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Hindi Section ( 5 Dec 2013, NewAgeIslam.Com)

Let's Stop Calling Them Muslims उन्हें मुस्लिम कहना छोड़ दें

 

 

 

 रॉबर्ट सलाम

23 सितम्बर 2013

लगभग 60 या उससे अधिक इस्लामी देश हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक़ लगभग 5.1 अरब लोग मुस्लिम होने का दावा करते हैं। जब मैंने 11 सितंबर, 2001 के तुरंत बाद इस्लाम स्वीकार किया, तो ये विडंबना मेरी समझ से बाहर थी। 'तो मैंने ये सीखा कि धर्म अपने आप में शांतिपूर्ण होता है हालांकि अपने देश पर एक भयानक हमले की वजह से मैंने इस्लाम का अध्ययन करना शुरू किया। मुझे ये मालूम हुआ कि मुसलमानों की परिभाषा और उनका निर्धारण उनके उच्च नैतिक चरित्र के आधार पर किया जाना चाहिए, जो अपनी इच्छा को खुदा के सुपुर्द कर देते हैं। इसका मतलब ये है कि मुसलमानों को ईमानदार और विश्वसनीय होना चाहिए। उन्हें ऐसे लोगों का मददगार बनना चाहिए जो खुद अपनी मदद नहीं कर सकते। उन्हें निस्सहाय लोगों का रक्षक होना चाहिए। उन्हें सच्चाई की आवाज़ बुलंद करनी चाहिए और उन्हें इस दुनिया में कभी दुश्मनी और अन्याय की वजह नहीं बनना चाहिए।

मुसलमानों का चरित्र ऐसा होना चाहिए कि वो ऐसे स्थानों की रक्षा करें जहां खुदा की महिमा का गुणगान किया जाता है चाहे वो चर्च हो, यहूदियों का पूजा स्थल हो, मंदिर या मस्जिद हो। मुसलमानों का चरित्र ऐसा होना चाहिए कि जिनके बीच उनके पड़ोसी चाहे वो मुस्लिम हों या गैर मुस्लिम खुद को सुरक्षित महसूस करें। ये सभी सबक़ 2001 में मैंने उस समय सीखे जब मुसलमानों ने न्यूयॉर्क, अमेरिका और वॉशिंगटन डीसी पर हमला करके इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अपनी भूमिका का प्रदर्शन किया।

ये सबक है कि एक मुस्लिम होने का क्या मतलब है, और वो गुण और खूबियाँ क्या हैं जो हर एक मुसलमानों में नज़र आनी चाहिए, और जिसे मुझे पिछले 12 सालों में बार बार याद दिलाया गया। हालांकि मुझे इस्लामी शिक्षाओं पर बिल्कुल भी कोई शक नहीं है। अब मैं ताज्जुब करने लगा हूँ जो इस्लाम के बारे में मेरी ही तरह के विचार और दृष्टिकोण रखने वाले हैं, वो ऐसे नहीं हैं जैसे मुस्लिम देशों के नेता, वहां के नागरिक, अलकायदा और दूसरे सम्बंधित आतंकवादी संगठन हैं।

जो चीज हमें अलग करती है हो सकता है कि वो ज़बान, धार्मिक समझ या भौगोलिक स्थिति से कहीं बढ़कर हो। हो सकता है मुसलमान कौन हैं और कौन लोग मुसलमान नहीं हैं का अंतर ही वही तत्व हो जो हमें दूसरों से अलग करता है।  इसीलिए मुझे लगता है कि जो लोग संग्रहालय, बेशकीमती स्थानों और दूसरे निर्माणों को ध्वस्त करेंगे और नागरिकों को इबादत करने के दौरान और बाज़ार में खरीदारी करते समय बेवजह मार डालेंगे और वो लोग जो इंसानों की शराफत और उस ज़िंदगी का सम्मान नहीं करते जिसे खुदा ने उन्हें अता किया है, ऐसे में वक्त आ गया है कि हम इन असभ्य और वहशी दरिंदों को मुसलमान कहना छोड़ दें, या उनके नामों को छोड़ दें और हम जो इस्लाम को जानते हैं कोई दूसरा नाम धारण कर लें।

आखिर हम कब तक इन समस्याओं को नज़र अंदाज़ करेंगे, उनके लिए माफी चाहेंगे, क्षमा की प्रार्थना लिखेंगे और कब तक हम हताशा में अपना हाथ मलेंगें इसलिए कि हम पूरी आबादी और मुसलमानों को घेराबंदी (धार्मिक हिंसा और आतंकवाद) की चपेट में देखते हैं। चाहे वो ​​ईसाई हैं, अहमदी या कोई दूसरे अल्पसंख्यक हैं पाकिस्तान में उनका नरसंहार हो रहा है और निर्दोष मुस्लिम और ईसाई मर्दों, औरतों और बच्चों को फ़िलिस्तीन, मिस्र और केन्या में मौत के घाट उतारा जा रहा है। और इन पर आतंकवादी हमले हो रहे हैं और इन्हें धमकियाँ भी मिल रही है। हम ऐसी समस्याओं को हल करने के लिए कब तक पश्चिमी देशों से उम्मीद रखेंगे जबकि 60 से अधिक मुस्लिम देशों को खुद से ऐसी समस्याओं को हल करने में सक्षम होना चाहिए? इन देशों के प्रमुख अपने देशों में क्या कर रहे हैं?

हम उनके खिलाफ लिखते हैं और भाषण देते हैं, जबकि ये जानवर हमारे मुस्लिम देशों की गलियों में बेलगाम घूम रहे हैं और ये कहते हुए नापाक अपराध कर रहे हैं कि वो ये सब हमारे नाम पर कर रहे हैं! आप मुझे नादान कह सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कई पेजों पर फैले फतवे, शानदार प्रेस विज्ञप्तियाँ या संपादकीय लिखने या टीवी या रेडियो पर आकर बयानबाज़ी करने से क्या इन आतंकवादियों की गोलियों और बम रुकने वाले हैं। वास्तव में मेरा मानना ​​है कि इस अभिशाप से केवल आंतरिक और बाहरी दोनों सतह पर शिक्षा और पोलिसिंग के संयोजन, वास्तविक भौतिक टकराव और हर आवश्यक स्रोतों का उपयोग करते हुए इस्लाम और मुसलमानों के नाम पर अत्याचार और बर्बरता को इस धरती से खत्म करने की वास्तविक इच्छाशक्ति के द्वारा ही निपटा जा सकता है। लेकिन ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब हमारे ऊपर इसका खुमार छा जाए, इसलिए कि कई लोग ऐसे हैं जो इस उम्मीद में बैठे हैं ​​कि पश्चिमी देश अपने सैनिक मदद  भेजे ताकि बाद में वो ये शिकायत कर सकें कि पश्चिम ने अपने सैनिक भेजे हैं।

अब ये ऐसा वक्त है कि तथाकथित मुस्लिम देश भी ऐसा ही काम करें। ये बड़े ही शर्म की बात है कि पश्चिम में रहने वाले एक मुस्लिम के रूप में मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसे देशों में जा सकता हूँ जहाँ मुसलमानों का बहुमत है सिर्फ इस डर से कि ऐसा कोई व्यक्ति जो खुद को मुसलमान कहता हो किसी भी तरह मेरे किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन फिर भी हम इसे सहन करते हैं और सरकार या लोगों से इन बातों की मांग करने का आग्रह करने के बजाय जिसे वो अंजाम देने के लिए तैयार नहीं हैं और वो एक सम्पादकीय लेख के ज़रिए इसका जवाब देते हैं।

हो सकता है कि वो मैं ही हूँ लेकिन मैं मुस्लिम देशों में इन हैवानों के बारे में सुन सुनकर थक गया हूँ जो गलियों में दंगा कर रहे हैं और अपने पड़ोसियों के दिलों में दहशत पैदा कर रहे हैं। यहाँ अमेरिका में भी इस बात से परेशान हूँ कि यहां जब भी कभी शांति की तरफ कोई कदम उठाया जाता है या अंतरधार्मिक सद्भाव के लिए कदम उठाया जाता है या ऐसी कोई गतिविधि को अंजाम दिया जाता है जिसका नेतृत्व मुसलमानों को भी करना चाहिए तो हर दूसरे दिन एक नई समस्या सिर उठाती है, और अगर कभी मस्जिदों या मुसलमानों की तरफ से ऐसा कोई आयोजन किया भी जाता है तो उनकी संख्या बहुत कम है। साफ शब्दों में मैं मुसलमानों से परेशान हो गया हूँ और ऐसे लोगों का साथ चाहता हूँ जो सही मायने में इस्लाम पर अमल करते हों।

स्रोत: http://salaamsblog.wordpress.com

URL for English article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/let’s-stop-calling-them-muslims-انہیں-مسلم-کہنا-چھوڑ-دیں/d/34687

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