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The Ozone Hole and the Quran ओज़ोन होल का विवाद और कुरआन का स्टैंड

सुहैल अरशद, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

14 मई, 2022

ओज़ोन होल का नजरिया 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पेश किया था और इस नजरिये ने पुरी दुनिया में फ़िक्र व अंदेशे की लहर दौड़ा दी थी। इसकी शुरुआत 1974 में हुई जब दो वैज्ञानिकों मारियो मौलेना और शेरी रोलैंड ने अपने तहकीकी मकाले में यह नजरिया पेश किया कि क्लोरो फ्लोरो कार्बन से स्ट्रेटवास्फेयर की सतह को नुक्सान पहुंच सकता है जिसमें ओज़ोन की परत मौजूद है।

सदियों से वैज्ञानिकों का अकीदा था कि ओज़ोन की साथ से 12 से 18 मील की बुलंदी पर स्ट्रेटवास्फेयर में जमा होता है और सूरज की अल्ट्रा वायलेट किरणों को अवशोषित कर के इंसानों और हैवानों को इसके हानिकारक प्रभाव से बचाता है।

तीन ब्रिटिश वैज्ञानिकों जोज़फ़ फारमैन, ब्रायन गार्डनर और जोनाथन शेंक्लिन ने 1984 में अपनी तहकीक में यह दावा किया कि अन्टार्कटिका पर मौसम बहार में ओज़ोन में सुराख देखा गया और इस तरह मारियो मौलेना और शीरी शेंक्लिन के दावे की ताईद की।

इस शोध पर मौलेना और शीरी रौलेंड को 1985 का नोबल एवार्ड भी दे दिया गया। इस शोध की बुनियाद पर दुनिया भर के अखबारों और रिसालों में ओज़ोन की साथ में होने वाले कथित छेद पर लेख लिखे जाने लगे। राजनीतिक साथ पर ओज़ोन को बचाने के लिए कदम उठाए जाने लगे। 1987 में माउन्टेरियाल  समझौता हुआ जिसके अनुवार तमाम देशों ने क्लोरो फ्लोरो कार्बन दुसरे औद्योगिक रासायनिक माद्दों पर पुरी तरह पाबंदी लगा दी। उन केमिकल्स में सी एफ सी, हैल्विन, कार्बन टेट्रा क्लोराइड और मिथाइल क्लोरोफोर्म शामिल थे।

उसी दौरान इम्पीरियल कालेज लंदन की वैज्ञानिक जवाना हेग और उनकी रिसर्च टीम ने भी अपनी तहकीक में यह दावा किया कि क्लोरो फ्लोरो कार्बन की वजह से ओज़ोन की परत में सुराख हो गया है और इससे ज़मीन पर इंसानी ज़िन्दगी को बड़े खतरे पेश आ सकते हैं।

लेकिन दूसरी तरफ वैज्ञानिको का एक बड़ा वर्ग इस ओज़ोन होल थ्योरी पर यकीन नहीं करता था और इसे फ्राड और घपला मानता था। कुछ वैज्ञानिक तो यहाँ तक कहते हैं कि ओज़ोन होल की थ्योरी सरकारी रिसर्च ग्रांट के करोड़ों रूपये पास कराने की गर्ज़ से पेश की गई थी। क्योंकि इस कथित खोज के बाद बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक रिसर्च में सरमाया कारी होने लगी और आर्थिक माध्यमों को बड़े पैमाने पर उस दिशा में मोड़ा जाने लगा। यहाँ तक कि नासा ने भी 1992 में यह दावा किया कि बाद में ओज़ोन के बिना सूरज की अल्ट्रा वायलेट किरणें ज़मीन की साथ को बंजर और बाँझ कर देंगी। लेकिन आलोचकों का ख्याल था कि नासा का यह बयान उस समय आया था जब उसको अपने बजट में इजाफे की दरख्वास्त को मंज़ूर कराना था।

असल में ओज़ोन होल की थ्योरी अमेरिका और ब्रिटेन के सरकारी वैज्ञानिकों के लिए एक आसमानी नेमत से कम नहीं थी जिस पर रीसर्च के बहाने उन्होंने अपनी सरकारों से करोड़ों की ग्रांट मंज़ूर करा ली थी। आखिर यह लोग ज़मीन को एक कयामत से बचाने की कोशिश जो कर रहे थे।

अखबारों और रिसालों में ओज़ोन ओज़ोन होल की वजह से ज़मीन के इंसानों और हैवानों में हानिकारक प्रभाव पर रिपोर्ट भी प्रकाशित होने लगीं। भेड़ों के अंधा होने और माहीगीरों के जरिये अंधी मछलियों के पकड़ने की खबरें भी छपने लगीं। जान होपिंक्स यूनिवर्सिटी ने इस पर शोध की तो सामने आया कि मछलियों और भेड़ों में अंधापन मुकामी तौरपर होने वाले इन्फेक्शन की वजह से हुआ था न कि तथाकथित ओज़ोन होल की वजह से।

कुछ गैर जानिबदार वैज्ञानिकों का यह कहना था कि ओज़ोन की परत में कमी और बेशी एक मुस्तकिल कुदरती अमल है। विभिन्न मौसमों और दिन के भिन्न भिन्न समयों में ओज़ोन की परत पतली और गहरी होती रहती है। मिसाल के तौर पर वैग्यानिकों का कहना है कि हर साल बहार के मौसम में अन्टार्कटिका पर ओज़ोन की परत पतली हो जाती है जिसे सुराख कहा जाता है और गर्मी के मौसम में यह फिर बंद हो जाता है। फिर अगले मौसमे बहार में यह पतला हो जाता है जिसे ओज़ोन होल या ओज़ोन सुराख कहते हैं।

उन वैज्ञानिकों में जो ओज़ोन होल थ्योरी को एक घपला मानते हैं टोनी हेलर भी एक हैं। उनका कहना है कि उत्तरी ध्रुव में कभी भी कोई ओज़ोन होल था ही नहीं। और अन्टार्कटिका पर जिस सुराख की बात की जाती है वह मोंट्रियाल प्रोटोकोल के निफाज़ के बाद भी बंद नहीं हुआ। इसका मतलब यह है कि जिन गैसों को ओज़ोन होल का जिम्मेदार माना जाता था उन पर पाबंदी के बद भी यह होल अर्थात ओज़ोन की साथ के पतले होने का अमल रुका नहीं है। इसलिए ओज़ोन की सतह का पतला और गहरा होना एक कुदरती अमल है जो कुदरत के निज़ाम का एक हिस्सा है।

भारत के एक मोतबर वैज्ञानिक डॉक्टर पद्मा नाभा राव जो हिमालियन इंस्टीटयूट  ऑफ़ मेडिकल साइन्सेज़ के पूर्व प्रोफेसर ऑफ़ मेडिकल फिज़िक्स हैं के मुताबिक़ ओज़ोन होल थ्योरी भी ग्लोबल वार्मिंग की थ्योरी की तरह ही एक माहौलियाती घपला है। उनके इल्म के अनुसार ओज़ोन होल का वजूद ही नहीं है।

जान ओस्लियोन अपने एक लेख में लिखते हैं

वैज्ञानिकों के ने इस बात के काफी प्रमाण पाए हैं जिससे यह बात साफ़ हो जाती है कि विभिन्न काल में फितरत में इस तरह की तब्दीलियाँ मामुल के मुताबिक़ हैं। आज हम यह देख रहे हैं कि जिस ओज़ोन की परत के मौजूद होने का दावा किया जाता है उसकी परत बहुत पतली है और वह भी दिन के औकात और मौसमों के मुताबिक़ उसकी परत बदलती रहती है। गर्मी के मौसम में यह गहरी होती है जबकि जाड़े में पतली होती है दिन के वक्त गहरी होती है और रात के वक्त पतली

उपर्युक्त तमाम तथ्यों से यह ज़ाहिर होता हैकि ओज़ोन की परत ऑक्सीजन के तीन एटमों के करह हवा की उपरी सतह स्ट्रे ट्वासफेयर में जमा होने से बनती है और इतनी बारीक होती है कि यह लगभग न के बराबर होती है। इसलिए वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग ओज़ोन की परत की मौजूदगी को ही नहीं मानता तो होल को कैसे स्वीकार करे। वैज्ञानिकों ने अन्टार्कटिका पर ओज़ोन की निस्बतन पतली परत का पता लगाया इसे वह हालिया मज़हर समझ बैठे जबकि उनके पास यह साबित करने के लिए कोई डेटा मौजूद नहीं था कि वह पतली परत कितने जमाने से मौजूद है। अगर कोई चीज इंसान आज दरयाफ्त करे तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि वह चीज आज ही वजूद में है। अन्टार्कटिका पर ओज़ोन का सर्दियों में पतला होना और गर्मियों में गहरा होना और दिन को गहरा होना और रात को पतला होना कुदरत के तयशुदा निज़ाम के तहत है। ताकि अन्टार्कटिका के बर्फ को गर्मियों में अधिक पिघलने से रका जाए और सर्दियों में मुनासिब मिकदार में पिघलने की राह हमवार की जाए।

पिछले कई सालों में दुनिया में होने वाली वैज्ञानिक खोजों पर कुरआन के मौकफ़ की ताईद हुई है। इसलिए ओज़ोन होल के मसले पर भी कुरआन के मौकफ़ को जानना जरूरी है। कुरआन की कम से कम दो आयतें ऐसी हैं जो ओज़ोन होल की थ्योरी को रद्द करती हैं और उन वैज्ञानिकों के मौकफ़ की इनसे ताईद होती है कि ओज़ोन होल एक फर्जी चीज है जिसे पश्चमी देशों के सरकारी वैज्ञानिकों ने गढ़ा है। कुरआन की सुरह काफ की आयत नंबर 6 देखें।

--“क्या नहीं देखते आसमान को अपने उपर कैसा हमने उसको बनाया और रौनक दी और उसमें नहीं कोई सुराख।

सुरह मुल्क की आयत नंबर 3 में भी इसी मौकफ़ का एआदा किया गया है।

क्या देखता है रहमान के बनाने में कोई ताफावुत। फिर दुबारा निगाह कर कहीं नज़र आई तुझको दरार

इन आयतों से डॉक्टर पद्मा नाभा और दुसरे गैर जानिबदार वैज्ञानिकों के इस मोकफ की ताईद होती है कि आसमान में कोई सुराख नहीं ओज़ोन होल नहीं। और जिसे कुछ वैज्ञानिक सुराख या ओज़ोन की परत या पतला और गहरा होना समझ रहे हैं वह असल में कुदरत के मुतवाज़िने निज़ाम का हिस्सा है।

Urdu Article: The Ozone Hole and the Quran اوزون ہول کا تنازع اور قرآن کا موقف

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/ozone-hole-quran/d/127300

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