सुल्तान शाहीन, संस्थापक-संपादक, न्यु एज इस्लाम
6 जून 2016
(अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद: वर्षा शर्मा)
भारतीय इस्लामी विद्वानों (उलेमा) ने इस्लामी राज्य की चुनौती पर मुकम्मल तौर पर चुप्पी साध रखी है। एक वर्ष पूर्व अपने खलीफा ही की तरह एक भारतीय जिहादी ने कहा था कि: “इस्लाम कभी भी अमन और शांति का मज़हब नही रहा है बल्कि इस्लाम एक मुस्तकिल अर्थात लगातार चलने वाली जंग का मज़हब रहा है और स्वयं हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना पूरा जीवन युद्ध (जंग) करते हुए बिताया है" ।
भारतीय उलेमा दाएश (आईएस) के इस साफ़ झूठ पर बिल्कुल खामोश रहे और उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर नही की। आईएस के इस दावे के विपरीत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपना पूरा जीवन सुलह अर्थात मेल-जोल से रहने और अमन व् शांति की तलाश में व्यतीत किया है। अपने एक इशारे पर 7,000 मेहनती सैनिकों की सेना इकट्ठा करने की क्षमता प्राप्त कर लेने के बाद भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़ाहिरी तौर पर मुसलमानों के लिए अपमानजनक शर्तों के साथ इन्साफ को अमन पर प्राथमिकता देते हुए मक्का वालों के साथ संधि (सुलह-ए-हुदैबिया) करने के लिए सहमत हो गये और आज जब तथाकथित इस्लामी राज्य के आतंकवादी इस्लाम को जंग व जिहाद का मज़हब कह रहे हैं तो सभी इस्लामी उलेमा ने इस पर चुप्पी साधी हुई है। उनकी ज़बान पर तो उस वक़्त भी ताले पड़े होते हैं जब दाएश (आईएस) इन उलेमा को कपटी (मुनाफिक) बताते है।
कुछ लोग कहेंगें कि हमारे मुस्लिम उलेमा पहले ही मुनासिब कदम उठा चुके हैं तो इन्हें ही हर फितने का जवाब क्यूँ देना चाहिए? क्या 1050 भारतीय विद्वानों ने एक ऐसे फतवे पर हस्ताक्षर नहीं किया जिसके में आईएस की गतिविधियों को इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ करार दिया गया है? इसमें कोई शक नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया है जैसा कि दुनिया भर के 120 उलेमा और यहां तक कि सऊदी अरब के ग्रैंड मुफ्ती ने भी ऐसा ही एक फतवा जारी किया था। लेकिन यहां सवाल यह है कि उनकी सारी कोशिशें पूरी तरह से अप्रभावी क्यों हैं? क्यों आईएस अब तक अपनी पार्टी में युवाओं को शामिल कर रहा है? 100 देशों से एक साल के भीतर 30,000 मुसलमान इस्लामी राज्य पहुँच चुके हैं।
इसका जवाब दाएश (आईएस) के खिलाफ जारी किये गये फतवों की प्रकृति में ही निहित है। भारतीय उलेमा का फ़तवा बुनियादी तौर पर एक-तरफ़ा है. यह फतवा कुरान मजीद की एक आयत पर निर्भर करता है, जोकि इस प्रकार है:
“इसी सबब से तो हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज्यादतियॉ करते रहे”। (5:32)
अन्य फतवों में भी कुरान से इसी तरह की दूसरी आयतों को नक़ल किया गया है। कुरान मजीद में कम से कम 124 ऐसी शुरूआती मक्की आयतें है जिनमें मुसीबत और उत्पीड़न के समय में शांति और धैर्य रखने की शिक्षा दी गयी है। इसलिए, यहाँ यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि इस्लाम की मूल किताब कुरान में शांति और बहुलवाद अर्थात एकता में अनेकता के पक्ष में इतनी बड़ी संख्या में सबूत मौजूद होने के बावजूद कैसे एक मुस्लिम विचारक खुलेआम आतंकवाद तथा असहिष्णुता का प्रचार कर सकता है और फिर पूरी दुनिया में इतनी बड़ी संख्या में मुसलमानों की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया भी हासिल कर सकता है? और इन सब परिस्थितियों में कैसे उलेमा पूरी तरह से चुप रह सकते हैं? कैसे आधुनिक ख्वारिज हमारे उलेमों को मुनाफिक कह सकते है जिनके लिए इस्लाम में जहन्नम (नरक) का सबसे निचला हिस्सा खास किया गया है, और वो कैसे हमारे उलेमा की किसी भी प्रतिक्रया का सामना किये बगैर बचकर निकल सकते है? यह वो सवाल हैं जिस पर हमारे उलेमा ध्यान देने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन क्या वे इसके लिए तैयार नहीं या वह इसके लायक ही नहीं हैं? मेरा यह मानना है कि न तो वह इसके लिए तैयार हैं और न ही उनके अंदर इतनी सलाहियत है। अगर वो इसके लिए तैयार होते भी हैं, तो इसके लिए उन्हें एक महान प्रयास की आवश्यकता होगी और तकरीबन पूरी इस्लामी शिक्षाओं का जाएज़ा लेने की आवश्कता होगी। उन्हें इमाम गजाली, इब्न ए तैमिया, मुजद्दिद अल्फेसानी, शैख़ सरहिन्दी, शाह वलीउल्लाह देहलवी, मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब, सैयद कुतुब और और अबुल आला मौदूदी जैसे विचारधारकों के साथ बहस करने की आवश्कता होगी। यह सभी प्रख्यात धर्मशास्त्री धार्मिक ज़हन रखने वाले मुस्लिम युवाओं को इस्लाम में पूजा, अलगाववाद, विद्वेष, असहिष्णुता और हत्या (सशस्त्र संघर्ष) के अर्थ में जिहाद की ज़िम्मेदारी का सन्देश देते हुए नज़र आते हैं। इमाम गज़ाली को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद इस्लाम की सही समझ रखनेवाला सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है उनका कहना है कि "मुसलमानों को हर साल कम से कम एक बार जिहाद पर जाना चाहिए"। यकीनन जिहाद से मुराद इस्लाम के प्रभुत्व की खातिर लड़ा जाने वाला जिहाद है। अठारवीं सदी के एक प्रमुख इस्लामी विद्वान, क़ुरान के शास्त्री और मुहद्दिस (हदीस के माहिर) शाह वलीउल्लाह देहलवी लिखते हैं: "अन्य सभी धर्मों में इस्लाम के प्रभुत्व (गल्बे) को स्थापित करना और किसी भी व्यक्ति को इस्लाम के वर्चस्व से बाहर न छोड़ना नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिम्मेदारी है, चाहे लोग स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार कर लें या ज़िल्लत व रुसवाई के बाद इसे स्वीकार करें"। आज कौन भारतीय विद्वान अल गजाली, इब्न तैमिया, अब्दुल वहाब और शाह वलीउल्लाह दहलवी से मतभेद (इख्तेलाफ़) करने की हिम्मत करेगा?
इस्लामी आतंकवादी विचारधारा कठोर मान्यताओं पर आधारित है और हमारे उलेमा उन्हें स्वीकार करते हैं:
जंग की अनुमति के बारे में बाद के ज़माने में नाज़िल होने वाली कुरान की मदनी आयतों ने इससे पहले मक्का में नाज़िल होने वाली उन तमाम कुरानी आयतों को मंसूख कर दिया है जिनमें धैर्य और दृढ़ता, अमन तथा शांति की शिक्षा दी गई है। हमारे उलेमा इन आयतों को रद्द करने के इस झूठे सिद्धांत से सहमत नहीं हैं। वह स्पष्ट रूप से यह नहीं कह सकते कि इस्लाम के शुरूआती दौर में नाज़िल होने वाली मक्की आयतें इस्लाम के बुनियादी नियमों पर आधारित हैं और न तो वह यह कह सकते हैं कि मदनी आयतें रद्द (मंसूख) हुई हैं और न ही इन्हें रद्द (मंसूख) किया जा सकता है। और ये कि युद्ध के समय नाज़िल होने वाली आयतें उस ज़माने के लिए ही खास थीं और अब उनका इस्तेमाल हमारे लिए नही होता। इन्हें मुनाफिक कहने वाले सल्फी और आधुनिक ख्वारिज हैं। दूसरी बातों के अलावा निर्दोष लोगों की हत्या के अर्थ में आतंकवाद एक अन्य हदीस के आधार पर जाईज़ है। रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का के दक्षिण पूर्व में स्थित एक छोटे से शहर ताइफ़ पर एक गुलेल द्वारा हमला करने का आदेश दिया था जिससे अनिवार्य रूप से निर्दोष नागरिकों की हत्या हो जाती थी। जब एक सहाबी ने उन्हें निर्दोष नागरिकों की हत्या के खिलाफ कुरान में इसका निषेध अर्थात इसकी मनाही याद दिलाई तो कथित तौर पर यह कहकर महिलाओं और बच्चों की हत्या की दलील पेश की गई कि "वह भी उन्हीं में से हैं"। यह हदीस इस्लाम की आत्मा और कुरान के कुछ नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। लेकिन विद्वानों का यह मानना है कि "हदीस रहस्योद्घाटन के बराबर हैं"। यहां तक कि वैश्विक (आलमी सतह पर) 120 उलमा ने 14,000 शब्द मुश्तामल बगदादी के नाम लिखे गये। एक खुले ख़त में भी इस हदीस का हवाला पेश किया। ये पूरी तरह से तर्कहीन है हदीसों को नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इन्तेकाल के 300 साल बाद जमा किया गया था। जिस हदीस का हवाला जिहादी अक्सर देते है वे इस प्रकार है:
साब बिन जस्सामा से रिवायत है:
अल-अबवा और वदान नामक स्थान पर मेरे पास रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का गुज़र हुआ तो मैंने सवाल किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क्या औरतों और बच्चों को खतरे में डालने की संभावना के साथ रात के वक़्त में काफ़िर सिपाहियों पर हमला करना जाएज़ है। रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जवाब दिया "वह (यानी औरतें और बच्चे) भी उन्हें (यानी मुशरिक, मूर्तिपूजक) में से हैं।
(संदर्भ: किताब बुखारी जिहाद ए हदीस 3012, किताब संदर्भ: पुस्तक 56, हदीस 221)
यह बिल्कुल असंभव लगता है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मासूम शहरियों के क़त्ल के खिलाफ विशेष कुरानी आदेशों और अपने ही पूर्व आचरण का उलंघन करेंगे। लेकिन इस्लामी विद्वानों का कहना है कि: "यह हदीस सिहाह ए सत्ता (यानि हदीस की सभी छह प्रामाणिक पुस्तकों) में मौजूद है।" आप उनकी चाहे जितनी भी दिलजोई कर लें इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता वह कभी भी इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहेंगें। और इसका मतलब भी साफ है: "हदीस पर एतराज़ नहीं किया जा सकता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह कुरान और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पूर्व आचरण के कितने खिलाफ ही क्यूँ न हों। अगर इस विशेष हदीस का मतलब यह है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ही गुनाहगार औरतों और बच्चों की हत्या की अनुमति दी है जिसको आज आतंकवाद के नमूनें के रूप में माना जाता है तो फिर ऐसा ही है”।
उलेमा महत्वपूर्ण प्रतिष्ठा के मालिक होते है। किसी मुद्दें में इनकी ख़ामोशी से भी उतना ही फर्क पड़ता है जितना कि उनके बयानों से फर्क पड़ता है। वो लोग जो इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ जंग में इनसे मदद की उम्मीद रखते हैं वो ग़लतफहमी का शिकार हैं। जिस अपमान के साथ सल्फ़ी और आधुनिक ख्वारिज उनके साथ पेश आते हैं वे इसी के ही लायक हैं और न ही कोई धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर), उदार (लिब्रल) उदारवादियों से कुछ उम्मीद की जा सकती है। वो आतंकवाद के सख्त खिलाफ हैं और एक संदिग्ध रूप में पूरी सतर्कता के साथ जीवन गुजारतें हैं जैसा कि आज हर मुसलमान की स्थिति है जबकि वह इस्लामी शिक्षाओं की ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके लिए उन्हें हिंसक मौत के डर पर काबू पाना ज़रूरी है। पड़ोसी देश बांग्लादेश के उदार लोगों से पूछें तो चारों ओर अराजकता का माहौल होने के बावजूद बहुत कम लोगों के अंदर इतना साहस और इतना उत्साह बरकरार रहता है। मुस्लिम और गैर मुस्लिम नेताओं की बात यह है कि जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है। राजनेताओं को ‘रहनुमा’ कहा जाता है लेकिन वो वास्तव में लोगों के झुंड की पैरवी करते हैं। आज हाल यह है कि शायद ही कोई ‘रहनुमा’ नज़र आये।
लेकिन हमें तारीख से उम्मीद रखनी चाहिए। उग्रवाद हमेशा इस्लामी इतिहास का एक हिस्सा रहा है। लेकिन मुसलमानों ने हमेशा उसे हराया है। इस ज़माने में उग्रवाद विशेष रूप से प्रभावी है और लगभग पूरे समाज में कट्टरपंथ का ज़हर घोल रहा है और इसकी वजह यह है कि पिछले चार दशकों के दौरान इस परियोजना पर दसियों अरब पेट्रो डॉलर का निवेश किया गया है। लेकिन इस्लामी आध्यात्मिकता (रूहानियत), शांति (अमन) और बहुलवाद की भावना फिर से अपना प्रभुत्व हासिल करने का रास्ता तलाश कर ही लेगी। इस प्रक्रिया में मदद करने के लिए चिंतित मुसलमानों को शांति और बहुलवाद पर आधारित एक नया फिकह तैयार करना होगा और सीधे मुसलमानों तक पहुंच करनी होगी। बहुलवाद इस्लामी फिकह की बुनियाद इस बात पर होनी चाहिए कि इस्लाम निजात पाने के लिए एक आध्यात्मिक (रूहानी) रास्ता है, न कि दुनिया पर वर्चस्व प्राप्त करने के लिए ज़ुल्म व् जबर पर आधारित कोई राजनितिक सिद्धांत, कि जिस पर आज इस्लामी विद्वानों की सहमति बनी हुई है। महज़ इस्लाम के सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने से कोई मदद हासिल नही होगी, जैसा कि आज कुछ लोगों की आदत है। यह इंटरनेट का युग है। आज कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता। अब हमें खुले तौर पर कट्टरपंथी सल्फ़ी और खारजी फिकह का सख्ती के साथ मुकाबला करना होगा। अब हमारे पास नरम रास्ता अपनाने का कोई विकल्प नहीं है।
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