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Hindi Section ( 12 Oct 2012, NewAgeIslam.Com)

Identity Crises of Muslim Diaspora मुस्लिम अप्रवासियों की पहचान का संकट

 

राशिद समनाके, न्यु एज इस्लाम

7 अगस्त, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

कवि डॉ. मोहम्मद इकबाल ने एक या दो सदी पहले मुस्लिम दुनिया में बेचैनी के संकेतों को समझ लिया था और उम्मीद ज़ाहिर की थी कि ये शायद सदियों की खुमारी से मुसलमानों को बाहर ले आएगी। और ये बेचैनी उस संकट के कारण थी, जो यूरोप को अपने घेरे में लिए हुए थी। उन्हें उम्मीद थी कि ये आने वाला तूफान मुसलमानों को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। लेकिन उनका ये एहसास उनके कई अन्य सपनों की तरह ही सिर्फ एक ख्वाब ही साबित हुआ! उन्होंने सादगी से सोचा:

मुसलमानों को मुसलमाँ कर दिया तूफाने मग़रिब ने,

तलातुम है दरिया ही से, होती है गौहर की सैराबी

उनके बाद दुनिया में जो घटनाएं घटित हुईं उन्हें देखते हुए ये स्पष्ट है कि वो समुदाय जिससे उन्होंने अपनी उम्मीदों को बहुत ही सकारात्मक ढंग से जोड़ रखा था वो और भी पतन की ओर गया है। ऐसा लगता है कि घटित हुई घटनाओं ने उन्हें जगाया है, लेकिन इन लोगों को कवि डा. इकबाल के इस्लाम के विज़न से ये बहुत दूर ले जा रहा है।

बौद्धिक क्षमता जो उन्हें दुनिया की नज़रों में प्रिय बनाती उसके बजाय सबसे अधिक बुरी किस्म की ऋणात्मकता यानी उग्रवाद और हिंसा को वो लोग अपना रहे हैं, जो सही और गलत, मासूम और अपराधी,  सशस्त्र और बिना हथियार, दोस्त और दुश्मन समझे जाने वालों और कुरान की शिक्षाओं और इनके विभिन्न धर्मों और धड़ों की अप्रमाणिक किताबों के बीच विभेद भी नहीं करता है। इसलिए, दुनिया इनसे डर रही है और उन्हें नापसंद कर रही है और बुरा कह रही है। इनकी पहचान- तालिबान की तरह का रूप, लंबी दाढ़ी, यहाँ तक कि अगर गैर मुस्लिम भी इसे रखते हैं तो ये नस्लों और राष्ट्रीयताओं के बीच नफरत को बढ़ावा देती है, जैसा कि हाल ही में विस्कांसिन, अमेरिका में मासूम गैर मुस्लिमों जैसे सिखों के साथ उनके गुरुद्वारा में भयानक कत्ल का मामला सामने आया है। ये सिखों के साथ ही होना था जो आमतौर पर सबसे पसंदीदा लोगों में से होते हैं और खुदा की वहदानियत में यकीन रखते हैं, जो कि इस्लाम के करीब है। दुनिया में मुस्लिम पहचान का ये सबसे अधिक नफरत योग्य प्रदर्शन है! कुल मिलाकर मुस्लिम देशों को कम से कम इस पर तुरंत अपनी संवेदना व्यक्त करनी चाहिए।

इकबाल की उम्मीदें किसी भी तरह से बेजा नहीं थीं, जैसा कि उन्होंने उस ज़माने की आपा धापी को देखा था जो कि आज के व्यापक पलायन के जैसी नहीं थी लेकिन उनके समय में औपनिवेशिक विद्वानों की जमात आमतौर पर यूरोप और पश्चिमी देशों में दाखिल हुई, जिनमें से कई अपने देश वापस गए ताकि जो ज्ञान यहाँ प्राप्त किया उससे अपनी जनता की सेवा कर सकें।

दुर्भाग्य से इस वर्ग के लिए विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पैदा हुई घटनाओं ने सब कुछ बदल दिया, क्योंकि ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले पूर्व के औपनिवेशिक क्षेत्रों के लोग अधिकतर मज़लूम, सताए हुए, कम शिक्षित आप्रवासियों के अधिसंख्य में बदल गए और जो अपने साथ अपने देशों के कायदे, संस्कृति और धार्मिक परंपराएं साथ लाए, जिसे उन्हें नए वातावरण में नई शुरुआत करने के लिए पीछे छोड़ देना चाहिए था। वो वातावरण जिसने उन्हें दिल खोलकर ऐसी सभी सुविधाएं प्रदान कीं जिनके बारे में वो जहां से आए थे, वहां पर कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यहाँ उनके लिए मौका था कि वो जिस देश को अपना रहे हैं उसकी संस्कृति और मानदंड के खराब पहलुओं को छोड़ सकें और उसे स्वीकार करें जो अच्छा था और इस तरह सद्भाव और पूर्व की नीति के साथ जो कुछ अच्छा था उसमें मदद कर वो विकास की गति को बढ़ा सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। डा. इकबाल ने अपने मशहूर शेर में कुरान के शब्दों को पेश किया-... बेशक अल्लाह किसी क़ौम की हालत को नहीं बदलता जब तक कि वो लोग अपने आप में खुद तब्दीली पैदा कर डालें (13:11)!

इसके बजाय हम यहाँ 'शरीयत कानून' के लिए मांग कर रहे हैं, इसका मतलब है जो भी हो, और धोखा देने वाले जुनूनी लोगों की तरह सड़कों पर मार्च कर रहे हैं और मेज़बान देश से खैरख्वाही के साथ सुरक्षा, संसाधन और यहां तक ​​कि इस देश को काफ़िर कहने की आज़ादी की भी मांग कर रहे हैं। ये पूरी तरह से नाशुक्री और नफरत भरा रवैय्या है! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इन लोगों का यहाँ अब स्वागत न होता हो?

यही लोग मस्जिदों में जुमा की अपनी इबादत के हिस्से के रूप में कुरान की आयत 55 को सुनेंगें या तिलावत करेंगे और उसी क़ुरान की आयत 60 उनसे सवाल करती है कि, "क्या खैरख्वाही का अजर (इनाम) खैरख्वाही के अलावा कुछ और है? "

जैसा कि डा. इकबाल ने कहा है कि जो उचित अवसर मिला था वो न केवल इस्लाम के धार्मिक विचारों के पुनर्निर्माण के लिए था बल्कि विनम्रता के साथ पूरे राष्ट्र की जीवन प्रणाली की बेहतरी के लिए भी था जिसे हमने शायद दोबारा न पाने के अयोग्य के तौर पर खो दिया है।

इसका कारण सिर्फ खराब गुणवत्ता नहीं बल्कि संख्या भी है और बड़ी संख्या में गैर उदार अप्रवासियों की आमद ने पूरे देश की मूल आबादी को नफरत के एहसास से भर दिया। जो कुछ भी ज्ञान हासिल करने की इच्छा रखने वाले अपने मूल देश से अच्छा लाए थे और जो वो लोग छोड़ गए थे, अब बहुमत उनके इस सहयोग को नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध है और वो भी इस हद तक कि जो गैर मुस्लिम, मुसलमानों के जैसे दिखते हैं उनको  भी नहीं बख्शा जा रहा है। अल्लामा इकबाल ने परेशान हाल दुनिया की इस स्थिति का भी खाका पेश किया था और कहा है:-

क़ौमों की रविश से मुझे होता है ये मालूम 

फरसूदा तरीकों से हुआ ज़माना बेज़ार

लेकिन, सभी आरोप यहाँ पहुंचने वाले तमाम बदकिस्मत जाहिल लोगों पर नहीं डाला जा सकता है। अक्सर अपने पैतृक देशों से तथाकथित धार्मिक उलमा, इमामों, को भौतिक नई दुनिया में आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए बुलाने की उनकी जरूरत के नतीजे में और भी अधिक अयोग्य लोगों के यहाँ आने में और भी वृद्धि हुई है, जो अरबी रूप की नकल करते हैं, इस तरह के पेशवरों के जैसे लोगों ने इस अवसर को अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया है। ये हकीकत भी डा. इकबाल पर ज़रूर ज़ाहिर हुई होगी, जिन्होंने इसे इस तरह पेश किया है:-

क़ौम क्या चीज़ है, क़ौमों की हक़ीक़त क्या है?

इसको क्या समझें, 'बेचारे' दो रिकत के इमाम

इन लोगों के पैतृक देशों में भी स्थिति अलग बिल्कुल नहीं हैं। वहाँ भी सत्ता में रहने वाले समूहों की राष्ट्रीय नीति के कारण आंतरिक और बाहरी दोनों स्तर पर जिहालत ने उत्पीड़ित होने के एहसास को और भी भड़काया है और धर्म केवल समाज में हलचल पैदा करने के आसान उपकरण बन गए हैं। इस मदहोशी में देश ने अपना संतुलन खो दिया है और साथ ही जो सुनहरा मौका परवरदिगार ने खिदमत का अता किया था उसे भी खो दिया है। जैसा कि डा. इकबाल ने ख्वाब देखा था लेकिन ये मौका खुमारी में खो दिया हैः-

ज़िंदगी जिसको कहते हैं, फरामोशी है ये

ख्वाब है, गफ़लत है, सरमस्ती है, बेहोशी है ये!

इसलिए पश्चिम में रहने वाले अप्रवासियों को जागरूकता और इस्लामी पहचान को स्थापित करने की जरूरत है।

राशिद समनाके भारतीय मूल के इंजीनियर (सेवानिवृत्त) हैं और चालीस सालों से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं और वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से लिखते हैं।

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