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Hindi Section ( 28 Jan 2018, NewAgeIslam.Com)

Repentance of Sins– the first Station of Islamic Mysticism गुनाहों से तौबा- इस्लामी सूफीवाद का प्रथम स्थान

 

 

 

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

21 अगस्त, 2017

इस्लामी सूफीवाद में तौबा (पश्चाताप) को हक़ के रास्ते पर चलने वालों का सबसे पहला स्तर माना जाता है, जैसे तहारत (पाकी) को उन लोगों का पहला कदम करार दिया गया है जो अल्लाह पाक की इबादत करने का इरादा रखते हैं [i] l इसकी मिसाल भूमि के एक टुकड़े की है जो कि आधार रखने के लिए आवश्यक है; इसलिए कि जिस व्यक्ति के पास भूमि का कोई भाग ना हो वह किसी भी इमारत का आधार नहीं रख सकताl इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने गुनाहों से तौबा नहीं करता और अल्लाह की बख्शिश तलब नहीं करता वह इस्लामी सूफीवाद के मैदान में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकताl [ii]

अल्लाह पाक फरमाता है, “ऐ ईमान वालों! अल्लाह की तरफ ऐसी तौबा करो जो आगे को नसीहत हो जाए” (अनुवाद कन्जुल ईमान 66:8)

मुफ़्ती नईमुद्दीन मुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह इस आयत की तफसीर में लिखते हैं, “खालिस (शुद्ध) तौबा वह है जिसके प्रभाव से मानव सभी बुरे कामों के करना छोड़ दे और नेक काम का आदी बन जाएl यह याद रखना चाहिए कि वास्तविक अर्थों में तौबा का शाब्दिक अर्थ पिछले गुनाहों पर लज्जित होना और भविष्य में गुनाहों से बचने का एक दृढ़ निश्चय करना हैl तौबा के विभिन्न प्रकार हैं, कुफ्र व इल्हाद से तौबा, अन्याय और आक्रामकता से तौबा, मानवाधिकार के उल्लंघन से तौबा, आदिl “तौबतुन्नसुहा” का मतलब यह है कि तौबा करने के बाद इंसान किसी भी गुनाह का इर्तेकाब ना करे, जिस प्रकार दूध थन से बाहर निकल जाने के बाद कभी फिर से उसमें दाखिल नहीं होताl [iii]

प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, “जो अपने गुनाहों से तौबा करता है तो उसे गुनाह हानि नहीं पहुंचाएगाl फिर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नें कुरआन करीम की यह आयत (2:222) तिलावत कीl “बेशक अल्लाह पसंद करता है अधिक तौबा करने वालों को और पसंद रखता है सुथरों को (अनुवाद: कंज़ुल ईमान) [v] l

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “अल्लाह की कसम अल्लाह अपने बन्दे की तौबा से इससे कहीं अधिक खुश होता है जितना हम उस समय खुश हों जब आब व गयाह सहरा में हमारा खोया हुआ ऊंट मिल जाएl” [vi]

शैख़ अबुल हसन शाजली की अरबी किताब “المفاخر العلیہ فی المآثر الشاذلیہ” से निम्नलिखित अनुवाद में गुनाहों से तौबा करने और इससे मगफिरत तलब करने (इस्तगफार) की वजाहत होती हैl

“तौबा की दो किस्में हैंl पहली किस्म यह है कि इंसान अल्लाह से डरे और हमेशा इस बात को दिमाग में रखे कि खुदा उसे सज़ा देने की पुरी कुदरत रखता हैl दूसरी किस्म यह है कि इंसान को अल्लाह से डरना चाहिए क्योंकि वह उसके बिलकुल करीब हैl लुगत (शब्दकोष) में ‘तौबा’ का अर्थ गुनाहों से बाज़ आना दो प्रकार का है; सबसे पहला प्रकार आम लोगों का गुनाहों से बाज़ आना और दुसरा प्रकार खास लोगों (सुफिया और नेक बन्दों) का गुनाहों से बाज़ आना हैl

आम लोगों की तौबा की भी तीन किस्में हैंl सबसे पहली किस्म कुफ्र से बाज़ आने और ईमान और इस्लाम कुबूल कर लेने के बाद काफिरों की तौबा, इसलिए कि अपनी शाने बंदगी के साथ अपने नफ्स को पहचानना और खुदा की ज़ात को उसकी सभी सिफात (रुबुबियत) के साथ स्वीकार करना एक बन्दे के ऊपर लाजिम और ज़रुरी हैl जो वयक्ति अल्लाह पाक के एक बन्दे की हैसियत से अपने फ़र्ज़ से लापरवाही बरतता है, दुनिया का कारोबार उसे आखिरत के बारे में फ़िक्रमंद होने से महरूम कर देता हैl ऐसा व्यक्ति शैतान का साथी बन जाता हैl

दूसरी किस्म ‘तौबा’ गुनाहगार [फासेकीन] की है जो बड़े गुनाहों का इर्तेकाब करते हैं या कोइ जुर्म अंजाम देते हैंl इस प्रकार की तौबा के लिए 6 शर्त हैं: प्रथम, पिछले गुनाहों पर शर्मिंदगी महसूस करना और यह इंसान को भविष्य में ऊँचा स्थान प्राप्त करने की तरगीब देता है; द्वितीय, हाल में गुनाहों को तर्क करने और दोबारा उन गुनाहों के इर्तेकाब ना करने का दृढ़ संकल्प करना; तीसरे, उन साज़ व सामान को उनहें वापस कर देना जिन से उसने तौबा करने से पहले लिया थाl चौथे, अपनी उन जिम्मेदरियों को पूरा करना जो उसने तर्क कर दिया हैl पांचवें, अपने ह्रदय और अंतरात्मा को इबादत में इस प्रकार मशगुल करना जिस तरह वह तौबा से पहले गुनाहों में डूबा हुआ था, रात के आखरी पहर में अल्लाह के हुजुर गिरया वज़ारी करना ताकि वह पिछले गुनाहों को माफ़ कर देl

तीसरी किस्म की ‘तौबा’ आम मुसलमानों की तौबा हैl यह उन मामूली गुनाहों से ‘तौबा’ है जो इंसान गलती, गफलत या जेहालत की बुनियाद पर अंजाम देता हैl अल्लाह पाक फरमाता है, “वह तौबा जिसका कुबूल करना अल्लाह ने अपने फज़ल से लाज़िम कर लिया है वह उनहीं की है जो नादानी से बुराई कर बैठें फिर थोड़ी देर में तौबा कर लें ऐसे लोगों पर अल्लाह अपनी रहमत से रुजुअ करता है, और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला हैl “(अनुवाद: कंज़ुल ईमान 4:17)l और यह मुकाम आम मुसलमानों और ख़ास तौर पर उन गुनाहगार मुसलमानों के लिए है जो ‘आलमे अर्वाह’ में तीसरे कतार में थे (जब अल्लाह ने ज़मीन और आसमान को बनाने से पहले सभी रूहों को पैदा किया थाl

दूसरी किस्म की ‘तौबा’ विशेष लोगों (सुफिया और उरफा ) की तौबा हैl इसकी भी दो किस्में हैं: पहला, खास लोग (आम सुफिया और उरफा) की तौबा दुसरे, खासों में ख़ास की तौबाl पहली किस्म की तौबा अल्लाह से खुद को उन ख्यालात और खतरों से सुरक्षित रखने के लिए क्षमता तलब करना है जो उनहें दुनयावी मामलों में पेश आते हैंl यह अल्लाह के आम वलियों और खास मुसलमानों का मकाम है जो ‘आलमे अर्वाह’ में दूसरी कतार में थेl खासों में ख़ास की तौबा दिल को पुरी तरह से खुदा की याद में मशगुल रख कर और दुनिया के सभी मामलों से बरतरफ हो जाना हैl यह अल्लाह के उन ख़ास वलियों का मुकाम है जो ‘आलमे अर्वाह’ में सबसे पहली कतार में थे और पैगम्बर अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी एक हदीस में इस मुकाम का उल्लेख किया है: “बेशक जब मैं अपने क़ल्ब पर हल्का सा भी हिजाब महसूस करता हूँ तो मैं अल्लाह की बारगाह में सत्तर बार ‘इस्तिग्फार’ करता हूँ, “(सहीह मुस्लिम, मिश्कात बाबुल इस्तिग्फार, नंबर २३२४ l (VII)

हज़रत ज़ुन्नुन मिसरी कहते हैं, “तौबा की दो किस्में हैं; पहला, रुजूअ की तौबा [तौबतुल अनाबत] दुसरे शर्म व निदामत की तौबा [तौबतुल इस्तिहया] l पहले यह कि तौबा अल्लाह के अज़ाब के खौफ से हैl जबकि दुसरे यह कि तौबा अल्लाह की रहमत व मेहरबानी पर शर्म व हया से हैl जबकि शर्मिंदगी वाली तौबा का मोहरिक हुस्ने इलाही का मुशाहेदा हैl जो लोग शर्मिंदगी महसूस करते हैं वह मखमूर हैं और जो लोग खौफ महसूस करते हैं संजीदा मिजाज़ हैंl [viii]

प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, “एहसासे नदामत तौबा का अमल है” l यह कौल तीन ऐसी चीजों पर आधारित है जिनका संबंध तौबा के साथ है, अर्थात (1) नाफ़रमानी पर एहसासे नदामत का इज़हार, (2) गुनाह को तुरंत तर्क करना, और (3) दुबारह गुनाह ना करने का पुख्ता इरादा करनाl [ix]

तौबा के तीन मुकामात हैं 1) अज़ाबे इलाही के खौफ से तौबा करना, 2) अनाबत, इनआमे इलाही की ख्वाहिश से तौबा करना 3) ओबा, अह्कामाते इलाहिया की पासदारी के लिए तौबाl तौबा आम मोमिनों का मुकाम है और इसका मतलब बड़े बड़े [कबीरा] गुनाहों पर एहसासे नदामत का इज़हार करना हैl अल्लाह पाक फरमाता है, “ऐ ईमान वालों! अल्लाह की तरफ ऐसी तौबा करो जो आगे को नसीहत हो जाए” (अनुवाद: कन्जुल ईमान 66:8) और अनाबत, अल्लाह के ख़ास बन्दों अर्थात औलिया और मुकर्रबीन का मुकाम है, जैसा कि अल्लाह का फरमान है: “और पास लाइ जाएगी जन्नत परहेज़गारों के कि उनसे दूर ना होगी, यह है वह जिसका तुम वादा दिए जाते हो हर रुजूअ लाने वाले निगाहदाश्त वाले के लिए, जो रहमान से बिना देखे डरता है और रुजूअ करता हुआ दिल लाया” (50:31-33)l खौफ और एहतेराम पर आधारित खौफ “खाशीयत” कहा जाता है और उसे हासिल करना अल्लाह पाक का बड़ा फज़ल हैl खौफ पैदा करने के किसी भी ज़रिये के बिना केवल अंबिया अलैहिमुस्सलाम की आवाज़ पर अल्लाह पाक से खौफl इस आयत में अरबी शब्द “क़ल्बे मुनीब” का ज़िक्र है जिस से मुराद ऐसा नदामत भरा दिल है जो “मुसीबत और आज़माइश के दौर में मुकम्मल तौर पर साबिर और खुशहाली के दौर में मुकम्मल तौर पर शाकिर हो, हमेशा हर हाल में अल्लाह की इबादत करता होl बड़े सुफिया और उरफा यह कहते हैं कि एक साबिर व शाकिर दिल अल्लाह पाक की अजीम नेअमत है जो केवल खुशकिस्मत लोगों को ही हासिल होती हैl [X] अव्वाब नबियों और रसूलों का मुकाम हैl अल्लाह पाक फरमाता है, “और हमने दाउद को सुलेमान अता फरमाया, क्या अच्छा बंदा बेशक वह बहुत रुजुअ लेन वाला” (38:30)l

तौबा अजीम गुनाहों से इताअत की तरफ रुजूअ करना हैl अनाबत मामूली गुनाहों से मुहब्बत की तरफ लौटना हैl औबा -  अपने नफ्स से अल्लाह की तरफ वापस लौटना हैl [Xi]

जब कोई व्यक्ति अपने बुरे और नापसंदीदा कामों पर गौर करता है तो वह उनसे निजात तलब करता है और अल्लाह उसके लिए तौबा को आसान बना देता है और उसे दुबारा दिल के इतमीनान की ख़ुशी मिलती हैl सालेहीन व सुफिया और उरफा की राय के अनुसार, जिस व्यक्ति ने एक गुनाह से तौबा किया और दुसरे गुनाहों का इर्तेकाब जारी रखे वह इसके बावजूद एक गुनाह से तौबा पर इनामे इलाही हासिल कर सकता हैl और यह भी हो सकता है कि वह इस इनाम की बरकत से गुनाहों से भी बच जाए गाl [xii]

संक्षिप्त यह है कि तौबा अल्लाह पाक के करीब आने और उसकी मुहब्बत हासिल करने का माद्ध्यम हैl यह परिवर्तन ज़िन्दगी का एक अमल और पाकीजगी की असल हालत पर वापस आने का एक तरीका हैl तौबा अल्लाह को राजी करने का जरिया है, हमारे दिल को पाक करती है और हमें मुश्किलात और आजमाइशों से दूर रखती हैl अल्लाह नें हमें कुरआन करीम में तौबा के बारे में बार बार याद दिलाया हैl जैसे कि अल्लाह पाक फरमाता है, “क्यों नहीं रुजूअ करते अल्लाह की तरफ और उससे बख्शिश मांगते, और अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान हैl” (5:74)l “बेशक वही है बहुत तौबा कुबूल करने वाला मेहरबानl “(2:37)l मगर वह जो तौबा करें और संवारें और ज़ाहिर करें तो मैं उनकी तौबा कुबूल फरमाऊंगा और मैं ही हूँ बड़ा तौबा कुबूल फरमाने वाला मेहरबानl (2:160)l

अल्लाह पाक हमारी तौबा और बख्शिश कुबूल फरमाएl

(अंग्रेजी से अनुवाद)

[I] हज़रत अली बिन उस्मान अल हुजवेरी दाता गंज बख्श, कश्फुल महजूब (उर्दू एडीशन), जियाउल हक़ पब्लिकेशन्स पृष्ठ-484,

[II] शैख़ अबुल हसन शाजली: अल मफाखिरूल उलिया फील मआसिर अल शाज्लिया (अरबी एडीशन), मकतबा अजहरिया मिस्र, पृष्ठ 152

[iii] सय्यद नईमुद्दीन मुरादाबादी, खज़ाइनुल इरफ़ान और कंज़ुल ईमान, जियाउल हक़ पब्लिकेशंज़, पृष्ठ-841

[IV] इब्ने असाकिर अल दमिश्की अल शाफई अल अशअरी, किताबुतौबा, (अरबी)

[V] इमाम अब्द करीम कुशैरी, रिसाला कुशैरिया, चेप्टर तौबा (अरबी/ अल कयानी उसूल अल काफी, हदीस 10/ हज़रत अली बिन उस्मान अल हजवेरी अल उरुफ़ दाता गंज बख्श, कश्फुल महजूब (उर्दू एडीशन), जियाउल हक़ पब्लिकेशंज़ पृष्ठ 484

[VI] सहीह मुस्लिम, किताबुत्तौबा

[VII] शैख़ अबुल हसन शाजली: अल मुफाखिर अल उलिया फिल मआसिर अल शाज्लिया (अरबी एडीशन), मकतबा अजहरिया मिस्र, पृष्ठ 152 ज़िक्र खैर

[VIII] हज़रत अली बिन उस्मान अल हजवेरी अल उरुफ़ दाता गंज बख्श, कश्फुल महजूब (उर्दू एडीशन), जियाउल हक़ पब्लिकेशंज़ पृष्ठ- 490

[IX] ‘’’’’’’’’’ (485)

[X] मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी: “तफसीर खज़ाइनुल इरफ़ान” सुरह 50:33

[XI] हज़रत अली बिन उस्मान अल हजवेरी अल उरुफ़ दाता गंज बख्श, कश्फुल महजूब (उर्दू एडीशन), जियाउल हक़ पब्लिकेशंज़ पृष्ठ 485l

[xii] ....’’’’’’ पृष्ठ 486

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