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Hindi Section ( 11 Nov 2011, NewAgeIslam.Com)

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Worthless, Despite Being A Billion! एक अरब होने के बावजूद लाचार और बेबस


ज़फ़र आग़ा (उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

मुबारक हो ,दुनिया का हर चौथा इंसान मुसलमान है। इस्लामी दुनिया और विश्व के कोने कोने में हर मुसलमान के लिए ये निश्चित रूप से एक खुशी देने वाली खबर है कि इस्लाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मज़हब है और इसमें विश्वास रखने वाले मुसलमान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं। ये खबर किसी मुस्लिम माध्यम से नहीं आयी है। कड़वी सच्चाई तो ये है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाली कौम के पास ऐसे माध्यम ही नहीं हैं कि वो खुद कोई ऐसा सर्वे कर सके, कि जिससे सही तौर पर पता चल सके कि दुनिया में मुस्लिम आबादी कितनी है? दुनिया में अब मुस्लिम आबादी एक अरब सत्तावन करोड़ है। ये खबर आमतौर पर अपना दुश्मन समझने वाले मुसलमानों को अमेरिका के एक थिंक टैंक ने दी है। इस संगठन ने पहले तीन साल तक पूरी दुनिया का सर्वे किया और इसके बाद जो नतीजे सामने आये उसने सारी दुनिया को हैरान कर दिया। इस सर्वे के मुताबिक दुनिया का हर चौथा आदमी न सिर्फ मुसलमान है बल्कि इसी सर्वे ने ऐसे चौंकाने वाले खुलासे किये हैं कि जिनसे आज तक मुसलमान भी परिचित नहीं थे। मिसाल के तौर पर इस सर्वे के अनुसार इस समय जर्मनी की मुस्लिम आबादी लेबनान की मुस्लिम आबादी से ज़्यादा है, और रूस की मुस्लिम आबादी लीबिया और जार्डन जैसे दो मुस्लिम देशों की सामूहिक मुस्लिम आबादी से बढ़ चुकी है, और ये खयाल बिल्कुल गलत है कि मुसलमानों की बड़ी आबादी अरब देशों और अफ्रीका के एक हिस्से में पाई जाती है। सर्वे के अनुसार पश्चिम एशिया(जिसमें कुल अरब और ईरान जैसे देश शामिल हैं) और उत्तरी अफ्रीका में विश्व की कुल मुस्लिम आबादी का सिर्फ 20 फीसद हिस्सा ही पाया जाता है और सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि तीन सौ मिलियन मुसलमान उन देशों में रहते हैं, जहाँ इस्लाम बहुसंख्यक धर्म नहीं हैं, अर्थात तीन सौ मिलियन किसी ऐसे इस्लामी राज्य की कल्पना नहीं कर सकते, जिसके लिए तालिबान जैसे मुस्लिम संगठन सक्रिय हैं।

कहने का तात्पर्य ये है कि यूरोप हो या अमेरिका, एशिया हो या अफ्रीका इस्लाम का झण्डा हर जगह लहरा रहा है। लाइलाहा इल्लल्लाह का नारा रूस से मोरक्को, न्युयार्क और लंदन से अहमदाबाद और इस्लामाबाद, काहिरा और तेहरान से लेकर खुद अल्लाह के घर मक्का और इस्लाम के केन्द्र मदीना तक गूँज रहा है। ये वास्तविकता जानकर निश्चित तौर पर हर एक मुसलमान को खुशी हुई होगी, लेकिन एक मुसलमान होने की हैसियत से मेरी खुशी कुछ ही पलों में सदमें में बदल गयी, क्योंकि अगर आप संजीदगी से ग़ौर करें तो ये वास्तविकता दुनिया में कोई पहली बार सामने नहीं आयी है कि मुसलमान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं। अगर इतिहास के पन्नों को पलटा जाये तो शायद ये सच्चाई सामने आ जाये कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के जीवन से लेकर उनके देहांत के लगभग सौ साल के अंदर ही इस्लाम दुनिया में सबसे तेज़ी से फैलने वाला विश्वास बन गया था। चारों खलीफा के जीवन में ही इस्लाम अरब दुनिया से निकल कर ईरान, अफ्रीका और यूरोप की सीमाओं तक पहुँच चुका था और फिर उमवी और अब्बासी खलीफा के समय में इस्लामी केन्द्र मोरक्को और बग़दाद की गिनती आज के वाशिंगटन और लंदन जैसे शहरो में होती थी। इस्लाम का झण्डा और लाइलाहा इल्लल्लाह का नारा इस दौर में भी स्पेन, रूस, इटली और फ्रांस के कुछ हिस्सों से बुलंद होना शुरु हो चुका था। यूँ तो उस दौर में आज की दुनिया की तरह आबादी के आंकड़ों पर शोध का कोई सिलसिला नहीं था लेकिन वास्विकता यही है कि मध्यकाल के मुसलमान और इस्लाम का वो दबदबा था कि उस वक्त दुनिया की सभी सभ्यताओं और विश्वासों को किसी बात से खतरा था तो वो इस्लामी सभ्यता और इस्लामी विश्वास से था। ईसाई सभ्यता और चर्चों ने कई बरसों तक अपने अस्तित्व के लिए मुसलमानों से जिहाद किया। इस युद्ध में मुसलमान विजयी रहे। हिंदुस्तान में हिंदू मत को अगर खतरा था तो ये था कि कहीं इस्लाम धर्म पूरे हिंदुस्तान पर छा कर इस धरती से हिंदू मत का चिराग ही न बुझा दे। वैसे अफ्रीका में न जाने कितने मज़हब सदाए लाइलाहा इल्लल्लाह में ऐसे गुम हो गये कि फिर उनका अस्तित्व सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही बचा मिला।

अर्थात जो क्षेत्र आज ईसाई सभ्यता (जिसको यूरोपी सभ्यता कहा जाता है) का है, उससे कहीं ज़्यादा रुत्बा मध्यकाल में इस्लामी सभ्यता का था। एक नहीं, न जाने कितने इस्लामी सभ्यता के केन्द्र आज के यूरोपी केन्द्रों से कहीं ज़्यादा प्रगतिशील थे। कभी दुनिया में दमिश्क और बग़दाद धन व संसाधन के केन्द्र बने तो कभी कुस्तुन्तुनिया, काहिरा, दिल्ली, आगरा व लखनऊ जैसे इस्लामी सभ्यता के केन्द्र अपनी वो धाक जमायी की जो आज वाशिंगटन, न्युयार्क और लंदन जैसे शहरों की है। आज जिस तरह यूरोप और अमेरिका में धन व संसाधन के भण्डार हैं या जिस तरह आज इन देशों के ज्ञान की प्रसिद्धि है वैसे ही कभी बग़दाद, कुस्तुन्तुनिया और दिल्ली जैसे शहरो में धन व संसाधन के साथ ही ज्ञान की धाराएं फूटा करती थीं और इन इस्लामी केन्द्रों से लाभान्वित होने के लिए पूरी दुनिया से लोग यहाँ आया करते थे, लेकिन दुनिया की इसी सबसे बड़ी आबादी वाली इस्लामी सभ्यता और इसमें विश्वास रखने वाले एक अरब सत्तावन करोड़ मुसलमानों की बेबसी का अब ये आलम है कि पिछले लगभग साठ बरसों से मुसलमान किबलए अव्वल यानि मस्जिदे अक्सा का रोना रो रहा है, लेकिन उसको इज़राइल के हाथों आज़ाद नहीं करा सके हैं। इस हिंदुस्तान में जहाँ आज से काफी कम आबादी में होने के बावजूद मुसलमानों ने महान अकबर जैसे शासक पैदा किये थे, उसी हिंदुस्तान में इस वक्त देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद भी मुसलमान मोदी को इशरत जहाँ जैसे मासूम मुसलमानों का कत्ल करवाने से भी नहीं रोक पाता। अगर आप सूडान और बहुत से दूसरे अफ्रीकी मुस्लिम देश जाकर वहाँ का हाल देखें तो इन देशों में हजारों सूखे से प्रभावित मुसलमान भूख से दम तोड़ रहे हैं और इनको कोई पूछने वाला नहीं है।

आखिर क्या कारण है कि मध्यकाल में जब आपकी आबादी आज की आबादी के मुकाबले में चौथाई भी नहीं थी, तब इस्लामी सभ्यता विश्व शक्ति थी। आखिर तब क्यों हर विश्वास इस्लाम के आगे कांप रहा था और दुनिया में मुसलमानों के डंके बज रहे थे? मेरे अनुसार इस्लामी सभ्यता के इस वैश्विक चरम का बुनियादी कारण पैगामे रसूलुल्लाह (स.अ.व.) था, और वो पैगामे रसूलुल्लाह (स.अ.व.) क्या था? आज की आधुनिक भाषा में इस्लामी सभ्यता मुसलमान की ताकत और बुलंदी का अगर एक शब्द में कोई राज़ हो सकता है तो वो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) का इस्लाम का भाईचारा का पैगाम था औऱ इसी भाईचारे के पैगाम ने आम इंसानों का जिस तरह सशक्तिकरण किया, ऐसा सशक्तिकरण इस्लाम से पहले दुनिया में कहीं भी नहीं पाया जाता था। यूरोप पर ईसाई पादरियों और चर्चों की वो पकड़ थी कि आम ईसाई को जन्नत हासिल करने के लिए इस दुनिया में पादरी को रिश्वत देनी होती थी। एक ग़रीब और आम ईसाई को गिरजाघरों में जल्द घुसने की हिम्मत नहीं होती थी। हिंदुस्तान में हिंदू मत इस समय न सिर्फ अपने चरम पर था, बल्कि सोमनाथ जैसे न जाने हज़ारों मंदिरों में कितनी धन दौलत भरी पड़ी थी, लेकिन इन मंदिरों में उच्च जाति के ब्राह्मणों और कुछ जातियों के अलावा हिंदुस्तान की लगभग 95 फीसद आबादी पैर भी नहीं रख सकती थी। अगर इसांन का विश्वास और धर्म मुट्ठी भर कुछ पादरियों, पंडितों और धर्म के दूसरे ठेकेदारों के हाथों में कैद था तो दूसरी ओर पूरे विश्व का इंसान किसी राजनीतिक आज़ादी की कल्पना ही नहीं रखता था। दुनिया भर के इंसानों का सियासी मालिक उस वक्त का बादशाह, उसका कबायली सरदार, उनका जाति का मुखिया या फिर उसका जमींदार होता था और आर्थिक स्तर पर इंसान केवल दो दर्जों में बंटा था यानि मालिक और गुलाम में बंटा हुआ था।

ऐसे रूहानी, सियासी, समाजी और आर्थिक गुलामी के दौर में अरब के रेगिस्तान से रसूलुल्लाह मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.) ने जब सदाए लाइलाहा इल्लल्लाह बुलंद की और इंसानियत को ये बताया कि देखो, तुम्हारा एक ही रब है और उस रब के लिए हर इंसान बराबर है, चाहे मोहम्मद (स.अ.व.) कुरैशी हों या बिलाल हब्शी हो, तुम जब चलो उसकी बारगाह में, उसकी मस्जिद में बेखौफ किसी भी आलातरीन व्यक्ति के साथ कांधे से कांधा मिला कर खड़े होकर इबादत करो और इसके लिए तुम्हें किसी पादरी, किसी पंडित और किसी मौलाना की इजाज़त नहीं चाहिए होगी। बस रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के इस पैगाम ने इंसानियत को सबसे पहले रूहानी आज़ादी और रूहानी सशक्तिकरण प्रदान किया। फिर रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने मदीना में जो राज्य कायम किया उसमें गरीब इस राज्य का ज़िम्मेदार करार पाया और इस्लाम ने क़ुरान और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के ज़रिए ये पैगाम दिया कि कोई भी भूखा न सोने पाये, यानि रूहानी आज़ादी के साथ ही साथ इस्लाम ने आर्थिक आज़ादी, आर्थिक सशक्तिकरण देकर इस्लामी रियासत में आम इंसान को हिस्सेदार बना दिया। फिर चारों खलीफा के चुनाव में आम राय शामिल करके इस्लाम ने सियासी सतह पर उस दौर के समाज में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित की और इंसान को बादशाह, कबीले के सरदार, जाति के मुखिया जैसे ज़ालिम लोगों से आज़ादी का रस्ता दिखा कर आम इंसानों को सियासी आज़ादी और सशक्तिकरण प्रदान किया। इसी इस्लामी ताकत ने इस्लामी सभ्यता को एक रूहानी, समाजी, सियासी और आर्थिक क्रांति की शक्ल प्रदान कर दी और वही इस्लामी क्रांति अरब के रेगिस्तान से निकल कर अफ्रीका, ईरान, तुर्की, यूरोप, हिंदुस्तान और चीन तक न सिर्फ पहुँच गयी बल्कि इसने बग़दाद में दुनिया के ऐसे शिक्षण संस्शान बनाये कि जिन के ज्ञान से 17वीं और 18वीं सदी में यूरोप लाभांवित होकर विश्व की ऐसी शक्ति बन गया कि आज उसने इस्लामी दुनिया को ऐसा गुलाम बनाया है कि दुनिया के एक अरब सत्तावन करोड़ मुसलमान अपने क़िबलए अव्वल को आज़ाद करने के उपाय भी नहीं कर सकते हैं।

आखिर इस्लामी दुनिया में ये गर्व क्यों? ये दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी मुसलमान इस इक्कीसवीं सदी में ऐसा मजबूर क्यों है कि वो एक फिलिस्तीन के लिए कुछ नहीं कर सकता है। वो मोदी के आगे लाचार है और सद्दाम हुसैन को फांसी होते देखकर सिर्फ अफसोस कर सकता है और कुछ नहीं कर सकता है? इस्लामी दुनिया की इस दूसरी सबसे बड़ी आबादी की लाचारी और बेबसी का कारण भी वही है, जो इसकी बुलंदी और उत्थान का कारण थी, यानि अगर इस्लाम ने दुनिया को पादरियों, पंडितो और मज़हब के ठेकेदारों से आज़ाद कराया था लेकिन आज भी इस्लामी देशों में शाही दौर है। मुसलमान फिर कबीलों और हिंदुस्तान जैसे समाज में जाति में बंटा हुआ है। यानि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने मुसलमानों को भी रूहानी, सियासी, समाजी, नस्ली, कबायली औऱ आर्थिक गुलामी से निजात दिलाकर उसे दुनिया की सबसे आज़ाद, दौलतमंद, अक्लमंद क़ौम बनाया था, वही मुसलमान आज फिर कलमा लाइलाहा इल्लल्लाह तो पढ़ रहा है, लेकिन इनके मज़हब पर आलिमे दीन का पहरा है, इनकी सियासी ज़िंदगी पर बादशाह और कबायली सरदार का पहरा है। वो समाजी फैसले खुद नहीं कर सकते है, इनकी अर्थव्यवस्था कबायली और जमींदाराना मूल्यों में कैद है। यही कारण है कि वो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद एक तरह से गुलामी की ज़िंदगी बिता रहे है और वो जब तक अपने को हर तरह की गुलामी से निजात दिला पायेगें, वो दुनिया में एक अरब सत्तावन करोड़  होने के बावजूद भी लाचार व बेबस रहेंगे, इसलिए दुनिया के हर चौथे इंसान का मुसलमान होना आपको मुबारक, मैं तो दुनिया का चौथा मुसलमान होकर भी गुलामी की ज़िंदगी जीने पर शर्मिंदा हूँ।

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