सुहैल अरशद, न्यू एज इस्लाम
3 फरवरी 2022
मौलाना आज़ाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे और यह पद उन पर आज तक गर्व करता है क्योंकि उनके बाद कोई भी शिक्षा मंत्री उनके कद और उनकी जैसी इल्मी और इंतज़ामी अंतर्दृष्टि वाला नहीं हुआ। मौलाना आज़ाद शिक्षा मंत्री होने के साथ कैबिनेट मंत्री भी थे और वह राष्ट्रीय मामलों पर प्रभावित होते थे।
उन्होंने आज़ादी के बाद भारत के शैक्षणिक प्रणाली को वैज्ञानिक आधार पर मजबूत किया। वह हालांकि एक दीनी माहौल में पैदा हुए थे और परवरिश पाई थी वह एक रौशन ख्याल और ऊँची सोच के दीन के आलिम और बुद्धिजीवी थे। उन्होंने देश को जो शैक्षणिक प्रणाली और वैज्ञानिक दिशा दी उसकी बुनियाद पर आज भारत इल्मी, तालीमी और विज्ञान के क्षेत्र में विकसित देशों के बराबर खड़ा है। भारत ने आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में सराहनीय विकास किया और एक महान वैश्विक शक्ति बन सका है तो इसमें मौलाना आज़ाद की इल्मी और वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि को बहुत दखल है। पाकिस्तान भारत के मुकाबले में इतनी वैज्ञानिक विकास नहीं कर सका इसकी वजह यही है कि उसे अपने सबसे पहले दौर में मौलाना आज़ाद जैसा शिक्षा मंत्री नहीं मिला।

मौलाना आज़ाद ने देश के शैक्षणिक प्रणाली में सुधार लाने और उसको विश्व स्तर तक लाने के लिए कई उल्लेखनीय पहल किये। वह शिक्षा मंत्री की हैसियत से न केवल मुसलमानों के दीनी तालीमी निज़ाम में सुधार के लिए चिंतित थे बल्कि पुरे देश को बेहतर से बेहतर बनाने के लिए भी चिंतित थे। उन्होंने जिस पुराने शैक्षणिक प्रणाली में परवरिश पाई थी और शिक्षा प्राप्त की थी इसका अंदाज़ा उन्हें था और इस लिए वह मुसलमानों के दीनी शिक्षा के प्रणाली में सुधार करके उसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुकूल बनाना चाहते थे। उन्होंने अपने बचपन के शिक्षा प्रणाली के संबंध में मलाल में लिखा है:
“खुद उस शिक्षा का क्या हाल था जिसको हासिल करने में तमाम शुरूआती ज़माना बसर हुआ। इसका उत्तर अगर संक्षेप में भी दिया जाए तो पन्ने के पन्ने काले हो जाएं। एक पुराना निज़ाम जिसे तालीम के फन की जिस दृष्ठि से भी देखा जाए सर से सर तक बाँझ हो चुका है। शिक्षा के तरीके के एतिबार से दोषपूर्ण, विषयों के एतिबार से दोषपूर्ण, विषयों के चुनाव के एतिबार से दोषपूर्ण।“ गुबारे खातिर पेज 97)
मदरसों के पाठ्यक्रम की फर्सूदगी का भी उल्लेख मौलाना आज़ाद आगे चलकर करते हैं:
“अगर ललित कलाओं को अलग कर दिया जाए तो दर्से निज़ामिया में मूल विषय दो ही रह जाते हैं। दीनी इल्म और माकूलात। दीनी उलूम की शिक्षा जिन किताबों में मुनहसिर रह गई है इससे उन किताबों के अर्थ व इबारत का इल्म हो जाता है लेकिन खुद इन उलूम में कोइ मुज्तहेदाना बसीरत हासिल नहीं हो सकती। माकूलात से अगर मंतिक अलग कर दी जाए तो फिर जो कुछ बाकी रह जाता है उसकी इल्मी कदर व कीमत इससे कुछ अधिक नहीं कि प्राचीन तारीखे फलसफा एक ख़ास जमाने की ज़हनी काविशों की यादगार है हालांकि इल्म की दुनिया उस जमाने से सदियों आगे बढ़ चुकी। उलूमे रियाज़िया जितना पढ़ाए जाते हैं वह मौजूदा जमाने की रियाज़त के मुकाबले ज़ीरो के बराबर हैं और वह भी आम तौर पर नहीं पढ़ाए जाते। जामिया अज़हर काहेरा के निसाबे तालीम का भी लगभग यही हाल है। भारत में बाद की माकूलात की किताबों को बढ़ावा मिला वहाँ इतनी वुसअत भी पैदा न हो सकी।“ (गुबारे खातिर पेज 98)
इस इक्तिबास से मौलुम होता है कि मौलाना को तमाम आलमे इस्लामी में तालीमी निसाब और उसकी कमियों का इल्म था और वह इसमें सुधार लाना चाहते थे। इसलिए आज़ादी के बाद उन्होंने भारत के मदरसों, मकतबों और दारुल उलूम के सरबराहों की एक कान्फ्रेंस बुलाई थी और यह कोशिश की थी कि मदरसों के सरबराह मदरसों के पाठ्यक्रम में आधुनिक ज्ञान को शामिल कर के दीनी शिक्षा के साथ साथ आधुनिक सेकुलर उलूम को शामिल करने पर राज़ी हो जाएं। दुसरे शब्दों में मदरसों की जदीद कारी की जो मुहीम आज की सरकारें चला रही हैं वह मौलाना आज़ाद ने पचास की दहाई में चलाई थी। मगर अफ़सोस कि मदरसों के सरबराहान और मुसलमानों की शिक्षा में पिछड़े पन का रोना रोने वाले दीन के मुस्लिम कायदीन ने इन तजवीजों पर तब अमल किया और न अब भी करने को तैयार हैं।
ऐसा नहीं कि मौलाना आज़ाद केवल मुसलमानों के दीनी तालीमी निज़ाम की फर्सूदगी से नाराज़ थे बल्कि वह अंग्रेजों के मातहत नाफ़िज़ तालीमी निज़ाम की फर्सूदगी से भी नालां थे और उसमें भी सुधार चाहते थे। 13 दिसंबर 1920 को कलकत्ता में मदरसा ए इस्लामी के इफ्तिताही जलसे से खिताब करते हुए कहा था:
“भारत में सरकारी शिक्षा ने जो हानि हमारे कौमी खसाएल और आमाल को पहुंचाए हैं उनमें सबसे बड़ा नुक्सान यह है कि इल्म के हासिल करने का सबसे आला मकसद हमारी नज़रों से महजूब हो गया है। इल्म खुदा की एक पाक अमानत है और उसको केवल इस लिए ढूँढना चाहिए कि वह इल्म है। लेकिन सरकारी युनिवर्सिटियों ने हम को एक दूसरी राह बतलाई है। वह इल्म का इस लिए शौक दिलाती है कि बिना इसके सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। तो अब भारत में इल्म को इल्म के लिए नहीं बल्कि पैसे के लिए हासिल किया जाता है। यह बड़ी बड़ी इमारतें जो अंग्रेजी शिक्षा की नई आबादियाँ हैं किस मखलूक से भरी पड़ी हैं? मुशताकाने इल्म व शैफतगाने हकीकत से? नहीं, एक मुट्ठी गेहूं और एक प्याला चावल के परिस्तारों से जिनको यकीन दिलाया गया है कि बिना इल्म के हुसूल के वह अपनी गिज़ा हासिल नहीं कर सकते।“
यह थे वह मोहरिकात जिन्होंने मौलाना आज़ाद के शिक्षा मंत्री बनने के बाद उन्हें जदीद आलमी खुतूत पर भारत के शैक्षणिक प्रणाली को मजबूत करने की तहरीक दी। उन्होंने भारत के तालीमी निज़ाम को आलमी सतह पर लाने और उस तालीमी निज़ाम को भारतीयों की ज़हनी और रूहानी तरबियत करने के काबिल भी बनाया और भारतीय कौमी वहदत को बढ़ावा देने की भी कोशिश की।
जब मौलाना आज़ाद शिक्षा मंत्री बने उस वक्त महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु जैसी कद्दावर शख्सियात मौजूद थीं जो तरक्कियाती विषयों पर अपने अपने अलग ख्यालात रखती थीं। एक तरफ महात्मा गांधी बड़े उद्योगों के बजाए घरेलू उद्योगों और दस्तकारी को बढ़ावा देने के हक़ में थे तो दूसरी तरफ जवाहर लाल नेहरु बड़े उद्योग स्थापित कर के देश को विकसित देशों के मुकाबले में खड़ा करना चाहते थे। मौलाना आज़ाद न केवल दीनी मामलों में उदारवादी थे बल्कि वह शिक्षा और उद्योग के मामलों में भी उदारवादी थे। इसलिए, शिक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने एक तरफ तो देहाती उद्योगों को भी महत्व दिया और साथ ही साथ विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा दे कर देश को औद्योगिक क्षेत्र में भी आगे ले जाने की कोशिश की।
आज भारत में जो वैज्ञानिक, तहज़ीबी, अदबी और समाजी सरकारी इदारे हैं वह सब के सब मौलाना आज़ाद के मंत्री रहने के दौर में कायम हुए हैं और मौलाना आज़ाद की राजनितिक और इल्मी बसीरत के गुम्माज़ हैं। उन्होंने देश में वैज्ञानिक विकास के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडीकल रीसर्च कायम किया। उन्होंने इंडियन काउंसिल और एग्रीकलचरल एंड साइंटिफिक रीसर्च कायम किया और सरकरदा भारतीय वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर की सरबराही में एटमी शोबे में रीसर्च के लिए भी इदारा कायम किया। उन्होंने इंडियन काउंसिल ऑफ़ सोशल साइन्सेज़ रीसर्च नामक इदारा भी कायम किया जो तमाम समाजी, मआशी और इक्तेसादी विषयों और समस्याओं का घेराव करता था।
वह हालांकि दीनी मिज़ाज के हामिल थे मगर जब वह भारत के शिक्षा मंत्री बने तो उन्होंने एक सेकुलर मंत्री की हैसियत से अदबी और सकाफती मैदान में भारतीयों की हौसला अफज़ाई के लिए इदारे कायम किये। जैसे भारतीय साहित्य की तरक्की के लिए साहित्य अकादमी, भारतीय नाच गाने को बढ़ावा देने के लिए संगीत नाटक अकादमी और हास्य कला को बढ़ावा देने के लिए ललित कला अकादमी। मौलाना आज़ाद इन अकादमियों के सरबराह भी रहे। इन अकादमियों के कयाम का उद्देश्य केवल कलाकारों को सम्मान देना नहीं था बल्कि अदब और सकाफत को कौमी इत्तेहाद और हम आहंगी को बढ़ावा देना भी था।
जैसा कि उनका स्टैंड था कि इल्म को केवल आजीविका के लिए नहीं बल्कि एक इंसान की हैसियत से समाज में अपने मकाम को पहचानने और इंसान को रूहानी तौर पर रिफअत अता करने के लिए भी हासिल करना चाहिए इसलिए वह धार्मिक ज्ञान को भी आधुनिक शिक्षा का हिस्सा बनाने के हक़ में थे ताकि छात्र के अंदर वैचारिक उदारता कायम रहे। वह न पुरी तरह मज़हबी जुनूनी बन जाए और न पुरी तरह माद्दियत परस्त हो जाए। इसलिए उन्होंने कुछ यूनिवर्सिटी में उलूमे मशरिकी या इस्लामी उलूम के शोबे भी कायम कराए। इसी तरह वह यह भी समझते थे कि भारत का इल्मी और तहज़ीबी सरमाया संस्कृत में भी महफूज़ है इसलिए संस्कृत भाषा व साहित्य के फरोग से भारत के प्राचीन इल्मी वरसे की भी हिफाजत होगी। इसलिए उनके दौर में संस्कृत की शिक्षा के फरोग के लिए कई इदारे कायम किये गए।
कुल मिलाकर मौलाना आज़ाद ने अपने मंत्री पद के संक्षिप्त दौर में भारत को शिक्षा के मैदान में आगे ले जाने के लिए जो अहम कारनामे अंजाम दिए उनकी बदौलत भारत ने बीसवीं सदी और इकीस्वीं सदी में तालीमी और साइंसी मैदान में काबिले कद्र तरक्की की है। भारत ने नामवर वैज्ञानिक पैदा किये और नोबल इनाम याफ्ता वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री दुनिया को दिए। इसने अंतरिक्ष तकनीकी में काबिले कद्र तरक्की की है और वैज्ञानिक ज्ञान में वह अमेरिका, चीन और दुसरे विकसित देशों के बराबर खड़ा है। उनकी सेवाओं का एतेराफ न करना एहसान फरामोशी होगी।
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