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Hindi Section ( 4 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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Taliban Fatwa on Terrorism आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 6

 

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

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वो स्थितियाँ कि जिनमें कुफ़्फ़ार के आम लोगों का कत्ल जायज़ है (छठी क़िस्त)

शेख़ यूसुफ़ अलउबैरी रहिमतुल्लाह ताला

5 दिसम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

ऐसे मासूम लोग (औरतों, बच्चे, बुज़ुर्ग कि जिनका क़त्ल करना हराम है) उन्हें उस सूरत में क़त्ल करना जायज़ है जब वो मुसलमानों के खिलाफ हथियार उठा लें या ऐसे काम को अंजाम दें जो मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई में सहायक की भूमिका अदा करें। चाहे ये जासूसी करना, मदद करना, राय देना या इसी तरह के दूसरे मामलों में शामिल होना हो.... इस औचित्य का स्पष्टीकरण उस हदीस में बयान किया गया है जो अहमद और अबु दाऊद में रोबा बिन रबी रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत की गयी है।

उन्होंने कहा कि हम रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के साथ एक गज़वे में थे तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने लोगों को एक जगह इकट्ठे होते देखा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने एक आदमी को भेजा और कहा कि देखो ये लोग क्यों इकट्ठे हुए हैं?  वो आदमी हालात देख कर वापस आया और कहा कि वहाँ एक औरत को क़त्ल कर दिया गया है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ये तो लड़ने में सक्षम नहीं थी। रावी कहते हैं कि इस लश्कर के हर दिल दस्ते पर खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहू अन्हू नियुक्त थे।  आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने एक आदमी को भेजा और फरमाया कि खालिद से कहो कि किसी औरत को क़त्ल करे और न किसी मजदूर को।

इमाम इब्ने हजर अस्क़लानी रहिमतुल्लाह अलैहि ने फतेह अलबारी, जिल्द 6 पेज 148 में फरमाया कि

'' इस हदीस का मफ्हूम (अर्थ) ये है कि अगर वो लड़ाई करे तो क़त्ल किए जाएंगे।''

इमाम नूरी रहिमतुल्लाह अलैहि ने सही मुस्लिम की शरह (व्याख्या) में लिखा है कि

'' उलमा का इस हदीस पर अमल करने और औरतों और बच्चों को क़त्ल की हुर्मत (आदर) पर इस सूरत में इजमा (सहमति) है कि अगर वो लड़ाई न करें। लेकिन अगर वो भी लड़ें तो ज़्यादातर उलेमा का कहना है कि इस सूरत में उन्हें क़त्ल किया जायेगा। इसी तरह हर उस व्यक्ति का क़त्ल करना हराम है, जो लड़ने वालों में से न हो,  हां अगर वो वास्तव में लड़े, या राय देकर या दुश्मन की बात मान कर और लड़ाई पर दुश्मन को हैरान करके और इसी प्रकार के किसी दूसरे तरीके से लड़ाई में भाग ले तो उसे क़त्ल किया जाएगा।''

इमाम नोवी रहिमतुल्लाह अलैहि के इस कथन पर विचार कीजिए कि, वो वास्तव में लड़े या राय देकर और (दुश्मन) की इताअत (मान कर) कर और (दुश्मन को) लड़ाई के लिए उकसा कर या इसी प्रकार के दूसरे तरीके से लड़ाई में भाग ले तो उसे क़त्ल किया जाएगा।''  शेखुल इस्लाम इमाम इब्ने तैमिया रहिमतुल्लाह अलैहि अल सियासतः अलशरिया में फ़रमाते हैं कि

'रहे वो लोग जो लड़ाकू और लड़ने वालों में शुमार होते हैं जैसे औरतें, बच्चे, राहिब (पादरी),  बूढ़ा शेख, जिसे दिखायी न देता हो और इन जैसे दूसरे तो ज़्यादातर उलमा के मुताबिक उन्हें क़त्ल नहीं किया जाएगा। सिवाए इसके कि वो अपने कथन या काम से लड़ें।''

ये बात और इमाम नोवी रहिमतुल्लाह अलैहि की बात इस हकीकत की दलील देती है कि जिन लोगों का क़त्ल कसदन हराम है,  वो अगर मुसलमानों के खिलाफ जंग में अपने कथन या काम के माध्यम से मदद करें तो उन्हें क़त्ल करना जायज़ है।

अलऔन के लेखक ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के फरमान '' अल्लाह का नाम लेकर निकलो, और अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मिल्लत पर होते हुए,  बहुत ज्यादा बूढ़े व्यक्ति को क़त्ल न करो,  न बच्चे को, न छोटे को, न औरत और न गनीमतों में खयानत करो'' की शरह (व्याख्या) करते हुए लिखा:

मगर ये कि वो लड़ने वाला हो या दुश्मन को राय देने वाला, क्योंकि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का दरीद बिन अलसम्ता को क़त्ल करना सही हदीस से साबित है हालांकि उसकी उम्र एक सौ बीस साल थी या उससे से भी ज़्यादा...... इसलिए कि उसे हवाज़न क़बीले के लश्कर में राय देने के लिए लाया गया था और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ये फरमान कि 'न बच्चे को न छोटे को'  इससे उसे मुक्त रखा गया है जो राजा हो या लड़ाई में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वाला हो। न किसी औरत को' यानी अगर वो लड़ने वाली न हो या रानी न हो।''

फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ऐसी औरत के क़त्ल को जायज़ कहा है, जो मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई में कुफ़्फ़ार की भौतिक या आध्यात्मिक रूप से किसी भी प्रकार की सहायता करे। उन्होंने इसके लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की इब्ने माजा में दी गयी हदीस से दलील दी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ताइफ़ का घेराव किया तो एक औरत किले पर चढ़ी और उसने मुसलमानों के सामने अपनी शर्मगाह को नंगा कर दिया तो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया ये तुम्हारे सामने है उसे तीर मारो, तो सहाबा इकराम रज़ियल्लाहू अन्हू ने तीर मारा और उसे क़त्ल कर डाला। फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ऐसी औरत के क़त्ल के औचित्य पर तर्क दिया है कि जो कि अगर लड़ाई न करे लेकिन जंग करने वालों की मुसलमानों के खिलाफ किसी कथन या काम से मदद करे तो उसे कसदन क़त्ल करना हराम है।

अल्लामा इब्ने कदामह रहिमतुल्लाह अलैहि ने अलमुगनी वलशरह, जिल्द 9, पेज 232 में फरमाया:

'' अगर कोई औरत कुफ़्फ़ार की सफ में या उनके किले में खड़ी होकर मुसलमानों को गालियां दे या उनके सामने नंगी हो जाये तो उसे कसदन मारना जायज़ है। जिसकी वजह वो रवायत है कि जिसमें सईद ने कहा कि हमें हम्माद बिन ज़ैद ने बयान किया कि अय्यूब से उन्होंने, अकरमा से उन्होंने कहा कि जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ताएफ़ वालों का धेराव किया तो एक औरत सामने आयी और उसने अपनी शर्मगाह को नंगा कर दिया तो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया ये तुम्हारे सामने है, उसे तीर मारो तो मुसलमानों में से एक मुसलमान ने तीर मारा और उनका तीर उस औरत की शर्मगाह पर जा लगा। इस हालत में उस औरत की शर्मगाह की तरफ उस पर तीर मारने के लिए देखना जायज़ है क्योंकि ये तीर चलाने की जरूरत के लिए है। इसी तरह उसे तीर मारना उस वक़्त भी जायज़ है जब वो दुश्मनों के लिए तीर इकट्ठे करे या उन्हें पानी पिलाए या लड़ाई करने पर उकसावे, क्योंकि ये उस सूरत में जंग जो कि हुक्म में है। यही उस औरत का और तमाम उन लोगों का शरई हुक्म है जिनके क़त्ल से मना किया गया है।''

इमाम इब्ने अब्दुल बर रहमतुल्लाह अलैहि ने इस्तज़कार में फरमाया:

'' उलमा का इसके बारे में कोई मतभेद नहीं कि जो औरतों और बूढ़ों में से लड़े तो उसका क़त्ल करना जायज़ है और बच्चों में जो लड़ने की कुदरत रखे और लड़े तो उसे भी क़त्ल किया जाएगा।''

इमाम इब्ने अब्दुल बर रहमतुल्लाह अलैहि ने अलतम्हीद में कहा कि

'' उलेमा की इस बात पर सहमति है कि निस्संदेह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने दरीद बिन अलसमता को हनीन के दिन क़त्ल किया था, क्योंकि वो जंग में सलाह देने वाला और साज़िश करने वाला था। इसलिए बूढ़ों में से जो कोई भी इस तरह का हो सब उलेमा के अनुसार उसे क़त्ल किया जाएगा।''

इब्ने कदामा रहिमतुल्लाह अलैहि ने भी इसी बात पर उलेमा का सहमति को नक़ल किया है कि

'औरतों, बच्चों और बड़ी उम्र के लोगों का क़त्ल ऐसे वक़्त में जायज़ है जब वो लड़ाई में अपनी क़ौम की किसी भी प्रकार की सहायता करें।''

इमाम नोवी रहिमतुल्लाह अलैहि ने मुस्लिम की शरह (व्याख्या) में किताबुल जिहाद में इस सहमति का उल्लेख किया है कि 'कुफ़्फ़ार के ऐसे बूढ़े जो राय देने वालों हों, तो उन्हें क़त्ल किया जाएगा।''

(जारी)

स्रोत: नवाये अफगान जिहाद (दिसम्बर, 2012)

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