New Age Islam
Sun Jan 17 2021, 08:42 PM

Loading..

Hindi Section ( 17 Oct 2013, NewAgeIslam.Com)

Philanthropy in Islam इस्लाम में समाज सेवा

 

सैय्यद इमादुद्दीन असद

24 फरवरी, 2012

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

समाज सेवा, सरल शब्दों में मानव जाति के कल्याण के लिए किए गए कामों की तरफ इशारा करता है। हर धर्म में समाज सेवा के तत्व पाए जाते हैं। इस्लाम इसका अपवाद नहीं है। वास्तव में इस्लामी आदेश दान के काम को अनिवार्य बताते हैं।

हालांकि, पश्चिम में बहुत से लोगों के लिए, समाज सेवा की कल्पना ऐसी कोई विशेषता नहीं है जिसका इस्लाम के साथ जुड़े होने की संभावना है। दया, सहानुभूति, करुणा, उदारता और लोगों से प्रेम के बजाय पश्चिमी देशों के आम लोग हिंसा, आतंकवाद, असहिष्णुता, अधिनायकवाद, और महिलाओं के उत्पीड़न और हिंसा आदि जैसी विशेषताओं से इस्लाम को जोड़ते हैं। इस गंभीर गलतफहमी के दो कारण हैं: कुरान और रसुलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की परंपराओं से उनकी अनभिज्ञता और कुछ मुसलमानों का गैर-ज़िम्मेदारी भरा रवैय्या। दरअसल इस्लामी ग्रंथों में अच्छे कामों को करने  और अपने साथी मनुष्यों की सेवा करने के अनगिनत आदेश हैं।

कुरान कहता है: "बल्कि असल नेकी तो ये है कि कोई शख्स ......... अल्लाह की मोहब्बत में (अपना) माल नातेदारों पर और अनाथों पर और मोहताजों पर और मुसाफिरों पर और मांगने वालों पर (गुलामों की) गर्दनें (आज़ाद कराने) में खर्च करें" (2­: 177)"बस आप नातेदारों को उसका हक़ अदा करते रहें और मोहताज और मुसाफिर को (उनका हक़), ये उन लोगों के लिए बेहतर है जो अल्लाह की खुशी चाहते हैं।" (30: 38)

इसी तरह समाज सेवा के महत्व को बताते हुए नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के कई कथन हैं, "तुम उस वक्त  तक जन्नत में दाखिल नहीं हो सकते जब तक भरोसा हासिल न कर लो और तब तक तुम भरोसा हासिल नहीं कर सकते जब तक एक दूसरे से मोहब्बत न करो। तुम उन लोगों पर रहम (दया) करो जो ज़मीन पर हैं, तो तुम पर उसके द्वारा रहम किया जाएगा जो आसमान पर है। खुदा उस पर रहम नहीं करता जो सभी मानव जाति के साथ हमदर्दी नहीं रखता।"

"दो लोगों के बीच इंसाफ करना सदक़ा (दान) है, और अपने जानवरों और सामान से किसी व्यक्ति को सहारा देना सदक़ा है, और साफ शब्दों में जिसके लिए ईनाम हैं और किसी सवाल करने (मांगने) वाले को जवाब नरमी के साथ देना सदक़ा है, और हर वो कदम जो नमाज़ की तरफ बढ़ाया जाए सदक़ा है और ऐसे पत्थरों और कांटों को रास्ते से हटाना जो इंसान के लिए तकलीफ देने वाला हो सकता है।"

इस्लाम में सामज सेवा के दो प्रकार हैं- अनिवार्य और स्वैच्छिक। अनिवार्य समाज सेवा में ज़कात और ज़कातुल फितरा या फितराना शामिल है जबकि स्वैच्छिक समाज सेवा में सदक़ा तथा वक्फ शामिल है।

ज़कात किसी व्यक्ति की संपत्ति का वो हिस्सा है जो लाभार्थियों की निश्चित श्रेणियों को देना एक मुस्लिम के लिए अनिवार्य है, अगर उस व्यक्ति की संपत्ति की कीमत एक निश्चित सीमा से अधिक है। ज़कात के लाभार्थियों का कुरान में ज़िक्र है: "सदक़े तो बस ग़रीबों, मोहताजों और उन लोगों के लिए है, जो काम पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना औऱ परचाना अभीष्ट हो और गर्दनों को छुड़ाने और क़र्ज़दारों और तावान भरने वालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है।"(9: 60)

एक इस्लामी राज्य में ज़कात की वसूली और उसकी व्यवस्था को देखना सरकार की ज़िम्मेदारी है। ज़कातुल फितर या फितराना वो सदक़ा है जिसका अदा करना हर उस मुसलमान पर रमज़ान के अंत में अनिवार्य है जिसके पास एक निश्चित रक़म हो। ज़कातुल फितर हर मुसलमान पर न केवल उसकी तरफ से अनिवार्य है बल्कि उनकी तरफ से भी अनिवार्य है जिनका वो मालिक है।

सदक़ा सिर्फ पैसे या खाने के रूप में नहीं होता बल्कि सदक़ा हर उस अमल में भी शामिल है जो साथी इंसानों के लिए उपयोगी हो। नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि, "भलाई और का हर काम सदक़ा है" और "सदक़ा हर मुसलमान पर अनिवार्य है।" अगर वो नहीं दे सकता क्योंकि उसके पास नहीं है तो उसे काम करने दें ताकि वो खुद की मदद कर सके और सदक़ा दे सके, अगर वो काम करने में असमर्थ है तो फिर उसे किसी ऐसे की मदद करने दें जिसे उसकी मदद कि ज़रूरत है, अगर वो ऐसा नहीं कर सकता तो उसे अच्छाई से जुड़ने दें, अगर वो ऐसा नहीं कर सकता तो उसे कोई बुराई या दूसरों का नुक़सान नहीं करना चाहिए, ये उसके लिए एक सदक़े के रूप में लिखा जाएगा।"

वक्फ एक मुसलमान के द्वारा किसी भी संपत्ति का किसी ऐसे उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से वक्फ करना है जो इस्लामी कानून के ज़रिए धार्मिक, दीनदारी या खैराती तौर पर मान्यता प्राप्त हो। वक्फ चीजों कि संपत्ति का ऐसा हस्तांतरण का कारण है कि खुदा की नज़र हो। लेकिन जैसा कि खुदा किसी संपत्ति का उपयोग करने या उससे आनंद लेने से ऊपर है, इसका लाभ इंसानों के फायदे के लिए है और उनके लिए वक्फ है।

कोई भी संपत्ति वक्फ की जा सकती है। वक्फ का औचित्य हमेशा के लाभ की संभावना के द्वारा साबित है जो इससे ऐसे किसी भी तरीके से प्राप्त किया जाए जिसकी वो क्षमता रखता हो, या उसे किसी और चीज़ में तब्दील करके। फर्क उस वक्त पड़ता है जब उसे फायदेमंद इस्तेमाल में तब्दील करना बिल्कुल अनुचित हो और वो नज़राना खराब हो जाता है।

वक्फ के इस्लामी संस्थाओं में अंग्रेजी कानून के ट्रस्ट से कहीं अधिक व्यापक गुंजाइश और उद्देश्य हैं। वो संस्थाएं इस्लामी देशों में इतने लोकप्रिय और महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उनमें से ज्यादातर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के साथ निपटने के लिए एक विशेष मंत्रालय की स्थापना की गई थी।

इस्लाम गरीबों के समर्थन पर बहुत ज़ोर देता है। कुरान और सुन्नत स्पष्ट शब्दों में समाज के वंचित वर्गों की देखभाल की ज़िम्मेदारी मालदारों के सुपुर्द करता है। मुसलमानों को सिर्फ अपने साथी इंसानों के लिए ही भलाई करने का ही निर्देश नहीं दिया गया है बल्कि उन्हें जानवरों के साथ अच्छी तरह से पेश आने और पर्यावरण संरक्षण का भी आदेश दिया गया है।

हालांकि दूसरे धर्म भी समाज सेवा की बात करते हैं और इसको प्रोत्साहित करते हैं लेकिन इस्लाम ज़कात के रूप में इसे अनिवार्य बनाकर और एक कदम आगे है। इस्लाम ने इस्लामी राज्यों को ये ज़िम्मेदारी सौंपी है कि वो ये सुनिश्चित करें कि लोग इस ज़िम्मेदारी को अंजाम दे रहे हैं। इसलिए ज़कात न देने वाला न सिर्फ़ ये कि खुदा की नाराज़गी को मोल ले रहा है बल्कि उसके खिलाफ राज्य के द्वारा भी कार्रवाई की जा सकती है। दूसरे शब्दों में समाज सेवा को एक कानूनी ज़िम्मेदारी भी बना दिया है।

सैय्यद इमादुद्दीन असद  हार्वर्ड लॉ स्कूल के ग्रेजुएट है और यूटीएम लाहौर के स्कूल ऑफ लॉ एंड पॉलिसी के डायरेक्टर हैं।

स्रोत: डॉन, कराची

URL for English article:

http://newageislam.com/islamic-ideology/syed-imad-ud-din-asad/philanthropy-in-islam/d/6712

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/syed-imad-ud-din-asad,-tr-new-age-isalam/philanthropy-in-islam-اسلام-میں-خدمت-خلق/d/13167

URL for this article:

http://www.newageislam.com/hindi-section/syed-imad-ud-din-asad,-tr-new-age-islam/philanthropy-in-islam-इस्लाम-में-समाज-सेवा/d/14034

 

Loading..

Loading..