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Hindi Section ( 2 May 2017, NewAgeIslam.Com)

Will This Appeal Effect क्या अपील का प्रभाव होगा?




शमीम तारिक़

21 अप्रैल, 2017

भाजपा कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन अपनी पार्टी के लोगों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि '' हमें यह कौशल सीखना चाहिए कि कब क्या बोलना है क्यों कि विवादित बयान कई कार्यों पर पानी फेर देते हैं''। जाहिर है उनका इशारा उन नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर था जो उत्तेजना करते हैं। इससे चार पांच दिन पहले दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम ने उलेमा और मुस्लिम बुद्धिजीवियों से अपील की थी कि पारिवारिक समस्याओं पर चर्चा करने के लिए मीडिया के कार्यक्रमों का बहिष्कार करें। चुप रहने की सलाह देने वाले नरेंद्र मोदी इस हद तक सशक्त हैं कि सरकार और शासक दल दोनों उनके इशारे पर काम करती हैं। मीडिया का बहिष्कार करने की अपील करने वाले मोहतमिम दारुल उलूम देवबंद की स्थिति यह है कि वे अच्छी बातों और अच्छे कार्यों की प्रेरणा तो दे सकते हैं किसी को अच्छे काम करने पर आमादा नहीं कर सकते। मोदी जी ने अपने बयान में जहां अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह याद दिलाया है कि शासन की कुछ नज़ाकतें होती हैं और शासक दल या सरकार के लोगों की मौके मौके पर कही हुई अपमानजनक बातें सरकार की बदनामी का कारण बनती हैं वहीं दारुल उलूम के मोहतमिम अपील में इस शिकायत के साथ कि मीडिया पारिवारिक समस्याओं पर चर्चा के नाम पर खेल रहा है यह स्वीकार भी शामिल है कि मुसलमान बुद्धिजीवी, उलेमा या उलेमा जैसी स्वरूप धरने वाले व्यक्ति कैमरे के सामने बोलने के लिए तो बेताब रहते हैं मगर उनमें से अधिकांश इस योग्य ही नहीं इसलिए मिल्लत की छवि प्रभावित हुई है। यह बात कोई और कहता तो उसे यह कहकर ताना कसा जता कि वह उलेमा का दुश्मन है इसलिए सबसे पहले तो दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए कि उन्होंने ढके छिपे शब्द में ही सही, लेकिन एक सच्ची बात कही, वाकई उलेमा और उलेमा जैसा रूप धारण करने वालों में अधिकांश इस योग्य नहीं हैं कि पारिवारिक या अन्य मुद्दों पर मिल्लत का प्रतिनिधित्व कर सकें। लेकिन अपनी पार्टी या खानदानी स्थिति के कारण बयान देना आवश्यक समझते हैं। इसके अलावा यह तथ्य भी अब छिपा नहीं रह गया है कि मीडिया ही नहीं मिल्ली मंच से मुसलमानों की तर्जुमानी के नाम पर ऐसे वाक्य बोलने के लिए जिनसे मुस्लिम दुश्मन ताकतों को सांप्रदायिक को हवा देने का मौका मिले एक विशेष प्रारूप के लोगों को विशेष मुआवजा मिलता है जबकि अन्य लोगों के मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले बयान की भी खूब सराहना की जाती है। गैर उलेमा अंग्रेजी से शिक्षित और आम लोगों में शरई कानून और उलेमा का सम्मान करने वालों की ही बहुमत है। ऐसे बद तौफीक लोग कुछ ही होंगे जिन्हें शरई कानून और विद्वानों से तकलीफ होगी। हाँ कुछ लोग उन्हें दुनियादारी से बचने, राजनीतिक ताकतों का आला कार बनने से बचने और मसलक और पार्टी या किसी और आधार पर अनावश्यक बयानबाजी से दूर रहने की प्रेरणा देकर नाराजगी मोल लेते रहते हैं हालांकि उनका ऐसा करना शरीअत या उलेमा की दुश्मनी के कारण नहीं होता। इसका नतीजा यह हुआ है कि इस वर्ग और उलेमा में दूरी बढ़ गई है और अब स्थिति यह हो गई है कि शरीअत और मुसलमानों के एकजुट होने को तिरछी नज़र से देखने वालों को मुसलमानों से ही आला कार मिलने लगे हैं।

मुस्लिम समाज किस हद तक अब्तरी और नैतिक गिरावट का शिकार हो चुका है इसका अंदाजा मिल्ली नेतृत्व को नहीं है। भीख मांगने वालों में हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है। वेश्यावृत्ति करने वालों में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है। कब्रिस्तान और वक्फ को हड़पने या उनके धन में गबन करने वालों में मुसलमान सबसे अधिक हैं। मुसलमानों की कोई संस्था या ट्रस्ट झगड़ा-फसाद से खाली नहीं हैं, दादरी जैसी कितनी घटनाएं देश में हुईं? मुसलमानों के कितने उद्योग नष्ट हुए यह सब जानने के लिए दूसरों की मोहताज मुसलमान अपने दम पर अपनी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक पिछड़ेपन का अनुमान भी नहीं लगा सके हैं। उनकी बस्तियों में अमीर गरीब और उच्च व निम्न की खाई बढ़ रही है। जो धनी है वह समझता है कि वह हमेशा धनी रहेगा जो परेशान हाल है उसे विश्वास दिला दीया गया है कि परेशानी ही उसका भाग्य है जिससे उसे कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। मस्जिदों और मदरसों का निर्माण और गैर मुसलमानों के योगदान के लिए विदेश से लाई हुई रकम पर ऐश करने की घटनाएं भी लोगों के सामने आ रहे हैं। दूसरों की बुराइयों का प्रचार और अपनी अच्छाई पर गर्व आम बात हो गई है ऐसे में मुसलमानों से ही मुस्लिम दुश्मन ताकतों को भोजन उपलब्ध होना आश्चर्य की बात नहीं है। रही सही कसर वह लोग पूरी कर रहे हैं जो समस्या की प्रकृति को सही तरीके से समझते हैं न इस्लामी आदेशों को, मगर टी वी पर राय देना और अखबारों में बयान छपवाना ज़रुरी समझते हैं। उदाहरण के रूप में तीन तलाक के होने के संबंध में एक मसलक पर वार करने वाले यह कभी नहीं बताते कि तलाक ही नहीं शादी के वजूब व शर्तों में भी विभिन्न मुद्दों में मतभेद है। इसलिए तलाक ही नहीं शादी के बारे में भी उन्हें राय देना चाहिए कि एक मजलिस में तीन तलाक स्थित होने के पक्षधर जिस तरह निकाह पढ़ते या पढ़ाते हैं वह सही है या नहीं? दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम ने अच्छा किया कि उनके नाम अपील जारी की, लेकिन यह अपील अधूरी मालूम होती है क्योंकि इसमें माइक, टीवी और अखबार से रिश्ता कायम रखने की कोशिश करने वाले उलेमा या उलेमा जैसी स्वरूप के लोगों की नासमझी और प्रसिद्धि की ओर इशारा नहीं है। यह तो वे लोग हैं जिनकी गर्मागर्म शब्दों में निंदा होनी चाहिए।

ये लोग अगर अपनी रविश पर कायम रहे तो आने वाले दिनों में मुसलमानों की छवि और स्थिति अधिक बिगड़ेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में उनकी पार्टी या पार्टी समर्थित लोग जो बयान दे रहे हैं या कर रहे हैं उसकी धमक भारत के बाहर में भी महसूस हो रही है। सरकार और सत्ताधारी दल की नज़र में मुसलमानों की आबादी या नेतृत्व का कोई भ्रम नहीं रह गया है। वह खूब समझती है कि इन तिलों में तेल नहीं है मगर भारत से बाहर भारत सरकार की जो छवि बन रही है इससे प्रधानमंत्री या आरएसएस बेनियाज़ नहीं है और वह विश्व समुदाय में अपनी छवि खराब किए बिना अपना वह एजेंडा लागू करना चाहती जो 1925 के बाद से ही उसके मद्देनजर रहा है। इसीलिए एक विशेष रणनीति के तहत सरकार बनाने से पहले सत्ताधारी दल के लोग ऐसे बयान देते हैं जिनसे सांप्रदायिक पांति शुरू हो और सत्ता में आने के बाद ऐसे बयान देते हैं जिनसे विश्व समुदाय में उनकी सरकार की प्रतिष्ठा बनी रहे । पता नहीं क्यों आम मुसलमान और उनकी धार्मिक राजनीतिक नेतृत्व ने इस सवाल को कभी ध्यान देने योग्य नहीं समझा कि ऐसा क्यों है कि मुसलमान ही शिकार भी हैं और बदनाम भी। ऐसा हुआ होता तो दारूल उलूम देवबंद के मोहतमिम ने बहुत पहले महसूस किया होता कि कुछ लोगों को तबर्रुकन माइक दे देने या उन्हें मिल्लत का प्रवक्ता समझ लिए जाने के कितने खतरनाक परिणाम सामने आए हैं और उन्होंने शायद मीडिया के बहिष्कार की अपील करने के बजाय यह अपील की होती कि मुसलमान बुद्धिजीवी और उलेमा टीवी के चर्चा में जरूर भाग लें लेकिन पहले वह इतनी जानकारी प्राप्त कर लें और बहस की ज़बान और बयान से परिचित हो जाएं कि एंकर के दांव से चित होने के बजाय उसी को दांव से चित कर सकें ।

21 अप्रैल, 2017 स्रोत: इन्केलाब, नई दिल्ली

URL fro Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/shamim-tariq/will-this-appeal-effect--کیا-اس-اپیل-کا-اثر-ہوگا؟/d/110904

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/shamim-tariq,-tr-new-age-islam/will-this-appeal-effect--क्या-अपील-का-प्रभाव-होगा?/d/110996

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