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Hindi Section ( 20 Jul 2014, NewAgeIslam.Com)

Religion Should be a Personal Affair of People धर्म इंसान का व्यक्तिगत मामला होना चाहिए

 

समर हलरनकर

8 जुलाई, 2014

जो सबसे पुरानी यादें मेरे दिमाग में हैं वो मेरी दादी 'अजी' की हैं जिनके साथ एक ही कमरे में मैं और मेरा भाई उनके साथ रहते थे। वो पलंग पर बैठी आगे पीछे हिलती रहतीं। ये 1970 के दशक में दक्कन क्षेत्र की बात है। मैं देख रहा हूँ कि वो खिड़की से आने वाले कीड़े मकोड़ों को भगाने की कोशिश कर रही हैं जबकि दूसरी ओर एक किताब में ध्यान मग्न हैं। 10 बच्चों की मां अजी अनपढ़ हैं लेकिन टूटे फूट शब्दों में पढ़ने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने पढ़ने के लिए मराठी भाषा में लिखी रामायण का चयन किया है जिसमें सही गलत और ताक़त व कमज़ोरी का किस्सा बयान किया गया है।

मुझे पूरी तरह याद नहीं कि अजी मुझसे क्या कहा करती थीं लेकिन हल्का सा याद है कि मैंने उनसे कोई गलत बात नहीं सीखी। बचपन में धार्मिक दादी के साथ कमरे में रहा, जो दिन में कई बार आंखें बंद करके पूजा करने लगती थीं और उनके साथ कई बार विभिन्न मंदिरों में दर्शन किये। जब भी मेरे माता पिता देश के दूर दराज़ के इलाके में कहीं भी जाते वो विभिन्न मंदिरों में ज़रूर जाते। हम श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर के पहाड़ पर भी चढ़े, कन्याकुमारी में तीन समुद्रों के संगम पर भी आचमन किया, तिरुपति मंदिर की पंक्तियों में भी खड़े रहे और मदुरई के मीनाक्षी अम्मन मन्दिर की आरती में भी भाग लिया।

बचपन की यादों को ताज़ा करने में मुझे माफ कर दें, क्योंकि ये मेरी अजी से जुड़ी बातें हैं और ये भी इसी बात पर निर्भर करती है कि जो कि आज मैं हूं, धार्मिक नहीं बल्कि सेकुलर। मुझे गलत मत समझें। अब मैं किसी मंदिर में नहीं जाता लेकिन परम्पराओं और संस्कृति के व्यापक संदर्भ में खुद को हिंदू घोषित करता हूँ जो कि इससे अधिक दूर नहीं है जिसे हिंदू दक्षिणपंथियों ने फैशन के रूप में अपनाया हुआ है।

जहां मैं खुद को गैर फेशनेबल महसूस करता हूँ वो ये कि मेरे विचार में भारत को कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं बनना चाहिए और ये कि धर्म इंसान का निजी मामला होना चाहिए जिसे सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों से अलग रखना चाहिए। हाँ तो मुझे ये देखकर अच्छा नहीं लगा कि नरेंद्र मोदी गंगा की आरती के लिए वाराणसी के घाट पर गए हालांकि मैं इस बात से खुश हूं कि उन्होंने पैर न छूने का आदेश जारी किया है। मैं अपनी स्थिति पर इसलिए ज़ोर दे रहा हूं कि हम मोदी की सफलता के बाद ऐसे समय में जी रहे हैं जहां सेकुलर या 'सिक्कुलर (बीमार मानसिकता वाला)' जैसा कि दझिणपंथी लोग मुझे कहते हैं, और उदार होना शर्म का कारण महसूस होने लगा है जिसे छिपाया जाए या जिस की आलोचना की जाए। तो फिर आधुनिक दझिणपंथ के अनुसार उदार होने का क्या अर्थ है?

मेरे अनुसार इसके कई अर्थ हैं, लेकिन वो मतलब नहीं, जो उनके अनुसार है। उदाहरण के रूप में उदार होने के नाते मैं प्रत्यक्ष रूप से वामपंथ का उदारवादी नहीं हो जाता।

मैं सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त कर मुक्त बाजार स्थापित करने, श्रम कानूनों में परिवर्तन, सरकारी अफसरों को और वेतन देने में विश्वास रखता हूँ, और कम से कम आधी सरकार को भंग करने में जो करोड़ों डॉलर खर्च करके सुरक्षा व्यवस्था करती है वो भी नाकाम साबित होते हैं। मेरे विचार में हालांकि सुरक्षा व्यवस्था करना ज़रूरी है क्योंकि अगर मोदी अपने सारे वादे पूरे कर दें, तब भी उन्हें ऐसा करने में बहुत वक्त लगेगा।

मेरा मानना ​​है कि मुस्लिम युवकों को शक की निगाह से देखना और अक्सर न्यायिक कार्रवाई से पहले ही उन्हें 'इन्काउण्टर' में मार देना गैरकानूनी, विध्वंसक काम और निहायत ही गलत है। जैसा कि किसी के केवल वामपंथ की तरफ झुकाव की कारण उसे माओवादी करार देकर उसे प्रताड़ना का निशाना बनाना है। मैं भी माओवादियों के खिलाफ लड़ाई में तेज़ी पैदा करने का समर्थक हूँ और हाँ मैं सज़ाए मौत का भी समर्थन करता हूँ। जब भी मैं गणतंत्र दिवस के अवसर पर परेड देखता हूँ तो अश्चर्यचकित रह जाता हूँ। मैं मानता हूं कि हमारे सैनिक बहुत ही बहादुर हैं लेकिन उनके लिए बहुत कम राशि खर्च की जाती है और उनके हथियार व अन्य उपकरणों भी उचित नहीं है, लेकिन मैं ये भी मानता हूं कि जो सीमा पार करते हैं उन्हें सज़ा दी जानी चाहिए और विशेष सुरक्षा कानून को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, जिनकी वजह उन्हें कश्मीर और मणिपुर जैसे क्षेत्रों में किसी का भी बलात्कार या हत्या कर देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

मैं इस बात में विश्वास रखता हूं कि महिलाएं हमसे अधिक अधिकारों की हकदार हैं जो हमें अपनी पत्नियों, बेटियों, बहनों और माताओं को देना चाहिए। हम उन्हें गलत रूप में देवी का दर्जा दे देते हैं और उनकी बदहाली के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं जबकि हक़ीक़त हमारे दिल और दिमाग में छिपी है कि हम उन्हें आगे बढ़ने नहीं देते।

राजीव गांधी की बात करें तो मैं हमेशा इस बात पर विश्वास रखता आया हूं कि हिंदुस्तान में जो कुछ गलत हो रहा है, उनमें से कई बातों के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। इंदिरा गांधी द्वारा सिख चरमपंथियों का बेवजह शोषण से लेकर उनके बेटे के द्वारा बाबरी मस्जिद का ताला खोलने और इंदिरा की हत्या के बाद सिखों का नरसंहार करने वालों को नज़रअंदाज़ किए जाने तक बहुत सारी बातें इसमें शामिल हैं। मैं ये भी मानता हूं कि मोदी अपनी गलतियों की माफी मांगे बिना 2002 से आगे निकल गए। (ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट दे दी हो, इसका फैसला अभी आना बाकी है) उनकी कामयाबी के बाद अनेक उदारवादी लोग उनके विचारों का समर्थन करते नज़र आ रहे हैं। समाजवादी शिव विश्वनाथन ने दैनिक हिन्दू में लिखा है कि धर्मनिरपेक्षता धीरे धीरे मध्यम वर्ग के गुस्से का कारण बन गया है जिसके कारण मोदी उनके जैसे उदार लोगों को हराने में कामयाब हो गए।

कितनी हास्यास्पद बात है। मैं तो खुद को पराजित महसूस नहीं करता। किसी के अधिक संख्या में होने से वो सही नहीं हो जाता। मैं भी हमेशा सही नहीं होता, लेकिन ये सच नहीं छिपाऊँगा कि मैं सेकुलर हूँ, उदार और भारतीय होने पर गर्व करता हूँ जो किसी से बैर नहीं रखता। मेरे विचार से मेरी अजी इस बात को ज़रूर पसन्द करेंगी।

8 जुलाई, 2014 स्रोत: इंक़लाब, नई दिल्ली

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http://newageislam.com/urdu-section/samar-halarnnkar/religion-should-be-a-personal-affair-of-people--مذہب-انسان-کا-ذاتی-معاملہ-ہونا-چاہئے/d/98188

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