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Hindi Section ( 11 Apr 2019, NewAgeIslam.Com)

How to Resolve the Issue of Khawarij and Extremism? ख्वारिज और चरमपंथ का इलाज कैसे संभव?


कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

मुसलमानों की तकफीर करना और उन पर शिर्क की तोहमत लगाना ख्वारिज का काम रहा हैl कुरआन की समझ के सिलसिले ख्वारिज की अकलें इनकार व गुमराही का शिकार हो गईं और इल्म वालों के कथन के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्हों ने वहि के सिलसिले में असलाफ के तरीके की पैरवी नहीं कीl

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी तकफीरी गिरोह और मनहज से अपनी उम्मत को आगाह किया है इसलिए हज़रत हुजैफा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि मुझे सबसे अधिक उस व्यक्ति से डर है जो कुरआन पढ़ने वाला होगा, कुरआन का नूर भी उसे हासिल होगा, इस्लाम का हामी और उसका बचाव करने वाला होगा, मगर वह कुरआन को बदल देगाl ऐसा करके वह कुरआन से जुदा हो जाएगा और उसे पीठ पीछे डाल देगा, अपने पड़ोसी पर तलवार उठाए गा और उस पर शिर्क की तोहमत लगाए गाl हज़रत हुजैफा फरमाते हैं कि मैंने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! उन दोनों में शिर्क से कौन अधिक निकट होगा, शिर्क की तोहमत जिस पर लगाईं गई है वह या जिसने तोहमत लागाई हैl आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: नहीं बल्कि तोहमत लगाने वालाl (सहीह इब्ने हिबान, बकौल इब्ने कसीर इसकी सनद जय्यिद है)

मौलाना ज़ियाउद्दीन अलीमी के अनुसार, इस हदीस में गौर करने से निम्नलिखित अलामतें सामने आती हैं: (१) यह गिरोह कुरआन से गहरा संबंध रखने वाला और इसकी सेवा करने वाला होगा इसकी वजह से लोगों को उनसे अच्छा गुमान होगा (२) उसको कुरआन की नूरानियत से कुछ हिस्सा हासिल होगा, इसकी वजह से लोगों को और अधिक उनसे अच्छा गुमान होगा (३) दीन के लिए बड़ा जोश व जज़्बा रखने वाला, इसका बचाव करने वाला होगा (४) इन सबके बावजूद उसके अन्दर एक अजीब व गरीब तबदीली रुनुमा होगी जिसकी वजह से लोगों में एक बेचैनी पैदा हो जाएगी, वह तबदीली यह होगी कि वह कुरआन के मुत्वारिस अर्थ से भटक कर अलग बातिल तावील करेगा क्योंकि वह इसतम्बात के तरीके से अनजान होगाl (५) इसलिए वह अपने पड़ोसी को काफिर व मुशरिक ठहराए गा (६) केवल इसी पर बस नहीं करेगा बल्कि वह उसके खिलाफ किताल के लिए हथियार उठाएगा और खूनखराबा आम करेगाl

उपरोक्त हदीस में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दीन दार नज़र आने वाले व्यक्ति की दीन के नाम पर जिस तीव्रता और उसकी जिन तबाहकारियों पर डर का इज़हार किया है वह बिलकुल सही है, क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आम स्थिति में तीव्रता बिलकुल पसंद नहीं फरमाते थे, हज़रत मुआज बिन जबल ने इबादत की जोश में इमामत के समय फ़जर की नमाज़ में लंबी किराअत शुरू कर दी, यह सहाबा पर शाक गुजरा जिसकी वजह से लोग जमात से दूर होने लगे तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत मुआज़ बिन जबल रज़ीअल्लाहु अन्हु की सख्त शब्दों में तादीब फरमाई और तीन बार फरमाया फतान, फतान, फतानl अर्थात क्या तुम लोगों को आज़माइश में डाल देना चाहते होl (बुखारी, बाब इज़ा तुलुल इमाम, हदीस ७०१)

इस घटना से पता चलता है कि इबादत में थोड़ी शिद्दत पर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब इतने चिंतित हो गए तो आप को इस तकफीरी शख्स के फितने से कितना अधिक अपनी उम्मत पर खौफ महसूस हुआ होगाl

हज़रत इब्ने अब्बास और ख्वारिज के बीच मुनाज़रा

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया जब ख्वारिज ने अलगाव विकल्प किया तो मैं ने हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु से अर्ज़ किया ऐ अमीरुल मोमिनीन नमाज़ को ठंडा करके पढ़ें (अर्थात थोड़ी देर से पढ़ें) ताकि मैं उन लोगों के पास जाऊं और उनसे बात करूँ! हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया! मुझे उन लोगों का डर है कि आपको कोई हानि पहुंचाएंl मैंने कहा इंशाअल्लाह ऐसा कभी नहीं होगाl तो मैंने यमन का अच्छे से अच्छा जोड़ा पहना और फिर ख्वारिज के पास आ गयाl

वह लोग बिलकुल दोपहर के समय कैलुला कर रहे थेl इसलिए मैं ऐसे लोगों के पास गया कि उन जैसे मैंने कभी नहीं देखे वह लोग शिद्दत व रियाज़त से अल्लाह की इबादत करते थेl उनके हाथ बहुत अधिक इबादत करने की वजह से ऊंट के बदन की तरह फटे हुए थे और उनके चेहरों पर बहुत अधिक सजदे करने की वजह से निशान साफ़ दिख रहे थेl तथापि मैं उनके पास दाखिल हुआl वह लोग कहने लगे ऐ इब्ने अब्बास मरहबा! यहाँ आप क्यों आए हैं? मैंने कहा मैं तुम्हारे पास आया हूँ ताकि तुमसे बात करूँ! फिर मैं बोला रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा के ज़माने में वहि नाज़िल होती थी, इसलिए सहाबा वहि की तावील से अच्छी तरह परिचित हैंl

कुछ ख्वार्जियों ने कहा कि इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु के साथ बात मत करो और कुछ ने कहा कि हम उनसे अवश्य बात करेंगेl

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मैं ने कहा मुझे बताओ! तुम लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चचेरे भाई, उनके दामाद और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सबसे पहले ईमान लाने वाले (अर्थात हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु) पर क्यों तान व तश्नीअ करते हो? हालांकि रसूलुल्लाह के सहाबा भी उनके साथ हैं? ख्वारिज बोले हम तीन बातों की वजह से तान व तश्नीअ करते हैंl मैंने कहा भला वह क्या क्या हैं? कहने लगे: पहली चीज यह कि उन्हेंने अल्लाह के दीन के मामले में मर्दों को मुंसफ बनाया है’ हालांकि अल्लाह पाक का इरशाद है: हुक्म व फैसले का इख़तियार केवल अल्लाह के लिए है (अनआम:५७)l मैंने कहा इसके अलावा और क्या चीज है? कहने लगे: हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु मुआविया रज़ीअल्लाहु अन्हु के साथ किताल करते हैं और उनके बच्चों और औरतों को कैदी नहीं बनाते और ना ही उनके माल को गनीमत समझ कर बांटते हैं इसलिए अगर वह काफिर हैं तो अनिवार्य रूप से उनके माल हमारे लिए हलाल हैं और अगर वह मोमिनीन हैं फिर तो हमारा उनकी तरफ तलवार उठाना भी हराम हैl

मैंने कहा अगर मैं तुम्हें अल्लाह की मोहकम किताब से आयतें और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत से हदीसें पढ़ कर (दलील के तौर पर) तुम्हें सुनाऊं तो क्या तुम रुजूअ कर लोगे? कहने लगे जी हैं हम जरुर कर लेंगेl मैंने कहा रही तुम्हारी बात कि हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने अल्लाह के दीन के मामले में मर्दों को हाकिम बनाया है, तो अल्लाह पाक का फरमान है:

“ऐ ईमान वालों (वहशी) शिकार को कत्ल मत करो जब कि तुम एहराम की हालत में हो और जो व्यक्ति तुम में से उसको जान बुझ कर कत्ल करेगा तो उस पर फिदिया वाजिब हैl जिसका फैसला तुममें से दो भरोसेमंद आदमी कर देंl” (मायदा)

और शौहर और उसकी बीवी के बारे में अल्लाह पाक का इरशाद है:

अगर तुम्हें मियाँ बीवी के बीच आपस की अन बन का डर हो तो एक मुंसफ मर्द वालों में से और एक औरत के घर वालों में से नियुक्त कर लो”l (निसा:३५)

फिर इब्ने अब्बास अजीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया मैं तुम्हें अल्लाह की कसम दे कर पूछता हूँ कि क्या मर्दों के खून व जान की सुरक्षा और उनके आपसी मामलों की सुधार के लिए मर्दों को हकम व मुंसफ बनाना अधिक बेहतर है या एक शिकार किये हुए खरगोश जिसकी कीमत चौथाई दिरहम है के बारे में मर्दों को हकम बनाना अधिक उचित है? कहने लगे जि हाँ मर्दों की जान की हिफाज़त और उनके आपसी मामलों की सुधार के लिए मर्दों को हकम बनाना अधिक उचित हैl फरमाया क्या मैं इस एतेराज़ के जवाब के जिम्मेदारी से बरी हो गया हूँ? कहने लगे जि हाँl

फरमाया रही तुम्हारी यह बात कि वह किताल तो करते हैं मगर विरोधियों की औरतों और बच्चों को कैद नहीं करते और ना ही उनके माल गनीमत के माल के तौर पर इस्तेमाल करते हैंl तो मुझे बताओ क्या तुम लोग अपनी मां को कैद करो गे? और फिर तुम उस से ऐसे संबंध को हलाल समझोगे जिनको तुम लोग दोसरी औरतों से हलाल समझते हो? अगर तुम्हारा यह दावा है कि वह (अर्थात हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा जो जंग में अमीर मुआविया रज़ीअल्लाहु अन्हु के साथ हैं) तुम्हारी मां नहीं हैं तो बेशक तुमने कुफ्र का इर्तेकाब कर लिया चूँकि अल्लाह पाक का इरशाद है: “नबी अलैहिस्सलाम मोमिनों पर खुद उनसे भी अधिक हक़ रखने वाले हैं और नबी की बीवियां मोमिनों की माँएं हैंl (अहज़ाब:६)

पास तुम लोग दो प्रकार की गुमराहियों में मंडला रहे हो (आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा को कैद करना रवा समझो तो कुफ्र और अगर उन्हें अंबी की बीवी ना जानो तो कुफ्र) पास इनमें से जिसको चाहो तरजीह दोl इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया क्या मैं इस एतेराज़ से बरी हो कर सहीह सालिम निकल गया? कहने लगे जि हाँl

फरमाया रही तुम्हारी यह बात कि हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने अपने नाम से अमीरुल मोमिनीन का लकब मिटाया है, सो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सुलह हुदैबिया के मौके पर कुरैश को सलीह की शर्तें तय करने और लिखने की दावत दीl रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया लिखो यह वह मुआविया है जिसे मोहम्मद रसूलुल्लाह ने तय किया हैl कुरैश कहने लगे अगर हम आपको रसूलुल्लाह मानते तो हम आपका रास्ता कभी ना रोकते और ना ही आप के साथ किताल करतेl लेकिन केवल मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह लिखो! (अर्थात समझौते के शुरू में जो नाम के साथ रसूलुल्लाह का शब्द बढाया है उसे काट दो)l इसलिए नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: बखुदा! मैं अल्लाह का रसूल हूँ चाहे तुम मुझे झुठलाते ही क्यूँ ना होl ऐ अली! लिखो: मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह (विवरण के लिए देखें: सुनन अबी दाउद: २७६५, अल मुअजमुल कबीर लिल तबरानी: ३४१/१०, व नस्बुल रायः: १३०/३,, मजमउल ज़वाइद: २४०/६, व कंज़ुल आमाल:३०१५३)

पास रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु से बदरजहा अफज़ल हैं (अर्थात नबी ने अपने नाम से रसूलुल्लाह का शब्द मिटा दिया वहाँ हज़रत अली ने अपने नाम से अमीरुल मोमिनीन का लकब मिटा दिया तो कौन सा कुफ्र हो गया)l इब्ने अब्बास ने फरमाया: क्या मैं इस एतेराज़ से भी बरी हो गया? कहने लगे जी हाँl

इस तरह ख्वारिज में से लगभग बीस हज़ार लोगों ने रुजूअ कर लिया और लगभग चार हज़ार अपने हाल पर बदस्तूर कायम रहे बाद में उन्हें कत्ल कर दिया गयाl (किताब: हुलियतुल औलिया, लेखक: इमाम हाफ़िज़ अबू नईम अहमद बिन अब्दुल्लाह अल सफहानी रहमतुल्लाह अलैह)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास के ख्वारिज के साथ मुनाज़रे पर गौर करने की जरूरत है, जिसमें हमें कुछ बिन्दुओं पर हिदायत मिलती हैं: (१) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु खुद ख्वारिज के पास जा कर उनकी इस्लाह करने में कामयाब हो गए (२) आपने मुनाज़रे के शुरू में अपने मनहज की खूबी और उनके मनहज का नुक्स स्पष्ट कर दिया कि मेरे पास तो रसूलुल्लाह के सहाबा की मुख्तलिफ जामातें हैं लेकिन उनके साथ ऐसी कोई जमात नहीं क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सोहबत याफ्ता ही दीन को बेहतर समझ सकते हैं (३) सबसे पहले मुनाज़रे के बीच उनके सभी एतेराजों व सवालों को गौर से सूना फिर उनके जवाब दिए (४) ख्वारिज के यहाँ भी पहला मसला हाकिमियत का था और आज भी शिद्दत पसंद जमातों का सबसे महत्वपूर्ण मसला यही है (५) ख्वारिज जिस तरह की दलीलों से मान सकते थे उन्हीं को उनके सामने पेश किया ऐसा नहीं था कि उन्होंने ख्वारिज को हार देने के लिए कोई नया मनहज या हदीस के इनकार का सहारा लियाl

आज भी आवश्यकता इस बात की है कि सभी शिद्दत पसंद संगठनों की इस्लाह के लिए इल्म वाले आगे आएं और अवाम को और अधिक शिद्दत पसंदी का शिकार होने से बचाएं और तौफीक अल्लाह पाक की तरफ से ही हैl

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/kaniz-fatma,-new-age-islam/how-to-resolve-the-issue-of-khawarij-and-extremism?--خوارج-اور-شدت-پسندی-کا-علاج-کیسے-ممکن-؟/d/118266

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/kaniz-fatma,-new-age-islam/how-to-resolve-the-issue-of-khawarij-and-extremism?--ख्वारिज-और-चरमपंथ-का-इलाज-कैसे-संभव?/d/118295

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