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Hindi Section ( 10 Jan 2013, NewAgeIslam.Com)

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Taliban Fatwa on Terrorism आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 7

 

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

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वो स्थितियाँ कि जिनमें कुफ़्फ़ार के आम लोगों का कत्ल जायज़ है (सातवीं क़िस्त)

शेख़ यूसुफ़ अलउबैरी रहिमतुल्लाह ताला

10 जनवरी, 2013

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

इमाम इब्ने कासिम ने अलहाशिया में इस सर्वसम्मत राय को नक़ल करते हुए लिखा है कि 'उलेमा की इस बात पर सहमति है कि जिहाद में (पीछे से) रक्षा करने का हुक्म और सीधे लड़ने का हुक्म है।'' इस पर उन्होंने इमाम इब्ने तैमिया रहिमतुल्लाह अलैहि से सहमति को नक़ल किया है। इमाम तैमिया रहिमतुल्लाह अलैहि  से ये भी नक़ल किया है कि ताकत और शौकत वाली (लड़ने वाली) जमात के मददगार उसके हुक्म के तहत (गिने जाएंगे) जो हुक्म उस जमात के लिए है। जो कुछ (लड़ने वाली जमात) पर है वही इन (मददगारों) के लिए और उन पर लागू होगा। ये (शरई) हुक्म उन लोगों का है जो जंग में (कुफ़्फ़ार) की मदद करते हैं, इसमें वो मासूम (यानी औरतें, बच्चे, बूढ़े और जो कोई उनके हुक्म में हो) जिन्हें आज के दौर में आम शहरी कहा जाता है, शामिल हैं।

आज अमेरिकी जनता अपनी राय के साथ जंग में सरकार की मदद करती है। अमेरिका में कोई फैसला अकेला राष्ट्रपति नहीं करता बल्कि हर निर्णय उस ऊपरी सदन से जारी होता है जिसके सदस्य अमेरिकी जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए इसका प्रत्येक सदस्य लोगों की उस बहुत बड़ी संख्या का प्रतिनिधित्व करता है जिन लोगों ने उसे इस पद के लिए आगे लाए और उसे चुना। अमेरिकी जनता के लिए ये मुमकिन है कि वो राष्ट्रपति की ओर से जारी होने वाले किसी फैसले पर अमल को रोकें। इसी तरह उनके लिए ये भी सम्भव है कि कोई भी ऐसा फैसला कराने के लिए दबाव डालें जिसे वो अपनी ज़रूरत समझते हों। जैसा कि अमेरिकी जनता ने सरकार पर दबाव डाल कर उसे सोमालिया से अपनी सेनाएं वापस बुलाने पर मजबूर किया। अमेरिकी जनता के ही बहुमत ने तो राष्ट्रपति को चुना था। हालांकि वो चुनाव अभियान के दौरान में इस राष्ट्रपति के भविष्य की योजनाओं और नीतियों के ऐलान करने के कारण उसकी इस्लाम दुश्मन नीतियों और योजनाओं से अच्छी तरह से परिचित होते हैं। इसलिए अमेरिकी जनता का अपने राष्ट्रपति की योजनाओं को पहले से जानते हुए भी चयन करना, जनता को राष्ट्रपति के फैसलों में शामिल समझा जाएगा। बुश ने अपने चुनाव अभियान के दौरान जिन योजनाओं का ऐलान किया था उनमें उसने कहा था कि मैं बलक़ान की फ़ाइल बलक़ान वालों के लिए छोड़ दूँगा और मैं मध्य पूर्व और मध्य एशिया के सैन्य समाधान पर ध्यान दूंगा।

अमेरिकी जनता का इस पार्टी को उसके कार्यक्रमों और उसका इतिहास जानने के बावजूद बिना किसी बंधन और शर्त के चयन करना, इन कार्यक्रमों और उसके काले इतिहास से सहमत होने का संकेत है। अमेरिकी जनता फैसला करने वाले और अहले राय में से गिने जाते हैं चाहे ये राय सैन्य सम्बंधी हो या राजनीतिक। अमेरिकी प्रशासन जिस जनमत के आधार पर निर्णय करता है वो इस बात की ओर इशारा करता है कि निस्संदेह अमेरिकी जनता ही अपने प्रत्यक्ष वोटों के द्वारा और संसद में अपने प्रतिनिधियों के वोटों से परोक्ष रूप से निर्णय करते हैं। जनमत से ही पता चलता है कि हर जगह और हर समय इस्लाम दुश्मनी की अमेरिकी राजनीति के फैसलों में अमेरिकी जनता का बहुत बड़ा हिस्सा होता है। हर जगह अमेरिकी जनता को चाहे जो अपने हाथ से लड़े या अपनी राय से लड़ाई के मामले में अपनी सरकार की मदद करे ...... निशाना बनाना, एक ऐसा मामला है जिसकी शरीअत इजाज़त देती है। चूंकि ये अमेरिकी जनता के प्रभावी बहुमत की स्थिति है इसलिए शरई हुक्म भी प्रभावी बहुमत के आधार पर आम होता है।

चौथी हालत:

औरतों, बच्चों और बूढ़ों के क़त्ल के औचित्य के रूपों में से एक ये है कि जब दुश्मन के किलों को जीतने के लिए मुसलमानों को उन्हें जलाने या पानी में डूबाने या उनमें ज़हर फैलाने या उनमें सांप, बिच्छू और ज़हरीले मकोड़े छोड़ने की ज़रूरत पड़े चाहे इसके नतीजे में मासूम लोग ही मारे जाएं। इमाम बुखारी रहिमतुल्लाह अलैहि ने ''खजूर के पेड़ों और घरों को जलाने' के शीर्षक से एक अध्याय दिया है, जिसमें इब्ने उमर रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि उन्होंने कहा नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बनी नज़ीर के खजूर के पेड़ों को जला डाला।

इमाम इब्ने हजर रहिमतुल्लाह अलैहि फतेह अलबारी जिल्द 6 पेज 154 में कहते हैं:

'इमाम बुखारी का ये कहना है कि खजूर के पेड़ों और घरों को जलाने का बाब (अध्याय) ...... उलमा की अक्सरीयत ने उन्हें जलाने के औचित्य को अपनाया है। और दुश्मन के मुल्कों में तोड़ फोड़ के औचित्य को भी, जबकि इमाम औज़ाई रहिमतुल्लाह अलैहि, अल-लैस रहिमतुल्लाह अलैहि और अबु सूर रहिमतुल्लाह अलैहि ने इसे मकरूह जाना और उन्होंने हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू के अपने लश्करों को की जाने वाली इस वसीयत को दलील बनाया कि वो इनमें से कोई काम न करें।''

जबकि उसका जवाब इमाम तबरी रहिमतुल्लाह अलैहि ने दिया है कि

ये नही (मना करना) उन्हें कसदन (जानबूझ कर) करने पर आधारित है, इसके विपरीत कि वो लड़ाई के दौरान ऐसा कुछ करें। जैसा कि ताइफ़ पर मनजनीक (तोप) स्थापित करने से हुआ। ये उसी तरह का जवाब है कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने औरतों और बच्चों के क़त्ल से मना करने के मसले में दिया है और ऐसा ही अक्सर उलमा ने कहा है। इसी तरह पानी में डुबो कर क़त्ल करने के बारे में है। और इमाम तबरी रहिमतुल्लाह अलैहि के अलावा भी उलमा ने ये कहा कि हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू ने लश्करों को इसलिए मना किया, इसलिए कि वो जानते थे कि वो मुल्क (आसानी से) फतेह हो जाएंगे। सो हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू ने इन देशों के संसाधनों को मुसलमानों के लिए बाकी रखने की वजह से कहा था। वल्लाहो आालम।'

इमाम अबु दाऊद रहिमतुल्लाह अलैहि ने अपनी सुनन में 'दुश्मन के मुल्कों में आग लगाने'' का अध्याय दिया है। जिसमें वो हज़रत अरवह रज़ियल्लाहू अन्हू की रवायत नक़ल करते हैं कि 'उन्होंने कहा कि मुझे ओसामा रज़ियल्लाहू अन्हू ने बताया कि बिना संदेह के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उन्हें (ओसामा रज़ियल्लाहू अन्हू को) हुक्म दिया और फरमाया उन पर सुबह के वक्त अचानक हमला कर और आग लगा।

दुश्मन को जलाना, नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जंग के तरीकों में से एक तरीका है। ये बात तो स्पष्ट है कि आग जलाने से कई मासूम लोग भी क़त्ल हो जाते हैं और इसी तरह जानवर मारे जाते हैं और खेतियाँ भी तबाह हो जाती हैं। इन सबको बचाने की मसलहेत, उन्हें खत्म करने की मसलहेत से कमतर है। क्योंकि शौकत और ताक़त वाले दुश्मन के क़त्ल करने की मसलहेत उसके अलावा दूसरों को ज़िंदा छोड़ने के मसलहेत से ज़्यादा बड़ी है।

अल्लामा इब्ने क़दामा रहिमतुल्लाह अलैहि ने अलमुग़नी में फरमाया:

''जब दुश्मन से जंग की जायेगी तो उन्हें आग के साथ नहीं जलाया जाएगा। अगर दुश्मन पर जीत हासिल हो जाये तो उसे आग के साथ जलाना जायज़ नहीं। हमारे इल्म के मुताबिक इसमें कोई मतभेद नहीं। जबकि हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू मुर्तदियों को आग के साथ जलाने का हुक्म देते और ये काम हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू के हुक्म से हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहू अन्हू ने किया। लेकिन आज लोगों के बीच आग से जलाने के नाजायज़ होने में कोई मतभेद नहीं पाता।''

हज़रत हम्ज़ा असलमी रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उन्हें एक दस्ते का अमीर बनाया। हज़रत हम्ज़ा रज़ियल्लाहू अन्हू कहते हैं कि मैं इस दस्ते के साथ निकला तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया ''अगर तुम फलाँ आदमी पकड़ लो तो उसे आग से जला डालो ' हज़रत हम्ज़ा रज़ियल्लाहू अन्हू कहते हैं कि मैं जाने के लिए मुड़ा तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने आवाज़ दी, मैं लौट आया, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ''अगर तुम फलाँ को पकड़ो तो उसे क़त्ल कर डालो मगर जलाना नहीं क्योंकि आग से सिवाय आग के रब के और कोई नहीं जलाता। इसे अबु दाऊद ने रवायत किया। इमाम बुखारी ने हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू से हज़रत हम्ज़ा रज़ियल्लाहू अन्हू की हदीस की तरह रवायत की है।

(जारी)

स्रोत: नवाये अफगान जिहाद (जनवरी, 2013)

URL for English article: https://newageislam.com/radical-islamism-jihad/taliban-fatwa-terrorism-that-needs/d/9931

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