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Madrasas: Islamic or Sectarian? इस्लामिक मदरसे: इस्लामिक या सांप्रदायिक?

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

26 जुलाई 2021

एक दूसरे को झूठा साबित करने का प्रयास करने के बजाए उन्हें विचारों की विविधता को स्वीकार कर लेना चाहिए

महत्वपूर्ण बिंदु:

* इस्लामी मदरसों में सांप्रदायिक विभाजन बहुत गहरे हैं

* यह हदीस के दर्स, किताबों और यहां तक कि कानूनी व्यवस्था में भी परिलक्षित होता है

* आम मुसलमानों को इस बात पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है कि क्या उन्हें इस तरह के सांप्रदायिक एजेंडे को जारी रखना चाहिए?

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यदि आप किसी मौलवी से मदरसों और मुसलमानों के जीवन में उनके योगदान के बारे में बात करेंगे तो वे आपको बताएंगे कि इस संस्था की भूमिका कितनी मौलिक रही है। उनके लिए मदरसों का अस्तित्व इस्लामी परंपरा के अस्तित्व का एक अभिन्न अंग है। इनके बिना इस्लाम की रोशनी बुझ जाएगी। इस तरह के शुद्ध दावे अक्सर इस तथ्य को अस्पष्ट करते हैं कि उलमा का इस्लाम शब्द से जो अर्थ है वह स्वयं टकराव का कारण है। अधिकांश उलमा एक ही विचारधारा से संबद्ध होते हैं, इसलिए इस्लाम की दावत से उनका अभिप्राय इस्लाम के अंदर एक ख़ास मसलक लिया जाना चाहिए।

सामान्य तौर पर, यह कोई समस्या नहीं होनी चाहिए क्योंकि सभी धर्मों के भीतर विचार के अलग-अलग स्कूल हैं। तो विविधता कई धर्मों का एक मूलभूत तत्व है। लेकिन इस्लाम में इन विविधताओं का एक अलग अर्थ है, खासकर दक्षिण एशिया में। यहां आंतरिक संघर्ष इतना तीव्र है कि एक संप्रदाय न केवल दूसरे की वैधता को नकारता है, बल्कि उनमें से प्रत्येक वैधता का एकमात्र दावेदार है। जब उलमा इस्लामी पहचान के बारे में बात करते हैं, तो वास्तव में उनकी अपनी पेशेवर पहचान होती है।

मदरसे उलमा द्वारा अपने विचारों को बढ़ावा देने के लिए स्थापित संस्थान हैं। इसलिए, ये संस्थाएं, जो इस्लाम का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती हैं, इस सांप्रदायिक विचार और विचारधारा को बढ़ावा और प्रचारित करती हैं। भारत में लगभग सभी मदरसे (कुछ सरकारी सहायता प्राप्त को छोड़कर) निजी दान के साथ स्थापित किए गए हैं और इस प्रकार उनके संस्थापकों के विचारों को दर्शाते हैं। यदि मदरसे के संस्थापक देवबंदी हैं, तो मदरसा अपनी शिक्षा और अध्यापन के माध्यम से उसी विचारधारा को प्रकाशित करेगा। यदि संस्थापक बरेलवी हैं, तो वह देवबंदियों के विचारों का खंडन करने के लिए अपनी ऊर्जा समर्पित करेंगे। और अल्लाह न करे, यदि संस्थापक अहले-हदीस है, तो वह देवबंदी और बरेलवी दोनों के विचारों और अकीदों को अस्वीकार कर देगा। इतिहासकार जॉर्ज मकदिसी ठीक ही दावा करते हैं कि मदरसे शुरू से ही सांप्रदायिक रहे हैं: अल-अजहर की स्थापना फातिमियों ने शिया विचारधारा के प्रचार के स्पष्ट उद्देश्य से की थी।

भारतीय संदर्भ में मदरसे ऐसा करने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, उसका तरीका गैब के ज्ञान पर चर्चा करना हो सकता है। बरेलवी मदरसे अपने छात्रों को सिखाते हैं कि पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पहले से ही जानते थे कि कौन स्वर्ग में जाएगा और कौन नरक में जाएगा। यह इस बात का प्रमाण है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम शुरू से अंत तक सब कुछ जानते थे। लेकिन साथ ही, शिक्षक अपने छात्रों को बताएगा कि देवबंदी, इस "सत्य" के विरोध में, मानते हैं कि पैगंबर के पास यह विशेष अधिकार नहीं था। हालांकि, देवबंदी मदरसे में वही बहस एक अलग परिणाम देगी। वहां छात्रों को सिखाया जाएगा कि गैब का ज्ञान केवल अल्लाह का है और कभी-कभी यह ज्ञान पैगंबर को थोड़े समय के लिए ही दिया जाता था। बरेलवी की इस अकीदे को बकवास कहकर शिक्षक खारिज कर देंगे।

न केवल औपचारिक पाठ्यक्रम बल्कि मदरसों के 'बाहरी अध्ययन' में शामिल लोकप्रिय पुस्तकें भी गहरी सांप्रदायिक विचारधाराओं को प्रकाशित करती हैं। उदाहरण के लिए, बरेलवी मदरसों में, दो लोकप्रिय पुस्तकें, ज़लज़ला और दावते इंसाफ, लोकप्रिय हैं। इन दो पुस्तकों के लेखक अल्लामा अरशद अल-कादरी (2002-1925) हैं जो एक प्रमुख बरेलवी मदरसे से फारिग हैं। तारिक रहमान का उल्लेख है कि ये दो पुस्तकें न केवल भारत में बल्कि पाकिस्तान में भी लोकप्रिय हैं। इन पुस्तकों को एक अभियोजन के रूप में लिखा गया है जिसमें अल्लामा कादरी उपमहाद्वीप के मुसलमानों से अपील करते हैं कि वे स्वयं निर्णय लें कि क्या सही है और क्या गलत। इन पुस्तकों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि देवबंदी 'सच्चे' मुसलमान नहीं हैं क्योंकि वे पैगंबर का 'अपमान' करते हैं। इस तरह की किताबें पढ़कर बरेलवी मदरसों के छात्र सीखते हैं कि देवबंदी मुसलमानों और इस्लाम के 'असली' दुश्मन हैं। बरेलवी मदरसों में यह सर्वविदित है कि "क्योंकि देवबंदी मुत्तकी दिखते हैं और इस्लामी सिद्धांतों का पालन करते हैं इसलिए वे और भी खतरनाक हैं क्योंकि कोई भी उन्हें इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर गलत नहीं कह सकता।"

दूसरी ओर, देवबंदी मदरसों के भीतर, यह दृढ़ता से माना जाता है कि मुसलमानों के बजाय बरेलवियों को हिंदू कहना बेहतर होगा क्योंकि वे मज़ार पर जाते हैं और शिर्क करते हैं। देवबंदी और बरेलवी दोनों एक हदीस का हवाला देते हैं जिसके अनुसार पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भविष्यवाणी की थी कि इस्लाम के लिए सबसे बड़ा खतरा एक ऐसे कौम से आएगा जो मुसलमानों को गले लगाएगा और कसरत के साथ नमाज़ों का एहतिमाम करेगा लेकिन वास्तव में, यह फुट पैदा करेगा। बरेलवी आम तौर पर वर्तमान देवबंदियों को एक कौम के रूप में संदर्भित करते हैं, जबकि देवबंदी उस कौम को बरेलवी मानते हैं।

इस तरह के गहरे सांप्रदायिक विभाजन बौद्धिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इतने महत्वपूर्ण हैं कि मदरसे अपने उपनियमों में उनकी व्याख्या करते हैं। उत्तर भारत के सबसे बड़े बरेलवी मदरसों में से एक अशरफिया मिस्बाह-उल-उलूम को देखें। इसके दस्तूर का एक हिस्सा है जिसे अपरिवर्तनीय सिद्धांत कहा जाता है। इसके तहत स्पष्ट तौर पर यह दर्ज है कि 'चपरासी से लेकर नाज़िमे आला तक उस मदरसे के तमाम अधिकारियों का अहले सुन्नत व जमात का अनुयायी होना आवश्यक है', और इसमें है कि 'अगर किसी वजह से यह मदरसा किसी गैर सुन्नी के हाथ में चला जाए तो भारत में कहीं से भी किसी भी सुन्नी (बरेलवी) को यह हक़ हासिल होगा कि वह उस मदरसे को दुबारा सुन्नियों के हाथों में वापस लाने के लिए अदालत जाए'

इसके अलावा, इस मदरसे की कार्य समिति निम्नलिखित प्रतिज्ञा करती है: मैं एक सच्चा सुन्नी मुसलमान हूं और मैं हुसाम अल-हरमैन के हर शब्द की पुष्टि करता हूं। अब हुसाम अल-हरमैन क्या है? यह 1906 में बरेलवी विचारक इमाम अहमद रज़ा खान द्वारा लिखी गई एक विवादास्पद पुस्तक है। यह मूल रूप से देवबंदियों और वहाबियों के जवाब में फतवों का एक संग्रह है। इसी किताब में इमाम अहमद रजा खान ने देवबंद के कुछ आलिमों और देवबंद मदरसा से जुड़े किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अविश्वास का फतवा जारी किया था। यह बताना महत्वपूर्ण है कि आमतौर पर एक मुसलमान कुरआन पर शपथ लेता है, लेकिन यहां शपथ एक ऐसी किताब पर ली जाती है जो अत्यधिक सांप्रदायिक और विभाजनकारी है। इससे हमें इन मदरसों के भीतर सांप्रदायिक पहचान की जड़ों की गहराई का अंदाजा होता है।

तो क्या इन मदरसों को इस्लामिक कहा जाना चाहिए या इन्हें सांप्रदायिक संस्थाएं कहा जाना चाहिए? या क्या हम मानते हैं कि इस्लाम को केवल संप्रदाय के चश्मे से ही समझा और अनुभव किया जा सकता है? इन मदरसों को फंड देने वाले आम मुसलमानों को शायद इस बात की जानकारी न हो कि उनके संसाधनों का इस्तेमाल सांप्रदायिक विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। क्या मदरसों के लिए सांप्रदायिकता की इन दीवारों को तोड़ने का समय नहीं है? एक-दूसरे का टकराने के बजाय, वे यह क्यों नहीं सोचते कि इस्लाम को समझने और उसकी सराहना करने के कई तरीके हैं?

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