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People Should Not Sow Thorns लोगों कांटे न बोना

ज़ाहेदा हिना (कराची)

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

5 जनवरी 2010

आपको भी वह ज़माना शायद याद हो जब स्कूलों और कालिजों के मौखिक और लिखित मुकाबलों में यह विषय दिया जाता था कि इस्लाम तलवार की ताकत से दुनिया में फैला!?” तो लिखने और बोलने वाले इस विषय के विरोध में पुरी ताकत से लिखते और बोलते थे। यह लिखा और कहा जाता था कि यह ईसाईयों और बतौर ख़ास अंग्रेजों का लगाया हुआ आरोप है जिसे हम बिलकुल स्वीकार नहीं करते। दुनिया भर के और ख़ास तौर पर उपमहाद्वीप में सूफियों के नामों की एक लम्बी सूची गिनवाई जाती है। बात मुल्तान में आने वाले सूफियों से शुरू होती थी और फिर अली हजवेरी, मुईनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया, रौशन चराग दिल्ली, अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी, लाल शाहबाज़ कलंदर और सैंकड़ों प्रसिद्ध सूफियों की सूचि पेश कर दी जाती थी। देवा शरीफ, पीली भीत और जाने किन किन दरगाहों का नाम लिया जाता और कहा जाता था कि वह लोग हैं जिन्होंने अपने अच्छे अख़लाक़ से गैरों के दिल मोम किये। हज़ारों उनके हाथ पर इस्लाम लाए। यह वह सूफी थे जो मुसलमान अल्लाह अल्लाह, या ब्राह्मण राम रामकी बात करते थे और उन लोगों के दिल जीतते थे जिनके समुंद्र के बीच, बाहर से आने वाले छोटे छोटे जज़ीरों से अधिक हैसियत नहीं रखते थे। अधिकतर इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि अगर इन सूफियों ने भारत में सहिष्णुता का यह माहौल न बनाया होता तो शुरूआती दौर के कट्टर अकीदा परस्त आखिर में हार जाते। भारत के तूल व अर्ज़ में शायद छोटी छोटी मुसलमान रियासतें वजूद में आ जातीं लेकिन वह महान समाज वजूद में न आता जिसके शानदार दर्शन हमें मुग़ल और इसके बाद के दौर में नजर आते हैं। यह सूफियों का ही कमाल था कि बटवारे के बावजूद आज के भारत में २० या २२  करोड़ मुसलमान मौजूद हैं। उनकी खानकाहें और दरगाहें आज भी केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं हिन्दुओं के लिए भी सम्मानजनक हैं, हम आज भी उच्च वर्गों से संबंध रखने वाले हिन्दू जियारत करने वालों को सूफिया की इन दरगाहों पर सर झुकाते और मन्नतें मांगते देखे हैं।

यह उन सूफिया की सहिष्णुता थी जिसने जात-पात में जकड़े हुए करोड़ों इंसानों को अपने सीने से लगाया और उनके लिए एक ऐसी दुनिया के दरवाज़े खोल दिए जो किसी मस्जिद, किसी दरगाह, किसी खानकाह में कदम रखने का उतना ही अधिकार रखते थे जितना किसी सैयद या किसी सिद्दीकी, फारुकी का अधिकार था, वह ९ सलातीन के दरबार से जुड़े रहने वाले मलिकुल शोअरा, अमीरुल उमरा, अमीर खुसरो के बराबर बैठ कर ‘‘محمدؐ میر محفل بود شب جائے کہ من بودم’’ सुन सकते थे। और हजरत निजामुद्दीन औलिया के हुजूर रक्स कर सकते थे। यह वही सूफी रिवायत थी जिसने हमें कबीर, नानक, फरीद, बलहा, सरमद, सचल, वारिस लतीफ जैसे अनगिनत बड़े दिए। इसी सूफी रिवायत ने हुसैनी ब्राह्मण पैदा किये। मुंशी नवल किशोर के अनुयायी से कुरआन के आला तरीन नुस्खे और अरबी, फ़ारसी और उर्दू की सैंकड़ों धार्मिक, ज्ञानवर्धक और साहित्यिक किताबें प्रकाशित हुईं, आज भी आशूरा की रात में छन्नू लाल दिलगीर का नौहा भय्या तुम्हें घर जा के कहाँ पाएगी जैनब, घबराए गी जैनबकलेजा चीर देता है, यह उन ही सुफिया के दम कदम की बरकत है कि मुंशी प्रेमचंद ने १९२३ में शहीदे आज़मके नाम से हिंदी में एक लेख लिखा और १९२४ में उसी हवाले से हिंदी और अपना ड्रामा कर्बलालिखा। मुंशी हरगोपाल तफ्ता, सर महाराजा किशन प्रशाद, जगन्नाथ आज़ाद, कुंवर महिंद्र सिंह बेदी सहर, नात, मनकबत और मरसिए तसनीफ करते रहे। गुरु सरण लाल अदीब ने कहा कि हिन्दू भी हूँ शब्बीर का शैदाई भी/ मीरास में मिली है मुहब्बत हुसैन की चन्द्र भान ख्याल ने लौलाकलिखी। मराठी के शायर ज्ञानेश्वरम ने फिलिस्तीन, बग़दाद, ग्वांताना मोबे और माहे रमजान पर ऐसी दर्द भरी नज्में लिखते हैं कि मुसलमान शायर उन पर रश्क करें। हमारे सिंध में लाल शाहबाज़ के खलीफा मुसलमान भी होते हैं और हिन्दू भी। राजा लौ के बसाए हुए शहर लाहौर में माधव लाल और शाह हुसैन को मौत भी जुदा न कर सकी और वह पहलु ब पहलु सोते हैं, उनकी याद में मेला चरागाँ जो इन दिनों लाहौर में शुरू हो चुका, हमारी उस सूफी रिवायत का हिस्सा है। आज भी उपमहाद्वीप का किसान, कुम्हार, करघा चलाने वाला और कर्खुनदार अब्दुल रशीद हो या राम दीन, अभय सिंह हो या किशन कुमार, खुदाबख्श सोमरू हो या मुहम्मद अहमद भट्टी, वह दाता दरबार और लाल शाहबाज़ कलंदर, निजामुद्दीन औलिया, सलीम चिश्ती और मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी की दरगाह पर, देवा शरीफ और पीली भीत में हाजरी देता है चढ़ावे चढ़ाता है। तबर्रुक और लंगर और प्रसाद के लिए धक्का पेल सहता है। उसकी महिलाएं ढके हुए सरों और नंगे पैरों के साथ आँखों में आंसू और दिलों में दुआए लिए हुए इन पीरों फकीरों की चौखट पर माथा टेकती हैं, मजारों की जालियों से धागे बांधती हैं और धमाल डालती हैं। यह कहानियां नहीं आज की हकीकत हैं और इनमें भारतीय उच्च वर्गों की महिलाएं भी शामिल हैं। कुछ दिनों पहले हमने जया भादुड़ी और ईश्वर राय की तस्वीर देखीं। आँचल से ढके हुए सरों पर मखमली चादरों की टोकरियाँ धरे नंगे पाँव अजमेर की दरगाह और सलीम चिश्ती के मज़ार पर हाजरी दे रही हैं, फूल चढ़ा रही हैं, दुआ मांग रही हैं और उन ही के साथ अभिषेक बच्चन की झलक भी नजर आई। यह सब कुछ भारत के कट्टरपंथियों के सामने हो रहा है और तलवारों के साए में नहीं, यह सूफियों की दरगाहों से खल्के खुदा के लिए बहने वाली मुहब्बत की धाराओं की अता है।

एक ऐसे सहिष्णु समाज में रहने वाले डरे हुए हैं। ६ मार्च को जब पाकिस्तानियों और दुनिया भर में सूफी मसलक और शायरी का सम्मान करने वालों को यह खबर मिली कि जुमेरात जिसे भरी मुरादके नाम से याद किया जाता है, इस रोज़ पेशावर का हज़ारों ख्वानी मोहल्ला आतंकवाद का निशाना बना है तो किसी को विश्वास नहीं हुआ। उस रोज़ आसमान पर रौशनी का पहला टांका लगा था, फजर की अज़ान हो रही थी जब पेशावर के हज़ार ख्वानी में एक बड़ा धमाका हुआ और पश्तू के अज़ीम सूफी शायर और दरवेश रहमान बाबा के मज़ार के खंभे ज़मीन पर गिर गए और इमारत ढह गई। १६५० में पैदा होने वाले और १७१५ में रहलत करने वाले इस बुज़ुर्ग की कब्र को भी नुक्सान पहुंचा। यह शायर जो अब से ३०० वर्ष पहले ख़त्म हो चुका, जिसका मज़ार आज भी खालाएक का मर्जा है, उसके अशआर में रवादारी और इंसान दोस्ती का जो संदेश है उससे अतिवादियों को इतना डर लगता है कि उन्होंने ३०० साल पुरानी एक कब्र को मलियामेट करना जरूरी समझा। पश्तू में रहमान बाबा से बड़ा शायर नहीं गुजरा। वह खुशहाल खान खटक से अलग दृष्टिकोण रखते थे। उनके यहाँ वह दर्दमंदी, दिलसोज़ी और इंसान परस्ती है जिसके कारण उनके अशआर की ताबानी ३०० साल बाद भी कायम है। २००५ में उनकी कुल्लियात का राबर्ट सिम्पस और मोमिन खान ने अंग्रेजी में अनुवाद किया जो ९०० पेज पर आधारित है। इस अनुवाद के प्रकाशन के बाद रहमान बाबा के कलाम की मकबूलियत में आलमी सतह पर इज़ाफा हुआ। रहमान बाबा ने असली सोने जैसी खरी बात कही थी कि जो खुदा का दोस्त नहीं, उसके साथ अगर अफ्वाज़ के परे हों, तब भी वह अकेला शख्स है।उनके मज़ार की बेहुरमती करने वाले हमारे समाज में तनहा हैं। यह कहा गया कि यह मज़ार इसलिए बारूद से उड़ाया गया कि यहाँ औरतें ज्यारत के लिए आती थीं और मन्नतें, मुरादें मांगती थीं। और अभी अभी जमरूद से जिस दो मंजिला मस्जिद के उड़ाए जाने की खबर आई है वहाँ न तावीज़ लिखे जा रहे थे और न मन्नत मांगी जा रही थी। नमाज़ी जुमे की नमाज़ के लिए जमा थे इस यकीन के साथ कि यह अल्लाह का घर है और यहाँ वह सुरक्षित हैं। इमाम ने अल्लाहुअकबरकहा और मस्जिद रिमोट के जरिये उड़ा दी गई। अब तक ७० नमाजियों की हलाकत की खबर आ चुकी है। रहमान बाबा के मज़ार की बेहुरमती के बाद उनके अंग्रेज़ अनुवादक सेमप्स ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था पश्तू ख्वाँ में इन दिनों हिंसा की जो आग भड़क रही है। वह रहमान बाबा जैसे शायर के इफ्कार से ही बुझाई जा सकती है।रहमान बाबा ने क्या खूब कहा था:

फूलों के बीज बो कर ही तुम अपने आस पास बागीचा उगा सकते हो

कांटे न बोना कि यह तुम्हारे तलवों में चुभेंगे

तुम दूसरों पर तीर अंदाजी करोगे

तो याद रखो तीर पलट कर तुम्हें छेदने आएँगे

दूसरों के रास्ते में गढ़ा न खोदो

मुबादा तुम उस गढ़े के किनारे आन पहुँचो

Urdu Article: People Should Not Sow Thorns لوگوں کانٹے نہ بونا

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/people-sow-thorns/d/125576

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