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Hindi Section ( 15 Jan 2012, NewAgeIslam.Com)

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Muslim Women Between Tradition And Modernity परम्परा और आधुनिकता के बीच मुस्लिम महिलाएं


असगर अली इंजीनियर (अंग्रेज़ी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

हाल ही में सऊदी अरब में टीवी चैनल पर मुशायरा के एक कार्यक्रम में शायरह (कवियित्री) हिसास हलाल ने अपने देश में महिलाओं के प्रति सख्त प्रतिबंधों के खिलाफ अपने गुस्से का इज़हार किया। यह विरोध की आवाज थी और बहुत ही साहसपूर्ण विरोध था और शायद सऊदी अरब के जैसे समाज में कोई इसे सोच भी नहीं सकता है। यह विरोध उनकी कविता में था। नक़ाब में छिपे अपने चेहरे के साथ उन्होंने इस्लामी प्रचारकों के बारे में कहा कि सत्ता में कौन बैठता है, लेकिन लोगों को अपने फतवा से डरा रहे हैं, और जो शांति चाहते हैं उनका लोमड़ी की तरह शिकार कर रहे हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें दर्शकों की जबर्दस्त दाद व तहसीन मिली और वह प्रतियोगिता के फाइनल में जगह बना सकीं। इसके कारण उन्हें मौत की धमकी भी मिली जो कई उग्रवादी वेबसाइटों पर पोस्ट की गई थी। धार्मिक मामलों में सल्फ़ी विद्वानों की मानने वाली सऊदी सरकार इस्लामी परंपरा के नाम पर महिलाओं पर सख्त प्रतिबंध बरकरार रखने पर अड़ी हुई है। महिलाओं को उनके अधिकार और ज़मीर की आवाज़ के अनुसार स्वतंत्र चुनाव करने देने से मना करती है।

ऐसा सभी मुस्लिम देशों में नहीं हो सकता है लेकिन पारंपरिक मुस्लिम समाज कई प्रतिबंध लगाता है और अब भी इनमें किसी तरह की रियायत देने के लिए तैयार नहीं है। जिस तरह का हिजाब कई महिलाएं पहनती हैं जिसमें वह अपने चेहरे को ढंकती हैं और आंखों के लिए बने दो सुराखों से ही दुनिया को देखती हैं। हिजाब मुस्लिम उलेमा, फुकहा (धर्मशास्त्रियों) और आधुनिक बुद्धीजीवियों के बीच विवादास्पद रहा है। सवाल ये है कि क्या किया जाना चाहिए?

कोई भी ग्लोबलाईज़्ड दुनिया में तेज़ परिवर्तन से इनकार नहीं कर सकता है और इससे पारंपरिक समाजो में वर्तमान प्रतिबंधों को बनाए रखना कठिन हो रहा है। यह विवाद तभी से जारी है जब 19वीं सदी में आधुनिकता का दावा किया गया। मुस्लिम देशों में कई सुधार हुए और कुछ हद तक महिलाएं स्वतंत्रता प्राप्त कर सकीं हैं।

लेकिन 20 वीं सदी के अंतिम हिस्से और 21वीं सदी के शुरुआती दौर में पारंपरिक इस्लाम, विशेष रूप से सल्फ़ी इस्लाम को दोबारा उभरते हुए देखा गया। कोई भी समाज केवल विकास ही नहीं करता है बल्कि विकास के लिए किए गए उपाय कई समस्याओं को भी लाते हैं। इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों के अलावा आर्थिक और राजनीतिक दोनों कारण हैं जिन पर यहां चर्चा नहीं की जा रहा है। पारंपरिक और आधुनिकता के बीच जटिल प्रकृति का ये तनाव एक चुनौती और अवसर दोनों है।

इस बहस में जो सबसे महत्वपूर्ण है और जिसे अक्सर अनदेखा भी किया जाता है, वो ये कि हम इस्लाम के नाम पर जिस पर अमल करते हैं वह धर्म या पवित्र किताबों की शिक्षा के अनुसार कम और संस्कृति के नाम पर अधिक करते हैं और इसके अलावा महिलाओं पर लगे प्रतिबंधों का विरोध या रक्षा करते समय भी बहुत सी परंपराओं पर निर्भर करते हैं। इसका एक बेहतरीन उदाहरण पाकिस्तान से हाल ही में प्रकाशित हुई प्रोफेसर खुर्शीद आलम की किताब 'चेहरे का पर्दा वाजिब है या गैर-वाजिब' है। यह दो काबिल आलिमों के बीच आलिमाना बहस है जिसमें एक आलिम चेहरे के पर्दे का बचाव कर रहे हैं और दूसरे विद्वान इसका विरोध कर रहे हैं।

लेकिन किताब पूरी तरह मध्यकाल के कई उलमा द्वारा पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) और उनके सहाबा के परस्पर विरोधी परंपराओं के हवाले पर निर्भर करती है। आपको दोनों तरह की कई हदीसों मिलेंगी जो चेहरे के पर्दे पर जोर देती हैं या अनावश्यक मानती हैं और दोनों उलमा अपनी बात को साबित करने के लिए इन्हीं हदीसों को हवाले के तौर पर पेश करते हैं। ये विचारधारा सिर्फ पारंपरिक संस्कृति वाले इस्लाम को मजबूत करती है।

में इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि ज़्यादातर हदीस (सिवाय चरित्र, नैतिकता और इबादत के बारे में) एक तरफ अरब संस्कृति को प्रदर्शित करती हैं और दूसरी ओर मध्यकालीन दौर के पश्चिमी एशियाई या मध्य एशियाई संस्कृति को प्रदर्शित करती हैं। धार्मिक कानूनों के विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अरब समाज की आदतें शरई कानून का हिस्सा बन सकती हैं और कई धार्मिक क़ानून में अरब की आदतें शामिल हैं।

जिस किताब का मैं हवाला दे रहा हूँ इसमें कुरान का बहुत कम रास्त नुक्तए नज़र (प्रत्यक्ष दृष्टिकोण) है या संबंधित कुरानी आयात पर नई व्याख्या नहीं है। मुसलमान फुकहा (धर्मशास्त्री) और उलमा को यह समझना होगा कि अरब समाज की आदतें खुदादाद नहीं हैं और इसलिए ये धार्मिक कानून के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा नहीं बन सकती हैं। महिलाओं से सम्बंधित कुरान की आयतों पर सीधे तौर पर विचार कर और नई तफहीम (व्याख्या) द्वारा इस सांस्कृतिक आधार को बदल सकते हैं। यह कोशिश व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और महिलाओं के चयन की स्वतंत्रता को कायम करेगा। ज़मीर की आज़ादी कुरान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है और इसी तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी है। मध्यकाल के पारंपरिक सांस्कृतिक संस्कार (रसूमात) की तुलना में कुरान मानव प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता से कहीं अधिक सामंजस्य रखती है।

इस दृष्टिकोण से शरई कानून की इलाही (दिव्य) प्रकृति को कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा और यह कुरान की आत्मा की तुलना में अरब संस्कृति के सामंती मूल्यों को शामिल करने वाली पारंपरिक संस्कृति के आधार से आज़ाद भी करेगी। यह महिलाओं को भी प्रतिबंध से मुक्त करेगी और उन्हें सम्मान और स्वतंत्रता का एहसास देकर परंपरा और आधुनिकता के बीच तनाव को कम करेगी। इस मौके को नहीं खोना चाहिए वरना यह महिलाओं में मानसिक पीड़ा का कारण बनेगा और जो उनके लिए चुनाव की कशमकश को पैदा करेगा। अधिकांश मुस्लिम महिलाएं अपने धर्म का पालन करना चाहती हैं और साथ ही आधुनिकता के कुछ लाभ का आनंद भी हासिल करना चाहती हैं। मुसलमान फुकहा (धर्मशास्त्रियों) और उलमा को इस पीड़ा को समाप्त करना चाहिए।

लेखक इस्लामी विद्वान और सेंटर फार स्टडी आफ सोसाइटी एण्ड सेकुलरिज़्म, मुम्बई के प्रमुख हैं।

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