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Hindi Section ( 19 Feb 2014, NewAgeIslam.Com)

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The Rights of Non-Muslims in Islam-Part -1 इस्लाम में गैरमुस्लिमों के अधिकार- पहला भाग

 

 

 

 

 

वायल सलीम

18 जून, 2013

हमने तुम्हें सारे संसार के लिए बस एक सर्वथा दयालुता बनाकर भेजा है (21: 107)

जब कोई व्यक्ति खुले दिमाग के साथ इस्लाम के क़ानून को समझता है तो उसको इस आयत में बतायी गयी रहमत निश्चित रूप से स्पष्ट हो जाती है। इस रहमत के स्पष्ट होने का एक पहलू इस्लाम के वो कानून हैं जिनका सम्बंध दूसरे धर्मों के मानने वालों के साथ है। अपने देशों में या मुस्लिम देशों में रहने वाले गैरमुस्लिमों के प्रति सहिष्णु व्यवहार को स्पष्ट रूप से इस्लामी इतिहास के सही अध्ययन से समझा जा सकता है। इस हक़ीकत का इज़हार न सिर्फ मुसलमानों द्वारा किया गया है बल्कि कई गैरमुस्लिम इतिहासकारों के द्वारा भी किया गया है।

पैट्रियार्क गेथो (Patriarch Ghaytho) नाम के एक ईसाई इतिहासकार ने गैरमुस्लिमों के प्रति इस्लाम धर्म के नज़रिए का विश्लेषण करते हुए लिखा है:

''अरब लोग जिन्हें खुदा ने दुनिया पर नियंत्रण दिया है वो हमारे साथ कैसा व्यवहार करते हैं, आप सभी जानते हैं, वो ईसाईयों के दुश्मन नहीं हैं। दरअसल, वो हमारे समुदाय की तारीफ करते हैं, और हमारे पादरी और संतों के साथ सम्मान से पेश आते हैं, और चर्चों और मठों की सहायता करते हैं।"

अमेरिकी लेखक, इतिहासकार और दार्शनिक विल ड्यूरॉन्ट ने लिखा है:

"उमवी खलीफा के ज़माने में, ईसाइयों और यहूदियों ने ऐसी सहिष्णुता का आनंद लिया है जिसे आज हम ईसाई देशों में भी नहीं पाते हैं।। वो अपने धर्म के संस्कारों का पालन करने के लिए आज़ाद थे और उनके चर्च और मंदिर सुरक्षित थे। उनको स्वायत्तता हासिल थी जबकि वो विद्वानों और जजों के बनाये धार्मिक नियमों के अधीन थे।"

सऊदी अरब के इस्लामी मामलों की सुप्रीम काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी डॉ. सालेह अलआयेद के अनुसार, मुस्लिम और दूसरे धर्मों के लोगों के बीच न्यायपूर्ण और व्यापक सम्बंध सिर्फ मुस्लिम शासकों के द्वारा की जाने वाली राजनीति के कारण नहीं था बल्कि ये इस्लाम धर्म शिक्षाओं का परिणाम था जो इस बात की शिक्षा देता है कि दूसरे धर्मों के लोग अपने धर्म का पालन करने के लिए आज़ाद हैं और केवल अपनी मर्ज़ी से ही वो इस्लाम धर्म के मार्गदर्शन को स्वीकार कर सकते हैं।

खुदा क़ुरान में फरमाता हैः

धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं (2: 256)

न केवल ये कि इस्लाम धर्म पालन के लिए उनकी आज़ादी की मांग करता है, बल्कि उनके साथ दूसरे इंसानों की तरह ही न्यायोचित व्यवहार करता है। सबसे बढ़कर इस्लाम गैरमुस्लिमों के साथ किसी भी तरह के बुरे व्यवहार से मना करता है। अल्लाह के रसूल जो इस धरती पर आखरी नबी हैं, ने फरमाया:

"खबरदार! जो गैरमुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करता है, उनके लिए मुश्किलें पैदा करता है, और उनके अधिकारों का हनन करता है, उन पर उनकी क्षमता से ज़्यादा बोझ डालता है, उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ उनसे कुछ लेता है तो मैं (नबी  मोहम्मद 'सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम') क़यामत के दिन उस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत करूँगा।"

इस्लामी शरीयत जो कि इस्लाम का कानूनी और नैतिक सिद्धांत है, वो खुद को सिर्फ मुसलमानों को अधिकार प्रदान करने तक ही सीमित नहीं करती। इसकी विशेषताओं में से एक ये है कि गैरमुस्लिम इनमें से कई अधिकारों और दायित्वों का आनंद लेते है। मज़हब का ये पहलू इस्लाम की ही विशेषता है, और शायद ये दुनिया के किसी भी दूसरे धर्म को हासिल नहीं है। मिसाल के तौर पर अगर हम ईसाई मज़हब पर नज़र डालें तो टोरंटो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोसेफ़ हीथ कहते हैं कि, ये कहने की ज़रुरत नहीं है कि आप पूरी बाइबल को खंगाल लें लेकिन आपको कहीं भी "अधिकार" का एक शब्द भी नहीं मिलेगा। बिना किसी अधिकार को पाये आप पिछले 1,500 बरसों के ईसाई विचारों को भी तलाश कर सकते हैं। क्योंकि ये विचार ही पूरी तरह अनुपस्थित है।

इस्लाम इस बात पर ज़ोर देता है कि पूरी मानवता का मूल एक ही है, इसलिए सभी इंसानों के एक दूसरे के ऊपर कुछ अधिकार हैं।

खुदा फरमाता है, ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वो है, जो तुममे सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है (49: 13)

अरब के इतिहास में सबसे बड़ी सभा को अपने आखरी संबोधन में पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म ने फरमाया:

"ऐ लोगो सुनो! अल्लाह एक है और तुम सब एक ही पिता की संतान हो। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि किसी अरब को किसी भी गैरअरब के ऊपर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है, किसी गैरअरब को किसी अरब के ऊपर भी कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है और न किसी गोरे को किसी काले पर और न ही किसी काले को किसी गोरे पर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है लेकिन श्रेष्ठता का स्तर केवल तक़वा (परहेज़गारी) है। क्या मैंने तुम लोगों तक संदेश पहुंचा दिया?"

गैरमुस्लिमों की मानव गरिमा के संरक्षण की एक मिसाल उनका ये अधिकार है कि उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाए।

और किताब वालों से बस उत्तम रीति ही से वाद-विवाद करो- रहे वो लोग जो उनमें ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है- और कहो- "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो अवतरित हुई और तुम्हारी ओर भी अवतरित हुई। और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी है।" (29: 46)

गैर मुसलमानों को इस बात का अधिकार है कि उनके धार्मिक विश्वासों का मज़ाक़ न उड़ाया जाए। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दूसरे धर्मों के लोगों के साथ इस्लाम जितना न्याय संगत है उतना इस दुनिया में कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है।

अल्लाह ने गैरमुस्लिमों के खुदाओं और देवताओं के बारे में बुरा बोलने से मुसलमानों को रोक दिया है ताकि वो एक सच्चे खुदा के बारे में बुरी बात न कहें। दुनिया भर के प्रमुख धर्मों की किसी भी किताब में इस तरह की मिसाल मिल पाना मुश्किल है। अगर बहुदेववादी मुसलमानों से अपने देवताओं के बारे में बुरी बातें सुनेंगे तो हो सकता है कि इस वजह से वो भी अल्लाह की शान में बुरी बात करें। अगर मुसलमान मूर्तिपूजा करने वालों के देवताओं के बारे में बुरी बात करते तो हो सकता है कि वो मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचा कर अपनी चोटिल भावनाओं को शांत करने का प्रयास करते। इस तरह के हालात दोनों पक्षों की मानव गरिमा के खिलाफ है और ये आपसी अस्वीकृति और नफरत को ही जन्म दे सकता है। खुदा कुरान में फरमाता है:

अल्लाह के सिवा जिन्हें ये पुकारते है, तुम उनके प्रति अपशब्द का प्रयोग न करो। ऐसा न हो कि वे हद से आगे बढ़कर अज्ञान वश अल्लाह के प्रति अपशब्द का प्रयोग करने लगें। इसी प्रकार हमने हर गिरोह के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है। फिर उन्हें अपने रब की ही ओर लौटना है। उस समय वह उन्हें बता देगा, जो कुछ वे करते रहे होंगे (6:  108)

स्रोतः http://213.158.162.45/~egyptian/index.php?action=news&id=29269&title=The%20rights%20of%20non-Muslims%20in%20Islam%20 (part%20I)

URL for English article:

http://newageislam.com/islamic-ideology/wael-salem/the-rights-of-non-muslims-in-islam-(part-i)/d/12256

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http://www.newageislam.com/urdu-section/wael-salem,-tr-new-age-islam/the-rights-of-non-muslims-in-islam-part--1--اسلام-میں-غیر-مسلموں-کے-حقوق۔-قسط-۔-اوّل/d/12425

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