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But If The Faith Of Abraham Is Born Once Again आज भी हो जो इब्राहीम सा इमान पैदा

मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

27 नवंबर 2009

अल्लाह पाक ने इस कायनात की फितरत कुछ इस तरह रखी है कि यहाँ अक्सर चीजें फना के रास्ते से गुजर कर बका व दवाम की मंजिल तक पहुँचती हैं, और अपने आप को मिटा कर ज़िन्दगी के एक नए पैकर से सरफराज होती हैं, सूरज डूबता है लेकिन इस डूबने में नई सुबह की आमद छिपी रहती है, चाँद अपना मुंह छिपाता है, लेकिन इसलिए कि कुछ घंटों के वक्फे के बाद नई आब व ताब के साथ उफक पर तुलुअ हुआ और फिर बदरे कामिल बन कर लोगों से खराजे तहसीन वसूल करे, किसान जिस बीज को जमीन में डालता है, वह यह ज़ाहिर अपने वजूद को खो देती है, लेकिन इसी से लहलहाते हुए पौदे वजूद में आते हैं, बागबान देखने में तो गुठलियों को ज़मीन की अथाह तारीकियों में दफन करता है, लेकिन यही अमल आसमान को छुते हुए दरख्तों के लिए बुनियाद बनते हैं, जिनके स्वादिष्ट फलों और सुंदर फूलों से इंसान अपने काम व ज़ेहन और निगाहे शौक की तस्कीन करता है। यही निज़ाम अल्लाह पाक ने आलमे इंसानियत का भी रखा है, जो शख्स अपने आप को जितना मिटाता है वह उतना ही सरबुलंदी से नवाज़ा जाता है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: ‘‘من تواضح اللہ رفعہ اللہ فہر فی نفسہ صغیر وفی اعین الناس عظیم....’’(شعب الایمان للبہقی ،فصل فی التواضع وترک الزہو والصلف والخلیلا والقخر والمدح ،حدیث نمبر :8140)‘ जो शख्स अल्लाह के लिए झुकता है और पस्ती को कुबूल करता है, अल्लाह पाक उसको सरबुलंद फरमाता है, वह खुद अपनी नजर में हकीर होता है और लोगों की नजर में अज़ीम। इंसानियत में सबसे बढ़ कर खुदा तर्शी और खुदा की खुशनूदी के लिए अपने आपको कुर्बान कर देने वाला गिरोह अंबिया अलैहिमुस्सलाम का है, अल्लाह के पैगम्बर इल्म, जहानत, शख्सी वजाहत, जिस्मानी हुस्न व जमाल, अख्लाकी कमालात, खानदानी इज्जत व शरफ हर जेहत से सबसे ज़्यादा मुकम्मल हुआ करते थे, लेकिन अल्लाह के रास्ते में हर तरह की आज़माइश और मुसीबत से भी उन्हीं को गुजरना पड़ता था, वह न केवल लोगों के अपमान का जख्म सहते थे, बल्कि उनकी जुबान दराजी और सब व शितम को भी बर्दाश्त करते थे, यहाँ तक कि जिस्मानी तकलीफ पहुंचने से भी दोचार होते थे, लेकिन यह सारी चीजें मिल कर भी उनके जमे रहने में कोई तज़ल्जुल पैदा नहीं करती थी, विरोध और अत्याचार के इस तूफ़ान में उन्हें अल्लाह पाक मीनार का मिनारा बना देता था और ऐसी सरबुलंदी से नवाजता था कि न केवल उस जमाने के लोग उनके सामने सर झुका देते थे बल्कि रहती दुनिया तक के लिए उनका नाम नक़्शे जावदाँ हो जाता था।

जिन पैगंबरों को बड़ी आजमाइशों से गुजरना पड़ा और कुरआन ने उनकी दास्ताने हयात को कयामत तक आने वाली इंसानियत के लिए मशअले राह बता कर महफूज़ कर दिया, उनमें हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़ाते वाला सिफात है, वह ईराक के एक सम्मानित कबीले के लड़के थे, जो अपनी जाति सलाहियत के एतिबार से भी नुमाया हैसियत के हामिल थे, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम से तौहीद और शिर्क पर जो बहस किये उससे उनकी जकावत, इस्तदलाली कुवत, फहम रिसा, और कुव्वते तफहीम ज़ाहिर होती है, फिर उनकी बातचीत में जो नरमी, मुलाइमत, नासेहाना उस्लूब, और दाइयाना तड़प पाई जाती है, उससे उनके बुलंद अख्लाकी और नर्म खुई, और इंसानी हमदर्दी का बे पनाह जज़्बा ज़ाहिर होता है, इन तमाम खूबियों के बावजूद जब वह हक़ की दावत ले कर उठे तो ऐसा नहीं हुआ कि उनका इस्तिक्बाल किया गया हो, उनके लिए फूलों की सेज बिछाई गई हो और कौम ने उनका शुक्रिया अदा किया हो कि वह उन्हें गुमराही की घटा टोप अंधेरों से हिदायत की रौशनी की तरफ ले जा रहे हैं, बल्कि उन्हें ऐसी आजमाइशों से गुज़रना पड़ा कि इंसानी इतिहास में कम इसकी मिसाल मिलेगी, और उन्होंने इतनी कुर्बानियां पेश कीं कि उससे बढ़ कर खुदा की राह में जां निसारी और फ़िदाकारी की कल्पना नहीं की जा सकती, उन्हें आग में डाला गया, यह ऐसी आग थी जो पत्थर को भी ख़ाक बनाने के लिए काफी थी, मगर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का अल्लाह की मर्ज़ी के सामने तस्लीमे रजा का हाल यह था कि उन्होंने उफ़ भी नहीं किया और खुदा से भी इस आज़माइश से निजात के लिए फरियाद नहीं की, यहाँ तक कि खुदा को खुद अपने इस बंदे पर रहम आया और आग उनके लिए फूल बन गई, फिर उन्हें अपने दीन और ईमान को बचाने और उसे फैलाने के लिए वतन की मानूस व महबूब सरजमीं को दागे फ़िराक देना और एक अनजान मंजिल फिलिस्तीन की तरफ रवाना हो जाना पड़ा, यह केवल उन फ़ज़ाओं की कुर्बानी नहीं थी, जिनमें उन्होंने बचपन से जवानी तक पुरी जिंदगी गुजारी थी। बल्कि यह सारे रिश्तेदारों और संबंधियों से भी हमेशा के लिए मुंह मोड़ लेने का एलान था।

फिर एक मरहला आया जब खुदा की तरफ से हुक्म हुआ कि इब्राहीम अपनी नई नवेली दुल्हन मिस्र की शहजादी हाजरा को फिलिस्तीन और शाम के सब्ज़ा जार से निकाल कर अपने शीर ख्वार बच्चे के साथ मक्का के रेगिस्तान में छोड़ आएं, नौजवान बीवी और दूध पीते बच्चे को ऐसी जगह छोड़ आना जहां पानी का एक कतरा भी मौजूद नहीं था, और जहां आदम ज़ाद का जीना तो क्या परिंदों का पर मारना भी कठिन था, अपनी जान की कुर्बानी से बढ़ कर था, लेकिन हजरत इब्राहीम ने इसके सामने भी सर झुका दिया, मगर कुर्बानी के मरहले अभी तमाम नहीं हुए और आज़माइश की दुनिया अभी ख़त्म नहीं हुई, बल्कि वह जवान बेटा जो औलाद से ना उम्मीदी के बाद पैदा हुआ, हुक्म हुआ कि उसे खुद अपने हाथों अपने रब की खुशनूदी के लिए जबह कर दो, यह हुक्म ख्वाब के जरिये हुआ था, और ख्वाब में तावील की गुंजाइश होती है, लेकिन कामिल बंदा हीला व हुज्जत पर क्यों कर किनाअत कर सकता था, इसलिए आपने अपने बेटे की कुर्बानी का इरादा कर लिया, और बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिसल्लम भी आखिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के जज़्बे के वारिस थे, उन्हें कैसे उज्र हो सकता था, उन्होंने भी सर झुका दिया और बाप ने अपने जिगर गोशे और नूरे चश्म को अल्लाह की रजा पर भेंट चढ़ा दिया, लेकिन अल्लाह को इंसान की कुर्बानी मतलूब नहीं थी, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की खुद सपुर्दगी का इम्तेहान मकसूद था, इसलिए हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम के बजाए गैब के पर्दे से आने वाले मेंढे की कुर्बानी अमल में आई।

गर्ज़ कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की जिन्दगी का कुरआन की रौशनी में अध्ययन किया जाए तो इसका खुलासा केवल दो बातें होंगी, दावते हक़ और इस राह में कुर्बानी व फ़िदाकारी, हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने रब की रजा और खुशनूदी के लिए अपने आपको मिटाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, अपने आपको मिटाया, अपने संबंधों को मिटाया, बीवी और दूध पीते बेटे की मोहब्बत को मिटाया और जवान बेटे को मिटाया, लेकिन कुर्बानी और अपने आप को मिटाने ने हजरत इब्राहीम अलैहिसल्लाम को जिंदा जावेद बना दिया, कुरआन मजीद ने कई मौकों पर इस हकीकत की तरफ इशारा किया है, इसलिए फरमाया गया कि हमने उसे दुनिया में भी चुना और वह आखिरत में भी सालेहीन में शुमार होंगे: ( اِ لاَّ مَن سَفِہہ نَفْسَہُ ،وَلَقَدِ اُ صْطَفَیْنَٰہُ فیِ اُلدُّ نْیا وَ ا ِ نَّہُ فیِ اُ لْأَ خِرَۃِ لَمِنَ اُلصَّلِحِینَ)(البقرہ :130) यही बात एक दुसरे मौके पर भी फरमाई गई (وَ اتَیْیَنٰہُ فیِ اُ لدُّنَیا حَسَنَۃَ وَانَّہُ فیِ اُ لاَ خِرَۃِ لَمِنَ اُ لصَّلِحِینَ)(النحل :122،نیز دیکھئے العنکبوت :27) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं को बका व दवाम से नवाज़ा गया: (وَ جَعَلَھَا کَلِمَۃَ باَ قِیَۃَ فیِ عَقِبِہِ لَعَلَّھُمََ یَرََ جِعُونَ)(الزخرف:28) उम्मते मोहम्मदिया जो कयामत तक के लिए हिदायत याफ्ता गिरोह है, उनसे कहा गया कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी भी तुम्हारे लिए आइडियल और नमूना है: (قَدََ کَا نَتََ لَکُمََ اُسَوَۃُ حَسَنَۃُُ فیِ اِبَرٰہِیمَ )الممنحنۃ:4) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने दुआ की थी कि बाद में आने वालों में मेरा ज़िक्रे खैर बाकी रहे: (وَ اَجَعَل لّیِ لِسَانَ صِدْ قِِ فیِ اُ لاََ خِرِ ینَ)(الشوری:84) यह दुआ इस शान से कुबूल हुई कि आज दुनिया में तीन बड़े मज़ाहिब: इस्लाम, इसाइयत और यहूदियत के मानने वाले हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तरफ अपनी निस्बत करते हैं और उसी निस्बत को अपने लिए इफ्तेखार का तमगा समझते हैं, यह बुलंदी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को उन बे पनाह कुर्बानियों के जरिये हासिल हुइ, जिनका अभी ज़िक्र किया गया। नबियों के गिरोह में सबसे अधिक आजमाइशों से जो शख्सियत गुजरी, वह पैगम्बरे इस्लाम जनाब मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की है, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो जितना अल्लाह के करीब होता है, वह उतना ही आजमाइशों से गुज़रता है, इसलिए सबसे अधिक आज़माइश अल्लाह के पैगम्बरों पर आती है, और पैगंबरों में सबसे अधिक आज़माइश मुझ पर आई है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पुरी सीरते मुबारका इस पर गवाह है, उस मौके पर आस बिन वाएल ने कहा कि मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तो अब्तर हो गए अब्तरसे मुराद है बे नाम व निशान हो जाने वाला शख्स, अरब ऐसे लोगों को अब्तर कहते थे, जिनकी केवल बेटियाँ हों, क्योंकि उन्हीं पर उनका खानदानी सिलसिला खत्म हो जाता था, यह मक्की ज़िन्दगी की घटना है, कुछ रिवायतों में आया है कि मदनी ज़िन्दगी में जब हज़रत मारिया किब्तिया रज़ीअल्लाहु अन्हा के पेट से पैदा होने वाले आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साहब जादे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की वफात हुई तब अबू जहल ने कहना शुरू किया कि मोहम्मद  सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दीन तो उन्हीं पर खत्म हो जाएगा, उनके बाद उनके दीन को कायम रखने वाला कोई नहीं होगा, इसलिए कि वह तो औलादे नरीना से महरूम हो चुके हैं, (देखिये तफसीरे कुर्तुबी: 20/223، 222) इस मौके से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सुरह कौसर नाजिल हुई। इस सुरह में पहले तो रसूलुल्लाह की दिलदारी की गई कि हम ने आपको हौज़े कौसर से नवाज़ा है, जिससे न केवल आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत को राहत नसीब होगी, बल्कि वह हश्र के मैदान में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इम्तियाज़ होगा, इसलिए आप अपने परवरदिगार के लिए नमाज़ पढ़िये और कुर्बानी कीजिये, और दुश्मनों की बातों से प्रभावित न होइए, अल्लाह उन्हीं को बे नाम व निशान कर देगा, मुफस्सेरीन ने लिखा है कि यहाँ दुश्मन से मुराद ख़ास तौर पर अबू जेहल, आस बिन वायल और उक्बा बिन अबू मुईत आदि हैं, जो दिल दुखाने की यह बात कहने में पेश पेश थे, खुदा की शान देखिये कि उसने दुनिया में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ऐसी सरफराजी और सरबुलंदी अता फरमाई कि रात दिन का कोई लम्हा ऐसा नहीं गुज़रता है कि जब किसी जमीन के खित्ते में हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलात व सलाम की निदा ए जां फिज़ा कानों में रस न घोलती हो, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पाक ज़िन्दगी पर जितना कुछ लिखा गया है, जितना कुछ कहा गया है और जिस कदर शायरों ने अपने तखय्युलात में बुलंद परवाज़ी की है, दुनिया की किसी मज़हबी या गैर मज़हबी शख्सियत पर इसका हज़ारवां हिस्सा भी न कहा गया और न लिखा गया, अपनों के अलावा बेगानों और दोस्तों के अलावा दुश्मनों को भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ात आला सिफात के हुजुर खराजे तहसीन पेश करना पड़ा, यह रफअना लका ज़िकरककी बेहतरीन मिसाल, बल्कि नबूवत मुहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एजाज़ है, इसके विपरीत आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दुश्मों का नाम व निशान इस तरह मिटा कि अगर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हवाले से उनका ज़िक्र न आए तो इतिहास के पन्नों से भी उनके नाम मिट जाएं, आज दुनिया में करोड़ों इंसान हैं जो मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपने नाम का जुज़ बना कर अपने लिए सआदत व बरकत हासिल करते हैं और उनमें ख़ुशी का एहसास होता है, लेकिन कोई शख्स अपना या अपने बच्चों का नाम अबू जेहल, या अबू लहब, या आस और उत्बा रखना नहीं चाहता। कुरआन ने इस सरफरजी व सर बुलंदी और दुश्मनों और बदख्वाहों की नाकामी व ना मुरादी को दो बातों से जोड़ा है: एक खुदा के सामने सर झुकाना, जिसका मिसाली तरीका नमाज़ है दुसरे, खुदा के रास्ते में कुर्बानी जिसका अलामती अमल बकरा ईद और हज की कुर्बानी है, मुसलमानों के लिए उनके नबी मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और अबुल अंबिया हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का उसवा यह है कि वह आजमाइशों और मुसीबतों से घबराएं नहीं, इम्तेहान उनके इस्तकामत वाले पाँव को फिसला न दे, हालात कुछ भी हों अगर उनकी पेशानियाँ खुदा के सामने ख़म रहें और खुदा की खुशनूदी के लिए कुर्बानी व फ़िदा कारी का अथाह जज्बा उसके सीनों में मोजज़न हो, तो फिर सरबुलंदी कामयाबी और सरफराजी आखिरत ही में नहीं, दुनिया में भी उसके कदम चूमेगी:

आज भी हो जो इब्राहीम का इमां पैदा

आग कर सकती है अंदाज़े गुलिस्तां पैदा

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