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Hindi Section ( 25 Aug 2020, NewAgeIslam.Com)

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Love Jihad – Myth or Reality? लव जिहाद- या इलज़ाम?


मौलाना नदीमुल वाजिदी

आज कल अखबारों में अंतर्जातीय शादियों के सिलसिले में बड़ी ले दे मची हुई है, कोई ना कोई घटना ऐसी पेश आई ही जाती है जिसको बहाना बना कर शिवसेना और बजरंग दल जैसी साम्प्रदायिक संगठने ज़हर घोल देती हैं, सहारनपुर जिले में भी आज कल ऐसा ही हो रहा है, यह सिलसिला देवबंद से शुरू हुआ, यहाँ तक कि एक मुस्लिम नौजवान ने अपने पड़ोस में रहने वाली एक हिन्दू लड़की को मुसलमान बना कर शादी कर ली, या वह लड़की मुसलमान लड़के की मोहब्बत में खुद मुसलमान हो गई, लड़की के मान बाप और दुसरे करीबियों ने इस घटना पर इतना हंगामा बरपा किया कि अल्लाह की पनाह, बात पुलिस थाणे तक पहुंची, गिरफ्तारियां हुईं, लड़की के अदालती बयान के मौके पर कोर्ट में इन साम्प्रदायिकों ने भड़काऊ नारे भी लगाए और तोड़ फोड़ भी की, गनीमत यह हुआ कि लड़की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार १९ वर्ष की थी, अगर वह १८ वर्ष से कम होती तो लड़का जेल अवश्य जाता, फिर लड़की ने अपने बयान में मुसलमान पति के साथ जाने और रहने के इरादे का इज़हार भी किया, जिससे केस लड़के के हक़ में हो गया। फिलहाल मामला अदालत के सख्त स्टैंड की वजह से दब चुका है, लेकिन अखबारों में “लव इन जिहाद” के शीर्षक से एक अणि बहस शुरू हो गई। अंतर्जातीय शादी की दो सूरतें हैं, एक तो यह कि दोनों पक्षों का धर्म अलग अलग हो और दोसरे यह कि एक पक्ष पहले से मुसलमान हो और दोसरे ने इस्लाम कुबूल करने के बाद पहले फरीक से निकाह किया हो, पहली सूरत खुले तौर पर अंतर्जातीय शादी की सूरत है लेकिन दोसरी सूरत को हकीकी तौर पर अंतर्जातीय शादी का उनवान दिया जा सकता है, बल्कि इस अर्थ में इसको अंतर्जातीय शादी कहा जा सकता है कि निकाह से पहले दोनों का धर्म अलग अलग था, तथापि निकाह के समय दोनों मुसलमान हो चुके थे, इस तरह दोनों सूरतों की प्रकृति भी अलग अलग था, तथापि निकाह के समय दोनों मुसलमान हो चुके थे, इस तरह दोनों सूरतों की प्रकृति भी अलग है और इनका हुक्म भी एक दुसरे से अलग है।

मिली जुली शिक्षा, मख्लुत कल्चर, लड़कों लड़कियों के अजादाना मेल जोल के प्रभाव समाज पर पड़ने लगे हैं, बहुत से नौजवान लड़के लड़कियां इस कल्चर में इतने आगे निकल चुके हैं कि उन्हें जिस्मानी संबंध कायम करने में भी कोई शर्म महसूस नहीं होती, इस तरह संबंधों के लिए सुरक्षित पनाह गाहें और खुली फज़ाएँ मौजूद हैं, जिनमें किसी तरह की कोई कानूनी या समाजी रुकावट नहीं है, जो नौजवान कानूनी या समाजी रुकावट महसूस करते हैं वह घर से भाग जाते हैं, अगर दोनों बालिग़ हों तो कानून भी उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है चाहे उनका संबंध भिन्न धर्मों ही से क्यों ना हो, बालिग़ ना होने की सूरत में यह अंदेशा बहार हाल मौजूद है कि अगर पकडे गए तो जेल और लड़की को नारी निकेतन भेजा जा सकता है, यह स्थिति हिन्दू और मुसलमान सब ही घरानों में पेश आ रही है, इस रुझान पर काबू पाने के लिए आवश्यक है कि समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए, अगर ऐसा ना किया गया तो हमारा समाज भी पश्चिमी समाज की तरह तबाह व बर्बाद हो सकता है, जहां बेहयाई आम है, रज़ा मंदी के साथ जिस्मानी संबंध स्थापित करते हैं किसी तरह की कोई कबाहत नहीं है, तलाक की शरह ना काबिले यकीन हद तक बढ़ चुकी है, नाजायज संबंधों के परिणाम स्वरूप जो बच्चे पैदा हो रहे हैं उनकी संख्या रोज़अफजूं है, आजादी के बावजूद लैंगिक अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है एड्स जैसे लैंगिक रोग पश्चिमी समाज की पहचान बन चुके हैं, पश्चिम की यह बे राह रवी पहले दबे पाँव पूरब की तरफ बढ़ रही थी अब खुले आम पूरब की सीमाओं पर दस्तक दे रही है, धार्मिक पेशवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक नेताओं और शिक्षा मामलों के विशेषज्ञों को बिना अंतर के धर्म व समाज ख़ास तौर पर इस सिलसिले में चिंता करना चाहिए।

भारत एक बहुजातीय देश है, आबादियाँ मिली जुली हैं, रहन सहन एक है, लिबास एक है, भाषा एक है, खाना पीना भी लगभग बराबर है, इस एकरूपता ने विभिन्न कौमों और धर्मों से संबंध रखने वाले लोगों को एक दुसरे से इतना करीब कर दिया है कि बहुत सी जगहों पर यह पहचान ही मुश्किल हो गई है कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान, शैक्षणिक संस्थाओं में, कार्यालयों में, बाज़ारों में, मनोरंजन स्थलों में और दुसरे सार्वजनिक स्थानों पर एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जो अगर भाषा से बतलाएं तो यह मालुम ही नहीं होता कि उनमें हिन्दू कौन है और मुसलमान कौन है, एक बहुत ही सीमित वर्ग अपनी पहचान रखता है, कुछ मुसलमान मर्द अपनी दाढ़ी टोपी से और कुछ मुसलमान औरतें अपने बुर्के से मुसलमान की हैसियत से पहचानी जाती हैं, बाकी सब लोग आबादी के समुंद्र में अपनी पहचान खो चुके हैं, इस स्थिति ने मिली जुली कल्चर को बढ़ावा दिया है, यहाँ तक कि अब नौजवान अपने मज़हब ही के जिंसी मुखालिफ दिलचस्पी नहीं लेते, बल्कि दुसरे धर्म की नौजवान लड़के लड़कियों में भी घुस पैठ कर बैठते हैं, ऐसे नौजवान में बड़ी संख्या तो वह है जो धर्म पर विश्वास ही नहीं रखती, उनमें से कुछ का ख्याल यह है कि धर्म उनके पर्सनल लाइफ में इस हद तक दखील नहीं है कि वह उन्हें उनकी मर्ज़ी से शादी भी ना करने दे, क्योंकि अभी हमारे समाज में पुरानी मूल्य बाकी हैं इसलिए जब भी कोई अंतर्जातीय शादी की घटना होती है तो बेचैनी फ़ैल जाती है, ख़ास तौर पर हिन्दू समाज के लोग उस समय बहुत अधिक बेचैन हो जाते हैं जब लड़का मुसलमान और लड़की हिन्दू हो, उनके ख्याल में किसी हिन्दू लड़की का किसी मुसलमान लड़के की जीवनसाथी बनना अपमान है, अगर सूरत इसके विपरीत हो तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होता बल्कि एक गोना ख़ुशी इत्मीनान का इज़हार किया जाता है। इश्क के चक्कर में पड़ कर कुछ नौजवान धर्म भी परिवर्तित कर बैठे हैं, यह वह लोग हैं जो मोहब्बत और मज़हब दोनों में संतुलन रखना चाहते हैं या दोसरे शब्दों में वह इन दोनों में से किसी एक से भी डीएसटी बरदार नहीं होना चाहते, ऐसे लोग विरोधी लिंग को अपना धर्म परिवर्तन करने पर राज़ी कर लेते हैं, यहाँ भी पिछली दोनों सूरतें पेश आती हैं, कभी मुस्लिम मुस्लिम लड़का इश्क के हाथों मजबूर हो कर अपनी अबदी बदबख्ती पर मुहर लगा बैठता है और धर्म परिवर्तन कर लेता है और कभी मुस्लिम लड़की गैर मुस्लिम लड़के से शादी रचाने के चक्कर में हिन्दू ध्र्म्धर्म अपना लेती अहि हमारे देश में यह दोनों सूरतें ख़ुशी से कुबूल की जाती हैं, आम तौर पर मुसलमान इस तरह के घटनाओं पर विरोध भी नहीं कर पाते बल्कि बेबसी के साथ अपनी बदबख्ती का तमाशा देखने पर मजबूर होते हैं, ऐसे घटनाओं में कानून भी कुछ नहीं कर पाटा और अगर इत्तेफाक से यह सूरत पेश आ जाए तो कोई हिन्दू लड़की किसी मुसलमान लड़के के इश्क में गिरफ्तार हो कर मुसलमान हो जाए तो साम्प्रदायिक संगठने आसमान सर पर उठा लेती हैं, देवबंद के गह्तना को आधार बना कर इन संगठनों ने अमन व अमां की सूरत ए हाल को बिगाड़ने की जो लगातार कोशिश की है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिन्दू संगठनों को यह सूरत किसी भी हाल में कुबूल नहीं है और वह इस तरह के किसी भी घटना की आड़ में मुसलमनों को निशाना बना सकती हैं, इस घटना में न्यायालय और प्रशासन की गैर जानिबदारी ने और लड़की की उम्र और इस्तिकामत ने घटना की प्रकृति बदल कर रख दी है वरना सहारनपुर की आग पुरे देश की सामंजस्य को प्रभावित कर सकती थी। अगर निष्पक्षता के साथ अध्यन किया जाए और आंकड़े जमा किये जाएं तो यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आएगी कि देवबंद जैसी घटनाएं कभी कभी ही पेश आती हैं, इसके उलट दोसरी प्रकृति के घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक पेश आ रहे हैं, यह साम्प्रदायिक संगठनों की बदनीयती है कि वह देवबंद जैसे घटनाओं पर आपे से बाहर हो जाती हैं और दूसरी प्रकृति के घटनाओं पर बिगुलें बजाती हैं। जहां तक मुस्लिम नौजवानों की धर्म परिवर्तन का मामला है वह अत्यंत बद्बख्ताना है, इसलिए कि ईमान की दौलत और इस्लाम की दौलत के मुकाबले में दुनिया जहाँन की नेमतें हेच हैं, लेकिन नौजवानों को यह बात समझाई नहीं जा रही है, दुनयावी शिक्षा ने दिलों से दीन की अहमियत निकाल दी है। घर में भी उनकी दीनी अखलाकी तरबियत का कोई इन्तिज़ाम नहीं किया जाता, मुसलमान बच्चे असरी तालीम में तो तरक्की कर रहे हैं और बड़ी बड़ी तनख्वाहों के हकदार बन रहे हैं लेकिन मान बाप की लापरवाही की बिना पर दीन से दूर होते जा रहे हैं, इस गंभीर समस्या पर संजीदगी के साथ सोचने की आवश्यकता है, ज़रा सी लापरवाही या गैर मामूली ताखीर तबाह कुन साबित हो सकती है। किसी गैर मुस्लिम लड़के या लड़की का इस्लाम कुबूल करना यह ज़ाहिर ज़ाहिर गलत नहीं है, मुल्क का कानून हर शहरी को धर्म प्रवर्तन का हक़ देता है, इस्लाम का दामन भी कुशादा है और वह उस शख्स को खुश आमदीद कहने के लिए हमेशा तैयार रहता है जो इसके साए रहमत में आना चाहे, इस लिहाज़ से कुबूल ए इस्लाम का कोई भी वाकिया किसी के लिए भी तशवीश का कारण नहीं होना चाहिए, लेकिन हमारे देश में फिरका वाराना हम आहंगी की कमी ने बहुत सारे समाजी और स्यासी मसाइल पैदा कर दिए हैं, उनमें एक मसला कुबूल ए इस्लाम का भी है, कुबूल ए इस्लाम का कोई भी वाकिया फिरका परस्तों को बर्दास्त नहीं है, इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग इस्लामी शिक्षाओं से प्रभावित हो कर इस्लाम कुबूल कर रहे हैं, इसके लिए उन्हें कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ती है और सामाजिक कशमकश से भी गुजरना पड़ता है, तथापि ब्याह जैसे मामलों में धर्म को आड़ बनाना सहीह नहीं है, मुस्लिम नौजवानों को च्चिये कि वह जज्बाती फैसलों से गुरेज़ करें, केवल शादी के लिए अगर कोई लड़की धर्म परिवर्तन करे गी तो शायद ही उसका इस्लाम मोतबर समझा जाएगा, चन्द्र मोहन चाँद और फिजा के मामले में आम तौर पर यह कहा जा रहा है कि उनका इस्लाम केवल शादी के लिए था, इस तरह के मामलों में भी यह कहा जाए गा, बेहतर यही है कि मुस्लिम नौजवान अपने जाती हितों के लिए इस्लाम का नाम ना इस्तिमाल करें और ना मुसलमानों को बलि का बकरा बनाएं, देश के राजनीतिक हालात इस तरह के फैसलों की इजाज़त नहीं देते, अगर इस्लाम से मोहब्बत हैं तो नौजवानों को चाहिए कि वह इस्लामी उसूलों के अनुसार अपनी शख्सियत तामीर करें। लव इन जिहाद का शोशा छोड़ कर फिरका परस्त संगठन यह साबित करना छः रही हैं कि मुसलामानों ने जिहाद का नया मैदान तलाश कर लिया है और देश में इन्तिशार फैलाने का नया तरीका इजाद कर लिया है, अब मुस्लिम नौजवान हिन्दू लड़कियों को मोहब्बत के जाल में फंसा कर जिहाद कर रहे हैं, जो लोग यह आरोप लगा रहे हैं वह जिहाद की हकीकत से वाकिफ ही नहीं हैं या जान बुझ कर अनजान बन रहे हैं, इक्का दुक्का घटनाओं को आधार बना कर आरोप लगाना फिरका परस्तों का पुराना शेवा है लेकिन इससे हमारे नौजवानों को भी सबक लेना चाहिए, इन हालात में जब कि फिरका परस्तों की तरफ से मुसलमानों पर “लव इन जिहाद” का आरोप लगाया जा रहा है, उलेमा और बुद्धिमान हजरात और मिल्लत के हमदर्दों को सोचना होगा कि इस आरोप का जवाब किस तरह दिया जाए, जुबान से कहें कि हम ऐसा नहीं कर रहे हैं और यह इस्लाम में जबरन धर्म परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है या अपने अमल से जिसके जरिये हम घरों में ऐसा माहौल पैदा करें कि किसी मुस्लिम नौजवान को धर्म का शोषण करने की हिम्मत ना हो।

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