मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी
1 नवम्बर, 2012
(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्पहली सीतारमैया सुदर्शन के निधन के बाद कई बातों को लेकर मीडिया में बहस और चर्चा शुरू हो गई है। जमाते इस्लामी हिंद के अखबार सहरोज़ा (त्रिदिवसीय) दावत ने इस संबंध में कुछ ऐसी बातें लिख दीं कि टाइम्स आफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने नियमित रूप से चर्चा का विषय बना दिया। जो लोग संघ की गतिविधियों की थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं, वो जानते हैं कि के. एस. सुदर्शन के नेतृत्व के अंतिम दिनों में उनकी कुछ बातों को लेकर सवालात शुरू हो गए थे। मामला ये है कि आदमी जब वैचारिक तुलना के लिए अध्ययन करता है तो उसके अंदर दो एक बातें ऐसी पैदा हो जाती हैं जो या तो उसे संतुलन के साथ निर्णय लेने पर आमादा करती हैं, या दूसरे ये कि प्रतिद्वंदी नज़रिया का भी कुछ न कुछ प्रभाव ग्रहण कर लेता है। श्री के. एस. सुदर्शन पिछले एक दशक से कुरान, सीरते रसूले पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, हदीसों और इस्लाम के इतिहास का एक विशेष ढंग से अध्ययन कर रहे थे। हमारी तीन मौक़ो पर उनसे बातचीत हुई थी। इससे अंदाज़ा हो रहा था कि उनमें विशेष प्रकार के और थोड़े सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं। संघ के नेतृत्व के अंतिम समय में वो महसूस कर रहे थे कि संघ के दायित्वों के साथ वो आवश्यक अध्ययन नहीं कर पा रहे हैं। इसको उन्होंने आरएसएस के नेतृत्व को मोहन भागवत को सुपुर्द करते समय स्पष्ट भी कर दिया था। 2004 में उन्होंने ये ज़रूरत महसूस की, कि मुसलमानों से संवाद होना चाहिए। इसके बिना आपसी गलत फहमियाँ दूर नहीं होंगी। इसके लिए उन्होंने जमीयत उलेमाए हिंद का चुनाव किया। उस वक्त हज़रत मौलाना असद मदनी रहिमतुल्लाह अलैहि ज़िंदा थे। शुरू में जमीयत उलेमाए हिंद के कुछ जिम्मेदार लोगों को हिचकिचाहट थी कि बातचीत की जाय या नहीं। अंत में मौलाना महमूद मदनी, जनरल सेक्रेटरी, मौलाना नियाज़ अहमद फारूकी और लेखक की राय हुई कि बातचीत होनी चाहिए ताकि प्रत्यक्ष रूप से मालूम हो जाये कि इस्लाम और मुसलमानों के संबंध में संघ और उसके ज़िम्मेदारों का क्या दृष्टिकोण है और गलतफहमियाँ कहाँ और क्यों है? इन्कार से ये संदेश जाएगा कि संघ तो आपसी गलतफहमियों को दूर करना चाहता है, लेकिन मुसलमान ही ऐसा नहीं चाहते। उसे संघ के लोग दूसरे ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। सभी पहलुओं पर विचार के बाद तय पाया गया कि बातचीत होनी चाहिए। एक निश्चित तारीख को इंटरकांटिनेंटल होटल में विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुई। जिसमें आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव, विष्णु हरि डालमिया आदि भी शामिल थे। जमीयत उलेमाए हिंद की ओर से मौलाना महमूद मदनी, मौलाना नियाज़ अहमद फारूकी और इस लेख का लेखक। अधिकांश बातें श्री के. एस. सुदर्शन और लेखक ने ही कीं। सुदर्शन की बातों और सवालात से स्पष्ट हुआ कि उनका इस्लाम और मुसलमानों के इतिहास के बारे में अच्छा खासा अध्ययन है। उन्होंने सबसे पहले ये सवाल उठाया कि हिंदू मुस्लिम एकता और करीब होने में कई रुकावटें हैं। प्रथम तो ये कि मुसलमान ही हम हिन्दुओं को इस्लामी शरीयत के मुताबिक किस श्रेणी में रखते हैं। उन्होंने मौलाना सैय्यद सुलेमान नदवी रहिमतुल्लाह अलैहि की किताब 'अरब व हिंद ताल्लुक़ात और सीरतुन नबी' और अन्य हवाले से कहा कि इस्लामी शरीयत के मुताबिक इंसान चार श्रेणियों में विभाजित हैं- मोमिन, काफ़िर, अहले किताब, शुबह अहले किताब।

के.एस. सुदर्शन
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अब सवाल ये है कि हिंदू को किस श्रेणी में आप हज़रात रखते हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि के. एस. सुदर्शन के अध्ययन की दिशा क्या थी। अगर किताब और सुन्नत, फ़िक़्ह इस्लामी, इस्लामी इतिहास और हिन्दुस्तानी मुसलमानों की तारीख से संबंधित आवश्यक अध्ययन न हो तो केवल अखबार पढ़कर और सुनी सुनाई और चलते फिरते काम चलाऊ अध्ययन से सुदर्शन जैसे लोगों को जवाब देना और फिर संतुष्ट करना आसान नहीं है। जबकि हमारे यहां ये हाल है कि हिंदुस्तान के एक देशव्यापी संगठन के महासचिव ने एक टीवी चैनल पर राम लक्ष्मण को महाभारत और अर्जुन को रामायण का पात्र बताया था। जिसके कारण विश्व हिंदू परिषद के सुरेंद्र जैन को मौका मिल गया कि वो बताएं कि मुसलमानों के ज़िम्मेदार लोग तक भारतीय परंपराओं से कितना बेखबर होते हैं। देश से बाहर की दुनिया अरब में जीते हैं। फिर हिंदू मुस्लिम दोनों में एकता की राह कैसे निकाली जा सकती है। मुसलमानों के उन प्रतिनिधियों की बड़ी संख्या जो चैनलों पर बिना तैय्यारी और आवश्यक जानकारी के बहस के लिए पहुँच जाते हैं और संदेह और अविश्वास को और ज्यादा गहरा और ये कहने का मौका देते हैं कि वो मुस्लिम प्रतिनिधित्व के प्रति गंभीर नहीं हैं। दुःखद स्थिति पर भी हंसते मुस्कुराते नज़र आते हैं, गंभीर नहीं। युद्ध और भयानक दंगे के मामले पर चर्चा करने के अवसर पर मुस्कुराहट, हंसी का क्या मतलब है, कहीं ऐसा तो नहीं कि वो बेखबरी और लाजवाब होने पर पर्दा डालने के लिए अनावश्यक रूप से हंसते और क़हक़हे लगाते हैं।
के. एस. सुदर्शन बहस के सलीके और बातचीत से परिचित थे, और लगता था कि मामले को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। उन्होंने उपरोक्त सवाल के अलावा अन्य समस्याओं और सवालात को भी उठाया। लेखक ने सबके उत्तर दिए और स्पष्ट रूप से लगा कि वो उत्तर से संतुष्ट हो गए हैं। हमने विभिन्न किताबों के हवाले से बताया कि हमारे फ़ुक़हा (धर्मशास्त्री) आपके सवाल का बहुत पहले जवाब दे चुके हैं, कि भारत के हिंदू शुबह (संदेह) अहले किताब की श्रेणी में आते हैं। मुहम्मद बिन कासिम के समय ये सवाल आया तो ख्वाजा हसन बसरी और अन्य फ़ुक़्हा और विद्वानों ने हजाज बन यूसुफ की जिज्ञासा में उपरोक्त जवाब दिया था। अल्लामा सैय्यद सलमान नदवी रहिमतुल्लाह अलैहि ने सीरतुन नबी और अरब व हिंद ताल्लुक़ात में जहां ये समस्या उठाई है वहाँ जवाब भी मौजूद है। लेखक ने अन्य हवालों के साथ काजी सनाउल्लाह पानीपती रहिमतुल्लाह अलैहि की तफ्सीरे मज़हरी और मौलाना आज़ाद रहिमतुल्लाह अलैहि की जामे अलशवाहिद का भी हवाला दिया था। इसके साथ लेखक ने ये सवाल कर दिया कि आप अपनी धार्मिक विचारधारा के मुताबिक हम भारतीय मुसलमानों को किस श्रेणी में शामिल करते हैं, और आपका आदर्श क्या है, जिसके हवाले से हम बात को आगे बढ़ाएं। हेडगेवार, गुरु गोलवलकर क्या राम, कृष्ण को आदर्श मानते थे? वो उन्हें भगवान की श्रेणी में शामिल करने को हिंदू समाज की मूर्खता (बेवकूफी) बताते थे। जैसा कि हेडगेवार की किताब 'ध्येय दृष्टि' में है। संघ अपने इस दृष्टिकोण को हिंदू समाज से छिपाता क्यों है? सुदर्शन हमारे सवाल से कुछ परेशान दिखे और ये कहते हुए बातचीत के रुख को मोड़ने की कोशिश की, कि विचार विमर्श से गलतफहमियाँ दूर होती हैं। आगे भी ये सिलसिला जारी रहेगा। बीच में पंडित एन. के. शर्मा ने ये कहकर बात आगे बढ़ाई कि नोमानी जी प्रचण्ड विद्वान हैं, दोनों ओर की जानकारी रखते हैं।
इससे उम्मीद है कि बातचीत का अच्छा नतीजा निकलेगा। लेखक ने इस बातचीत में हुए सवाल और जवाब पर आधारित एक विस्तृत लेख उस ज़माने (2004) में साप्ताहिक 'अलजमीयत के अपने कालम में लिखा था। इसके अलावा लेखक की सुदर्शन से दो बार सीधे तौर पर और हुई थीं। एक बार इंडिया हैबिटेट सेंटर में, मुत्तेहेदा क़ौमियत और इस्लाम के अंग्रेजी अनुवाद के विमोचन के अवसर पर, और दूसरी बार बहुत दिनों बाद शोभित युनिवर्सिटी, मेरठ के पुरस्कार वितरण और कंवोकेशन कार्यक्रम में। पत्रकार बिरादरी के कई दोस्त साथ थे, हम लोग खाना खा कर चाय कॉफी के लिए उठे तो सुदर्शन जी खाना खा रहे थे, उन्होंने दूर से देखकर पहचान लिया और अपने पास एक साहब को भेज कर बुलवाया और बहुत सम्मान से पास में ही बिठाया। खाते हुए उन्होंने कहा कि मुसलमानों को ये सोचना चाहिए कि इस्लाम एक नैतिक और आध्यात्मिक जीवन प्रणाली है। इसका सत्ता से प्रत्यक्ष रूप से कोई अधिक लेना देना नहीं है। हज़रत के समय में ऐसा ही था। बाद में (सुदर्शन जी आनहज़रत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ज़िक्र 'हज़रत' से करते थे) सत्ता और विरासत के विवाद ने उसकी तस्वीर धुंधली कर दी और मुसलमान सत्ता के हो के रह गए, और उसी को ओढ़ना बिछौना बना लिया और इस्लामी, आध्यात्मिक और नैतिक पहलू गायब हो गया। यह मुगल युग तक जारी रहा। उन्हें ये मानना चाहिए कि भारत के अधिकांश मुसलमान यहीं के हैं, बाहर से नहीं आए हैं, उन्हें राम, कृष्ण को अपना पूर्वज स्वीकार करना चाहिए, यदि ऐसा हो जाए तो हिंदू मुस्लिम दोनों के करीब आने की राह में कोई रुकावट नहीं होगी। लेखक ने कहा कि अधिक समय नहीं है, आपके पास न हमारे पास, कम शब्दों में बात ये है कि मुसलमानों ने राजाओं और सत्ताधारियों के फैसले और अमल को कभी धर्म और आदर्श स्वीकार नहीं किया है, केवल खिलाफ़ते राशेदा और बाद में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिमतुल्लाह अलैहि के शासनकाल को नमूना समझा है, इसका कुछ विवरण पेश किया। मुसलमानों का सबसे अहम मसला अक़ीदए तौहीद और रिसालत है। उन्होंने कभी खासकर भारतीय नस्ल के मुसलमानों ने राम, कृष्ण को खारिज नहीं किया है, फिर पूर्वज मानने का सवाल क्यों उठाया जाता है। इसमें मुश्किल हिंदू बहुल समाज ने दो तरह से उत्पन्न किया है। एक तो उन्हें मानव श्रेणी से निकाल दिया तो वह हमारे लिए आदर्श और पूर्वज दोनों होने से बाहर हो गये। क्या इतिहास में आनहज़रत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अलावा किसी और व्यक्ति का जीवन पूरी तरह सुरक्षित व पूर्ण है, जिसको मानव समाज अपने मार्गदर्शन के लिए नमूने के तौर पर ले सके और इत्तेहाद और तौहीद पर होगा, न कि शिर्क, एक खुदा तो हम आप दोनों मानते हैं, जबकि शिर्क और कई खुदाओं के हम इंकार करने वाले हैं। तो दोनों की एकता का साझा आधार एक खुदा पर विश्वास ही होगा। जहां पहले से दोनों जमा और पहुंचे हुए हैं। उसे छोड़ कर जिसको मन करे उसे क्यों पकड़ा जाए और जीवन तो विश्वास और भरोसे पर कायम है। हमारी बातें सुदर्शन जी सुनते रहे और केवल इतना कहा कि आपकी बातें तर्क संगत होती हैं। हमने महसूस किया कि बातों की वो तह में जाना चाह रहे हैं। कई वर्षों के बाद इस साल अगस्त 2012 ई. में भोपाल से ये खबर आई कि वो वहां की ताजुल मसाजिद की तरफ नमाज़ अदा करने के लिए चल पड़े। वो मुस्लिम भाइयों को ईद की मुबारकबाद देना चाहते थे।
लेकिन उनके स्टाफ और सुरक्षा कर्मचारियों ने यातायात और नमाज़ हो जाने की सूचना देकर वहां जाने से रोका। बाद में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौड़ अपने जानने वाले एक मुस्लिम के घर ले गए, जहां सुदर्शन जी ने सेवईंयाँ खाईं और मुस्लिम भाइयों को बधाई दी, तो कई ऐसे सवाल सामने आए जो उत्तर चाहते हैं। अभी हाल ही में उनकी एक शोक सभा में अशोक सिंघल, नितिन गडकरी और आरएसएस के कई जिम्मेदारों के साथ लोगों की बड़ी संख्या थी। सभा में संबोधित करने वालों ने सुदर्शन जी को महान संत और सामाजिक सुधारक बताया। इससे उनके मन में पैदा होने वाले सवालों के जवाब मिल जाएंगे। ईद की नमाज़ अदा करने के लिए रवाना होने का सवाल, नसियान का मरीज़ करार देने से खत्म नहीं हो जाता है, बल्कि सवाल आगे तक जाता है। जमीयत उलेमाए हिंद से बातचीत के बाद उन्होंने इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ बयान देना लगभग बंद कर दिया था। उसकी कोई तो वजह होगी। इस परिप्रेक्ष्य में सुदर्शन के अमल पर ग़ौर करने से कई बातें काम की सामने आयेंगीं।
1 नवम्बर, 2012, सधन्यवाद: रोज़नामा आज़ाद हिंद, कोलकाता
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