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Hindi Section ( 3 Sept 2022, NewAgeIslam.Com)

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Slogans like "Sar Tan Se Juda" Are Utterly Incompatible with Islam, Though Nothing Is More Valuable than the Honour of the Prophet for Us Muslims आक़ा ए नामदार की नामूस से बढ़ कर कुछ नहीं ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा बिलकुल गैर इस्लामी है

विभिन्न मस्लकों और मकतबे फ़िक्र के बड़े उलमा की राय

मौलान अबू तालिब रहमानी

(ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की जनरल बॉडी के सदस्य)

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

28 अगस्त, 2022

एक आम से आम मुसलमान के लिए भी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इज्ज़त नामूसवकार और सम्मान से बढ़ कर कोई चीज नहीं है। अगर कोई बिलकुल गिरा हुआ इंसान आपकी शाने अक़दस में गुस्ताखी करता है तो अदना से अदना मुसलमान भी अपने जज़्बात पर काबू नहीं रख पाता। यह एक फितरी बात है। यह मुहब्बत का तकाज़ा है। लेकिन इस्लाम एक अजीमुश्शान दीन है। इस्लामी शरीअत हर मौके पर हमारी रहनुमाई करती है। हमें हर हाल में अपने जज़्बात पर काबू रखना है। यह एहसास और रहनुमाई इस्लाम और शरीअत की है। हमें अपने गुस्से को नकारात्मक दिशा नहीं देना है। हमें इस गुस्से का सकारात्मक इस्तेमाल करना है। लेकिन यह ज़ाहिर है कि गुस्से और जज़्बात के वक्त नकारात्मक से रुकना और सकारात्मक पर अमल करना हर आदमी के बस की बात नहीं है। यहाँ पर हमारे उलमा बड़े फुकहा असलाफ और बुज़ुर्गाने दीन की आवश्यकता पेश आती है। हमारे उलमा व अकाबिरीन को आगे बढ़ कर खुद रहनुमाई करनी पड़ेगी। कोई यह कह कर नहीं बुलाएगा कि हमारी रहनुमाई कीजिये। ऐसे समय में जब लोग गुस्से और जज़्बात में हैं उलमा को ही थामना पड़ेगा। हर देश का एक कानून है। मुसलमान के लिए यह जायज़ नहीं है कि जिस देश में रहे उसके लॉ एंड आर्डर के लिए समस्या पैदा करे। जिसने गुस्ताखी की है उसने देश के लॉ एंड आर्डर के लिए एक समस्या और समाज में एक कुशीदगी पैदा की है। अगर मुसलमान भी अपने जज़्बात और नादानी में लॉ एंड आर्डर के लिए समस्या पैदा कर दे तो यह उस शैतान के लिए मददगार साबित हो सकता है। हरगिज़ मुनासिब नहीं है कि मुसलमान कोई ऐसा नारा लगाए जो कानून और सिद्धांत के खिलाफ हो। किसी एक आदमी की सज़ा जुबान से या अमल से किसी समाज को नहीं दी जा सकती। कर्ने उला में हज़रत अबुबकर सिद्दीक की खिलाफत के बीच जब जब तहफ्फुज़े नामूस के लिए आवाज़ बुलंद हुई तो सरकार और एक निज़ाम के तहत हुई।ऐसा नहीं हुआ कि कोई मुसलमान खडा हुआ और उसने हथियार लहराए हों। इतिहास में अगर ऐसी को नज़ीर हो भी तो वह भी इस्लामी जाब्ते के खिलाफ है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहाँ एक निज़ाम और दस्तूर बाकी है। जो लड़ाई लदनी है और जो कोशिश करनी हैं वह कानून के दायरे में ही करनी होंगी। अगर कानून के दायरे से हटते हैं तो नुक्सानात तो अपनी जगह मगर इस्लामी एहसासात और उसूलों के भी विपरीत है।

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मौलाना मोहम्मद रहमानी

(अध्यक्ष मौलाना अबुलकलाम आज़ाद वेक्टिंग सेंटर)

सर तन से जुदाजैसा नारा स्रास्र्गैर इस्लामी है और एक आम आदमी अगर इस्लामी हुकूमत के तहत भी जिंदगी गुज़ार रहा है तो भी उसे ऐसे नारों की बिलकुल इजाज़त नहीं है। बल्कि इस अंदाज़ के नारों पर इस्लामी हुकूमत की जिम्मेदारी है कि सज़ा निर्धारित कर के अमन व सलामती की बहाली को निश्चित करे। जब इस तरह के जज़बाती जुर्म की इस्लामी देशों में किसी भी सूरत में इजाज़त नहीं दी जा सकती तो गैर इस्लामी देशों में इसकी गुंजाइश कैसे हो सकती है। (ये मालुम हो कि इस्लामी देशों में शातिमे रसूल की सज़ा क़त्ल है लेकिन इस सज़ा को लागू करने का हक़ क़ाज़ी और हुकूमत को है आम आदमी को नहीं) । मुसलमानों की ऐसे माहौल में दीनी जिम्मेदारी यह है कि वह सीरते रसूल और सुन्नते रसूल की पाबंदी और उनको अमली जामा पहनाने पर ध्यान दें। अल्लाह पाक ने रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मज़ाक उड़ाने या आपको गालियाँ देने वालों के लिए फरमा दिया इन्ना कफैनाकल मुस्तहज़िईनकि ऐसे ज़लील लोगों के लिए अल्लाह काफी है और कायनात के रब ने रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उन्हें अनदेखा करने और दीन की तबलीग करते रहने का आदेश दिया है (विवरण के लिए सुरह हुजरात आयत 94 से 99)

मुसलमानों की ऐसे माहौल में राजनीतिक जिम्मेदारी यह है कि एकता पैदा करें और भविष्य के लिए मजबूत लाए अमल बनाएं और पुरी मजबूती के साथ कानूनी इकदामात करें और देश के कानून के दायरे में रहते हुए समस्या की पैरवी करें। याद रखें कि खुद मुसलमान अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सुन्नत से संबंधित जी आपराधिक गफलत का शिकार है और अपने फिखी मसाइल को हदीसों पर तरजीह देने की खतरनाक गलती लगातार अंजाम दे रहा है यह भी तौहीने रिसालत की ही एक शक्ल है। ऐसी सूरत ए हाल पर हमें आयते करीमा वमा असाबकुम मिम मुसीबतिन फबिमा कसबत ऐदीकुम (अल शूरा: 30) पर गौर करना चाहिए। यकीनन तमाम मकातिबे फ़िक्र के रहनुमाओं को मुत्तहिद लाए अमल तैयार करना चाहिए और मुसलमानों की भी करनी चाहिए और हुकूमत के संबंधित जिम्मेदार से एक हो कर बात भी करनी चाहिए।

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मौलाना अब्दुल अली फारुकी

मोहतमिम मदरसा फारुकिया काकोरी

जहां तक इस नारे का मामला है इसकी तो गुंजाइश ही नहीं हो सकती। सबसे बड़ी बात यह है कि यह इस्लामी शरई कानून है तौहीने रिसालत पर सज़ा और उसका निफाज़ इस्लामी देश में हो सकता है भारत जैसे देश में इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। इस प्रकार के भड़काऊ बातों से नुक्सान ही होगा। शरई तौर पर इसकी कोई इजाज़त नहीं। विरोध तो अवश्य होना चाहिए, लेकिन इसके लिए उचित व्यवहार करना चाहिए और जो अंदाज़ इख्तियार किया जा रहा है वह बिकुल अनुचित है। विरोध के दौरान सड़कों पर भड़काऊ नारे लगाने से बात और बढ़ेगी। जिम्मेदारों और हुक्मरानों को मुनासिब तरीके पर सुचना देनी चाहिए और अखबारों के माध्यम से और वफ्द की शक्ल में अपना विरोध अवश्य दर्ज कराना चाहिए। हमारे देश में जो कानून है उसमें किसी की भी तौहीन की इजाज़त नहीं। स्पष्ट तौर पर संविधान में मौजूद है कि किसी भी मज़हबी पेशवा की तौहीन नहीं की जा सकती। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुसलमानों के लिए जितनी अहमियत है उसके पेशे नज़र हम यह कह सकते हैं की सत्ताधीशों को हमारी बात सुन्नी चाहिए और अगर हुक्मरान नहीं सुनते हैं तो हम को कानूनी चारा जुई करनी चाहिए। इस सिलसिले में आपस में मशवरा कर के कोई मुनासिब तरीका इख्तियार करना चाहिए खामोश नहीं रहना चाहिए। तमाम मस्लकों और तमाम मकातिबे फ़िक्र के उलमा को और दुसरे वर्ग के लोगों को जमा कर के लाए अमल तरतीब देना बहुत आवश्यक है। सबसे बड़ा मसला यही है कि हम लोग जमा नहीं हो पाते।

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मुफ़्ती उमर आबेदीन कासमी मदनी

(नायब नाज़िम अल माबदल आली अल इस्लामी, हैदराबाद)

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी गंभीर अपराध है और इस तरह की कोशिशें भारत में केवल फिरका परस्ती को हवा देने और पुरे माहौल में ज़हर घोलने के लिए की जा रही है। सरकार और देश से हकीकी मोहब्बत रखने वालों को चाहिए कि ऐसे अपराधियों के खिलाफ सख्त कानूनी चारा जुई की जाए वरना यह देश साम्प्रदायिकता की आग में ख़ाक हो जाएगा। इस्लामइस बात की शिक्षा देता है कि केवल एक खुदा की इबादत व परस्तिश की जाए और दुसरे मज़हबी पेशवा के बारे में कोई गुस्ताखी न की जाए। विचारों में मतभेद के बावजूद दुसरे मज़हबी मुकद्द्सात का अपमान न किया जाए और अल्हम्दुलिल्लाह मुसलमान कौम की हैसियत से इन निर्देशों पर अमल करते रहे हैं। इस्लामी नियमों के मुताबिक़ सख्त से सख्त अपराध करने के लिए इस्लामी रियासत का होना आवश्यक है और अदालती कार्रवाई के जरिये ही यह काम अंजाम दिया जा सकता है। इसलिए किसी जम्हूरी देश में ऐसे नारे लगाना जिनसे कानून शिकनी, या बज़ाते खुद सज़ा नाफ़िज़ करने का इज़हार हो सहीह नहीं है। मुसलमानों को ऐसे हालात व हादसात में निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए।

कानूनी चारा जुई- देश व्यापी स्तर पर कानून दानों और दुसरे इकाइयों पर आधारित एक ग्रुप बनाया जाए, जो ख़ास तौर पर Blasphemy के घटनाओं का नोटिस ले, और तमाम तर इमकानात को पेशे नज़र रख कर कानूनी इकदामात करे। और रियासती सरकारों से कानून साज़ी का मुतालबा किया जाए। स्थानीय हालात और नज़ाकतों को सामने रख संगठित विरोध प्रदर्शन किये जाएं। अवामी गम व गुस्सा और विरोध का अपना वज़न होता है, मगर इसमें क्षेत्रीय नज़ाकतों को अवश्य सामने रखा जाए। विभिन्न स्तर पर सरकार और आला ओहदे दारों से साझा वफ्द मुलाक़ात करे और अपने मांग को पेश करे। अंतरधार्मिक मुज़ाकरात आयोजित किये जाएं। रबीउल अव्वल और दुसरे मौकों पर सीरते नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इंसानी पहलुओं को पेश किया जाए, इसके लिए सोशल मीडिया के प्लेटफोर्म को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाए। समाजी रवय्यों को अख्लाके नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पैकर में ढाला जाए। आए दिन इस तरह के तकलीफ देने वाली घटना पेश आने लगी हैं।

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सईद रज़ा नूरी

सदर रज़ा एकेडमी, मुंबई

मुसलमानों के नज़दीक तौहीने रिसालत से बढ़ कर कोई भी अपराध नहीं है। तौहीने रिसालत के करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त विरोध प्रदर्शन और मुजाहेरे होने चाहिए। मगर इसके लिए हालात पर भी नज़र होनी चाहिए। विरोध कानून के दायरे में ही होना चाहिए। भारत में या भारत के बाहर सज़ा देना केवल अधिकारियों का काम है। अवाम का काम विरोध और कानूनी कार्रवाई करना है। ऐसे नारों से परहेज़ करना चाहिए जिन पर न हम अमल कर सकते हैं और न करवा सकते हैं। हमें एक मजबूत तहरीक चला कर अहानत के खिलाफ कानून बनवाना चाहिए जिसके तहत किसी भी मज़हबी पेशवा के खिलाफ तौहीन करने वालों को कम से कम दस साल की सज़ा दी जाए। 1974 में जिस तरह तमाम मस्लकों के मुसलमानों ने मिल कर कादियानियों को गैर मुस्लिम करार देने की मुहिम चलाई थी उसी तरह गुस्ताखाने रसूल के खिलाफ कानून बनवाने के लिए भी तमाम मसालिक से संबंध रखने वाले उलमा और मुसलमानों को तहरीक चलानी चाहिए।

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तौहीने रिसालत संभव ही नहीं

मुफ़्ती अतहर शम्सी

अल कुरआन एकेडमी कैराना, शामली

मेरे नज़दीक तौहीने रिसालत संभव ही नहीं है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान इस कदर बुलंद है कि किसी सिफिरे की मजाल ही नहीं है कि वह उस अज़ीम हस्ती की शान को कोई अदना दर्जे में घटा सके। आप जिस तरफ नज़र उठाएं, हर तरफ इसी अज़ीम हस्ती का फैजान नज़र आएगा। खुद कुरआन ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में इरशाद फरमाया है और हमने आपका ज़िक्र बुलंद कर दिया (4/94) । अर्थात आपका नाम बुलंद कर दिया। भला जिस अज़ीम हस्ती का नाम खुद खालिके कायनात ने बुलंद कर दिया हो, क्या किसी अपराधी की मजाल है कि वह आप अलैहिस्सलाम की शान को ज़रा भी मजरुह कर सके? हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में यह बयान कि अल्लाह की पनाह, आप की तौहीन कर दी गई है रसूलुल्लाह की अजमत से नावाकिफ या उसके गहरे शउर के अभाव का प्रमाण है। हाँ कुछ सिरफिरे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखाना कलमात इस्तेमाल कर के खुद अपने जलील होने का एलान करते रहते हैं। जिन लोगों ने मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के संबंध से दरीदा ज़हनी करने की कोशिश की, उन आपराधिक बदतमीजियों का जवाब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जिस तरह देने का आदेश दिया गया उसका इल्म हमें कुरआन की सुरह हजर की आयत नंबर 94-95 से हो जाता है। जिसका मफहूम यह है: व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन के जिन सिद्धांतों का आपको हुक्म दिया गया है, आप उन्हें खुल्लम खुल्ला सूना दीजिये और मुशरेकीन से एराज़ कीजिये। इस तरह आप अपने प्रोग्राम पर जमे रहिये। और मज़ाक उड़ाने वालों से निमटने के लिए आपकी तरफ से हम ही काफी हैं।कुरआन की इस आयत में साफ हुक्म दिया गया है कि जब भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी की नाकाम कोशिश की जाए हमें एराज़ का रवय्या इख्तियार करना चाहिए। सुरह ताहा की आयत चालीस में इरशाद है जो लोग अपनी जुबान से आपको तकलीफ पहुंचा रहे हैं। आप उनके जवाब में सब्र कीजिये।इसलिए कुरआन की इन आयतों की रौशनी में ऐसी बदतमीज़ी का जवाब केवल साबिराना रणनीति है जिसमें कानूनी कार्रवाई भी शामिल है। सर तन से जुदा जैसे नारे लगाना अल्लाह की किताब और सुन्नत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खिलाफ है। तौहीने रिसालत की नाकाम कोशिशों का जवाब दो स्तर पर दिया जाना चाहिए। (1) संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी चारा जुई कर के ताकि समाज में किसी बड़े इंतेशार और बदअमनी को रोका जा सके। (2) ऐसी जसारत करने वाले हर शख्स और देश के तमाम नागरिकों के साथ ओपन डायलागके माध्यम से तमाम सुचना तंत्र का इस्तेमाल कर के देश के शहरी के साथ सभ्य और जदीद इल्मी उस्लूब में मुकालमा का दरवाज़ा खोल दिया जाए तो हर इंसान की निगाह में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। (3) मुसलमान खुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गहराई से मुताला करें। अल कुरआन एकेडमी कैराना अपने सीमित संसाधनों के साथ इन्हीं खुतूत पर काम कर रही है।

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English Article: Slogans like "Sar Tan Se Juda" Are Utterly Incompatible with Islam, Though Nothing Is More Valuable than the Honour of the Prophet for Us Muslims

Urdu Article: Slogans like "Sar Tan Se Juda" Are Utterly Incompatible with Islam, Though Nothing Is More Valuable than the Honour of the Prophet for Us Muslims آقائے نامدار کی ناموس سے بڑھ کر کچھ نہیں ’سر تن سے جدا‘ جیسا نعرہ سراسر غیر اسلامی ہے

URL: https://newageislam.com/hindi-section/sar-tan-se-juda-honour-prophet-muslims/d/127863

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