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Hindi Section ( 3 Jan 2021, NewAgeIslam.Com)

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Love Jihad: From Illusory Slogan to Potent Weapon लव जिहाद: भ्रामक नारे से खतरनाक हथियार में परिवर्तित


राम पुनयानी

२० अक्टूबर २०१३

देश अभी भी मुज़फ्फर नगर के साम्प्रदायिक दंगों और उसके बाद आने वाली घटनाओं से बाहर नहीं आ पाया है। हिंसा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में हुई जहां जाटों और मुसलमानों के बीच मजबूत सामंजस्य और सामाजिक संबंध रहे हैं। हालांकि, उनकी आर्थिक स्थिति काफी भिन्न रही है। अतीत में, इस राज्य और देश के अन्य हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा, बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने, हमारे समुदाय में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा जैसे मुद्दों को उठाया गया है।

जहां तक उस क्षेत्र का संबंध है तो उसे Communalise करने के लिए जो बुनियादी हथियार प्रयोग किया जाता रहा है वह है बिरादरी का अभिमान (सामाजिक सम्मान) मुसलमान युवाओं के माध्यम से हिन्दू लड़कियों के साथ छेड़ छाड़, उन्हें बहला फुसला कर भगाने जैसी बातें इस दुष्प्रचार को हवा देने के लिए वरीयता के साथ प्रयोग की जाती हैं। हम सब आरएसएस तत्वों के माध्यम से वीडियो क्लिपिंग अपलोड करने बेटी बचाओके नाम पर हिन्दुओं को सक्रीय करने जैसी बातों और संघ परिवार के दुसरे कारकों पर बहस करते रहे हैं मगर अब उस क्षेत्र में उछाले जा रहे हैं लव जिहादहमारी बेटियों को मुसलमानों से बचाओजैसे नारों का निरिक्षण करने की आवश्यकता है।

मुजफ्फरनगर और आस-पास के इलाकों में कई दिनों से लड़कियों से छेड़छाड़ की योजना बनाई गई है। अफवाहें फैलाई गईं और 'लव जिहाद' का प्रचार किया गया। (सामाजिक संगठन अनहद द्वारा मुज़फ्फरनगर दंगों पर रिपोर्ट में भी यह कहा गया है)। हिंदू लड़कियों से जबरन शादी करने, उन्हें अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर करने जैसी बातें मुस्लिम युवाओं के लिए अच्छी तरह से प्रचारित की गईं। दंगों के लिए झूठी कहानियाँ भी बनाई गई थीं कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़ करते हैं।

लव जिहाद शब्द, जिसने हिंसा के लिए हिंदू समुदाय को लामबंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, का एक अजीब इतिहास है। "लव" और "जिहाद" शब्द के दो घटक अर्थ में बहुत भिन्न हैं। 9/11 के बाद से, "जिहाद" शब्द मुख्यधारा के मीडिया और "सामाजिक सोच" का हिस्सा बन गया है। कुरआन में, इसका अर्थ है संघर्ष, इसके विपरीत, इसे गैर-मुस्लिमों को मारने के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लव जिहाद शब्द निश्चित रूप से एक शैतानी दिमाग का निर्माण है जिसका इस्तेमाल मुसलमानों को बदनाम करने के लिए किया जाता है। यह प्रचारित किया जाता है कि कुछ मुस्लिम संगठन मुस्लिम युवकों को गैर-मुस्लिम लड़कियों को शादी के लिए राजी करने और मुस्लिम आबादी बढ़ाने के लिए धन मुहैया करा रहे हैं। इन युवाओं को मोटरसाइकिल, मोबाइल फोन आदि खरीदने और गैर-मुस्लिम लड़कियों को रिझाने के लिए दी जाती हैं।

गूगल पर सर्च के बीच अगर आप टाइप करें, क्यों हिन्दू लडकियां, जो दुसरा वाक्य इसके बाद दिखाई देगा वह है , मुस्लिम लड़कों की ओर आकर्षित हैं। महाराष्ट्र में एक समूह हिन्दू रक्षक समीति, यह कहता है कि हिन्दू धर्म को बचाने के लिए उस जोड़े को तोड़ दो। जिसमें लड़की हिन्दू हो। ऐसा नहीं कि ऐसे जोड़े बहुत अधिक हैं मगर सामान्य शक पर भी हिन्दुओं के यह तथाकथित अभिभावक इस जोड़े पर टूट पड़ते हैं। इन शब्दों को इस तरह फैलाया गया है कि केरला में भी एक ईसाई ग्रुप ने इस रुझान को रोकने के लिए संघ परिवार के संगठन वी एच पी के साथ हाथ मिला लिया।

यह शब्द भारत में पहली बार तटीय कर्नाटक, मैंगलोर और केरल के कुछ हिस्सों में इस्तेमाल किया गया था। RSS के प्रशिक्षु स्वयंसेवक प्रमोद मतालक द्वारा स्थापित श्री राम सेना ने उसी शब्द का उपयोग उन दंपतियों को निशाना बनाने के लिए शुरू किया, जिनके पास हिंदू धर्म है। माता-पिता के विवाह के खिलाफ होने के साथ ही विवाह को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। यहां तक कि श्री राम सेना भी ऐसे मामलों को अदालत में ले जाने लगी। यह औचित्य पेश किया था कि एक मुस्लिम लड़के ने एक हिंदू लड़की से जबरन शादी की थी। दिलचस्प बात यह है कि सज्जल राज और असगर मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि 'लव जिहाद' शब्द को राष्ट्रीय संदर्भ में देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसका प्रभाव देश की सुरक्षा और महिलाओं की अवैध तस्करी से जुड़ा हुआ है। उन्होंने राज्य के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक को मामले की विस्तार से जांच करने का निर्देश दिया और कहा कि जांच पूरी होने तक लड़की अपने माता-पिता के साथ रहेगी। हालाँकि, यह मुद्दा अंतर जातीय विवाह के बारे में अधिक था। हालांकि, सभी राजनीतिक दबावों के बावजूद, लड़की अपने  स्टैंड पर कायम रही और अपने पति के साथ रहने का फैसला किया। जांच में यह भी पाया गया कि यह शब्द अतिरंजित था और इसके नकारात्मक प्रभावों का कोई सबूत नहीं था।

इसी प्रकार के दो मामलों में केरला हाईकोर्ट ने भी दोनों पक्षों के अभिभावकों की अपील सुनने के बाद ज्यादा या कम ऐसा ही निर्णय सुनाया था। इन मामलों में दो हिन्दू लड़कियां घर से भाग गई थीं और मुस्लिम लड़कों से शादी के लिए उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया था। केरला आदालत ने भी पुलिस को इस पुरे घटना की विस्तृत छान बीन का आदेश दिया। फिर पुलिस जांच में यही बात सामने आई कि लव जिहादका इन घटनाओं से कुछ लेना देना नहीं। इस तरह के शादियों के संबंध में विभिन्न संगठनों के माध्यम से जो बातें भी फैलाई गईं, वह सब केवल अफवाह और दुष्प्रचार से अधिक कुछ नहीं, मगर इसके बावजूद लव जिहादयह सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया है।

श्री राम सेना द्वारा फैलाए जा रहे दुषप्रचार के अनुसार, अकेले कर्नाटक में 4,000 से अधिक हिंदू लड़कियों को धर्म परिवर्तन का लालच दिया गया है और उनका विवाह कर दिया गया है। अफवाह जंगल की आग की तरह फैल गई, जिससे माता-पिता में दहशत फैल गई। इन मामलों में, कई लड़कियों के दृष्टिकोण, जो अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए मजबूर थे, बदलते रहे। कुछ लड़कियों ने यह भी कहा कि उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया गया, जबकि कुछ लड़कियों ने कहा कि उन्हें जिहादी सीडी और उसके बाद कई अन्य चीजें दिखाई गईं।

हमने गुजरात में दंगों के दौरान इस तरह के दुष्प्रचार का भी सामना किया है, जब यह कहा गया था कि मुस्लिम लड़के न केवल हिन्दू लड़कियों को उनसे शादी करने का लालच दे रहे हैं, बल्कि उनका धर्म भी बदल रहे हैं। बाबू बजरंगी, जो दंगों में सक्रिय भूमिका निभा रहा था और जो इन दिनों जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है, ऐसी अफवाहों का मास्टरमाइंड था। उसके पास एक समान गिरोह भी है, जिसके लोग ऐसे जोड़ों को निशाना बनाते हैं और उन्हें एक-दूसरे से अलग होने के लिए मजबूर करते हैं। ये सभी कार्य धर्म का बचाव करने के नाम पर किए जाते हैं। इंटरफेथ और अंतर-जातीय विवाह किसी भी बहुआयामी समाज में आम हैं, लेकिन देश में सांप्रदायिक राजनीति के उदय ने अंतर-धार्मिक विवाह का खतरनाक विरोध किया है। हमारे पास रिज़वान-उर-रहमान और प्रियंका तोडी का मामला है, जिसमें कोलकाता के एक प्रभावशाली व्यवसायी की बेटी प्रियंका ने एक गरीब मुस्लिम लड़के से शादी की थी, लेकिन प्रियंका अपने माता-पिता और रिश्तेदारों के साथ भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल थी। जिसके कारण वह भी बदल गई। मामले के सभी विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि रिजवान-उर-रहमान को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया गया था। ऐसे सभी मामलों में, पुलिस की भूमिका, राज्य मिशनरी की भूमिका संविधान और कानून के नियमों और विनियमों के साथ सीधे विरोधाभास में पाई जाती है।

अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाहों के खिलाफ चलाई जा रही यह मुहिम ना केवल राष्ट्रीय एकता के खिलाफ हैं, बल्कि लड़कियों को मर्दों के कंट्रोल में रखने के कार्य करने के तरीके को मजबूत बनाती हैं। इसके अलावा अल्पसंख्यक विरोधी रुझान को हवा दे कर राजनीतिक नफरत को भी बल प्रदान करती हैं। नफरत की राजनीति करने वालों के लिए यह डबल बोनस का कार्य करती हैं। चूँकि इस समाज में जहां मर्दों की हुक्मरानी है, वहाँ औरतों को मर्दों के सम्पत्ति से अधिक कुछ नहीं समझा जाता और उन्हें एक ऐसे सामाजिक ढाँचे में रहने के लिए मजबूर किया जाता है। जिसका निर्माण मर्द करते हैं और जहां सभी फैसले उन्हीं के होते हैं। साम्प्रदायिक राजनीति के एजेंडे में अल्पसंख्यको को निशाना बनाना केंद्र बिंदु रखता है, मगर दूसरी सतह पर यह उस सामाजिक सोच को भी बढ़ावा देता है, जिसमें मर्द ही सब कुछ होते हैं।

पिछले कुछ दिनों में एक ऐसा मेकानिज्म तैयार किया गया है, जिसमें हिन्दू लड़कियों और हिन्दू मज़हब की सुरक्षा के नाम पर असल में लड़कियों को इस आज़ादी से वंचित किया जा रहा है कि वह अपने जीवन साथी का चुनाव स्वयं करें। मुज़फ्फर नगर में इस शब्द के गलत प्रयोग से हालात को उत्तेजक बनाया गया और साम्प्रदायिक दंगे फैलाने के लिए मनगढ़त कहानियां बनाई गईं। अब लव जिहादकेवल एक नारा नहीं, बल्कि खतरनाक हथियार बन चुका है। एक तरफ इसका प्रयोग मुसलमानों को नाकारात्मक किरदार में पेश करने के लिए किया जाता है तो दूसरी ओर महिलाओं की आज़ादी को कुचलने के लिए। धर्म के नाम पर भारत में जो राजनीति है, वह अफगानिस्तान में तालिबान की नीतियों से अलग नहीं है। कई ईसाई बुनियाद परस्त ग्रुप भी धर्म के नाम पर कुछ ऐसी ही मुहिम चलाते हैं, जो असल में महिलाओं के अधिकारों को दबाने के लिए प्रयोग की जाती है। श्री राम सेना से लेकर बाबू बजरंगी की कारगुजारियों और इसके बाद सामने आने वाले दंगों में जो कुछ भी सामने आया, यह सभी कम और अधिक इस सिद्धांत पर आधारित मुहिम हैं, जिनमें महिलाएं मर्दों की संपत्ति के तौर पर रहने को मजबूर किया जाना और उनकी ज़िन्दगी और सोच पर पूर्ण कंट्रोल रखना महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

सच्चाई यह है कि लव जिहादका प्रयोग इस तरह किया जा रहा है, इससे जुड़े दुष्प्रचार को इस तरह फैलाया जा रहा है कि यह सामाजिक सोच का एक हिस्सा बन गया है और लव जिहादआज साम्प्रदायिक ताकतों का एक मजबूत हथियार बन गया है।

२० अक्टूबर, २०१३ बशुक्रिया: रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली

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