
सैफ़ शाहीन, न्यु एज इस्लाम
18 दिसम्बर 2012
आज बहुत से मुसलमान अपने विश्वास को कुछ खास मूल्यों जैसे धार्मिक सहिष्णुता, मानवाधिकारों, महिलाओं के अधिकार, लोकतंत्र, धर्म और राजनीति के अलगाव, वैज्ञानिक सोच आदि के मामले में आधुनिक दौर के मानकों के करीब करने के लिए धार्मिक सुधार की आवश्यकता महसूस करते हैं। पिछले दो दशकों में आतंकवाद के बढ़ाने से और मुट्ठी भर आतंकवादियों द्वारा इस्लाम की गलत व्याख्या ने इस इच्छा को विशेष रूप से पश्चिम में मुसलमानों के बीच और मुस्लिम देशों में शिक्षित वर्गों को बीच दबा दिया है।
लेकिन ख्वाहिश की कोई नई बुनियाद नहीं है। उन्नीसवीं सदी में और बीसवीं सदी के शुरूआत में अलनहदा क्रांति के दौरान जिसे कम ही याद किया जाता है। मुस्लिम विद्वानों की एक बड़ी संख्या मुस्लिम संस्कृति, राजनीति और समाज में यूरोपीय मूल्यों को शामिल करने की इच्छुक थी। उस वक्त एक सवाल था, और अभी भी बाकी है: ये सुधार कैसे दिखना चाहिए?
प्रारंभिक सुधारक जैसे 'रफा अलतहतावी’ ने आधुनिकता और यूरोप को समानार्थी समझा: उनके अनुसार आधुनिकता और हर संभव स्थिति में यूरोपियन बनने के लिए अपने पारंपरिक जीवन शैली को छोड़ देना बहुत महत्वपूर्ण था। इसके मुकाबले जमालुद्दीन अफ़ग़ानी ने इस्लाम से प्रभावित सुधार पर ज़ोर दिया। उनके अनुसार इस्लामी शिक्षाओं का गठन आधुनिकता के बुनियादी सिद्धांत के साथ हुआ है, इसलिए मुस्लिम समाज के लिए आधुनिकता आवश्यक होते हुए भी उन्होंने ऐसा करने के लिए इस्लाम को छोड़ने की ज़रूरत नहीं।
अलनहादा का खात्मा बीसवीं सदी के बीच अरब राष्ट्रवाद आंदोलन में सिर्फ सैन्य तानाशाह के दबाए जाने, व्यंग के तौर पर एक इशारे पर आधुनिक यूरोपीय राष्ट्रों के रहमो करम पर हुआ (राष्ट्रवाद, ये याद होना चाहिए, ये खुद एक आधुनिक यूरोपियन योजना है)। इस बदलाव ने बीसवीं सदी के अंत में अनगिनत अतिवादी और गैरअतिवादी इस्लामी आंदोलनों को जन्म दिया है।
सुधार के नये दृष्टिकोण
लेकिन इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है। इन आंदोलनों की दरिंदगी और वैचारिक कंगाली और राजनीतिक रूप से बुरी नाकामी को इस आंदोलन में और व्यापक मुस्लिम समाज में सुधार के लिए पुनर्जीवन प्रदान किया है। जो मुसलमान खुद को उदारवादी, आज़ाद खयाल वाले और प्रगतिशील मानते हैं, और आधुनिक दुनिया के अधिक अनुकूल हैं, वो बढ़ती हुई संवेदनशीलता का शिकार हो गये हैं। पश्चिम के ईसाइयों के विपरीत, इस्लामी दुनिया सुधार की प्रक्रिया से कभी नहीं गुज़री, और मुस्लम समाज में जो कुछ भी गलत है उसके लिए वो इस कमी को दोषी ठहराते हैं।
लेकिन अब्दू की मौत के एक सदी बाद ये कि सुधार का मतलब क्या होना चाहिए, इस पर एक आमराय ज़रूर सिर्फ आम लोगों के बीच ही नहीं बल्कि विद्वानों के बीच भी पैदा हुई है। जो लोग सुधार की ज़रूरत की बात करते हैं, वो इस बात में विश्वास रखते हैं कि इल्में फ़िक़्ह (धर्मशास्त्र) के स्थापित मदरसे आधुनिक दौर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए या तो नाकाफी हैं, या गुमराह करने वाले या इस्लाम की सच्चाई के विपरीत हैं। इनमें से अधिकतर को ये महसूस होता है कि इस्लाम के धार्मिक कानून को आधुनिक दौर की वास्तविकताओं की रौशनी में दोबारा पेश करने की ज़रूरत है, ताकि इस तरीके से धर्म प्रासंगिक बना रहे जैसा कि आज के समय में ये मुसलमानों के लिए उपयुक्त है।
तारिक़ रमज़ान ने इस दृष्टिकोण को 'अनुकूली सुधार' का नाम दिया है जिसका मकसद मुस्लिम समाज को आधुनिक दौर के अनुकूल बनाने में सुविधा प्रदान करना है। जबकि खुद उनका सोचना है कि इस तरह के सुधार काफी नहीं होंगे। वो ऐसे 'परिवर्तनकारी सुधार' के लिए दलील देते हैं जो कि इस्लामी कानून और आदर्श के स्रोतों को चुनौती देगा जोकि आज लोकप्रिय हैं। वो सदियों पुराने इस धर्म की रूढ़िवादिता को खत्म करना चाहते हैं और इस्लाम को उसके वास्तविक, उचित और आध्यात्मिक मूल्यों के साथ अनुकूल बनाना चाहते हैं। और वो ये चाहते हैं कि वैज्ञानिक और सामाजिक वैज्ञानिक इस प्रक्रिया का हिस्सा बनें। इस्लामी साहित्य के उन मूल्यों को घटाने के लिए जो कानून और आदर्श के मामले में हदीस के अनुरूप हैं, दूसरे उलमा ने भी इन पर बुनियादी तौर पर दोबारा विचार करने के लिए दलील पेश की है, और कुरान के उन हिस्सों की पहचान करने के लिए जिनके बारे में उनका मानना है कि अब वो प्रासंगिक नहीं रहे।
अनुकूल और और परिवर्तनकारी दोनों सुधार, मुस्लिम दुनिया में यूरोपियन सुधार को फिर से पेश करने के उनके मकसद से दूर हैं, और वो इसी तरह हैं जैसे विशेष मामलों में आम दृष्टिकोण अख्तियार करना। और ये इसलिए है क्योंकि यूरोपीय सुधार ने मानवाधिकार के आधुनिक मूल्यों, लोकतंत्र और वैज्ञानिक सोच को दिमाग में नहीं उतारा। ये मूल्य बाद में खुद यूरोपियों के धर्म के अर्थ में परिवर्तन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक नतीजों के रूप में प्रकट हुए।
यूरोप में सुधार का धार्मिक निहितार्थ धर्मनिरपेक्षता के दौर की शुरुआत थी। धर्मनिरपेक्षता को अक्सर नास्तिक या खुदा में विश्वास के खिलाफ समझा जाता है। सुधार के बाद यरोपीय समाज में विज्ञान को धर्म की जगह माना जाता था। लेकिन ये पायी गयी बुद्धिमत्ता ग़लत है। आम लोगों की तो कोई बात नहीं, यूरोप का हर एक बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक, गैलीलियो से आइनस्टाईन तक सभी खुदा में विश्वास रखते थे।
धर्मनिरपेक्षता का क्या मतलब है
धार्मिक दार्शनिक होने के नाते चार्ल्स टेलर ने समझाने के तौर पर ये दलील पेश किया कि धर्मनिरपेक्ष काल का मतलब ख़ुदा की मौत नहीं होता। बल्कि इसका मतलब इस बात से होता है कि किस तरह लोग खुदा को समझना और दूसरे धार्मिक विचारधारा को समझना शुरू करते हैं। वो खुदा जिसका अस्तित्व बाहरी था और जो इस जमीन और दुनिया के जूसरे भागों का स्वामी था, इंसाने के अंदर घर करके उस खुदा का अस्तित्व आंतरिक हो गया। स्वर्ग और नरक ऐसे स्थान से जहां मौत के बाद आत्माएं जाएंगी, उससे सुख और दुख में बदल गया, जिसे लोग अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में अनुभव करते हैं। दिव्यता इतनी गूढ़ नहीं थी; इसके बजाय वो अस्तित्व के भौतिक क्षेत्र में अंतर्निहित हो गया।
इस गहरे आध्यात्मिक परिवर्तन की जड़ें बहुत यांत्रिक थी। प्रिंटिंग प्रेस के ईजाद ने साक्षरता के क्षेत्र में एक नाटकीय परिवर्तन को जन्म दिया और साथ ही साथ बड़े पैमाने पर बाइबल की प्रिंटिंग में मदद की। जल्द ही लगभग हर घर में बाइबिल था जिसे कोई भी पढ़ सकता था। दरअसल लोगों ने निजी बाइबिल रखना शुरू कर दिया। इसने धीरे धीरे धर्म को सामाजिक से निजी रुझान में बदल दिया और इसने चर्च की शक्ति और दर्जे को कम कर दिया। जब लोग बाइबल रखने लगे और इसे खुद पढ़ने लगे, तो उन्होंने खुदा से अपने सम्बंध खुद जोड़ने लगे और धार्मिक विचारों को व्यक्तिगत बनाना शुरू कर दिया। दूसरे शब्दों में खुदा उनके अंदर घर कर गया।
इस बड़े बदलाव ने इंसानों को प्रयास करने वाला और साहसी बना दिया। इसने लोगों में चेतना पैदा की, कि इंसानों को खुद ही करना पड़ेगा बल्कि उसे अपने दम पर करने की ताकत थी। ये वैचारिक बदलाव औद्योगिक क्रांति के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। जिस तरह आध्यात्मिक दुनिया की सभी कल्पनाएं भौतिक विज्ञान में घर कर गई इसी तरह प्रौद्योगिकी जादू का नया स्रोत बन गया। शेक्सपियर ने The Tempest के अंत में इस परिवर्तन का चित्रण बड़ी खूबसूरती से किया, जब उसका नायक प्रोस्पेरो अपनी जादुई ताकत को इंसानों के साहस को देखते हुए छोड़ता है और दूसरे इंसानों के बीच रहने के लिए उस द्वीप को छोड़ता है जहां वो अपने जादू के साथ रहता था।
मानव शक्ति और उद्यम की ये बढ़ती हुई भावना मिल्टन और मिल्स की उदारवाद की धारणा का अग्रदूत बनी। वो कल्पना कि हर इंसान आज़ाद पैदा होता है और जो चाहे चयन कर सकता है। कार्टीजियन बुद्धिवाद और एक इंसान के रूप में नैतिकता की कांट की पुनर्अवधारणा के रूप में खुदा के ज़रिए स्थापित की गयी नैतिकता का विरोध किया गया। समय के साथ इन विचारों ने चर्च और राज्य के अलगाव, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र, वैश्विक मानवाधिकार और महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में विचारों की अवधारणाओं के जन्म और ज़्यादातर दूसरे विचार जो आधुनिक समाज के निर्माण के आधार माने जाते हैं, उनके गठन में मदद की। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में खुदा का कभी इंकार नहीं किया गया और न ही कभी धर्म की आलोचना की गयी था। इसे जिस तरह से लोग समझते थे वो चीजें बदल गयीं।
मुसलमानों के लिए सबक़
आज मुसलमान इस इतिहास से क्या अर्थ निकाल सकते हैं? किसी को भी गर्व का एहसास हो सकता है। इसलिए कि स्पष्टता के साथ इतिहास लिखा गया है कि यूरोप वैज्ञानिक, तकनीकी और दार्शनिक प्रगति में मुसलमानों का एहसानमंद है, जिन्होंने न सिर्फ प्राचीन पूर्वी किताबों का अनुवाद यूरोपियन भाषाओं में किया बल्कि उनमें बहुत सारे क्षेत्रों अहम योगदान भी दिया। इन सबसे अलग, मुस्लिम सुधारकों को सुधार के अपने संघर्ष की दिशा और ज़ोर पर दोबारा विचार करना चाहिए।
सुधार धार्मिक किताबों में सिर्फ एक परिवर्तन नहीं था। ये व्यवहार और दर्शन में एक परिवर्तन था, लोग दुनिया को किस तरह देखते हैं और जो इस दुनिया से परे हैं (या नहीं है) उसमें एक परिवर्तन था। सबसे ज़्यादा अहम ये बात थी कि लोग खुद को कैसे देखते हैं। और यही इस्लामी सुधार का लक्ष्य भी होना चाहिए। इस्लामी कानून के स्रोत और उनकी व्याख्या और संबंधित महत्व का कुरान और हदीस के अनुसार समीक्षा करने के महत्व में कोई शक नहीं है। लेकिन मुसलमानों को इन सबसे ऊपर उठकर सोचने की ज़रूरत है। उन्हें दुनिया की तरफ सिर्फ आखिरत की तैयारी के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उस ज़िंदगी के लिए देखना चाहिए जो उन्हें मिली है , कम से कम ऐसे सचेत व्यक्ति के रूप में जैसा वो खुद को जानते हैं।
खासकर उन्हें खुद को एक 'मुस्लिम' ही नहीं समझना चाहिए, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति समझना चाहिए जो साधन सम्पन्न और उद्यमी है, और वो जैसा जीवन जीना चाहे उसके चयन का मौका है और दूसरें भी ऐसा कर पायें, वो उससे जुड़ी जिम्मेदारी उठा सकता है। अगर मुसलमानों को मुसलमान न होने पर दूसरों की हत्या से रोकना है, अच्छे मुसलमान न होने के आधार पर दूसरों की हत्या से रोकना है, दूसरे मुसलमानों को बुर्का पहनने और दाढ़ी रखने पर मजबूर करने से रोकना है और खुद को वैश्विक मुस्लिम विरोधी साजिश के शिकार एहसास करने से रोकना है जो जवाबी वार करना चाहते हैं, तो उनकी व्यक्तिगत पहचान के निर्माण में विकल्प की ये आज़ादी काफी अहम है।
सैफ शाहीन न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कालम लिखते हैं, और वो अमेरिका के आस्टिन में स्थित युनिवर्सिटी आफ टेक्सास में पोलिटिकल कम्युनिकेशन के रिसर्च स्कालर हैं।
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