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Hindi Section ( 17 Jul 2012, NewAgeIslam.Com)

Being A Muslim Today: Who Is The Momin And Who Is The Kafir? आज का मुसलमान: कौन मोमिन और कौन काफ़िर

 

आसिफ मर्चेण्ट, न्यु एज इस्लाम

7 जुलाई, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

ऐसा लगता है जैसे दुनिया भर में सिर्फ मुसलमान ही हर चरण में अपनी धार्मिक पहचान पर जोर देने की कोशिश करते हैं। इस हद तक ​​कि दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। कोई भी मुल्क दारुल हरब (जंग का मस्कन) हो सकता है या दारुल इस्लाम (इस्लाम या अमन का मस्कन) । ये किस तरह मुमकिन है? क्या  पाकिस्तान को इस्लाम या अमन का मस्कन या या दारुल इस्लाम कहा जा सकता है? कौन से मुस्लिम देश दारुल इस्लाम की सूचि में शामिल होने के योग्य हो सकते हैं? क्या ऐसे भी देश हैं जो इस सूची में शामिल होने के पात्र हैं, लेकिन उन्हें इसमें शामिल नहीं कर सकते क्योंकि वो गैर मुस्लिम बहुल देश हैं? हम मुसलमानों को इस पाखण्ड से बचना चाहिए। हमें, इन कोशिशों को हर मामले में सांप्रदायिक रंग देने और मुसलमान बनाम गैर मुस्लिम में बांटने के तौर पर देखना चाहिए। इस तरह के विचारों ने दुनिया भर में शांति के रास्ते में गतिरोध पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और इस तरह उन्हें इस्लाम विरोधी कहा जा सकता है।

जब शाह, ईरान पर राज कर रहे थे, आयतुल्लाह खुमैनी को खुद की हिफाज़त के लिए अपना देश छोड़ना पड़ा। दुनिया में बहुत से मुस्लिम देश हैं, लेकिन फ्रांस- एक दारुल हरब देश, को उन्होंने चुना? ऐसा इसलिए क्योंकि ज़्यादातर पश्चिमी देशों ने तब भी उन्हें शांति और सुरक्षा प्रदान की जब वो इन देशों के साथ मतभेद रखते थे? सितंबर 2001 की घटनाओं तक, पश्चिमी देश सभी मुसलमानों के लिए शांति की एक पनाहगाह थे। दारुल इस्लाम? एक ऐसा क्षेत्र जहां किसी की रचनात्मक क्षमताओं को पूरी तरह खोज की जा सकता है और उसका विकास कराया जा सकता है।

 इसके बाद जब बहुत से मुसलमान इस्लाम की महिमा के सबूत के तौर पर 9/11 की घटनाओं के लिए क्रेडिट का दावा करने लगे, तो  ये सहज था  कि पूरी दुनिया में निर्दोष मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाने लगा। इस्लाम के नाम पर सभी प्रकार की हिंसा की जा रही है। कई सालों तक मुस्लिम समालोचकों की तरफ से इसकी बहुत कम निंदा की गई। अंत में एक फतवा 'आया कि आतंकवाद गैर इस्लामी है। ये कितना शर्मनाक है कि जो स्पष्ट है उसे बताने के लिए एक फतवा की जरूरत पड़ी। इससे भी ज़्यादा शर्मनाक समर्थन का वो तरीका है जिसके साथ गैर मुसलमानों ने इसकी सराहना की थी। हम किस हद तक नीचे गिर गए हैं?

 मुसलमानों के मन में ये बात डाली गयी है कि इस्लाम लोकतंत्र के अनुकूल नहीं है। इसके लिए जो दलील दी जाती है वो ये कि लोकतंत्र में प्रभुसत्ता जनता के हाथों में होती है जबकि इस्लाम सिर्फ खुदा की प्रभुसत्ता को तस्लीम करता है। इसलिए लोकतंत्र के लिए इस्लाम में कोई जगह नहीं है। सवाल उठता है कि "खुदा की प्रभुसत्ता पर कैसे अमल होता है"? जाहिर है कुछ इंसानों के ज़रिए, लेकिन कैसे इंसानों के ज़रिए? क्या ये उल्मा का शासन स्थापित करने की कोशिश है? कौन सा देश है जहां तथाकथित 'खुदा की प्रभुसत्ता का शासन है और कोई ऐसी मिसाल है जिस पर रश्क किया जा सके?

व्यावहारिक रूप से हर जायज़ मैदान में मुसलमान अन्य सभी लोगों से बहुत पीछे हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने इसे स्पष्ट किया है। तो क्या हमें सरकार की तरफ देखना चाहिए कि वो हमें इस पिछड़ेपन से बाहर निकाले जबकि खुद मुसलमानों के पास बहुत पैसा है। मुसलमानों के पास बहुत पैसा है, लेकिन खिदमते खल्क (सेवा भाव) का जज़्बा गायब है। महाराष्ट्र का कोंकण तट इसका एक उदाहरण है, जहां बहुत से मुसलमान परिवार रहते हैं। व्यवहारिक रूप से प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति खाड़ी देशों में काम करता है। ये लोग वहां खूब पैसा कमाते हैं और अपने घरों को भेजते हैं। ये कैसे खर्च किया जाता है? ये जन्नत में स्थान खरीदने की कोशिश में खर्च किया जाता है। हर जगह मस्जिद का निर्माण कराया जाता है। इन मस्जिदों में से हर एक, दूसरे से अधिक शानदार हैं। लेकिन इस क्षेत्र में कोई स्कूल नहीं है। बच्चों को पंचगनी के बोर्डिंग स्कूलों में से किसी एक में भेजा जाता है। इस इलाके में कोई अस्पताल नहीं है। बीमारों को महाबलेश्वर की पहाड़ी से नीचे वाई लाना होता है जहां बेहतरीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। वाई में मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है लेकिन इनमें एक भी मुसलमान डॉक्टर नहीं है। पहले की पीढ़ियों से सिर्फ मुस्लिम वकील हैं।

मुसलमानों को निश्चित तौर पर गुमराह किया गया है। बेशक ये वो नहीं है जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कल्पना की थी। अब मुसलमानों के बीच उन विभिन्न रस्मों और रिवाजों पर अमल करने पर ज़ोर दिया जाता है  जो जन्नत में जगह सुनिश्चित कर सकें। ये पूरी तरह स्वकेंद्रित हैं। तथाकथित इस्लाम के स्तम्भ 'मानवता के सांस्कृतिक विकास में किसी भी तरह से कोई सहयोग नहीं कर रहे हैं जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का मिशन था।

इसे हिन्दुओं से तुलना करें, जिन्हें बहुत से मुसलमान तुच्छता की नजर से देखते हैं। कुछ साल पहले मेरी बहन को अस्पताल में भर्ती कराया गया। गणेश महोत्सव के दौरान हर सुबह, डॉक्टर की तरफ से पूजा आयोजित की जाती थी। यह पूजा मानवता के लिए प्रार्थना के साथ समाप्त होती थी। हमारी मिल्कियत एक हिंदू परिवार ने खरीद लिया था। उन्होंने वहां पर 'हवन' आयोजित किया और हमें आमंत्रित किया। मुसलमान आमतौर पर अपने आयोजनों में गैर मुसलमानों को बुलाने से बचते हैं। मैं इसमें शामिल हुआ, और यहाँ तक कि पूजा के दौरान कुछ देर के लिए उनके साथ बैठने के लिए भी आमंत्रित किया गया। यहां प्रत्येक संस्कृत श्लोक के बाद उसका गुजराती में अनुवाद किया जाता था। इसका भी अंत सभी मानवों के लिए प्रार्थना के बाद हुआ।

कौन 'मोमिन' है और कौन 'काफ़िर' है?

आसिफ मर्चेण्ट, पंचगनी (महाराष्ट्र, हिंदुस्तान) के पास रहने वाले स्वतंत्र चिंतक हैं। और न्यु एज इस्लाम के लिए कभी कभी लेख लिखते हैं।

URL for English article:

http://www.newageislam.com/the-war-within-islam/asif-merchant,-new-age-islam/being-a-muslim-today--who-is-the-momin-and-who-is-the-kafir?/d/7855

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/today’s-muslim--who-is-a-momin-and-who-is-a-kafir?--آج-کا-مسلمان--کون-مومن-ہے-اور-کون-کافر-ہے؟/d/7890

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