मोहम्मद यूसुफ इस्लाही
उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम
28 अक्टूबर 2022
“(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे (ईमानदार) बन्दों जिन्होने (गुनाह करके) अपनी जानों पर ज्यादतियाँ की हैं तुम लोग ख़ुदा की रहमत से नाउम्मीद न होना बेशक ख़ुदा (तुम्हारे) कुल गुनाहों को बख्श देगा वह बेशक बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (53) और अपने परवरदिगार की तरफ रूजू करो और उसी के फरमाबरदार बन जाओ (मगर) उस वक्त क़े क़ब्ल ही कि तुम पर जब अज़ाब आ नाज़िल हो (और) फिर तुम्हारी मदद न की जा सके (54) और जो जो अच्छी बातें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हई हैं उन पर चलो (मगर) उसके क़ब्ल कि तुम पर एक बारगी अज़ाब नाज़िल हो और तुमको उसकी ख़बर भी न हो (55)” (अल ज़ुमर: 53-55) यह तीन आयतें सुरह ज़ुमर से ली गई हैं। सुअरह ज़ुमर का मुख्य विषय है तौहीदे खालिस, दीने खालिस, और बंदगी ए खालिस। और वाकेआ भी यही है कि दुनिया में मानवता के सारे समस्या का हल और दोनों जहान की अजमत और कामरानी का केवल एक माध्यम यह है कि बंदा अल्लाह के लिए खालिस हो जाए और केवल उसी का हो कर रहे।
इलाह की शाने करीमी
उन तीन आयतों में से पहली आयत खुदा की बंदों के लिए उनके रब रहीम की तरफ से एक उम्मीद का संदेश, नवेदे मुसर्रत और एक मुज़्दा ए जांफिज़ा है, जो बंदे को वुसअते रहमत के तसव्वुर और अल्लाह से पुर उम्मीदी के एहसास से सरशार कर देता है। यह आयत एक तरफ तो खुदा की शाने रफअत व अज़मत, उसके बेपायाँ अफ्व दरगुज़र और उसकी बेमिसाल वुसअते रहमत का परिचय कराते हुए बंदे को हमेशा आशान्वित रहने और खुदा से किसी हाल में भी मायूस न होने का सबक देती है, और दूसरी तरफ इब्लीस लईन की मक्कारी, चाल बाज़ी और बन्दों को खुदा से मायूस करने वाली साजिशों पर इब्लीस का दिल दहला देने वाली कारी ज़र्ब लगाती है।
इस आयत में अल्लाह पाक अपने बन्दों को अपना कह कर आवाज़ देता है कि ऐ मेरे बन्दों! तुम ने अपनी जानों पर जो ज़्यादती भी की हो, काफिर व मुशरिक हो या मुल्हिद व ज़िन्दीक, कातिल व जानी हो या फासिक व फाजिर, तुम सरकश व बागी हो या खुदा के नाफरमान, तुम गुनाहों की दलदल में गर्दन तक फंसे हुए ही क्यों न हो, अल्लाह की रहमत से हरगिज़ मायूस न हो, अल्लाह का दर वह दर है जिससे कभी कोई मायूस नहीं लौटाया जाता, वह ऐसा कादिरे मुतलक है कि उसके किये हुए फैसले को कोई चैलेंज नहीं कर सकता। पुरी ज़मीन पर अपनी कारगुजारी दिखाने वाले सारे इंसान उसके बंदे हैं। वह सबका खालिक है और खालिक के पास अपनी मखलूक के लिए बेपनाह प्यार भी है और उनके लिए बेकरां अफ्व व रहमत भी, जब कोई बागी और गुनाहगार बाँदा सच्चे इरादे से उसकी तरफ पलटता है तो वह हरगिज़ उसको मायूस नहीं करता।
यह आयत अपने दिल नवाज़ पैगाम और खुदा की शाने रहमत के अनोखे अंदाज़े बयान की वजह से अपने अंदर गैर मामूली तासीर रखती है और कट्टर से कट्टर इंसान के दिल को भी एक बार मोम बना देती है और बंदा बेइख्तियार अपने आप को अपने रब के हुजूर डाल देता है। इसी लिए मोह्बते वही हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “मुझे इस आयत के बदले यह दुनिया और दुनिया की साड़ी चीजें भी मिलें तो मुझे पसंद नहीं।“ अर्थात मेरी नज़र में इस आयत के मुकाबले में यह साड़ी दुनिया और इसकी तमाम मताअ कतअन दरखोरे एतेना नहीं। इस आयत के मुकाबले में यह सब कुछ हेच है। फिर आयत का अंदाज़ केवल तज्कीरया जाब्ता बयान करने का नहीं है, बल्कि अल्लाह ने अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इस पर मामूर फरमाया और हुक्म दिया कि ऐ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मेरा पैगाम और मेरा यह एलान मेरे बन्दों तक पहुंचा दीजिये और इस प्यार भरे उस्लूब और अंदाज़ में पहुंचा दीजिये कि ऐ बंदों! तुम्हारा रब तुम्हें खिताब कर रहा है और यह कहता है कि ऐ मेरे प्यारे बंदों! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है, देखो अल्लाह की रहमत से हरगिज़ मायूस न हो, वह सारे गुनाह माफ़ कर देता है। (इसलिए कि) यकीनन वाग बहुत अधिक माफ़ फरमाने वाला और बहुत मेहरबान है।
तौबतुन्नुसुह
इस आयत में खुशखबरी यह है कि अल्लाह पाक सारे गुनाह माफ़ कर देता है तो होना यही चाहिए कि बंदा सारे गुनाहों से पाक होने के जज़्बे से खुदा की तरफ पलटे। मगर इंसान का नफ्स कभी कभी इस धोके में मुब्तिला कर देता है कि यकायक मैं सब गुनाहों को तो नहीं छोड़ सकता, धीरे धीरे छोड़ूंगा। कुछ से तौबा करता हूँ, कुछ मामलों में बदस्तूर रब की ना फ़रमानी और उसके हुक्म से सरकशी करता रहूँगा। तो दरहकीकत यह वह तौबा नहीं है जो अल्लाह को मतलूब है, खालिस और मतलूब तौबा यह है कि आदमी अपने आपको बिलकुल अल्लाह के हवाले कर दे और तौबा के बाद की जिंदगी कामिल फरमाबरदारी की जिंदगी हो। आगे दो आयतों में गुनाहों की माफ़ी के लिए तीन बातों की तलकीन की गई है जो यक गोना शराइत भी हैं और अलामात भी, अर्थात अल्लाह की तरफ रुजूअ, उसके हुजूर खुदसपुर्दगी, और कलामुल्लाह की कामिल इताअत व पैरवी।
इनाबत इलल्लाह: पहली शर्त या अलामत है इनाबत इलल्लाह। जिसके मानी हैं अपने रब की तरफ पलट आना, चाहे कुफ्र व शिर्क से तौबा कर के आदमी खुदा की तरफ पलटे और ईमान लाए, चाहे गुनाहों से तौबा कर के खुदा का फरमाबरदार बंदा बनने का अज़म करे। खुदा की तरफ पलटने का यह अमल और तौबा की यह कैफियत खुदा के नज़दीक वह पसंदीदा अमल है जो बंदे की काया पलट देता है, और अल्लाह के आगोशे रहमत में बंदे को अपने अंदर समेट लेने का जोश पैदा कर देता है। किसी बंदे की तौबा और इनाबत से उसके खालिक और परवरदिगार को किस कदर ख़ुशी होती है। हर इंसान खुदा ही का बाँदा है और खुदा चाहता है कि मेरा बंदा मेरे अहकाम की पैरवी करे कि आखिरत में से इनाम से नवाज़ा जाए। लेकिन नाशुक्रा बंदा अपने रब की मर्ज़ी के खिलाफ चल पड़ता है और सरकशी की रविश इख्तियार कर लेता है। लेकिन जब भी वह अपने रब की तरफ पलटता है तो रहीम रब अपने बंदे को धुत्कारता नहीं, बल्कि खुश होता है कि मेरा बंदा फिर मेरी तरफ पलट आया। हज़रत सौबान रज़ीअल्लाहु अन्हु की रिवायत में है कि इसी आयते मुबारका में किसी ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा: या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! अगर कोई शिर्क में मुब्तिला हो तो? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लम्हा भर के लिए खामोश हुए और फिर फरमाया: हाँ, खूब सुन लो, शिर्क करने वाला भी अगर खुदा की तरफ पलट आए, और यह बात आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन बार फरमाई। वाकया यह है कि अल्लाह की वुसअते रहमत की कोई थाह नहीं, उसकी शाने अफ्व व करम से बंदा को अक्भी मायूस न होना चाहिए। बड़े से बड़े गुनाह में मुब्तिला होने वाला बल्कि गुनाह से ज़मीन व आसमान की फिज़ा भर देने वाला भी जब अपने रब की तरफ पलटता है और वास्तव में तौबा और इनाबत की कैफियत के साथ रब के दरबार में हाज़िर होता है तो वह करीम व रहीम अपने बंदे को मायूस नहीं करता।
खुद सुपुर्दगी: दूसरी शर्त या अलामत यह है कि तौबा के बाद बंदा वाकई अपनी
जिंदगी बदल दे, वह अब फार्माबारदारों की सी जिंदगी गुज़ारे, हकीकतन खुद को अल्लाह के हवाले कर दे और इस तौबा व इनाबत
और फरमाबरदारी की जिंदगी में देर न करे कि उसका आखरी समय आ जाए और हलक में सांस गरगराने
लगे तो उस समय तौबा करे, या जब गुनाहों की पादाश में कोई दुनयवी अज़ाब आ जाए तो उस समय तौबा के लिए हाथ उठाए।
बल्कि जब भी एहसास हो और आँख खुले, जल्द से जल्द अपने रब से अपना मामला सहीह कर ले। इसलिए कि मौत के सकरात के वक्त
जब आखिरत का अज़ाब सामने हो या कोई दुनयवी अज़ाब सर पर आ जाए तो उस वक्त न तो तौबा कुबूल
है न फरमाबरदारी का अहद कोई मायने रखता है। ऐसी हालत तक पहुँचने पर तो फिर खुदा के
अज़ाब से बचाने वाली और आई मुसीबत को टालने वाली कोई ताकत नहीं। कहीं से बंदे को कोई
मदद और सहारा मिलना संभव नहीं। “इससे पहले कि कोई अज़ाब आ जाए” के अलफ़ाज़ बंदे को मुतवज्जोह करते हैं कि तौबा करने में
और अल्लाह से अपने मामले सहीह करने में हरगिज़ देरी न करनी चाहिए, एहसास होते ही फ़ौरन आदमी खुदा
की तरफ बेताबाना दौड़ पड़े और रब की आगोशे रहमत में अपने आपको दे दे।
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