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Hindi Section ( 13 May 2014, NewAgeIslam.Com)

A Community which Lives on Prayers rather than Medicine दवाओं के बजाय सिर्फ दुआओं पर जीने वाला समाज

 

सादिक रज़ा मिस्बाही, न्यु एज इस्लाम

25 अप्रैल, 2014

आप कहीं इंटरव्यू के लिए जाएं और आपके नंबर 45 फीसद हों और आपके हिन्दू साथी के 40 प्रतिशत, तो मुमकिन है मार्क्स ज़्यादा होने के बावजूद आप के साथ भेदभाव किया जाए और आपके हिंदू साथी का चयन कर लिया जाए। लेकिन अगर 45 के बजाय आपके मार्क्स 80 या 90 फीसद हों तो यकीन कर लीजिए आपको भेदभाव की शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।

आप बिज़नेसमैन हैं, मार्केट की उभरती डूबती कीमतों और वस्तुओं की कदर व कीमत पर गहरी निगाह रखते हैं तो आपको देखना पड़ेगा कि इस समय मार्केट वैल्यू किस चीज़ की है। अगर आप उसी तरह का माल बाज़ार में पेश करेंगे तो आप नाकाम भी हो सकते हैं, लेकिन अगर आप इससे अच्छी गुणवत्ता का माल लाकर रख देंगे तो निश्चित रूप से आप का माल सबसे ज़्यादा बिकेगा। ख़रीदार ये नहीं देखेगा कि दुकानदार मुसलमान है बल्कि आपके माल की क्वालिटी उसे आपके पास आने पर मजबूर कर देगी। खरीदार की नज़र किसी की जाति, धर्म और विचारधारा पर नहीं होती बल्कि गुणवत्ता और क्वालिटी पर होती है। ग्राहक बिना मानक वाली वस्तु को देखता तो है मगर खरीदने के इरादे से नहीं बल्कि उस पर उचटती सी निगाह डालता है और आगे बढ़ जाता है।

ये तथ्य बताता है कि क्वालिटी और मानक ऐसी चीज़ हैं जो बदतरीन दुश्मनों और बड़े पक्षपाती को भी आपकी तारीफ  करने पर मजबूर कर देती है। ये दौर प्रतिस्पर्धा का है, गुणवत्ता का है, क्वालिटी का है। आप अगर चाहते हैं कि आपकी मार्केट वैल्यू बढ़ जाए और लोग आपकी तरफ आकर्षित हो जाएं तो आपको मार्केट का स्वभाव समझना होगा और उसी के अनुसार तैयारी करनी होगी। इसके बाद जब आप मैदान में उतरेंगे तो निश्चित रूप से कामयाबी खुद बखुद आपका स्वागत करेगी। दूसरे शब्दों में केवल शिकायत करने से कुछ नहीं होगा बल्कि आपकी मार्केट वैल्यू कम होती जायेगी और आप पिछड़ेपन के कीचड़ में चिपकते चले जाएंगे।

इससे एक सिद्धांत समझ में आया कि मैच जीतने के लिए सिर्फ ज़मीन पर जमे रहना काफी नहीं होता बल्कि अच्छा प्रदर्शन भी करना पड़ता है इसलिए अब ये शिकायत बन्द होनी चाहिए कि मुसलमानों को हिंदुस्तान में नौकरी नहीं मिलती, उनके साथ दुश्मनी बरती जाती है, अनुचित व्यवहार किया जाता है, उन्हें तिरछी नज़रों से देखा जाता है और उन्हें पिछड़ा बना दिया गया है। आदि। विचार इस पर करना चाहिए कि उनका शैक्षिक रिकॉर्ड क्या है, आपके कितने बच्चे TOP कर रहे हैं, आपने अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी को कितनी ईमानदारी से अंजाम दी हैं और इस पूर्वाग्रह को बेअसर करने के लिए क्या अनुशासन और योजना बनायी है?

इंसान का जीवन दो अहम तत्वों से बंधा हुआ है, एक अधिकार और दूसरा ज़िम्मेदारी। इन दोनों को अदा किये बिना ज़िंदगी शिकायतों, दूरियों, गलतफ़हमी, झगड़ों, नफरतों और दुश्मनियों के खंडहर में तब्दील हो जाती है और इंसान अन्दर ही अन्दर सुलगता रहता है। इन दोनों यानि अधिकार को अदा करने और ज़िम्मेदारी को अंजाम दिये बिना ज़िंदगी गुज़ारी तो जा सकती है मगर ऐसी ज़िंदगी का मकसद ही क्या जो दुख दर्द से इस तरह ग्रस्त हो कि हलका सा एक झटका भी इंसान को बिखेर कर रख दे। ये तत्व ज़िंदगी के दो पहिए होते हैं और ज़िंदगी के ट्रैक को इस बेहतर अंदाज़ से आगे ले जाते हैं कि इंसानों को उनकी मंज़िल तक पहुंचने में दिक्कत नहीं होती। आप जीवन के किसी भी क्षेत्र से जुड़े हों जब तक आप अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरी नहीं करते आप अपने अधिकारों की मांग करने के दावेदार नहीं हो सकते हैं। बस यही ​​फर्क है जो हमारी समझ में नहीं आता या हम समझना नहीं चाहते। हम अपने अधिकारों की मांग तो बड़े दावे के साथ करते हैं और दूसरों के सामने शिकायत की गठरी खोल कर रख देते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों से आंखें चुराते हैं। दूसरे शब्दों में खुद तो काम नहीं करते मगर दूसरों से काम की उम्मीद रखते हैं।

जनता का एक बड़ा बहुमत सिर्फ खुदा के भरोसे के दावे के साथ जीना चाहता है, मेहनत करने, आगे बढ़ने और कुछ कर दिखाने का जज़्बा नहीं रखते। उसका इस्लाम से दूर का भी कोई रिश्ता नहीं। धर्म नीति और भाग्य दोनों के संयोजन का नाम है। धर्म ने तदबीर करने के लिए प्रेरित किया है और तकदीर को वास्तविकता समझने का भी हुक्म दिया है। उपाय से किनारा करके सिर्फ तकदीर के भरोसे जीने वाले वही हैं जो अपने दायित्वों को अदा करने से कतराते हैं और जब उनके अधिकार छीने जाते हैं, तो विरोध की आवाज़ सबसे पहले इन्हीं की तरफ से उठाई जाती है। इस्लामी सिद्धांत तो ये है कि आप जो करना चाहते हैं उसके लिए भरपूर मेहनत करें और अपनी भरपूर कोशिशें जारी रखें फिर इसके बाद अल्लाह से दुआ करें कि ऐ अल्लाह! मुझसे जितना हो सकता था मैंने किया अब नतीजा तेरे हाथ में है।

मेहनत और कोशिश की सबसे अच्छी और महान मिसाल जंगे बदर की घटना है। जंगे बदर के बारे में 313 और 1000 का ज़िक्र बहुत बार होता है लेकिन इसमें जो पैग़ाम निहित है उसे भुला दिया जाता है। इस जंग में सहाबा की संख्या सिर्फ 313 थी जबकि उनके मुकाबले में काफिर एक हज़ार की संख्या में थे। सहाबा के पास लड़ने के लिए हथियार भी कम थे, भोजन और सवारियाँ न होने के बरारबर थीं। दूसरी ओर काफिरों के पास हथिायार भी थे, सवारियां, भोजन और लोगों की संख्या भी थी। नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने एक एक ऊंट पर तीन तीन सहाबियों को सवार कराया, जिनके पास तलवार नहीं थीं उन्हें पेड़ों की सूखी टहनियाँ दी गईं। मुसलमानों से जितना कुछ सम्भव हो सकता था उन्होंने किया। जब जंग का नक्कारा बजा और मैदाने बदर में मुसलमान और काफिर एक दूसरे के सामने पंक्तिबद्ध हो गए तो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुदा के हुज़ूर में दुआ फरमाई और कामयाबी की मांग की और अल्लाह ने उनकी मदद के लिए पांच हज़ार फरिश्ते उतार दिए। कुरान मजीद में है इन तस्बेरू वतत्तक़ू वयातूकुम मन फौरेहिम हाज़ा यमदिदकुम रब्बकुम बेखमसते अल्फिम् मेनल मलाएकते मुस्वमीन (अनुवाद) यदि तुम धैर्य से काम लो और डर रखो, फिर शत्रु सहसा तुम पर चढ़ आएँ, उसी क्षण तुम्हारा रब पाँच हज़ार विध्वंशकारी फ़रिश्तों से तुम्हारी सहायता करेगा ( सूरे आलइमरान: 125)

इस घटना ने कई नियम तय कर दिए। (1) दुआ उसी समय की जाती है जब तैयारी पूरी हो जाती है। (2) खुदा की मदद उसी को मिलती है जो सारी तैयारी करके बड़ी विनम्रता के साथ उससे मदद माँगता हो। (3) अगर आप सच्चे, ईमानदार के जज़्बे से लैस हैं तो खुदा की मदद ज़रूर आयेगी। (4) आपके पक्ष की सच्चाई उस समय की  सुपर पावर को भी हारने पर मजबूर कर देगी। (5) लीडर अगर सच्चा, खरा और ईमानदार हो तो उसके मानने वाले संसाधन न होने का बहाना नहीं बनाते और जान देने को तैयर हो जाते हैं। (6) जंगे, हथियारों और भौतिक संसाधन से अधिक गहरी भावनाओं, मज़बूत हौसलों और भरपूर इच्छाशक्ति से लड़ी जाती है। (7) अगर तैयारी पूरी हो तो कामयाबी की संभावना अधिक उज्जवल होती है।  

युद्ध के मैदान में आने से पहले और काफिरों से मुकाबला के लिए नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से बतौर इंसान जो कुछ हो सकता था उन्होंने किया। अपने प्रयासों, मेहनतों, तैयारियों और बलिदान का सारा सरमाया समेट कर मैदाने बदर में ले आए। सिर्फ दुआओं पर भरोसा नहीं किया। दुआ के लिए उस समय हाथ उठाये जब सारी तैयारियां पूरी हो गईं और स्पष्ट रूप से इससे अधिक प्रयास करना उनके लिए सम्भव नहीं रहा। अगर वो चाहते तो दुआओं के सहारे ही काफिरों को शिकस्त दे देते। खानए काबा के साये में दुआ फरमाते सारा अरब मुसलमान हो जाता मगर ये जंगें क्यों बरपा की गईं, सहाबा को जिहाद क्यों करना पड़ा? इसलिए कि बंदा सिर्फ दुआओं के सहारे ही न बैठ जाए और भौतिक संसाधन का उपयोग छोड़ न दे। इस्लाम व्यावहारिक धर्म है, वो पूरी दुनिया को ये संदेश देता कि मेहनतों और कोशिशों से तकदीरें बदलती हैं फिर इसके बाद ही अल्लाह से मदद माँगी जाती है।

जब तैयारी पूरी हो, इससे अधिक प्रयास करना हमारे बस में न हो और हम खुदा के हुज़ूर गिड़गिड़ा कर उसकी मदद माँगे तो खुदा ऐसे रास्ते से हमारी मदद फरमाता है जो किसी के सपने और विचार में नहीं होता। इसके विपरीत अगर हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और अपना भविष्य खुदा की प्रकृति के हवाले कर दें और इच्छित सफलता न मिलने पर शिकायत करें कि खुदा को एसा ही मंज़ूर है तो अव्यावहारिकता कहलायेगी। और अल्लाह अमल न करने वालों की मदद को आगे नहीं आता।

हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हू से रिवायत है, एक सहाबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के हुज़ूर में हाज़िर हुए और ये पूछा किः आक़ेलहा वतावक्कल अव-उतलेक़ोहा वतवक्कल क़ाला- ऐ अल्लाह के रसूल! मैं ऊँटनी को बांध कर भरोसा करूँ या उसे छोड़ कर भरोसा करूँ। हूज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया इसे बांधो फिर भरोसा करो।

ये रवायत सुनन तिर्मज़ी में विभिन्न तरीक़े से आई है। इस हदीस से ये सबक़ मिलता है कि पहले इंसान अपने तौर पर पूरी कोशिश कर ले इसके बाद अल्लाह पर भरोसा करे क्योंकि जो अपनी मदद आप करता अल्लाह भी उसकी मदद फरमाता है और जो अपनी मदद नहीं करता तो अल्लाह उसको यूँ ही छोड़ देता है। अल्लाह ने इंसानों को पैदा किया और जन्नत और जहन्नम प्राप्त करने को उसके अमल पर निर्भर किया। अल्लाह को मालूम है कि कौन जन्नती और कौन जहन्नमी मगर बंदे को उसको अमल का मालिक बनाने का क्या मतलब है, ये दुनिया अमल करने की जगह है। यहाँ जो अमल करता है, कोशिश करता है, मेहनत और संघर्ष की वेदी में खुद को कुर्बान करता रहता है वही सफल होता है।

आज हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं उसमें मेहनत का अर्थ बदल गया है, आज उसी की मेहनत रंग लाती है जिसके अंदर गुणवत्ता पायी जाए। मेहनत और कोशिश में अगर क्वालिटी न हो तो उस समय के शब्दकोष में ऐसे अमल को मेहनत नहीं कहते। निश्चित रूप से हम मेहनत भी कर रहे हैं लेकिन हमारे अंदर मुक़ाबले का वो आवश्यक जज़्बा नहीं पाया जाता है जो गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। हमारी इच्छा होती है कि थोड़ी सी मेहनत से हमें वांछित सफलता प्राप्त हो, आज के दौर में ये असंभव है। व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर हमें अपनी मेहनत और तैयारी की सबसे ऊँची चोटी तक पहुँचना होगा और मिल्लत के साझा हितों के लिए भी अपने हिस्से का पानी डालना होगा तभी मिल्लत का ये पेड़ फलदार होगा और इसके फैलते साये हमें ठंडक पहुँचाएगें। जब तक इंसान अपने अपने हिस्से का पानी नहीं डालेगा हालात वैसे के वैसे बने रहेंगे। हम लोगों से तो वो मेंढक अच्छा है कि जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को नमरूद ने आग में डाला तो वो अपने मुंह में पानी लाकर आग बुझाने की कोशिश करने लगा। ज़ाहिर है आसमान से बातें करती हुई आग एक मेंढक के मुँह के पानी से कैसे बुझ सकती है। उसके मुंह में पानी ही कितना आता है, इससे सुलगते हुए अंगारों को भी ठण्डा नहीं किया जा सकता। लेकिन उसने अपने स्तर पर प्रयास तो किया और अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार आग बुझाने के लिए आगे तो बढ़ा। अगर ये भी हमारी ही तरह सोचता कि हमारी मेहनत से क्या होगा तो वो ये नेक काम भी न कर पाता और न खुदा के यहाँ इनाम के लायक करार पाता। इसलिए कुछ उलेमा ने मेंढक को मारने से मना किया है।

यक़ीन माने तो हम इस मेंढक से भी गए गुज़रे हैं जो हमेशा ज़िम्मेदारी न निभाने का बहाना तलाशते हुए कहते हैं कि हम जैसे नाकारा आदमी की छोटी मोटी कोशिश से क्या हो जाएगा। आप समाज का सर्वे कर लें लगभग हर इंसान यही कहता मिलेगा। दुनिया में कौन है जिसे ये हक़ीक़त पता न हो कि कतरा कतरा समंदर होता है। अगर हर इंसान अपनी अपनी  ज़िम्मेदारी निभाए तो मेहनतों और संघर्षों का एक ऐसा पहाड़ खड़ा हो जाए जो टकराने वालों को  टुकड़े टुकड़े कर दे।  सामूहिक रूप से न सही व्यक्तिगत तौर पर ही अगर हम आगे बढ़ें और खुदान करे नतीजा न भी निकलें तो कम कम हम जवाबदेही से तो बच ही जाएंगे।

ये भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि इस समय चूंकि मानकों का सांचा बदल गया है इसके लिए प्रयासों और मेहनतों का तरीका भी बदलना चाहिये। बदलते परिदृश्य में मेहनत और तैयारी का अर्थ ये है कि जैसा सवाल हो उसी तरह का जवाब दिया जाए। मेहनत का मतलब सिर्फ मेहनत करना नहीं बल्कि सही दिशा मैं मेहनत करना है। और जिस प्रकार की मेहनत आवश्यक है वैसी मेहनत करनी है अन्यथा परिणाम अच्छे नहीं आएंगे। आज भी कुछ लोग अतीत में जीवन गुज़ार रहे हैं।  उनका चलना फिरना वर्तमान समय में है लेकिन काम करने का ढंग अतीत जैसा ही है। अगर दुश्मन आधुनिक तकनीक के सहारे हमला कर रहा है तो ज़ाहिर है उसी के अनुसार जवाब भी देना होगा, दूसरे तरीके में ये जवाब नहीं होगा मूर्खता होगी और धर्म और दुनिया की नामसझी भी कहलाएगी। आज धर्म को बढ़ावा देने की महज़ बातें करना मगरा इसके लिए मौजूदा अत्याधुनिक उपकरण, प्रचार और प्रसार और मीडिया के इस्तेमाल को भी पाप समझना बेहद सरलता वाली बात है। धर्म के प्रयार प्रसार के लिए आधुनिक संसाधनों से परहेज़ करना ऐसा ही है जैसे कोई बीमारी के इलाज के लिए दवाएं खाने के बजाय सिर्फ दुआएं करने और कराने पर संतोष करे। ऐसे लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि उनको मेहनत, कोशिश, संघर्ष, तैयारी और योजना बनाने की भी जानकारी नहीं है। तैयारी उसी वक्त तैयारी कहलाती और परिणाम देने वाली होती जब परीक्षा हॉल में आने वाले पर्चे के अनुसार की जाए। अगर आप सिर्फ खुदा केफज़ल (अनुग्रह) के सहारे परीक्षा स्थल में पर्चा हल  करने जाएंगे तो न केवल ये कि नाकाम होंगे बल्कि अपमान की नौबत भी आ जाएगी। अगर आपके पास आवश्यक तैयारी नहीं है तो क्या भावनाएं ठण्डी पड़ गई हैं और हौसले शिथिल पड़ गए हैं और क्या आपके पास मुक़ाबला करने का भा जज़्बा नहीं है? मुसलमानों के पास असाधारण प्रतिभा है। इसकी मिसालें  हमारा शानदार अतीत है और आज भी हमारे ऐसे भाई हैं जिनके कारनामे सुनकर हमारी गर्दन फख़्र से तन जाती हैं।

बात तैयारी की चल निकली है तो ये भी बता देना ज़रूरी है कि हम मेहनत करने, बलिदान देने और खुद को किसी मकसद में लगा देने में किसी क़ौम से पीछे बिल्कुल नहीं हैं मगर चूँकि हमारी शक्तियों का केन्द्र एक नहीं है इसलिए हमारी तैयारियों की कोई हैसियत नहीं रह गई है। हमारी सारी शक्तियां विभिन्न स्थानों पर बिखरी हुइ हैं और जो चीज़ बिखरी हुई हों, टूट फूट का शिकार हों वो कोई काम नहीं कर सकती लेकिन जब सारी शक्तियां एक जगह जमा हों तभी वो कोई बड़ा काम करने की हिम्मत जुटा पाती हैं। अगर ये सारी शक्तियां, कौशल और मेहनतें एक जगह एकत्रित हों जाएं और फिर संगठन, योजना के साथ वितरण के सिद्धांत के तहत काम पर लग जाएं तो हमें शिकवे शिकायतों का मौका नहीं मिलेगा। शिकवा करना दरअसल अपनी कमियों को बल प्रदान करने के समान होता है। हमारी कमनसीबी है कि हम अपनी ही कमियों को बल प्रदान करके गलती पर गलती किए जा रहे हैं और हमें इसका एहसास ही नहीं।

आज हर किसी की ज़बान पर बस एक ही शिकवा है ''हमारी दुआ क़ुबूल नहीं होती'' दिमागों में ये बेचैनी पायी जाती है कि हम पंच वक्त नमाज़ पढ़ते हैं, बुजुर्गों के पास बैठते हैं, बड़ों से दुआएं कराते हैं, व्यक्तिगत रूप से भी दुआ करते हैं और हज़ारों व लाखों के समूह में भी दुआ में शामिल होते हैं, मगर हालात की ईंट बदलती तो क्या खिसकती भी नहीं। लोग एक दूसरे से सवाल करते हैं कि क्या हमारी दुआओं से असर उठ लिया गया? घूम फ्र कर बातचीत इसी विषय पर आ रही है कि जब इंसान की सारी कोशिशें दम तोड़ देती है तब अल्लाह की रहमत और मदद उसे अपने आगोश में ले लेती है। इंसान को अपना काम करते रहना चाहिए अल्लाह भी यकीनन अपना काम करेगा। हमें समझना होगा कि हम जिस चीज के लिए दुआ कर रहे हमने उसे पूरा करने के लिए क्या किया है।

इस सतह पर आकर देखें तो आम और खास में कोई फर्क़ नहीं मालूम होगा। जिस तरह जनता का एक बहुमत सिर्फ ''दुआ'' पर जीना चाहता है उसी तरह हमारे धार्मिक कुलीन वर्ग का एक बहुमत 'दवा' पर कम और 'दुआ' पर ज़्यादा जीना चाहता है या कम से कम ऐसा प्रभाव देना चाहता है। ये किसी का मज़हब तो हो सकता है, इस्लाम हरगिज़ नहीं हो सकता। इस्लाम का मिशन ये है कि पहले दवा बाद में दुआ ताकि अंदर और बाहर दोनों तरह से भरपूर मदद हासिल हो और कामयाबी कदम चूमने के लिए खोजती फिरे। इसके बावजूद अगर इच्छित मुराद न मिले तो समझ लीजिए कि इसमें कोई बहुत हिकमत है जो समझ में आने वाली नहीं। हां ''दवा'' उसी वक्त कारगर हो सकती जब अल्लाह चाहे। हमारी योजना, मेहनत, प्रयास, अमल, संघर्ष, तैयारी, बलिदान और अनुशासन 'दवा' है और फिर खुदा के हुज़ूर में कामयाबी के लिए विनती हमारी दुआ है। लापरवाही, वादाखिलाफी, निश्चिन्तता, उदासीन, असंवेदनशीलता, आलस्य, शिकवा और गैर ज़िम्मेदारी के ढेर पर र्बैठ कर दुआ करने वाले से इसके सिवा उम्मीद ही क्या की जा सकती है कि वो शिकायतों का दफ्तर खोल कर रख दे और अपने लोगों की तबाही का मर्सिया पढ़े। कोई मेरे कान में फूंक रहा है कि मियां तुम भी तो इन्हीं में से हो।

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