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Hindi Section ( 11 Jul 2013, NewAgeIslam.Com)

Importance of Knowledge in Human Life मानव जीवन में ज्ञान का महत्व

 

शाहनवाज़ फ़ारूक़ी

20 जून, 2013

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

इंसान की ज़िंदगी में ईमान (विश्वास) के बाद सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण इल्म (ज्ञान) है। यही वजह है कि कुरान मजीद में विश्वास के बाद सबसे अधिक ज़ोर ज्ञान पर दिया गया है। अल्लाह ने ज्ञान के महत्व को प्रकट करने के लिये कहा कि ज्ञान रखने वाला और ज्ञान न रखने वाले बराबर नहीं हो सकते। अल्लाह ने ज्ञान के महत्व को दर्शाने के लिये कहीं अहले ईमान (ईमान वालों) से कहा कि तुम सोच विचार से काम क्यों नहीं लेते? कहीं कहा है कि तुम तदबीर को क्यों काम में नहीं लाते? रसूले अकरम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के एक इरशाद का अर्थ ये है कि ज्ञान नबियों की विरासत है। इसका अर्थ ये है कि नबी और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। नबी दुनिया में ज्ञान के साथ तशरीफ़ लाते हैं और वो दुनिया से विदा होते हैं, तो अपने पीछे ज्ञान की ऐसी दौलत छोड़ जाते हैं जिससे सदियों तक इंसानों की अनगिनत नस्लें फायदा हासिल करती रहती हैं। इसके विपरीत जो लोग नबियों के विरोधी के रूप में पेश किए गए हैं उनका विरासत माल व दौलत और दुनिया की चाहत के सिवा कुछ नहीं।

ज्ञान का महत्व इतना बुनियादी है कि इसके बिना मानव जीवन का अस्तित्व सम्भव ही नहीं। इंसान की व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान किसी न किसी तरह के इल्म की मोहताज है। इंसान खाने, पीने,  यहाँ तक कि चार कदम चलने के लिए भी इल्म का मोहताज है। इंसान ने इस दुनिया में जो कुछ निर्माण और आविष्कार किया उसका आधार भी ज्ञान पर रखा हुआ है। इंसान का दूसरे इंसान से सम्बंध भी इल्म के ही कारण है, यहां तक ​​कि इंसान अपने रचनाकार, अपने मालिक और रोज़ी रोटी देने वाले को भी ज्ञान के ही कारण जानता है। यही वजह है कि कुरान मजीद में 800 से अधिक स्थानों पर ज्ञान और उससे सम्बंधित अवधारणाओं की ओर इंसान का ध्यान आकर्षित किया गया है। गौर किया जाए तो ज्ञान चेतना का आधार है। ज्ञान के बिना चेतना और चेतना के बिना मनुष्य की कल्पना कठिन है। अल्लाह ने आदमी को फरिश्तों पर जो फज़ीलत दी है उसका हवाला इल्म भी है। अल्लाह ने फरिश्तों से चीज़ों के नाम मालूम किये। चूंकि फरिश्तों को चीज़ों के नाम का ज्ञान अता नहीं किया गया था इसलिए वो चीज़ों के नाम नहीं बता पाये। इस संदर्भ में देखा जाए तो मनुष्य के अतीत, वर्तमान और मुमकिन का आधार ज्ञान है। ज्ञान न हो तो इंसान का कोई अतीत न हो। ज्ञान न हो तो इंसान का कोई वर्तमान न हो। और ज्ञान न हो तो इंसान का कोई भविष्य न हो। यही कारण है कि जाहिलियत को अंधकार और ज्ञान को प्रकाश कहा जाता है। शेक्सपियर ने कहा है कि असली समस्या होने या न होने की है। गौर किया जाए तो मनुष्य का होना इल्म की शर्त के तहत है।

ज्ञान का उल्लेख होता है तो उच्च और निम्न ज्ञान का सवाल ज़रूर सामने आता है। इंसान जानना चाहता है कि उच्च ज्ञान क्या है और वो कहाँ से आता है? और निम्न ज्ञान किसे कहते हैं और क्यों कहते हैं? दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहते हैं कि अल्लाह तक पहुँचने के लिए इंसान को वही की ज़रूरत नहीं, आदमी खुद अपनी कल्पना और विचारों की मदद से खुदा की उपस्थिति का एहसास कर सकता है। लेकिन खुदा के अस्तित्व के सम्बंध में अस्पष्ट सा एहसास काफी नहीं। इंसान खुदा से वास्तविक सम्बंध स्थापित करने के लिए उसके गुणों, उसके आदेशों और उसके खुश और नाराज़ होने की बुनियादों के लिए इल्म का मोहताज है। इसके बिना वो दुनिया और आखिरत (परलोक) में कामयाब नहीं हो सकता, और समस्या ये है कि इन सभी बातों के ज्ञान के लिए वही (Revelation) का इल्म अनिवार्य है। इंसान अपनी बुद्धि से केवल इतना जान सकता है कि जीवन और ब्रह्मांड का कोई न कोई बनाने वाला है। ये बात भी सभी इंसान नहीं जान सकते। इस तरह से देखा जाए तो इल्मे वही की बरतरी पूरी तरह से उजागर होकर सामने आती है। इसलिए कि वही का इल्म अल्लाह की तरफ से है,  इसलिए सिर्फ इल्मे वही सौ फीसद सही है। इंसान की दृष्टि और ज्ञान की त्रुटि का आलम ये है कि आदमी रेगिस्तान में दूर से चमकती हुई रेत को पानी समझ लेता है। करीब जाता है तो उसकी नज़र और समझ की सच्चाई उजागर होती है और मालूम होता है कि जिसे वो पानी समझ रहा था वो केवल चमकती हुई रेत थी। इंसान पानी में पड़ी हुई छड़ी को देखता है तो वो उसे टेढ़ी नज़र आती है। छड़ी को पानी से बाहर निकाला जाता है तो पता होता है कि वो सीधी है। इसी तरह गंभीर प्यार और गंभीर नफ़रत भी इंसान क चीज़ों और हालात व घटनाओं की तह तक नहीं पहुंचने देतीं। गुस्से की हालत में इंसान के इल्म और समझ का बड़ा हिस्सा मौजूद होकर भी गैरमौजूद होता है। इसलिए मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी ने बिल्कुल ठीक कहा है?

इल्म क्या इल्म की हक़ीक़त क्या

जैसी जिसके गुमान में आई

अक़्ल अपनी जगह एक हक़ीकत और इंसान की ज़रूरत है, लेकिन बुद्धि ठीक तरह से काम करने के लिए इल्मे वही की मोहताज है, बिलकुल उसी तरह जिस तरह आंखें देखने के लिए बनाई गई हैं, लेकिन देखने की क्षमता के लिए वो (सूरज) की रौशनी की मोहताज हैं। कुरान मजीद इंसान की कल्पना को ज्ञान स्वीकार नहीं करता, बल्कि वो तो ये तक कहना है कि कुछ गुमान गुनाह होते हैं। कुरान मजीद अपने प्रारंभ में ही ये दावा करता है कि ये एक ऐसी किताब है जिसमें शक नहीं। इसके विपरीत आधुनिक दर्शन का आधार विश्वास के बजाय शक पर रखा हुआ है। इकबाल का एक मशहूर शेर है?

मेरा दिल मेरी रज़्मे गाहे हयात

गुमानों के लश्कर यक़ीं का सेबात

कहने को ये इक़बाल की व्यक्तिगत घटना का वर्णन है लेकिन वास्तव में ये शेर आधुनिक पढ़े लिखे मुसलमानों की सामूहिक तस्वीर है। इस तस्वीर में विश्वास इल्मे वही की ''अता'' है और गुमानों के लश्कर आधुनिक विज्ञान की 'बख्शिश' हैं।

इस्लाम का एक कमाल ये है कि वो ज्ञान असतत नहीं रहने देता। इस्लाम कहता है कि इल्म को अमल में ढालो। यानी खयाल को तजुर्बा बनाओ। अगर तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा ज्ञान असतत रह जाएगा। असतत ज्ञान और अमल में ढल जाने वाले ज्ञान में वही अंतर है जो गुलाब के फूल की तस्वीर और गुलाब के पौधे पर लगे गुलाब में है। पूरी मानवता और खुद मुसलमानों के इतिहास में ये समस्या इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे समझे बिना हम अपने इतिहास के विभिन्न चरणों की उपादेयता को नहीं समझ सकते। इकबाल ने अपने एक शेर में कहा है?

रह गई रस्मे अज़ाँ रूहे बिलाली न रही

फलसफा रह गया तल्क़ीने गज़ाली न रही

सवाल ये है कि इस शेर में 'रूहे बिलाली'' और'तल्क़ीने गज़ाली'' का अर्थ क्या है? रूहे बिलाली का मतलब ये है कि अज़ाने के कल्मात (शब्द) हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहू अन्हू के लिए 'क़ाल' नहीं थे,''हाल'' थे। जब कहते थे कि अल्लाह बड़ा है तो वो अल्लाह की बड़ाई को बसर करके दिखाया होता था। बेशक तल्क़ीने ग़ज़ाली में गज़ाली का इल्म और उनकी शैली भी शामिल है मगर अपनी असल में तल्क़ीने गज़ाली इस्लाम को बसर करने का तजुर्बा है। यानी गज़ाली के लिए इस्लाम कोई मानसिक सच नहीं था, बल्कि एक ऐसी घटना थी जो उनके पूरे अस्तित्व को अपनी गिरफ्त में लिए हुए थी। मुसलमान जब तातारियों से पिट रहे थे तो वो काफिर और मुशरिक नहीं हो गए थे और उनकी वैज्ञानिक विरासत फना नहीं हो गई थी, असली समस्या ये थी कि मुसलमान इल्म को बसर करने वाले नहीं रह गए थे। इसलिए कि उनके पास इल्म तो था लेकिन उसमें ज़िंदगी नहीं थी। उनके पास इल्म का बयान था लेकिन उसमें ''प्रभाव' नहीं था, और ये लोगों को अपना बनाने वाला नहीं रहा था। इस समय भी मुसलमानों को वास्तविक कमज़ोरी यही है। मुसलमानों ने जहां इस्लाम को बसर कर के दिखाया है वहाँ उन्होंने बहुत बड़े नतीजे पैदा किये हैं। इसकी एक मिसाल मौलाना मोदूदी रहमतुल्लाह अलैहि का इल्मुल कलाम है जिसने करोड़ों मुसलमानों की ज़िंदगी को बदला है। इसकी दूसरी मिसाल अफगानिस्तान है जहां मुसलमानों की एक छोटी सी जमात ने जिहाद को 'बसर' कर के दिखा दिया। नतीजा ये कि अफगानिस्तान में 30 साल की छोटी सी अवधि में वक्त की दो महाशक्तियों को हार का सामना करना पड़ा है। इकबाल ने इस सम्बंध में एक महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने कहा:

या मुर्दा है या नज़ा के आलम में गिरफ्तार

जो फलसफा लिखा न गया खूने जिगर से

ये सिर्फ फलसफे की बात नहीं ....... शायरी हो या इल्म, जिस चीज में खूने जिगर शामिल नहीं होता, उसमें न उपादेयता होती है न हुस्न व जमाल और न ही वो चीज़ ज्यादा दिनों तक ज़िंदा रहती है।

इस्लाम में इल्म की एक शान ये है कि इल्म असल में अल्लाह की ज़ात, गुणों, आदेशों और आयतों के इल्म को कहते हैं। लेकिन इस्लाम में इल्म की पूरी रवायत खुदा केंद्रित या God Centric है। कुछ लोग ये मतलब लेते हैं कि इस्लाम की ज्ञान की परंपरा में मनुष्य और तत्व का कोई स्थान नहीं। लेकिन ये विचार सही नहीं है। आदेशों और आयतों के इल्म में इंसान और तत्व का इल्म शामिल है। यही कारण है कि मुसलमानों ने ज्ञान की जितनी बुरी परंपरा पैदा की है दूसरी उम्मतें इसकी कल्पना भी नहीं कर सकतीं। मुसलमानों ने व्याख्या (टिप्पणी) का असाधारण ज्ञान पैदा किया है। इल्मे हदीस का खज़ाने की रचना की है। वो फ्क़्हि (धर्मशास्त्र) के समंदर को अस्तित्व देने वाले हैं। उन्होंने शायरी की दुनिया का  निर्माण किया है। उन्होंने इल्मुल कलाम के दरिया बहाये हैं। उन्होंने अपने इल्म से आधी से अधिक दुनिया को जीता है। अहम बात ये है कि मुसलमान जितना कुछ कर चुके हैं, उससे अधिक की संभावना अपने अंदर रखते हैं। इसलिए कि उनके पास कुरान है। इसलिए कि उनके पास रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का जीवन है।

20 जून, 2013 स्रोत: रोज़नामा अवधनामा, लखनऊ

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