न्यू एज इस्लाम विशेष संवाददाता
१६ फरवरी २०२१

Persecution of members from the Baha’i Faith community in the Islamic
Republic of Iran
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इस साल फरवरी में भारत के बहाईयों ने इरानी सरकारी अधिकारियों से साझा अपील जारी की थी ताकि वह इरान के बहाईयों, मुख्यतः एवेल गाँव पर होने वाले अत्याचार को खत्म करें और उनकी ज़मीन और जायदादें वापस करें।
अपील का एक अंश इस प्रकार है:
“ईरान में माज़ंदरान के एवेल गाँव के बहाईयों की जायदाद की तबाही और बड़े पैमाने पर विस्थापन से संबंधित घटनाओं के सिलसिले को नोट करने के बाद हमें काफी दुख हुआ है। इस गाँव के बहाईयों को १९८३ के बाद से अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है। २०१० में, इस गाँव में बहाईयों के घरों को आग लगाया गया और ढाया गया था जिसके नतीजे में स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर बहाईयों की ओर से बार बार शिकायत की गईं।
नवंबर में २०२०, में सरकारी एजेंटों ने मुल्क भर में मरबूत छापों में बहाईयों के बीस घरों और दुकानों पर छापे मारे, और मुतालबा किया कि वह अपनी जायदाद के कागज़ात हवाले कर दें। हमें ईरानी अदालत की तरफ से एवेल की २७ बहाईयों की जायदाद जब्त करने और गाँव के स्थानीय मुसलमान नागरिकों में बांटने के फैसले से बहुत चिंता है। यह फैसला शरई कानून के मुताबिक़ नहीं है कि वह एक गिरोह से जायदादें ले कर मुसलमानों के हवाले कर दें। हमारे कुरआन मजीद में किसी और धर्म की बेइज्ज़ती करने की कड़ी निंदा की गई है।
इस अपील में इरान की हुकूमत की तरफ से इरान की बहाई बिरादरी के ज़ुल्म व सितम, हिंसा और सामाजिक बेदखल होने को उजागर किया गया है। बहाई बिरादरी का दावा है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से ही वह इरान में अत्याचार और सामाजिक अशांति का शिकार हैं। १९७९ में इस्लामी इंकलाब के बाद, राज्य के प्रायोजित अत्याचार का बाज़ार गर्म रहा। उन्हें अक्सर घरों से बेदखल कर दिया जाता है, उनकी धार्मिक संपत्ति और व्यक्तिगत जमीने जब्त हो जाती हैं और उनके कब्रिस्तान और मज़ार सरकार और बहुसंख्यक वर्ग के लोगों की तरफ से तबाह व बर्बाद कर दिए जाते हैं।
बहाईयों का दावा है कि इरान के बहाईयों पर अत्याचार आयतुल्लाह खामनाई की ज़िन्दगी के दौरान इख्तियार की जाने वाली हुकुमती पालिसी का एक हिस्सा है। १९९३ में संयुक्त राष्ट्र के जरिये इरान की हुकूमत की सरकारी याददाश्त में कहा गया है:
“बहाईयों के साथ हुकूमत का मामला इस तरह होना चाहिए कि उनकी तरक्की और कामयाबी मसदूद हो जाए।“ संयुक राष्ट्र के पूर्व अफसर हेज़बेलीफीलडिट ने कहा, “इरानी बहाईयों को महद (अर्ताथ पालने) से लेकर कब्र तक और उससे आगे तक अत्याचार का सामना करना पड़ता है।“

अगस्त १९८० में, बहाई इन्तेजामी इदारे के ९ सदस्यों को इग्वा कर लिया गया और उन्हें ना मालुम स्थान पर ले जाया गया। उनका डर है कि उन्हें इज़ाफ़ी अदालती तौर पर फांसी दी जाएगी।
हुकुमती पालिसी के तहत १९८३ में, ईरानी अटार्नी जनरल ने बहाई मज़हबी सरगर्मियों पर कानूनी पाबंदी का एलान किया। पाबन्दी के नतीजे में, बहाईयों का कौमी रूहानी असेम्बली रज़ाकाराना तौर पर तहलील हो गया। पाबंदी के बाद हुकूमत के जरिये बहाई कब्रिस्तान, मुकद्दस मुकामात और जायदादें जब्त और तबाह कर दी गईं।
पाबंदी के बाद बहाईयों ने सरकारी इजाज़त से बहाईयों की सामाजिक और रूहानी जरूरियात में शिरकत के लिए यारान (दोस्त) के नाम से एक कमेटी तशकील दी। लेकिन २००८ में, कमेटी के ७ मेम्बरों को गिरफ्तार कर के २० साल कैद की सजा सुनाई गई। इस सज़ा को बाद में कम करके दस साल कर दिया गया।
बहाईयों की एक बहुत बड़ी आबादी वाला शहर एवेल है जहां के बहाई हुकूमत के ज़ेरे एहतिमाम ज़ुल्म व सितम का बुनियादी हदफ़ हैं।
एवेल इरान के सूबे माजंदरान के हज़ार जरीब के चहार दांगिया में स्थित है। बहाई कम्युनिटी लगभग १६० साल पहले एवेल में कायम हुई थी और १८०० की दहाई के अंत तक एवेल की आधी आबादी बहाई के नाम से प्रसिद्ध हुई।
अपने आगाज़ से ही बहाई बिरादरी ने स्कूलों और गुस्ल खानों की तामीर, और जंग और ज़लज़ले से प्रभावित अफ़राद की सहायता सहित सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पेश रफ्तों में हिस्सा लिया।
बहाई आबादी वाली दूसरी देहाती बिरादरियों की तरह, एवेल भी अपने कयाम और बरसों से ही ज़ुल्म व सितम, अज़ीयत व जब्र का सामना रहा है। २५ नवंबर १९४१ को गाँव की काउंसिल के सरबराह, मिर्ज़ा आगा जान जज्बानी जो एक बहाई थे और गाँव के बाशिंदों यहाँ तक कि आस पास के ज़िलों में भी काफी मोहतरम थे उन्हें उनके अकीदों की बिना पर कत्ल कर दिया गया था।

बहाईयों का आरोप है कि इस्लामी इंकलाब के बाद से संगठित तरीके से यह ज़ुल्म व सितम जारी रहा। २८ जून १९८३ को बड़े पैमाने पर हमले के नतीजे में एवेल के बहाईयों को बेदखल और बेघर कर दिया गया। उनका कहना है कि मज़हबी रहनुमाओं और मुकामी हुक्काम ने गाँव और आस पास की आबादी में मौजूद मुस्लिम हुजूम को उकसाया ताकि वह बहाईयों को घरों से बाहर निकाल कर, गाँव के बाहर तैयार किये हुए एक बस में दाखिल कर के एक इलाका जिसका नाम सारी है वहाँ ले जा कर गिरा दे। तथापि, जब बस सारी शहर पहुंची तो अधिकारियों ने इस तरह के मनसूबे की सख्त मुखालफत की ताकि वह बस से बहाईयों को एवेल वापस ले जाएं।
लेकिन उनकी वापसी पर गाँव वालों ने बहाईयों को उनके घरों में वापस दाखिल होने की इजाज़त नहीं दी। इसके बजाए, उन्हें मुकामी मस्जिद के अन्दर कैद कर दिया गया। उनमें से १३० से अधिक, जिनमें बच्चे और बूढ़े शामिल हैं, उनको तीन दिन तक बिना खाने और पानी के इग्वा किया गया था। जब उन पर अकीदा तब्दील करने वाला दबाव नाकाम हो गया तो उन्हें घर वापस जाने दिया गया। तथापि उसी रात गाँव वालों ने उन पर हमला किया। कुछ लोगों को हुजूम ने दबोच लिया, कुछ ज़ख्मी हुए, और मज़ीद अफ़राद को करीबी जंगल में छपने पर मजबूर किया गया।
बहाई जिन्होंने अपने आबाई मकान एवेल में बरकरार रखने की कोशिश की, और जिनमें से कुछ के पास खेती बाड़ी के जरिये ज़िन्दगी का गुज़ारा करने के लिए कुछ ज़मीने थीं वह हर गर्मी के मौसम में वहाँ जाते और अपने घरों में आरज़ी तौर पर खेत में रहते। यहाँ तक कि इन हालात में भी जिनमें हुक्काम उनके घरों और खेतों को उनसे दूर करने की कोशिश करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। उनका मंसूबा बहाईयों के लिए था कि वह कभी भी एवेल वापस ना आएं ताकि उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा किया जा सके।
२३ जून २०१० को, कुच्लोगों ने चार बुलडोजर और कई ट्रकों के जरिये एवेल में लगभग ५० बहाईयों के घरों को ढा कर जमीन बोस कर दिया।
१९८३ के बाद से, एवेल में बहाईयों ने तहरीरी तौर पर तमाम सरकारी इदारों, पार्लियामेंट के रहनुमा, अदालती निज़ाम आदि से अपने हुकुक की खातिर अपील करने की कोशिश की। यह अपीलें अब भी जारी हैं।
देश के बहाईयों के बारे में हुकूमते इरान की सियासत मुकम्मल तौर पर मिस्र की सुन्नी हुकुमत से प्रभावित है जहां उन्हें इसी तरह के अत्याचार का सामना करना पड़ता है। सन १९६० में, जमाल अब्दुल नासिर ने एक कानून नाफ़िज़ किया था जिसमें मिस्र की बहाई बिरादरी को एक आज़ाद मज़हब करार दिया गया था जो रियासत को कुबूल नहीं था। कानून के निफाज़ के बाद, हुकुमत ने कब्रिस्तानों, मज़ारों और दुसरे मज़हबी इम्लाक को या तो तबाह कर दिया था या जब्त कर लिया था। बहाईयों की ज़मीनें भी एक एक कर के जब्त कर ली गईं। उस समय से, मिस्री हुकुमत ने ६० की दहाई में जमाल अब्दुल नासिर की इख्तियार की हुई पालिसी पर अमल पैरा है। हुकूमत सरकारी उद्देश्यों के लिए केवल इस्लाम, ईसाईयत और यहूदियत को सरकारी तौर पर स्वीकार करती है। अल अज़हर ने एक फतवा जारी किया है जिसमें बहाईयों को काफिर करार दिया गया है। इसलिए, मिस्र के बहाई आज़ादाना तौर पर अपने मज़हब का एलान नहीं कर सकते हैं और बहाईयों को अपनी पहचान छिपाना पड़ता है। वह बहाई की हैसियत से वोटर कार्ड, पैदाइशी सर्टिफिकेट और दुसरे सरकारी शिनाख्ती कार्ड हासिल नहीं कर सकते हैं।
बहाईयों के संबंध में मिस्र की पालिसी के बाद, दुसरे इस्लामी देश जैसे बरुंडी, कांगो, योगांडा, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, आज़रबाईजान, माली और मराकिश ने भी इस मज़हब पर पाबंदी लगा दी है। इन देशों में, बहाईयों को हुकूमत और आम लोगों की ओर से विभिन्न प्रकार के जब्र वू अत्याचार का सामना करना पड़ता है।
आज इरान के बहाई, हुकूमत और बहुसंख्यक आबादी दोनों ही जानिब से हमला, इग्वा किये जाने और बेघर होने के मुसलसल खौफ में ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं। अक्सर मुकामी उलेमा उन्हें काफिर करार दे कर उनके खिलाफ हिंसा को हवा देते हैं।
विश्व समुदाय को इरान और दुसरे इस्लामी देशों में बहाईयों पर होने वाले ज़ुल्म व सितम के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के फ्रेम वर्क के तहत उन्हें एक बा वकार ज़िन्दगी का यकीन दिलाना चाहिए।
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URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/persecution-bahais-iran-/d/124394
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