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Hindi Section ( 7 Jan 2013, NewAgeIslam.Com)

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Muslims Needn't Tell Hindus Who, Or What, They Are मुसलमानों को हिन्दुओं के बारे में ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि वो कौन हैं, और क्या हैं

 

सैफ शाहीन, न्यु एज इस्लाम

30 दिसम्बर 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

हाल ही में ऐमन रियाज़ ने दलील दी कि मुस्लिम, यहूदी और ईसाइयों की तरह हिन्दू भी ''अहले किताब'' हैं, या वो समुदाय हैं, जिन तक अल्लाह का पैग़ाम पहुंचा है। इस तर्क से मोहम्मद यूनुस की दलील को और विस्तार मिलता है जो एक साल पहले कुरान में मुशरिकीन (जो खुदा के साथ किसी और को शरीक करते हैं) लफ्ज़ हिंदुओं के लिए नहीं है, शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस लेख और इस तरह के दूसरे लेखों का उद्देश्य इस्लाम को अधिक समावेशी बनाने और मुसलमानों को दूसरे धर्मों, खासकर हिन्दुओं के प्रति अधिक सहिष्णु बनाना है।

हालांकि मैं इस तरह के इरादों की सराहना करता हूँ, लेकिन मुझे अंदेशा है कि इस तरह के तर्क शायद ही उनके तय किये हुए उद्देश्यों को हासिल करने में मदद करते हों। मुझे लगता है कि इसका परिणाम इसके बहुत विपरीत हो सकता है।

यूनुस साहब ने अपने तर्क का आधार दो बातों पर रखा है। सबसे पहले उन्होंने हिंदू संहिताओं का ज़िक्र किया और बताया कि एक खुदा में विश्वास की कल्पना से हिंदू धर्म अपरिचित नहीं था और ये कि प्राचीन समय के संतों में से कुछ एक को एक खुदा में विश्वास ने प्ररित ज़रूर किया होगा, दूसरे शब्दों में उन्हें खुदा का पैग़ाम मिला होगा। दूसरे, उन्होंने आज के हिन्दुओं की कुरान नाज़िल होने के समय के बुतपरस्त अरबों से तुलना पर सवाल खड़ा किया है, जिनके लिए क़ुरान में मुशरिकीन लफ्ज़ इस्तेमाल किया गया है, और ये भी ज़ाहिर किया है कि मुनाफ़िक (पाखण्डी) चरित्र वाले मुसलमान उनसे अलग नहीं हैं। जैसा कि मुसलमानों को मुशरिक नहीं माना जाता है, इसलिए हिन्दुओं के साथ ऐसा व्यवहार करने का कोई आधार नहीं है।

रियाज़ साहब ने भी अपने दावे की दलील में दो बुनियादी तर्क पेश किए हैं। एक, हालांकि केवल कुछ नबियों के नाम का ज़िक्र कुरान में है, ये पूरी स्पष्टता के साथ बताया गया है कि पैगंबर सभी समुदायों के लिए भेजे गए थे। दो, यूनुस साहब की तरह, रियाज़ साहब भी हिन्दुओं और मुसलमानों की पवित्र किताबों के बीच कई समानताओं का उल्लेख किया है। उनकी दलील है कि ये सभी समानताएं ये साबित करती हैं कि हिंदू भी अहले किताब हैं।

इस्लाम धर्म के बारे में अपने सीमित ज्ञान और हिन्दू धर्म की कम समझ के साथ, मैं न ही इस दावे का समर्थन कर सकता हूँ और न ही इसे चैलेंज कर सकता हूँ। लेकिन कई कारणों से, मुझे इस बात में संदेह है कि इससे हिन्दू मुस्लिम सम्बंधों को बेहतर बनाने के उद्देश्य में मदद मिलेगी।

पहली बात ये है कि पारंपरिक रूप से मान्यता प्राप्त अहले किताब यानी यहूदियों, ईसाइयों के साथ मुसलमानों के संबंध बहुत खराब रहे हैं। इन्हीं धार्मिक समूहों के साथ मुसलमानों ने अपने पूरे इतिहास में सबसे खूनी लड़ाईयाँ लड़ी है। ईसाईयों के साथ जंग से लेकर मोजूदा इसराइल- फ़िलिस्तीन की लड़ाई तक । दूसरे अहले किताब की बहुलता वाले समाज में ही मुसलमानों ने ज़्यादातर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया है। ये भी यहूदियों और ईसाइयों की वजह से है कि मुसलमान इस्लामोफ़ोबिया की सबसे बुरी स्थिति से प्रभावित हैं। इसके विपरीत ऐतिहासिक रूप से ऐसे समाज के साथ उनके सम्बंध अच्छे रहे हैं जिन्हें पारम्परिक रूप से अहले किताब नहीं कहा जाता, जैसे हिंदू और बौद्ध। ये मामला आज तक ऐसा ही है।

खुद अपने सबसे खराब दुश्मन

दूसरा कारण ये है कि, मुसलमान अक्सर खुद अपने सबसे खराब दुश्मन होते हैं। सांप्रदायिक हिंसा मुस्लिम समाज के लिए, यहूदियों और ईसाइयों के साथ जंग से अधिक बड़ी मुसीबत है, और ये आज भी बड़ी मुसीबत बनी हुई है। गैर मुस्लिमों के मुकबले सुन्नियों के हाथों शिया लोगों का क़त्ल ज़्यादा हुआ है। अहमदियों के जैसे छोटे सम्प्रदाय इस्लामोफ़ोबिया या अन्य प्रकार की धार्मिक कट्टरता से कहीं अधिक मुस्लिम समुदायों के हाथों पीड़ित हैं। यहां तक कि शांतिपूर्ण समाज भी सालों साल तक सांप्रदायिक लड़ाई का शिकार रहे हैं, जैसा कि इराक में सद्दाम हुसैन के शासन के खातमे के बाद हुआ। पाकिस्तान जिसे पूर्ण इस्लामी समाज समझा जाता था, अब वो इस बात की मिसाल है कि एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से कितनी सख्त नफरत कर सकता है। और हम यहाँ सिर्फ़ धार्मिक मतभेद की बात कर रहे हैः जब हम मुसलमानों के बीच नस्लीय और जातीय भेदभाव को सामने लाते हैं तो चीजें और भी बुरी नज़र आती हैं।

इसलिए अहले किताब होने के नाते एक सम्प्रदाय का मुसलमानों के साथ अच्छे संबंधों की कोई गारंटी नहीं है। दरअसल मुसलमान होना भी अपने आप में ऐसी उम्मीद नहीं जगाता। इसलिए हिन्दुओं के भी अहले किताब होने का तर्क देने से भी हिंदू मुस्लिम संबंधों में सुधार की गुंजाइश बहुत कम है। वास्तव में ये स्थिति को और भी खराब कर सकता है। अगर आमतौर पर मुसलमान ये यक़ीन करना शुरू कर दें कि हिंदू ''मुशरिकीन'' नहीं, बल्कि वो 'अहले किताब' हैं, तो वो हिंदुओं से भी उम्मीद करना शुरू कर देंगे कि वो बुतों के सामने पूजा न करें। यहाँ तक कि वो हिन्दुओं से ये भी उम्मीद लगा सकते हैं कि वो बहुदेववाद को छोड़ कर  'एक सच्चे खुदा में यक़ीन करना शुरू कर दें।

दरअसल उग्रवादी मुसलमान आम तौर पर हिन्दुओं के खिलाफ हिंदू विश्वासों और प्रथाओं के कारण लड़ाई नहीं छेड़ते, क्योंकि वो हिंदुओं को एक दूसरे धर्म से सम्बंध रखने वाले के तौर पर मान्यता देते हैं, जबकि वो कुछ मुसलमानों को बुरा भला कहते हैं और उन्हें क़त्ल करते हैं, जैसे कि हिंदू प्रथाओं के कारण बरेलवियों को। भारत में मुसलमानों की हिंसा को मुसलमानों के खिलाफ वास्तविक या कथित भेदभाव के कारण याद किया जाता है किसी और कारण से नहीं। हालांकि एक बार अगर मुसलमान ये स्वीकार करना शुरू कर दें कि हिंदू ''मुशरकीन'' नहीं बल्कि अहले किताब हैं, तो हम आसानी से एक ऐसे मुस्लिम समाज के एक वर्ग की कल्पना कर सकते हैं जो हिन्दुओं को ये बताये कि किस तरह इब्राहीमी विश्वास के अनुसार उन्हें अपने धर्म का पालन करना चाहिए। उनका ऐसा न करना केवल समस्या को और तूल देगा और अनावश्यक दुश्मनी को पैदा करेगा।

जैसा कि मैंने शुरू में ही ज़िक्र किया कि रियाज़ और यूनुस साहिबान का मकसद कि मुसलमानों को दूसरे धर्मों और खासतौर से हिंद धर्म के प्रति और अधिक सहिष्णु होना चाहिए, ये काबिले तारीफ है। इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच सैद्धांतिक और आध्यात्मिक समानताएं तलाश करना भी समान रूप से प्रशंसा योय है। लेकिन 'समानताएं' तलाशना  और 'सम्बंध' तलाशना एक समान नहीं है। दोनों के अर्थ अलग हैं और परिणाम भी अलग हैं। कोई भी समानता पैदा कर सकता है, या कम से कम समानता की उम्मीद पैदा कर सकता है। जब ये उम्मीद पूरी नहीं होती है, और हो भी नहीं सकती, क्योंकि हिन्दु लोग खुद ही इस बात की कोई परवाह नहीं करते हैं कि वो 'अहले किताब' 'या' मुशरिकीन'' हैं या नहीं- ये नफरत, दुश्मनी और खून खराबा की ओर ले जा सकता है।

हिन्दुओं के अहले किताब न होने में कोई बुराई नहीं है। और हिन्दुओं के 'मुशरिकीन' होने में भी कोई बुराई नहीं है। हिंदू क्या हैं, और क्या नहीं, इस पर सिर्फ उनको ही विचार करना है। हम जैसे मुसलमानों को इसमें कुछ नहीं कहना चाहिए, और न ही ये हमारा काम होना चाहिए।

हालांकि तमाम मुशरिकीन, या सभी गैर अहले किताब, या सभी गैर मुस्लिमों, या ऐसे मुसमानों को जिनका संबंध एक विशेष समुदाय से नहीं है, उन्हें धार्मिक कर्तव्य के रूप में क़त्ल करने के मुसलमानों के विश्वास में ज़रूर बुराई है। मेरी, यूनुस और रियाज़ साहिबान जैसे मुसलमानों की इस मसले में राय है, और हमें अपने काम के तौर पर इसे जारी रखना चाहिए।

सैफ शाहीन न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कालम लिखते हैं, और वो अमेरिका के आस्टिन में स्थित युनिवर्सिटी आफ टेक्सास में पोलिटिकल कम्युनिकेशन के रिसर्च स्कालर हैं।

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