New Age Islam
Sat Jan 16 2021, 10:23 AM

Loading..

Hindi Section ( 18 Sept 2011, NewAgeIslam.Com)

Social role of teachers in The Religious Madrasas दीनी मदरसों के शिक्षकों की सामाजिक भूमिका


वारिस मज़हरी (उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

मुस्लिम समाज में सुधार और उसमें धार्मिक व सांस्कृतिक जागरूकता के लिए कई पहलुओं पर विचार करने की ज़रूरत है। एक पहलू दीनी मदरसों के शिक्षकों की समाजिक भूमिका का है। ज़ाहिर है मदरसों की स्थापना मुस्लिम समाज के लिए अत्यन्त ज़रूरी है। ये समाज में दीनी तालीम के फैलाव के एक अहम स्रोत हैं। जो देश या इलाके मदरसों के वजूद से खाली हैं, उनकी दीनी हालत संतोषजनक नहीं है। यही वजह है कि वो ताकतें जो मुस्लिम समाज की धार्मिक जागरूकता को अपने लिए खतरा समझती हैं, मदरसों को अपना निशाना बनाती हैं। इसीलिए मिस्र और यमन में सैकड़ों मदरसों को बंद कर दिया गया है, या इनका दीनी निसाब (पाठ्यक्रम) बदल दिया गया है। ये मुहिम जारी है। मदरसों की इस अहमियत के बावजूद ये दावा करना बिना दलील के होगा कि मदरसा अपने मिशन और अपेक्षाओं के मुताबिक कामयाब हैं। मदरसों के मतलूबा (अपेक्षित) किरदार में दीनी तालीम के फैलाव के साथ ही मुस्लिम समाज का सुधार भी शामिल है। इस सुधार के कई पहलू हैं।

सवाल ये है कि मुस्लिम समाज के सुधार में मदरसों और मदरसा के शिक्षकों की क्या भूमिका है? हकीकत ये है कि बड़ी तादाद में मदरसे से पढ़कर निकलने वाले मदरसों में ही पढ़ाने का काम अंजाम देते हैं। इसलिए उनकी समाजिक भूमिका तय होना चाहिए। तालीम उस समाजिक भूमिका का एक अहम पहलू है। देखा ये जा रहा है कि इसमें भी पढ़ाने का काम दूसरे अन्य कामों की तरह नियमित काम बन गया है। और तकनीकी और मशीनी अंदाज़ में किया जा रहा है। अगर मदरसों से पढ़ कर बाहर निकलने वाले अधिकांश इन्हीं मदरसों की चारदीवारी के अंदर कैद होकर रह जा रहे हैं, और उसी काम को दुहराते हैं जो उन पर दुहराया गया था, तो ऐसी सूरत में इस काम और इस इदारे का बाहर की दुनिया से कितना ताल्लुक रह जाता है? मिसाल के तौर पर एक बड़े दीनी मदरसे के बारे में एक विदेशी पत्रकार (सिलयावी डगर) ने न्युयार्क टाइम्स में लिखा कि इस्लाम में सफाई (और तहारत) पर बहुत ज़ोर है। (फिक़ह की अक्सर किताबें तहारत से शुरु होती हैं।), लेकिन मदरसों से बाहर इसका कोई असर देखने को नहीं मिलता है। ये अहम सवाल है। आप अगर जायेज़ा लें तो आपको अंदाज़ा होगा कि सफाई, सलीक़ा और सेहतमंदी पर अमल के लिहाज़ से मदरसे बहुत ही अफसोसनाक तस्वीर पेश करते हैं।

मदरसों से पैदा होने वाली नई नस्ल की तालीम और तरबियात की पूरी ज़िम्मेदारी मदरसे के शिक्षकों पर आती है। स्कूलों के मुक़ाबले मदरसे में पढ़ने वाले 8-10 साल, दिन-रात मदरसा शिक्षकों की निगरानी में गुज़ारते हैं। इसलिए ये अपेक्षा मां-बाप से ज़्यादा मदरसा टीचरों से की जानी चाहिए, कि वो मदरसे पढ कर निकलने वाली नई नस्ल की तरबियत इस तरह करें कि वो समाज के निर्माण में अहम भूमिका अदा कर पायें। अगर वो ये रोल अपेक्षा के मुताबिक निभा नहीं सकते हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी का बड़ा हिस्सा उनके ही सिर जाता है। मदरसा के शिक्षकों का तो एक रोल यही है जो मदरसे के अंदर से ही ताल्लुक रखता है।

दूसरा रोल वो है जिसका ताल्लुक मदरसे से बाहर की दुनिया से है। मदरसा शिक्षक जिस समाज में रहते हैं, उसकी इस तरह से वाकिफीयत ज़रूरी है ताकि वो मुख्तलिफ पहलुओं से किसी समाज के तब्कों के अंदर पायी जाने वाली खूबियों और कमियों को तय कर सकें। उनके विश्लेषण की उनके अंदर क्षमता हो और सही और अमल किया जाने लायक सुधारों के बारे में सोच सकें। मदरसा के कुछ शिक्षक समाज सुधार में इस तरह लगे हुए हैं कि वो लोगों की मांग पर सुधार के विषय पर तकरीर करते हैं। कुछ शिक्षकों से इस सलिसिले में लिखित तौर पर खिदमात ली जाती हैं। इसकी अपनी अहमियत से इंकार नहीं है, लेकिन मेरे मुताबिक इसका फायदा महदूद (सीमित) है।

 मदरसा के शिक्षकों को खुद इलाकाई लोगों की मदद से ऐसे समाज सुधार के आंदोलनों की बुनियाद डालनी चाहिए और सबसे पहले अपने इलाकों से समाज सुधार के ज़रिए समाजी बुराईयों को खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए। अंग्रेज़ी का मशहूर मुहावरा है कि हर चीज़ अपने घर से शुरु करनी चाहिए। इस्लाम का सुधार फार्मुला भी इसी सच्चाई को मानता है, कि पहले अपने घर, मुहल्ले और इलाके में सुधार की कोशिश करो। सभी सुधारकों का यही अंदाज़ रहा है। मदरसा के शिक्षकों में वही लोग समाज में घुल मिल पाते हैं जो तकरीर, तावीज और झाड़ फूंक के हुनर से वाकिफ हों। बाकी लोगों की दुनिया अपने कमरे, क्लास रूम और मस्जिद तक सीमित रहती है। सच्चाई यही है कि यही सीमित रहने वाले लोग ही ज़्यादा सलाहियत के मालिक होते हैं। उनकी सलाहियतों को एक हिस्सा अगर समाज सुधार में लगे तो इसके बहुत अच्छे नतीजे सामने आयेंगें। असल ज़रूरत ज़हेन में तब्दीली और मदरसे के बंद माहौल में थोड़ा खुलापन और फैलाव लाने की है।

 समाज सुधार के लिए तब्लीग़ी जमात के तरीके सबसे ज़्यादा काम के और फायदेमंद हैं। तब्लीग़ी जमात की कमायाबी इस बात पर है कि वो तकरीर और तहरीर से ज़्यादा आपसी मेल जोल को बुनियाद बनाते हैं। और इसी उद्देश्य से घर घर और मुहल्ले मुहल्ले चक्कर काटते हैं। दुत्कारे जाते हैं और बुरा भला सुनते हैं, लेकिन हर हाल में बातचीत की राह ढूँढ़ निकालते हैं। होना ये चाहिए कि सभी काबिले ज़िक्र मदरसों में समाज सुधार की एक कमेटी होनी चाहिए और इन कमेटियों की एक संस्था होनी चाहिए। इस कमेटी का सदस्य उन्हीं लोगों को बनाने की कोशिश की जाये, जो समाज को गलत राह पर डालने में शामिल हैं। इसमें नौजवान भी हों और बुज़ुर्ग भी शामिल हों। खासतौर से अमीर और असरदार लोग हों। ग़ौर करने की बात है कि तब्लीग़ी जमात ने आम लोगों के साथ ही पढे लिखे (आधुनिक शिक्षा) लोगों से भी अपने काम में भरपूर मदद ली हैं। इसके लिए उसका तरीका ये रहा है कि उसने तब्लीग़ी गश्त को सबका काम बना दिया और दूसरे शब्दों में उसे इस अच्छे अंदाज़ से पेश किया कि वो हर छोटे बड़े को ये अपना काम नज़र आने लगा। जिससे हर तब्के और हर सलाहियत का आदमी अपना हिस्सा निभाने लगा। समाज सुधार के लिए इसी तरीके की ज़रूरत है। इसमें अमली तौर पर एक अच्छाई ये है कि इसमें गैर मुस्लिम भी आसानी से शामिल हो सकता है। क्योंकि समाज की बहुत समस्याएं साझा हैं और दोनों समूह के लोगों के लिए चिंता का विषय हैं।

समाज सुधार में मदरसा उस्तादों को रोल इसलिए ज़्यादा अहम नज़र आता है क्योंकि वो लोग उस सियासत से कोसों दूर हैं जिसने मदरसे से बाहर मिल्ली मैदान में काम करने वाली कई मज़हबी और नीम-मज़हबी तंज़ीमों को सियासत का कारिंदा बना दिया है, चाहे इनमें काम करने वाले उलमा हो या गैरउलमा। ये समझना सही नही होगा कि मदरसा के उस्तादों का समाज सुधार में लग जाने से उनके पढ़ाने लिखाने के काम पर असर पड़ेगा। पढ़ाने का बोझ कम करने के लिए उस्तादों की तादाद बढाई जा सकती है। इसलिए रोज़ाना या हफ्ते में उनके काम के लिए वक्त निकाला जा सकता है। कुछ मदरसों में इस काम के लिए मुबल्लिगीन (धर्मउपदेशकों) का एक विभाग खुला हुआ है, लेकिन उनके जायज़े से ये बात मालूम होती है कि वो सिर्फ कुछ पेशेवर तकरीर करने वालों पर आधारित होता है। इसमें खास तौर से बड़े जोरदार अंदाज़ से तकरीर करने वालों को लिया जाता है। हकीकत में ये मेयार ही गलत है। तकरीर की सलाहियत तो अक्सर नेहायत मामूली सलाहियत रखने वालों के अंदर पैदा हो जाती है। और आजकल तकरीर करने वालों में ऐसे ही लोग शामिल हैं।

समाज सुधार के ताल्लुक से जिस दृष्टिकोण को सामने लाने की ज़रूरत है वो ये है कि सिखाने के साथ ही इसमें सुधार का दृष्टिकोण हो। समाज सुधार की कोशिशों के हवाले से आखिरी बात ये होनी चाहिए कि उनका विषय क्या हो? क्योंकि इसमें विचार बहुत अलग अलग हैं। इस वक्त कुछ समाजिक बुराईयों पर ध्यान देने का रुझान है, जैसे महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन, तलाक का गलत इस्तेमाल, विरासत से उसको महरूम रखना, जहेज़ का लेनदेन या मुशरिकाना रस्म व रिवाज से समाज को पाक करने की कोशिश वगैरह। ये सारे काम अहम होते हुए भी बहुत से दूसरे मामलों के मुकाबले में कम अहम हैं।

 मुस्लिम समाज की बुराईयों को दूर करने और उसको तरक्की की राह पर ले जाने के लिए सबसे पहली चीज़ ये है कि आम और खास मुसलमानों में अपनी आलोचना करने का स्वाभाव पैदा किया जाये। सामूहिक रूप से मुसलमानों के अंदर इसकी कमी पायी जाती है। इस कमज़ोरी ने हक़ीक़त पसंदी की तमाम राहों को उनके सामने बंद कर दिया हैं। बहुत सी सामाजिक बुराईयों के मामले में मुस्लिम समाज अन्य समाजों की अपेक्षा ज्यादा खराब स्थिति में हैं। अमानत, सच्चाई, सफाई, अच्छा व्यवहार, पड़ोसियों के साथ बर्ताव, इंसानी बुनियादों पर दूसरों के काम आना, दूसरों के मज़हबी जज़्बात का खयाल रखना, जनसेवा जैसे बहुत से मामलों में  मुसलमान दूसरों से बहुत ज़्यादा पिछड़े हुए हैं। पाकिस्तान के एक लेखक की ये बात काबिले ग़ौर है। इस्लाम का वैश्विक न्याय जिस पर खिलाफते ऱाशिदा ने अमल किया था, दूर की बात है, हम उन शिक्षाओं पर आज तक अमल न कर सके जिन पर इस्लाम के न मानने वाले भी सदियों से अमल कर रहे हैं। (मज़ूरुल हसनः माहनामा इशराक़, लाहौर,1 अक्तूबर 2002)

ऐसे लगता है कि हमारे समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक नैतिकता का ढांचा सिरे से ही मौजूद नहीं है। जहाँ तक मज़हब का मामला है, हक़ीक़त ये है कि कुछ नज़र आने वाले अमल को ही मज़हबी तकाज़ा मान लिया गया है। किसी व्यक्ति का नैतिक सुधार व निर्माण बुनियादी काम है जिसके बगैर समाज के सुधार की कोई योजना सफल नहीं हो सकती है। इसलिए सुधार पर मेहनत की ज़रूरत है। और हक़ीक़त ये है कि दीनी मदरसों के शिक्षक इसमें अहम रोल अदा कर सकते हैं, लेकिन शर्त ये है कि वो इस बात के मानने वाले हों कि उनकी दीनी और सामाजिक ज़िम्मेदारियों का दायरा सिर्फ मदरसा की चार दीवारी तक सीमित ना हो।

स्रोतः हमारा समाज, नई दिल्ली

URL for English and Urdu article:  http://www.newageislam.com/urdu-section/دینی-مدارس-کے-اساتذہ-کا-سماجی-رول/d/3948

URL: https://newageislam.com/hindi-section/social-role-of-teachers-in-the-religious-madrasas--दीनी-मदरसों-के-शिक्षकों-की-सामाजिक-भूमिका/d/5514


Loading..

Loading..