डॉक्टर जीशान अहमद मिस्बाही, न्यू एज इस्लाम
उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम
(क़िस्त-1)
17 जनवरी 2023
अल्लामा सर्खसी ने गिना को मासियत (गुनाह) करार दिया है: अल्लामा अलाउद्दीन कासानी ने गिना पर तफ्सीली गुफ्तगू की है और हासिल कलाम में मुतलक गिना को भी मासियत कहा है। फरमाते:
अगर किसी को किसी वलीमे में या किसी भी दावत में बुलाया जाए और वहाँ खेल और गिना हो तो इस सिलिसले में खुलासा बहस यह है कि ऐसी दावत दो हाल से खाली न होगी; या तो मदउ इन उमूर से वाकिफ होगा या वाकिफ नहीं होगा।
अगर मदउ (जिनको बुलाया गया है) उमूर से वाकिफ हो और साथ ही इसे ग़ालिब ज़न हो कि वह इस लअब व गिना को रोक सकता है तो वह ऐसी दावत कुबूल करे; क्योंकि दावत कुबूल करना सुन्नत है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जब कोई किसी वलीमे में मदउ किया जाए तो वह इस में शरीक हो। और मुनकर को दूर करना फर्ज़ है। और इस सूरत में दावत कुबूल करने में फर्ज़ की अदायगी और सुन्नत की रिआयत दोनों बातें हासिल होंगी।
और अगर इसे जने ग़ालिब हो कि वह मुनकर को रोक नहीं पाएगा ऐसी सूरत में भी दावत कुबूल करने में कोई हर्ज नहीं, जैसा कि हमने ज़िक्र किया कि दावत कुबूल करना मस्नून है और कायदा यह है कि अगर मासियत का वजूद किसी अमरे खारिज के सबब हो तो इसकी वजह से सुन्नत तर्क न की जाएगी। क्या तुम देखते कि अगर जनाज़े के साथ नौहा और चाक गिरेबानी जैसी मासियत हो रही हो, फिर भी जनाज़े के साथ चलना तर्क नहीं किया जाएगा। यही हुक्म यहाँ भी होगा।
एक कौल यह है कि यह हुक्म इमाम मुक्तदी के लिए है, जिसका एहतेराम व एहतेशाम किया जाता हो। अगर वह मुक्तदी न हो तो ऐसी दावत रद्द कर देना और ऐसी मजलिस से उठ जाना अधिक बेहतर है।
और अगर वह पहले से इन उमूर से वाकिफ नहीं था और वह दावत में पहुँच गया। फिर वहाँ देखा कि खेल या गिना हो रहा है तो अगर वह रोक सकता हो तो इसे रोक दे और अगर अगर इस पर कादरिया न हो तो किताब (कुदूरी) में यह है कि ऐसी सूरत में इस मजलिस में बैठने और खाने में कोई हर्ज नहीं। इमाम अबू हनीफा फरमाते हैं कि मैं भी एक बार इसमें मुब्तिला हुआ था। इसकी वजह यह है जैसा कि हमने उपर ज़िक्र किया कि दावत कुबूल करना एक अम्रे मुस्तहसन है। इसलिए किसी खारजी सबब से पाई जाने वाली मासियत के सबब दावत तर्क नहीं की जाएगी। यह हुक्म उस सूरत में है, जब कि इस मजलिस में दाखिल होने से पहले उसे मालुम नहीं था। लेकिन अगर इसे उस मजलिस में जाने से पहले ही इसका इल्म हो तो वह ऐसी मजलिस से लौट जाए और उसमें दाखिल न हो।
एक कौल यह है कि यह हुक्म गैर मुक्तदी के लिए है। अलबत्ता अगर वह शख्स मुक्तदी हो तो वह ऐसी मजलिस में न रुके बल्कि इससे निकल आए; क्योंकि ऐसी मजलिस में ठहरना इल्म व दीन की तौहीन है और फिस्क को जरी बनाना है और यह जायज़ नहीं। और इमाम हनीफा जो ऐसी मजलिस में रुके रहे थे, उनके इस वाकए को इस बात पर महमूल किया जाएगा कि यह उस वक्त का वाकेआ होगा जब अलल इतलाक मुक्तदा न बने होंगे, अगर वह मुक्तदा होते तो हरगिज़ नहीं ठहरते।
यह मसला बताता है कि महज़ गिना भी मासियत (गुनाह) है। इसी तरह इसका सुनना भी मासियत है। (اِنَّ مُجَرَّدَ الغِنَاءِ وَالاستِمَاعَ اِلیہِ مَعصِیَۃٌ) ऐसे ही ढोल पीटना और उसका सुनना भी मासियत है। क्या तुम नहीं देखते कि इमाम अबू हनीफा ने इसे इब्तिला से ताबीर किया है? बिदाए अल सनाए, किताबुल इस्तेहसान, 5/128)
लगभग यह हुक्म साहबे हिदाया ने भी लिखा है। एक दुसरे मुकाम पर लिखते हैं कि नगमा, नौहा और इसी तरह दुसरे उमूर लहू का इजारा जायज़ नहीं; क्यों कि यह मासियत का इजारा है और मासियत, अकीदे से साबित नहीं होती। अलमुहीत अल बुरहानी में है:
अगर लअब और गिना दस्तर ख्वान पर हो तो ऐसी सूरत में वहाँ बैठना जायज़ नहीं: क्योंकि अल्लाह पाक का इरशाद है: فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرَى مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ(الانعام: ۶۸) और अगर लअब व गिना घर में हो रहा हो तो ऐसी सूरत में दस्तरख्वान पर बैठने और खाने में कोई हर्ज नहीं। कुदूरी में जो मसला है, इसका मुहमल यही है। और एक कौल यह है कि यह हुक्म साहबे हशमत व तमकनत के लिए है: क्यों कि लोग इसके वकार व तमकनत के सबब गिना से बाज़ आ जाएंगे। (अल मुहीत अल बुरहानी, फसल 18)
अल्लामा कासानी एक जगह और लिखते हैं कि नगमा और नौहा ममनूअ है और नगमा और नौहा की किताबत ममनूअ नहीं है।
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Urdu Article: Listening to Songs in the Light of the Hanafi School
of Jurisprudence – Part 1 سماع نغمہ-مذہب حنفی کی روشنی میں
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