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Nuclear Weapons And Ground Realities परमाणु हथियार और जमीनी हकीकत

ज़ाहिदा हिना, न्यू एज इस्लाम

(ऊर्दू से अनुवाद: न्यू एज इस्लाम)

2 जून 2021

पिछले कई महीनों से करीब 10 लाख पाकिस्तानी और भारतीय सैनिक एक-दूसरे को निशाना बनाकर एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर देख रहे हैं. परमाणु शक्ति बनते जा रहे इन दोनों देशों द्वारा की जा रही धमकियों से पूरी दुनिया परेशान है। फ़िलिस्तीन और अफ़ग़ानिस्तान के मामले काफी हद तक पीछे छूट गए हैं और दुनिया की बड़ी ताकतों के शीर्ष सरकारी अधिकारी सुबह-शाम दिल्ली और इस्लामाबाद से "हटो बचो" की गूंज में भागे चले आ रहे हैं। इसकी वजह यह नहीं कि उपमहाद्वीप से प्यार हो गया हैइसका कारण यह है कि दोनों देशों ने पहले परमाणु शक्ति बनने में अनुचित प्रगति दिखाई और अब जब उन्होंने यह क्षमता हासिल कर ली हैतो वे एक-दूसरे को परमाणु बम से धमकाते रहते हैं। यह एक गैरजिम्मेदाराना रवैया है जो पूरी दुनिया को परेशान और नाराज़ करता है।

एक तरफ दोनों सरकारों का यह युद्ध के प्रति रवैया है, दूसरी ओर दोनों सरकारों ने अपने अवाम की फलाह व बहबूद (भलाई) को बिलकुल फरामोश कर रखा है। परिणाम स्वरूप दोनों ओर के नागरिक बेरोज़गारी, बेहिसाब बढ़ती हुई आबादी, अज्ञानता, अत्याचार के नाम पर राजनीति करने वाली जमातों और ताकत के स्रोत पर काबिज़ तत्वों ने अवाम के चेतना में बढ़ोतरी के बजाए उन्हें कुछ अधिक तंग दिल, तंग नजर और जंगी जूनून का इंधन बना दिया है। इसका नतीजा यह निकला है कि जमीनी तथ्यों को नजर में रख कर विदेश निति मुरत्तब करने के बजाए जज्बाती नारों और खोखले दावों से अवाम को बहलाया जा रहा है। अरबों खरबों रूपये की वह रकम जो अवामी भलाई के लिए प्रयोग हो सकती थी, उसे असलहे की खरीदारी, एटम बम की तादाद में इजाफे और डिलीवरी सिस्टम को बेहतर बनाने पर खर्च किया जा रहा है।

एक पाकिस्तानी समाजशास्त्री के अनुसारयदि दक्षिण एशिया के देशों ने मानव कल्याण के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया होतातो यहां के लोगों को प्रगति और समृद्धि की नेमत प्राप्त होती। दूसरी ओरअरबाबे इख्तियार ने युद्ध जैसी नीतियों को अपनायाजिससे व्यापक विनाश और घातकता हुई। उल्लेखनीय है कि इस तरह के बलिदानों के बावजूद दोनों देशों के लोगों को सलामती और सुरक्षा की गारंटी नहीं दी गई है और अब कुछ वर्षों से परमाणु युद्ध की तलवार उनके सिर पर लटकी हुई है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन देशों को सम्मान की बजाय नापसंदगी की नजर से देखा जा रहा है. अगर इन तथ्यों को अब भी नहीं समझा गया तो आने वाली पीढ़ियों को इस कम समझ की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। पाकिस्तान की रवां परमाणु नीतियों के जवाज़ में जो कुछ भी कहा जाता है उससे परे हकीकत यह है कि दोनों देशों को न फ़ौजी लिहाज़ से स्थिरता हासिल हुई है और न दोनों के आपसी संबंध जो हमेशा से दुश्मनी का शिकार हैं, उनमें बेहतरी और इस्लाह के कोई आसार नमूदार हुए हैं। कारगिल के बाद से माहौल और ज़हरीला हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत परमाणु हथियारों से लैस है लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया और कारगिल पर चढ़ दौड़ा। कारगिल के जवाब मेंभारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की और पाकिस्तान के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू कियाभले ही वह जानता था कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार थे और लंबे दूरी की मिसाइलें मौजूद हैं। कारगिल की यह घटना 'परमाणु घेराबंदीके समर्थकों को चिंतन करने के लिए आमंत्रित करती है। कोई भी कुछ भी हासिल करने में सक्षम नहीं था। परमाणु हथियारों के समर्थकों का दावा है कि परमाणु हथियार पारंपरिक सैन्य खर्च को कम कर देंगे। तथ्य यह है कि तब से दोनों देशों में सैन्य खर्च में तेजी से वृद्धि हुई है।

समस्या यह है कि दुनिया में बहुत कम व्यक्ति और कौम हैं जो इतिहास और दूसरों के अनुभवों से सीख सकते हैं। पाकिस्तान और भारत के शासक दूसरे देशों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। वरना सच तो यह है कि सोवियत संघ जैसी महान विश्व शक्ति का भाग्य देखकर इन दक्षिण एशियाई देशों और खासकर पाकिस्तान को अपने भारी रक्षा खर्च के बारे में सोचना चाहिए था। कौन भूल सकता है कि सोवियत संघ के पास हजारों परमाणु हथियार थेऔर पूरी दुनिया उसकी पारंपरिक शस्त्रागार से डरती थी। उन्होंने पारंपरिक और परमाणु हथियारों की दौड़ में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा कीऔर सोवियत शासकों ने लोगों की आर्थिक दुर्दशा और देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था के बारे में नहीं सोचा। परिणामस्वरूपसंयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में जीडीपी के संदर्भ में इसका सैन्य खर्च तीन गुना हो गया। सोवियत अर्थव्यवस्था के लिए यह बोझ उठाना अब संभव ही नहीं रहा आखिर में वह ज़मीन बोस हो गई और एक महान शक्ति एक दर्जन से अधिक राज्यों में विभाजित हो कर पुरानी कहानी हो गई।

पाकिस्तान सीमित संसाधनों वाला देश है। यह वर्तमान में 36 अरब डॉलर के विदेशी ऋण में जकड़ा हुआ है। इसका आंतरिक कर्ज भी खरबों तक पहुंच गया है। हर साल जिस तरह से इसका रक्षा खर्च बढ़ रहा है वह चिंताजनक है। परमाणु मिजाइलों की दौड़ और भारत से उसकी गंभीर सरहदी तनाव ने केवल कुछ महीनों के अन्दर इसकी रक्षा खर्चों में अरबों रूपये का इजाफा किया है। कौमी सलामती के नाम पर होने वाले यह खर्च अगर वास्तव में कौम की सलामती का कारण हों तो उन पर किसी पागल को ही आपत्ति हो सकता है लेकिन तथ्य यह है कि इन नाकाबिले बर्दाश्त गैर पैदावारी खर्च के बिना पर हम तेज़ी से उस मरहले की तरफ बढ़ रहे हैं जिसके बाद हालात किसी के काबू में नहीं रहेंगे।

यह अधिक नहीं है कुछ वर्ष पुरानी बात है कि सोवियत संघ के विश्लेषण के बाद इसकी तीन उप राज्यों की विरासत में परमाणु हथियार मिले थे लेकिन उनमें इतनी सकत नहीं थी कि उनकी देख भाल और निगरानी के खर्च बर्दाश्त कर सकतीं इसलिए उन्होंने एन पी टी पर हस्ताक्षर करने में ही भलाई समझी। यूक्रेन की स्थिति इतनी विकट थी कि उसने संयुक्त राज्य अमेरिका से अपने परमाणु शस्त्रागार को छुड़ाने के लिए भी भुगतान किया। रूस के बारे में भी यही सच है। उसके लिएपरमाणु हथियारों का भंडार एक बोझ बन गया है,  इसलिए उसे इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए अपने पूर्व 'पहले प्रतिद्वंद्वी', संयुक्त राज्य अमेरिका से सहायता प्राप्त करना जारी रखा है। एकबार फिर उसने अमेरिका से परमाणु हथियार में कमी के संधि पर हस्ताक्षर किए हैं।

दुर्भाग्य सेदक्षिण एशिया मेंइन मुद्दों और घटनाओं से सीखे बिना परमाणु और पारंपरिक हथियारों की दौड़ अभी भी पूरे जोरों पर हैजिसका तार्किक परिणाम कुछ वैसा ही हो सकता है जैसा कि पूर्व सोवियत संघ की तर्ज पर उल्लेख किया गया था। हालांकिअगर आशावाद के साथ काम किया जाता हैतो यह उम्मीद की जा सकती है कि एक राष्ट्र जो बदले की भावना से अभिभूत हो गया हैवह अचानक ज्ञानतर्कसंगतता और दूरदर्शिता के साथ काम करना शुरू कर देगा और विनाश के बजाय शांतिसुरक्षा और समृद्धि का रास्ता अपनाएगा। इस संबंध मेंहमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील को अलग-अलग परिस्थितियों में इस तरह के समझदार निर्णय लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। 1991 में दक्षिण अफ्रीका ने अपने हथियार खो दिए क्योंकिइसे साकार करने के बावजूदयह उस नस्लवादी व्यवस्था को बनाए रखने में सक्षम नहीं हो सका जिसने इसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग कर दिया था। नस्लवादी सरकार को यह भी डर था कि जिस दिन श्वेत वर्चस्ववादियों ने सत्ता खो दी तो परमाणु हथियार काले अफ्रीकी सरकारों के हाथों में पड़ जाएंगे।

अर्जेंटीना और ब्राजील के पास परमाणु क्षमताएं थींलेकिन एक आपसी समझौते के तहतउन्होंने निरीक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के लिए अपनी परमाणु सुविधाएं खोल दीं और परमाणु शस्त्रागार का पीछा नहीं किया। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि दोनों देशों की परमाणु नीतियों में यह परिवर्तन सैन्य शासन के अंत और लोकतंत्र की शुरुआत में हुआ था।

पाकिस्तान में आम चुनाव अक्टूबर में होने की संभावना है। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि इन चुनावों से एक जागरूक और सच्ची देशभक्त सरकार बनेगीजो झूठे दावों के साथ लोगों का मनोरंजन करने के बजायउनके सामने तथ्य प्रस्तुत करेगी और यह कि केवल आर्थिक रूप से स्थिर और आर्थिक रूप से समृद्ध राष्ट्र ही अपनी सुरक्षा की रक्षा कर सकते हैंऔर यह कि लोगों की स्थितियों में सुधार करनेगरीबी को कम करने और उन्हें तत्काल न्याय दिलाने के लिए राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग करना चाहिए। अवाम से महान शक्ति दुनिया में आज तक आविष्कार नहीं हुआ। अगर लोग समृद्ध और संतुष्ट हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत पाकिस्तान को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है। हमने देखा है कि एक "परमाणु शक्ति" होने के बावजूद हमें पिछले कुछ महीनों में दुनिया के विभिन्न देशों से "डिक्टेशन" लेने के लिए मजबूर किया गया है।

URL for Urdu article: https://www.newageislam.com/urdu-section/nuclear-weapons-ground-facts-/d/1942

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