सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम
19 दिसम्बर, 2012
(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

अपने लेख की तीसरी क़िस्त में शेख यूसुफ अलउबैरी एक गैर शरई नुक्ता बयान करते हैं
'' जब किसी ज़्यादती करने वाले मुसलमान से कसास में बराबर (बिलमस्ल) बदला लेना जायज़ है तो फिर ज़्यादती करने वाले काफ़िर मोहारिब (लड़ाकू लोग) का बदला क्या होगा।''
ऊपरोक्त कथन से ये संदेश देने की कोशिश की गई है कि ज़्यादती करने वाले गैर मुस्लिम मोहारिब पर मुसलमानों को बदला लेने में हद से आगे जाने का अधिकार है। जबकि क़ुरान कहता है
'' अगर तुमको बदला लेना हो तो उतना ही बदला लो जितनी तुम पर ज़्यादती की गई हो। (अलनहेल: 126)
और इसमें किसी मुस्लिम या गैर मुस्लिम का विभेद नहीं किया गया है। कोई मुसलमान सिर्फ इसलिए किसी से बदले से ज़्यादा ज़ुल्म नहीं कर सकता कि ज़्यादती करने वाला गैर मुस्लिम है।''
कुरान के शब्दों में
'' खुदा की राह में उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं मगर हद से न निकल जाओ।' (अलबकरा: 190)
इस्लाम मसला (लाश के नाक, कान और अन्य इंगो को काटना) और कसास के मामले में मुस्लिम और गैर मुस्लिम में अंतर नहीं करता।
हज़रत अली का क़ौल है,
'' अगर कोई मुस्लिम किसी ईसाई की क़त्ल करता है तो बदले में उसे (मुसलमान) भी क़त्ल किया जाएगा। (अलशीबानी- अलहुज्जत: 349:4)
इमाम अबु हनीफा रहिमतुल्लाह अलैहि का क़ौल (कथन) है,
'' एक शांतिपूर्ण यहूदी, ईसाई और ज़रतुश्ती का खून बहा एक आज़ाद मुसलमान के बराबर है।
इसलिए, बदला और कसास के मामले में इस्लाम मुसलमान और गैर मुस्लिम में कोई अंतर नहीं करता है।
इस लेख के इस हिस्से में सारा ज़ोर ये साबित करने पर किया गया है कि गैर मुस्लिम के उत्पीड़न का बदला लेना जायज़ है। कुरान और हदीस ने साफ साफ इस बात की इजाज़त दी है कि अगर ज़्यादती हुई तो वो ज़्यादती करने वाले से उतना ही बदला ले सकता है, ज़्यादती करने वाला चाहे मुसलमान हो या गैर मुस्लिम। लेकिन आगे चलकर मुल्ला अलउबैरी कहते हैं कि,
'फ़ुक़हा (धर्मशास्त्री) कुफ़्फ़ार के खेतों को जलाने और उनके पेड़ों को काटने के औचित्य की ओर इशारा कर चुके हैं। कि अगर वो हमारे साथ ऐसा ही करते हैं। बिल्कुल उसी मसले में अल्लाह ताला ने सहाबा इकराम रिजवानुल्लाह अजमईन की तरश से यहूदियों के खजूर के पेड़ों को उन्हें रुस्वा करने के लिए काटने के अमल को जायज़ करार दिया है।
मुल्ला अलउबैरी उन फ़ुक़हा का नाम या उनके बयान का हवाला नहीं देते जिन्होंने कुफ़्फ़ार के खेतों को जलाने और पेड़ों को काटना जायज़ करार दिया है। इसके विपरीत पहले खलीफा ने ऐसा करने से मना फरमाया है। उनके बारे में नक़ल किया जाता है,
''अबु बकर सिद्दीक़ ने फलों और पेड़ों के काटने और (जंग के दौरान) इमारतों को (जानबूझ कर) ढहाने से मना फरमाया और मुसलमान उनके इस निर्देश पर सख्ती से अमल करते थे'' (सुनन)
इब्ने अबी शीबा, मजायद सेएक हदीस नक़ल करते हैं जो इस तरह है,
'कम उम्र बच्चों, औरतों और कमज़ोर और बुज़ुर्ग मर्दों को जंग में मारा न जाये। खाद्यान्नो और खजूर के पेड़ों को न जलाया जाए, इमारतों को न ढहाया जाए और फलदार पेड़ों को न काटा जाए। (अलमोसन्निफ़- 6:483)
इस्लाम की यह नीति वर्तमान दौर की ज़मीन सोख्ता नीति (Scorched earth Policy) की प्रतिक्रिया है। फौजें अपनी दुश्मन फौज को नुक्सान पहुँचाने के लिए अपने रास्ते में आने वाली सभी फसलों, खेतों, पेड़ों और यहाँ तक कि शहरी आबादियों को भी जला देती हैं या फिर तबाह कर देती हैं ताकि वो दुश्मन के किसी काम न आ सकें। तालिबान ने अफगानिस्तान में जंग के दौरान उत्तरी क्षेत्र में पेड़ों को काट दिया वहाँ की नहरों को तबाह कर दिया और घरों को नष्ट कर दिया और इस तरह वहाँ के नागरिकों को वहां से पलायन करने और अन्य क्षेत्रों में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया। मुल्ला अलउबैरी के द्वारा तालिबान के इसी अमल को सही ठहराने की कोशिश है, जबकि इस्लामी कानून ज़मीन सोख्ता नीति (Scorched earth Policy) के खिलाफ हैं।
कुरान कहता है,
'ऐ ईमान वालों खुदा के लिए मजबूती से खड़े हो जाओ और हुस्ने सुलूक के गवाह रहो। दूसरों की नफरत तुम्हें गलत राह पर न डाल दे और इंसाफ से न हटा दे। मुंसिफ (न्याय करने वाले) बनो। (अलमाएदा- 8)
इसलिए, इस्लाम का ये संदेश है कि मुसलमान किसी क़ौम की दुश्मनी में इंसाफ औऱ सही राह को थछोड़कर ज़ुल्म औऱ ज़्यादती अख्तियार नहीं करता। बल्कि जंग हो या शांति हर हालत में इंसाफ, संतुलन और ज़िम्मेदारी के साथ बर्ताव करता है। इसलिए जंग के दौरान गैर मुस्लिम फौजों ने ज़मीन सोख्ता नीति जो अख्तियार की थी और जो आज भी प्रचलन में है। इस नीति को इस्लाम ने रद्द किया और इसकी निंदा की, क्योंकि इस नीति से जनता भुखमरी और अनगिनत समस्याओं से ग्रस्त हो जाती है।
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