों के बीच धार्मिक आधार पर हुआ था। इस नरसंहार में एक लाख के करीब मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों का नरसंहार किया गया और हज़ारों महिलाओं की इज्जत लुटी गई। हज़ारों मुसलमानों को इलाके से बेदखल कर दिया गया। यह क़त्ल आम मज़हबी मोहरिकात से अंजाम दिए जाने वाले कत्ले आम की एक और मिसाल थी। इस कत्ले आम की कई दशकों बाद भी मुसलमानों और ईसाईयों ने कोई सबक नहीं लिया और उनके बीच मजहबी आधार पर दुश्मनी जारी है।

2014 में मध्य पूर्व ने मज़हब के आधार पर कत्ले आम का एक और दौर देखा। एक उग्रवादी इस्लामी समूह ने क्षेत्र में खुदा की हुक्मरानी कायम करने के नाम पर आतंकवाद का राज शुरू कर दिया। उन्होंने दीने इस्लाम की अपनी व्याख्या के अनुसार लाखों मुसलमानों, ईसाईयों को क़त्ल किया और मज़हबी इमारतों को तबाह किया और हज़ारों को गुलाम बना लिया। लाखों मुसलमान और ईसाई बेघर हुए और उन्हें दुसरे देशों में पनाह लेना पड़ी।

भारत में बहुसंख्यक हिंदुओं और अल्पसंख्यक मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगों में धार्मिक लगाव ने महत्वपूर्ण किरदार अदा किया है। इस्लाम और हिन्दू मत दोनों मज़हब के अनुयायिओं का दावा है कि उनका मज़हब अमन की शिक्षा देता है। फिर भी, असुरक्षा के एहसास की बुनियाद पर कौम परस्त गिरोहों ने एक दुसरे के साथ लड़ाई की जिसमें हज़ारों लोगों की जानें गईं। आज़ादी के पिछले 70 सालों में हिंदुओं ने लाखों छोटे बड़े सांप्रदायिक दंगे देखे हैं जिनमें लाखों लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं।

पाकिस्तान में आज़ादी के बाद अहमदिया विरोधी दंगे हुए जिनमें हज़ारों अहमदी जान से हाथ धो बैठे। इसका प्रतिबद्ध इस्लाम के अनुयायिओं ने किया हालांकि उनका दावा था कि उनका मज़हब अमन की तबलीग करता है और दूसरों के मज़हब का सम्मान करता है और कोई भी व्यक्ति दूसरों के बोझ नहीं उठाएगा। आज भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक बिरादरियों के लोगों को मज़हब या खुदा के नाम पर बहुसंख्यक वर्ग के हाथों अपहरण किया और मारा जाता है।

मज़हबी अनुयायिओं के बीच सांप्रदायिक हिंसा ने एक तहज़ीबी ताकत के तौर पर मज़हब की शबीह को भी दागदार किया है। यहूदियों, ईसाईयों और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा इतिहास में दर्ज है और इंसानी समाज में मज़हब की अहमियत पर सवालिया निशाँ खड़े करता है। यहूदी फिरका वाराना बुनियादों पर आपस में लड़ते थे। तीसरी से आठवीं शताब्दी के दौरान ईसाईयों ने एक दुसरे को सांप्रदायिक आधार पर क़त्ल किया। यह दुश्मनी 17 वीं शताब्दी तक जारी रही।

मुसलमान 72 फिरकों में बटे हुए हैं और हर फिरके के अनुयायी अपने आपको सच्चे रास्ते पर गामज़न समझते हैं और बाकी सबको जहन्नमी और क़त्ल का हकदार भी करार देते हैं। इस अकीदे की वजह से खुदा के नाम पर बहुत से कत्ले आम और हिंसा के घटना हुए। भारत, पाकिस्तान, मिस्र, अफगानिस्तान और दुनिया के तमाम हिस्सों में जहां वह रहते हैं मुसलमान फिरका वाराना खुतूत पर बंटे हैं और अक्सर हिंसा में लिप्त होते हैं।

उग्रवादी और आतंकवादी संगठनों के उभरने से स्थिति और खराब हुई है। वह समय समय पर हाउसिंग काम्प्लेक्स, बाज़ारों, हस्पतालों और यहाँ तक कि कब्रिस्तानों पर भी आत्मघाती हमले करते रहते हैं ताकि उस मुसलमान फिरके के लोगों को क़त्ल कर सकें जिन्हें वह अपने अनुसार काफिर समझते हैं।

कुरआन इंसान की इस झगड़ालू और हिंसक तबीयत की वजह से सरजींश करता है। इंसान हमेशा अपना नजरिया या अपनी फ़िक्र उन लोगों पर थोपना चाहता है जिन पर उसका गलबा है। इसलिए कुरआन कहता है:

और आदमी हर चीज से बढ़ कर झगड़ालू है।(अल कहफ़: 54)

(उसने) आदमी को एक निथरी बूंद से बनाया तो जभी खुला झगड़ालू है। (अल नहल:4)

खुदा ने कभी भी इंसानों को अपनी अना की तस्कीन के लिए दुसरे इंसानों को क़त्ल करने केलिए नहीं कहा क्योंकि जब उसकी मखलूक में से किसी को मारा जाता है तो उसे ख़ुशी हासिल नहीं होती। लेकिन मज़हब की स्वयंभू अथारिटी खुदा के नाम पर हिंसा और क़त्ल को बढ़ावा देती है।

दुनिया भर में मज़हब या मज़हबी प्रभुत्व के नाम पर हिंसा के कल्चर ने आधुनिक युग में मज़हब की अहमियत पर सवालिया निशाँ लगा दिया है। बच्चों, औरतों और बेसहारा और गैर जंगजू लोगों को मारने वाले इस हिंसा ने बहुत सारे इंसानियत पसंद लोगों को मज़हब से दूर कर दिया है। वह मज़हब के फायदे पर विश्वास खो चुके हैं। एक सार्वभौमिक नैतिक मेयार ने जन्म लिया है जिसके मुताबिक़ लोग यह फैसला करते हैं कि क्या सहीह है और क्या गलत। वह इस बात की परवाह नहीं करते कि मज़हब किसी ख़ास मसले पर क्या कहता है।

अधिकतर लोग जो विज्ञान से प्रभावित हैं या वैज्ञानिक दृष्टि रखते हैं वह एक ऐसी ताकत पर विश्वास रखते हैं जो कायनात को चलाती है लेकिन वह किसी मज़हबी अकीदे को स्वीकार नहीं करते। जैसे कि आइंस्टाइन एक ऐसी ताकत पर यकीन रखते थे जो कायनात पर हुकूमत करती है लेकिन वह किसी खुदा पर यकीन नहीं रखते थे। इसलिए उनका ख्याल था कि बुद्ध मत भविष्य की दुनिया का मज़हब है क्योंकि यह किसी ख़ास खुदा पर विश्वास नहीं रखता था।

तुर्की जैसे मुस्लिम बहुल देशों में युवा नस्ल के बहुत सारे लोग इस्लाम को नहीं मानते बल्कि किसी दीन पर ही विश्वास नहीं रखते। जैसे जैसे इंसानी सभ्यता विकास कर रही है और बैरूनी खुला की खोज कर रही है और दुसरे सय्यारों पर कमंड डाल रही है, किसी ज़ाती खुदा के बारे में उनका ख्याल यकसर तब्दील हो रहा है। वह खुदा को उस तरह नहीं देखते या समझते हैं जैसा कि कदीम दौर के लोगों ने इसे देखा और समझा है। और खुदा की इस कदीम ताफ्हीम पर इसरार करना एक अहमकाना बात होगी। इसलिए आधुनिक युग का इंसान मज़हब को एक पाबंद ताकत के तौर पर अधिक अहमियत नहीं देता है बल्कि इसे केवल रूहानी तस्कीन और बोहरान और तनाव के वक्त मदद पहुंचाने का ज़रिया मानता है।

English Article: Has Religion Lost Its Relevance In The Modern Society?

Urdu Article: Has Religion Lost Its Relevance In The Modern Society? کیا جدید معاشرے میں مذہب اپنی اہمیت کھو چکا ہے؟

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/religion-modern-society/d/126632

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