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Hindi Section ( 2 Sept 2014, NewAgeIslam.Com)

Islam and Humanity- Part- 2 इस्लाम और मानव-समाज- भाग- 2

 

सैयद मुहम्मद इक़बाल

धर्मगुरु और धार्मिक शिक्षाएँ

धर्म का इतिहास और आज संसार में पाये जाने वाले धर्मों के अध्ययन से भी इस बात की पुष्टि होती है कि धर्म शुरु से एक ही था। धार्मिक शिक्षाओं में आज भी बड़ी समानता है। मूल नैतिक शिक्षाएँ तो बहुत मिलती-जुलती हैं। बड़ी-बड़ी भलाइयाँ जिन्हें करने का हुक्म दिया गया है और बड़ी – बड़ी बुराइयां जिनसे रुकने के लिए कहा गया है एक ही सी हैं। यह विश्वास करने का ऐसा मज़बूत आधार है कि आरम्भ में धर्म का स्वरुप एक ही रहा होगा।

ईशदूतों और सच्चे धर्मगुरुओं ने एक ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और ईश्वरीय नियमों के अनुसार जीवन बिताने का आह्रवान किया। परन्तु यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि लोगों ने अपने अन्धविश्वास में ईशदूतों और धर्मगुरुओं की ही पुजा शुरु कर दी और उन्हें ही ईश्वर का स्थान दे दिया, उन से मदद मांगने लगे। अपने धर्म का नाम भी धर्मगुरु के नाम पर रख लिया, हालांकि तमाम ईशदूतों द्वारा लाये गये धर्म का नाम भी एक ही था इस्लाम। हज़रत ईसा के अनुयायियों ने उन्हें ईश्वर का बेटा घोषित कर दिया, जब कि हज़रत ईसा ने भी अन्य ईशदूदों की तरह एक ईश्वर की उपासना सिखाई थी। इन लोगों ने अपने धर्म का नाम ईसा (CHRIST) रख लिया। धर्मगुरुओं के नाम पर धर्मों के नामकरण का उदाहरण विश्व के बड़े बड़े धर्म स्वयं ही हैं। जैसेः-BUDHISM, JAINISM, ZOAROSTERMISM इत्यादि। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मानने वाले अपना धर्म इस्लाम ही मानते हैं ‘MOHAMMADANISM’ नहीं, हांलाकि यूरोप ने यह नाम फैलाने का हर सम्भव प्रयास किया।

अब ज़रा विभिन्न धर्मों की धार्मिक शिक्षाओं पर एक नज़र डालें। इस्लाम ने सिखायाः-

सच बोलो और सच के गवाह बनो।

किसी को न सताओ, कमज़ोरों की मदद करो।

किसी इन्सान का ख़ून न बहाओ।

सारे इंसान आपस में भाई-भाई हैं।

न्याय क़ायम करो। इत्यादि।

जोरोस्टर ने कहा-

ईश्वर एक है, जो सर्वशक्तिमान है।

मनुष्य अपने कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक में जायेगा।

सच्चाई की हमेशा जीत होती है।

जैन मत के पाँच मौलिख बातें ये हैं-

सदा सच बोलो।

लालच से बचो।

चोरी न करो।

किसी जीव को न सतओ।

अपनी इच्छा को मार कर जीवन बिताओ।

इसी प्रकार बैद्ध धर्म से सच्ची सेवा, सच्चा ज्ञान, सच्चे विचार, सच्ची भावना की शिक्षा बहुत उभरी हुई है।

वेदों में इस तरह की शिक्षाएं मिलती हैं-

सब लोग एक ही परिवार हैं।

सैकड़ों हाथों से जमा करो और हज़ारों हाथों से बांट दो।

प्रशंसा और नमस्कार योग्य एक ही है।

अच्छे विचारों को हर ओर से आने दो।

क़ुरआन और हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)

क़ुरआन साधारणतः मुलसमानों की धार्मिक किताब के रुप में जानी जाती है। वास्तव में यह पूरी मानव-जाति के लिए उसके मालिक का भेजा हुआ संदेश है। यह ईश्वरीय किताबों का अंतिम और पूर्ण संस्करण है। क़ुरआन के बाद कोई ईश्वरीय किताब दुनिया में कहीं नहीं पायी जाती। यह किताब मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए आयी है और जीवन के ही पहलू में रास्ता दिखाती है। यह किताब संसार के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है, उसे जीवन बिताने का तरीक़ा सिखाती है, उसे उसके कर्तव्यों की याद दिलाती है, उसे अच्छे कामों के फ़यदे बताती और बुरे कामों के दुष्परिणामों से डराती है।

यह किताब हमारे पास उसी तरह अक्षरशः उपलब्ध है जिस तरह हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर अवतरित हुई थी। हमारे पास पहली इस्लामी शताब्दी से आज तक की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध है, जो एक दूसरे को प्रमाणित और पुष्टी करती हैं। क़ुरआन दुनिया की एक मात्र ऐसी किताब है, जिसे हर ज़माने में हज़रों लोगों ने पूरा-पूरा कंठस्थ रखा है। पूरा क़ुरआन कंठस्थ करने वाले को हाफिज़ कहते हैं। यह हाफिज़ हर वर्ष रमज़ान के महीने की रात को नमाज़ में पूरा क़ुरआन पढ़रते हैं। इस तरह पूरी दुनिया की लाखों मस्जिदों में पूरा क़ुरआन दोहराया जाता है।

इस किताब की एक और विशेषता भी है। यह किताब एक बार लिख कर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नहीं दी गई थी, बल्कि पैग़म्बर के रुप में उन के 23 वर्षीय जीवन में थोड़ा-थोड़ा अवतरित होती रही। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) द्वारा इस्लाम की स्थापना के प्रयास से जुड़ा था अवतरण का यह सिलसिला।

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)

जिस तरह क़ुरआन मुसलमानों की किताब समझी जाती है, उसी तरह हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मुसलमानों का पैग़म्बर समझा जाता है। वास्तव में यह बात भी सही नहीं है। अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सारी मानवता के लिए अपना दूत बना कर भेजा।

सारे धर्म गुरुओं में हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का जीवन ही सब से अधिक विस्तार और विश्वसनीय के साथ हमें उपलब्ध है – उनका जीवन भी और उनकी शिक्षाएं भी। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का जन्म इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर हुआ जब संस्कृति का उजाला फैल चुका था और मानवता अपने आधुनिक युग में प्रवेश कर रही थी।

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का जन्म मक्का में हुआ, जो एक छोटा-सा शहर था। आपने जन्म लिया तो परिस्थितियाँ पूर्णतः विपरित थीं। बाप की मृत्यु जन्म से पहले ही हो गई। माता की ममता भी अधिक दिनों तक साथ न दे सकी। कोई बड़ा भाई न था। चाचा अबू तालिब का एक छोटा-सा सहारा था। आर्थिक स्थिति भी ख़राब थी। इसीलिए आपको बकरियाँ चरानी पड़ीँ और दूसरों की व्यपार सामग्री लेकर निकलना पड़ा। आपके पास सब से बड़ी दौलत तरित्र की थी, जिसकी ख़ुशबू पूरा मक्का महसूस करता था। आपको अमानतदार के नाम से याद किया जाता। लोग अपनी क़ीमती चीज़े उनके पास रख कर सुरक्षित समझते। लोग आप पर विश्वास करते, आप की बात मानते। यदि कोई झगड़ा होता और किसी तरह समाप्त होता नज़र न आता तो लोग आपको पंच मान लेते और आप के निर्णय को स्वीकार कर लेते।

जब आप की उम्र चालीस साल की हुई तो अल्लाह ने आपको अपना रसूल (ईशदूत) घोषित किया और आपके पास क़ुरआन के अंश आने लगे। अल्लाह का संदेश लेकर वह लोगों के पास गए। उन से कहा कि वे केवल एक अल्लाह की उपासना करें और मूर्तिपूजा छोड़ दें। उनसे कहा कि सच बोले, न्याय करो, किसी का माल हड़प न कर लो, सारे इंसान एक माँ – बाप की संतान हैं, उनमें कोई भेदभाव नहीं है। इन बातों को सुनकर मक्का के लोग बिगड़ गये,बल्कि आप के दुश्मन हो गए। उन्हें सताया, यहाँ तक कि उन्हें जान से मार देने की योजना बना ली। ऐसे में हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का छोड़ने का फैसला कर लिया। मदीना के लोगों ने उनका साथ देने की शपथ ली और अपने शहर में उन्हें जगह दी। कुछ वर्षों में यहां एक आदर्श इस्लामी समाज स्थापित हो गया। मक्का के लोग यहाँ भी लड़ने के लिए आए, पर पराजित हो कर लौट गए, यहाँ तक कि हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और उनके साथियों का मक्का पर अधिकार हो गया। इस्लामी राज्य हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बाद भी फैलता रहा। राज्य ही नहीं, आपकी शिक्षाएं और क़ुरआन सुदूर पूर्व तक फैल गया।

इस्लाम और उसका अर्थ

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के द्वारा इस्लाम हम तक पहुंचा है।इस्लाम अरबी भाषा का शब्द है, जिसका एक अर्थ है आज्ञापालन और दूसरा शांति। मुस्लिम आज्ञाकारी को कहते हैं – अर्थात अल्लाह का आज्ञाकारी, उसका आदेश मानने वाला, उसके आगे सिर झुका देने वाला। अल्लाह ने जितने पैग़म्बर भेजे उन सब ने ऐकेश्वरवाद का पाठ पढ़ाया। किसी ने अपनी उपासना का हुक्म नहीं दिया, किसी ने खुद को ईश्वर या उसका रुप नहीं कहा। यह बात बड़ी विचित्र रही है कि अधिकतर लोगों ने अपने पैग़म्बरों को झुठलाया, उनकी बात न मानी, बल्कि उन्हें सताया, यातनाएं दीं और जब उनकी मृत्यु  हो गई तो उन्हें पूज्य घोषित कर दिया, उनकी मूर्तियाँ बनाने लगे और उसी से सहायता मांगने लगे। वास्तव में सारे पैग़म्बरों का धर्म एक ही था इस्लाम। सब का परम उद्देश्य ईश्वर का आज्ञाकारी बनाना था यह भी उल्लेखनीय है कि इस पूरे संसार का धर्म भी इस्लाम ही है। ज़मीन, सूर्य, पहाड़, हवा, पेड़-पौधे, बादल, चांद, तारे, सब उस नियम का पालन कर रहे हैं, जिस का बनाने वाले ने उन्हें पाबन्द कर दिया है।

मौलिक आस्थाएं

इस्लामी आस्था के तीन मौलिक तत्व हैं, जिन्हें मान कर आज्ञाकारी जीवन का आरम्भ होता है और जिन में से किसी के इंकार से एक व्यक्ति मुस्लिम बाक़ी नहीं रह जाता।

पहला एक ईश्वर पर ईमान- उस ईश्वर पर जो संसार का बनाने वाला, उसका मालिक और हाकिम है, जिसके हाथ में जीवन और मृत्यु है, जो अपनी पूरी सृष्टि पर पूरी नजर रखे हुए है और तमाम जीवों के भोजन का प्रबन्ध करने वाला है, जो अपने बन्दों की पुकार को सुनता है और उसका जवाब देता है जो सर्वशक्तिमान  है और मनुष्य के लिए क़ानून बनाने का अधिकार केवल उसे ही है और यह की वह अपने गुण और अधिकार हस्तांतरित नहीं करता।

दूसरा ईशदूतों (पैग़म्बरों) पर ईमान-यह विश्वास कि अल्लाह ने हर युग में और हर इंसानी आबादी में अपने पैग़म्बर भेजे, जो उस के आदेशों को पहुचाते और जीवन बिताने का सही ढंग सिखायाते। यह सिलसिला हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर समाप्त कर दिया गया। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अंतिम पैग़म्बर होने की बात कुछ लोगों के लिए प्रश्नचिन्ह बन जाती है। अब पैग़म्बर क्यों नहीं आयेंगे? जवाब आसान है। यदि हम यह जान लें कि पैग़म्बर आते क्यों थे? पैग़म्बर के आने का एक कारण तो यह होता कि किसी विशेष क्षेत्र में अल्लाह का पैग़ाम न पहुंचा हो, दूसरा यह कि पिछले पैग़म्बर की लाई हुई शिक्षा मिट गई हो और तीसरा यह कि अभी अल्लाह की और हिदायतों और आदेशों की जरुरत बाक़ी रह गई हो। जब ये ज़रुरतें पूरी हो गईं तो फिर यह सिलसिला बन्द कर देना ही मुनासिब था। अल्लाह की किताब और हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की जीवनी और शिक्षा हमारे पास सुरक्षित है। ये दोनों चीज़ें पूरी दुनिया में फैल चुकी हैं, केवल अरब देश तक सीमित नहीं है, और तीसरे यह कि जो जरुरी आदेश इन्सानों को देने थे वे भी पूरे कर दिये और यह घोषणा, क़ुरआन के शब्दों में, कर दी गई – आज मैंने तुम्हारे दीन को तुम्हारो लिए पूर्ण कर दिया।

तीसरा, आख़िरत पर विश्वास-इन में हमारा जीवन नश्वर है।हम यहाँ सदा के लिए नहीं आए हैं। हमें यहाँ से लौटना है। इस जीवन के बाद एक और जीवन है, जो हमेंशा रहने वाला है। यह दुनिया एक परीक्षा-स्थन है। इसके बाद वाले जीवन में हमें अपने कर्मों का हिसाब देना होगा। हमारा वर्तमान संसार भी ईश्वर है, एक दिन यह ख़त्म हो जायेगा। सारे इंसानों को फिर से उठाया जायेगा और उन से उन के किये का हिसाब लिया जायेगा, जिन लोगों ने अच्छे कर्म किये होंगे, उन्हें स्वर्ग का आराम मिलेगा और  जिन लोगों ने ईश्वरीय आदेशों के विपरीत जीवन बिताया होगा, वे सज़ा के घर जहन्नम में डाले जायेंगें।

इन तीन सच्चाइयों को मानने का ही दूसरा नाम इस्लाम स्वीकार करना है। इन बातों को मानना और न मानना बराबर नहीं है। इनको मानने और न मानने से जीवन के दो पूर्णतः भिन्न दृष्टिकोण उभरते हैं और उन पर चलने के परिणाम भी सर्वथा भिन्न होते हैं। ये तीनों आस्थाएं जीवन को एक विशेष दिशा और विश्वासनीयता प्रदान करती हैं, एक उत्तरदायी मनुष्य बनाती हैं। उसके चरित्र को उज्जवल बनाती और उसके दिल को शांति प्रदान करती हैं।

इबादत

उपर्युक्त तीनों सच्चाइयों को दिल से मान लेने के बाद आज्ञापालन शुरु होता है। आम तौर से लोग पूजा-पाठ ही को इबादत समझते या कहते हैं। जैसे नमाज़ एक इबादत है। परन्तु इबादत का इस्लामी अर्थ इतना सीमित नहीं है। अल्लाह की इबादत केवल मस्जिद में ही नहीं होती और किसी विशेष समय ही नहीं होती, बल्कि चौबिसों घण्टे होती है और हर जगह करनी पड़ती है।

इबादतों में चार इबादतें सासूहिक होने के नाते विशेष महत्व रखती हैं। रोज़ा, हज, ज़कात। नमाज़ हर रोज़ पाँच बार अदा की जाती है। रोज़ा हर साल एक महीना रखा जाता है, जिस के लिए रमज़ान का महीना तय है। तीसरी इबादत ज़कात है। यह एक माली (आर्थिक) इबादत है और मालदारों से सम्बन्धित है। साल भर के ख़र्च के बाद जिन लोगों के पास जमा होते है, उसका ढ़ाई प्रतिशत निकाल कर सामूहिक रुप से ग़रीब पीड़ित, बेसहारा, क़ैदी इत्यादी पर ख़र्च करना ज़कात है। जिन लोगों के पास साढ़े सात तोले से अधिक सोना हो, उन्हें भी ज़कात देनी पड़ती है। हज़ जीवन में एक बार अनिवार्य है। अगर मक्का का सामर्थ्य हो और सुरक्षित मात्रा संभव हो।

इस्लाम हमें सिखाता है कि हमारा पूरा जीवन अल्लाह की इबादत में गुज़रना चाहिए। अल्लाह की मर्ज़ी के अनूसार किया जाने वाला हर काम इबादत है। सच बोलना, झूठ से बचना, माता-पिता कि सेवा करना, पड़ोसी का ख्याल रखना, इंसानों के काम आना, न्याय क़ायम करना, बुराइयों को मिटाना, रास्ते से पत्थर और कांटे को हटाना भी इबादत है। जिस प्रकार नमाज़ अदा करके या रोज़ा रख कर एक व्यक्ति अल्लाह को खुश करता और पुण्य का हक़दार होता है, उसी तरह दूसरी इबादतों से अल्लाह की खुशी और पुण्य प्राप्त होता है।

URL:  http://newageislam.com/hindi-section/syed-muhammad-iqbal/islam-and-humanity--part--2--इस्लाम-और-मानव-समाज--भाग--2/d/98864

 

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