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Hindi Section ( 18 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

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Falling Muslim Fertility Rates Raise Grave Concerns मुसलमानों की गिरती शरह पैदाइश तशवीशनाक



सैफ शाहीन, न्यु एज इस्लाम

एक आम मुसलमान ख़ानदान का आपके ज़हेन में क्या तसव्वुर होगा? ख़ुदा से डरने वाला शौहर, जाहिल बीवी (या बीवियां), और बड़ी तादाद में दरवाज़े को तोड़ कर घर से बाहर सड़कों पर आ रहे बच्चे? ताहम, ऐसा नहीं है जैसा कि एक आम मुसलमान ख़ानदान के बारे में तसव्वुर किया जाता है या आने वाले सालों में ऐसा नज़र नहीं आएगा।

नई तहक़ीक़ ने दुनिया भर में मुस्लिम ख़वातीन की शरह पैदाइश या बच्चों की पैदाइश की तादाद में तारीख़ी एतबार से ग़ैरमामूली कमी को ज़ाहिर की है, मशरिक़े वुस्ता जैसे मुस्लिम अक्सरीयत वाले ममालिक में कमी ने पहले से ही मग़रिब के बराबर ला खड़ा किया है जहाँ बुज़ुर्गों की तादाद ज़्यादा है। ऐसे भी ख़दशात हैं कि शरह पैदाइश में मज़ीद कमी आएगी।

इस रुजहान के सख़्त मन्फ़ी असरात सामने हैं। जैसे, एक,  मुस्लिम मुआशरों में काम करने वाली आबादी की तादाद कम हो रही है, क्योंकि कम बच्चे पैदा हो रहे हैं जो उनको ऐसे हालात की तरफ़ ले जा रहा है जैसा मग़रिबी ममालिक सामना कर चुके हैं। दो, जबकि मग़रिब ममालिक ने पहले से ही तालीम, तरक़्क़ी, और ख़ानदान की आमदनी की आली सतह को हासिल कर चुके हैं, और एशिया और अफ़्रीक़ा में ज़्यादा तर मुस्लिम ममालिक की बड़ी आबादी के नाख़्वान्दा, पसमांदा और ख़ानदान की इंतेहाई कम आमदनी के बावजूद आबादियाती जमूद का सामना कर रहे हैं।

गिरती हुई शरह पैदाइश

2009 मैं, पियो फ़ोरम ऑन रिलिजन ऐंड पब्लिक लाईफ़ ने मुसलमानों की आलमी आबादी तक़रीबन 1.6 अरब, या उस वक़्त की आलमी आबादी का 23 फ़ीसद का तख़मीना लगाया था। ताहम, तरक़्क़ी याफ़ता ममालिक में मुसलमानों की आबादी बहुत कम है जो सिर्फ 3 फ़ीसद के आस पास है। इसका मतलब ये है कि मुसलमानों की अक्सरीयत दुनिया के कम तरक़्क़ी याफ़ता हिस्सों में रहती है।

माहिरे सियासी मआशियात निकोलस इबरस्टेट और अपूर्वा शाह की तहक़ीक़ के मुताबिक़ मुस्लिम ममालिक में पैदाइश फ़ी ख़वातीन में तेज़ी से कमी आ रही है। वो लिखते हैं: "जंग (दूसरी आलमी जंग) के बाद की दो दहाईयों मैं शरह पैदाइश में दस में से छः सबसे बड़ी गिरावट मुस्लिम अक्सरीयत वाले ममालिक में दर्ज हुई है (और आगे के ज़माने के लिए भी ये माना जा सकता है कि इंसानी तारीख़ में ऐसा हो सकता है)।

इनमें से चोटी के चार में से सभी मुस्लिम ममालिक हैं? ओमान, मालदीप, कुवैत और ईरान में से हर एक को सिर्फ 20 साल में 4.5 पैदाइश फ़ी औरत से भी ज़्यादा की कमी का सामना करना पड़ा है,  5.3 पैदाइश फ़ी औरत में कमी के साथ ओमान इसमें सरे फ़ेहरिस्त है। चोटी के दस दूसरे ममालिक में दो दीगर मुस्लिम ममालिक में अल्जीरिया और लीबिया हैं।

इबरस्टेट और शाह मज़ीद बताते हैं : "काबिले ज़िक्र है कि अरब दुनिया (अल्जीरिया, लीबिया, कुवैत और ओमान) में पैदाइश में दस में से चार सबसे बड़ी कमी बीस साल के अर्से में दर्ज हुई, इसमें ईरान को शामिल करने पर हम देखते हैं कि इनमें से पाँच टाप टेन अज़ीम तर मशरिक़े वुस्ता में हुआ। दुनिया के किसी और ख़ित्ते में नहीं?  इस कारकर्दगी के क़रीब ना तो बहुत ज़्यादा मोतहर्रिक जुनूब मशरिक़ी एशिया और न ही तेज़ी से जदीद हो रहा मशरिक़ी एशिया आता है।

ये कमी क्या बताती है? शरह पैदाइश में बड़ी कमी आम तौर पर बढ़ती हुई आमदनी की सतह, बढ़ती हुई तालीम और हमल रोकने वाली दवाइयों तक आसान रेसाई के साथ इसे मुंसलिक किया जाता है। क़दामत पसंद और अक्सर पसमांदा मुस्लिम मुआशरों के लिए इन अवामिल में से कोई भी दुरुस्त नहीं हैं। इसके बजाय मुहक़्क़िक़ीन मुस्लिम मुआशरों में "मतलूबा पैदाइश की सतह" को शरह पैदाइश में कमी से मंसूब करते हैं? जैसा कि औरतों की तरफ़ से इज़हार किया गया। वो तालीम या हमल रोकने वाली दवाईयों तक रेसाई तक के अलावा वो तरीक़ा तलाश लिया है जिससे वो  बच्चों को जन्म देने से बच सकती हैं।

इस कमी से मुस्लिम ममालिक में शरह पैदाइश पहले ही मग़रिब की सतह पर आ चुका है। अक़वामे मुत्तहिदा के आदादो शुमार का इस्तेमाल करते हुए मोहक़्क़िक़ीन का कहना है कि "मुस्लिम अक्सरीयत वाले 21 मुल्कों की शरह पैदाइश की सतह इन दिनों अमेरीका के सूबों के लिए ग़ैरमामूली नहीं होगा ... इन 21 ममालिक और ख़ित्तों में तक़रीबन 750 मिलियन लोगों की आबादी का अहाता करता है: जिसे उम्मत की कुल आबादी का तक़रीबन निस्फ़ कहा जा सकता है"। बाक़ी की उम्मत उन ममालिक में रहती है जो पहले ही से कम शरह पैदाइश की सतह से दो चार माने जाते हैं।

नाज़ाईदा मुस्तक़बिल

एक तरफ़ जहां तहक़ीक़ बताती है कि मुसलमानों को बेकार में ख़दशा है कि वो आबादी में बेतहाशा इज़ाफ़ा कर रहे हैं और पूरी दुनिया पर अमले तौलीद के ज़रिए क़ब्ज़ा करने की मंसूबा बंदी कर रहे हैं। लेकिन दूसरी जानिब इससे पता चलता है कि मुस्लिम मुआशरे तारीक और ग़ैर यक़ीनी मुस्तक़बिल की तरफ़ जा रहे हैं।

एक, शरह पैदाइश में कमी काम करने वाली उम्र की आबादी में कमी का क़ब्ल अज़ वक़्त एहसास करा रहा है। कम बच्चे पैदा हो रहे हैं, इसलिए जो लोग बुज़ुर्ग हो रहे या इंतेक़ाल कर रहे हैं उनको मुंतक़िल करने के लिए बहुत कम नौजवान होंगे। अगरचे बहुत से मुस्लिम ममालिक आज बेरोज़गारी के मसले से मुतास्सिर हैं, कल वो अपने खेतों पर हल चलाने, उनकी मशीनों को चलाने या मईशत के दूसरे शोबों में ख़िदमात के लिए लोग न मिलें।

दो, ये जमूद आमदनी, तालीम और समाजी व इक़्तेसादी तरक़्क़ी के बहुत कम सतह वाले मुस्लमि समाज में आ रहा है। मग़रिबी मुआशरों में इसी तरह की शरह पैदाइश में कमी आ रही है लेकिन वो पहले से ही तालीम और ख़ानदान की आमदनी की आला सतह से लुत्फ़ अंदोज़ हो रहे हैं। तकनीकी तरक़्क़ी के साथ ये मुआशरे अपनी आबादी के बुज़ुर्ग होते हिस्से समेत अपना ख़्याल ख़ुद रखने के काबिल हैं। दूसरी तरफ़ मुस्लिम मुआशरों को इससे निमटने के लिए जद्दोजहद करनी होगी।

जैसा के इबरस्टेट और शाह लिखते हैं: "मुस्लिम अक्सरीयत वाली आबादी की एक बड़ी तादाद पहले ही बहुत तेज़ी से बुज़ुर्ग होने की राह पर है... यही मुक़ामात अमेरीका की फी कस आमदनी की सतह के मुताक़ाबिल सिर्फ एक हिस्सा ही लुत्फ़ उठा रहा है, यहां तक कि इक़्तेसादी तरक़्क़ी के बारे में पुरउम्मीद मफ़रूज़ात के साथ भी, मुआसिर ओ.ई.सी.डी. की तालीमी सतह या इल्मी सलाहियत वाली नस्ल की तो बात छोड़िए, ये तसव्वुर करना मुश्किल है कि वो किस तरह मुआसिर ओ.ई.सी.डी. की आमदनी वाली सतह को पहुंचेंगे... किस तरह ये मुआशरे निसबतन कम आमदनी की सतह पर अपनी बुज़ुर्ग आबादी की ज़रूरियात को पूरा करेंगे। उम्मत में जारी पैदाइश से मुताल्लिक़ इन्क़ेलाब की ये शायद सबसे ज़्यादा हैरान करने वाला और ग़ैर मुतवक़्क़ो चैलेंज हो।"

कई दहाईयों से मुस्लिम मुआशरे सेकुलर तालीम, टेक्नोलोजी की तरक़्क़ी और ख़वातीन को काम करने की आज़ादी जैसे जदीद समाजी इक़दार के इमतियाज़ात व ख़ुसुसियात पर बहस कर रहे हैं। यहां तक कि हिंदुस्तान, चीन, ब्राज़ील जैसे कम तरक़्क़ी याफ़्ता ग़ैर मुस्लिम मुआशरों ने तरक़्क़ी के इन "मग़रिबी" तरीक़ों को अपनाया है और तरक़्क़ी की है और मुस्लिम मुआशरे अंग्रेज़ी पढ़ना, कम्प्यूटर पर काम करना और औरतों को दफ़्तर जाने देना, इस्लामी है या नहीं,  इस ना ख़त्म होने वाली बहस में उलझे हुए हैं। ज़ाहिर है, वक़्त तेज़ी से ख़त्म हो रहा है।

सैफ शाहीन, ऑस्टिन, में वाक़े टेक्सास यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कालर हैं। वो न्यु एज इस्लाम के लिए बाक़ायदगी से कालम लिखते हैं।

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