
कासिम सैयद
10 मार्च 2017
महानगर मुंबई से एक भयानक खबर आई जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सम्राटों के गिरेबानों से खेलने वालों को अब अपने गिरेबान तार तार करनें और पगड़ियाँ उछालने में अधिक मज़ा आने लगा है। मंच से एकता और सहमति की दुहाई देने वाले फर्ज़न्दाने तौहीद के बीच एक दूसरे का खून बहाने पर चुप रहते हैं अपने हर बुरे काम की जिम्मेदारी यहूदी व ईसाई पर डालने की अदा आत्मनिरीक्षण का मौका ही नहीं देतीl साम्प्रदायिक संघर्ष के परिणाम में बढ़ता कलह और हार्दिक उत्कृष्टता में दिन प्रतिदिन तीव्रता की बारूदी सुरंगें पूरे समाज में बिछा दी गई हैं जो कभी कहीं विनाश लाता है तो कभी कहीं फूल की पत्ती से हीरे का जिगर काटने वालों पर कोमल वचन बेअसर हो गया है।
दुनिया में दीन की दावत की निस्वार्थ सेवा और अल्लाह के बन्दों तक उसका संदेश पहुंचाने में सक्रिय जमाअत में गुटीय कलह का प्रभाव मुंबई में नज़र आया। मलाड क्षेत्र की कोकनी पाड़ह की नूरानी मस्जिद में 5 मार्च को तबलीगी जमाअत के दो समूहों में आपसी तकरार और गरमा-गरमी, लाठी-डंडे के स्वतंत्र उपयोग तक पहुँच गई, अल्लाह के दीन की दावत देने वालों के कपड़े और दाढ़ी खून से भीग गए। अस्पताल में भर्ती किए गए, पुलिस ने हिरासत में लिया अब पुलिस वैन के साथ पुलिसकर्मियों को मस्जिद के बाहर तैनात किया गया है। बताया जाता है कि अफ्रीका से आई एक जमाअत के कयाम पर दोनों समूहों में झगड़ा हो गया था। अदालत से जमानत हुई, स्थिति तनावपूर्ण हैं। प्रशासन नजर रखे हुए है। यह कौन सी ईमानी गैरत है? एक दुसरे का सिर फाड़ने की प्रेरणा कौन देता है। क्या वे इस्लाम और मुसलमानों के सच्चे दोस्त और हमदर्द हैं? एक दूसरे का खून बहाने पर उकसाने वाले माफी के लायक हैं? क्या ऐसी घटनाएं हतोत्साहित नहीं होनी चाहिए। क्या हम ऐसी घटनाओं के पीछे भी यहूदी व ईसाई की साजिश का हाथ तलाश करना चाहेंगे। क्या अज्ञानता पूर्ण सत्यता की तबलीग कोई मायने रखती है क्या यह नासूर हमारे समाज को स्वस्थ रख सकेगा।
इसका औचित्य आखिर क्या है क्या इससे जगहँसाई का सामान प्रदान नहीं होता। क्या शांतिप्रिय और सुलह पसंद दीन की पहचान का एक ऐसा चेहरा पेश नहीं किया जा रहा है जहां मतभेद की कोई गुंजाइश नहींl बरदाश्त और धैर्य का कोई खाना नहींl मतभेद को बल की नोक पर दबाने की कोशिश की जाती है। क्या ऐसे लोग वास्तव में दीन को पसंद करनें वाले और रसूल प्रेमी हैं तो यह कैसे रसूल प्रेमी और जान निसार दीने मोहम्मदी हैंl क्या ऐसे सवाल उठाने वाले कौम के सौदागर हैं। वह भाजपा के एजेंडे को पूरा कर रहे हैं। क्या आईना दिखाना अपराध है। व्हाट्स ऐप और सोशल मीडिया के अन्य साधनों पर सक्रिय बुद्धीजीवी, राष्ट्र सुधारकों और अहले फतवा ऐसी घटनाओं को दुश्मनें इस्लाम की साजिश करार देंगे। इन रोगों की पहचान करके उनका इलाज करने में क्या दिक्कत हैंl क्या यह शक्तियां इतनी हावी हो गई हैं कि गंभीर लोग उनसे भय खाने लगे हैं। उलझना नहीं चाहते। ऐसी कष्टप्रद स्थिति जब सत्ताधारी लोगों द्वारा श्मशान और कब्रिस्तान की समस्याएं उठाई जा रही हों बिजली के धर्म की जांच की जाने लगे अधिक आबादी का हंगामा बनाया गया होl सब के साथ कुछ का विकास द्वारा देश में अलग तरह का संदेश देने की कोशिश हो। देशद्रोही और देश भक्ती की रेखा मिटाई जाने लगी हो मतभेद की तीव्रता को देशद्रोही का नाम दिया जाने लगा है। आतंकवाद का मतलब दाढ़ी और टोपी बताया जाने लगा हो, और इस अभियान में कमोबेश हर पार्टी अपना योग दान देने में प्रतिस्पर्धा का प्रदर्शन कर रही हो। मस्जिदों में सिर फोड़ने एक दुसरे पर आजादी से लाठी डंडों का उपयोग करके थानों में मामले, और गिरफ्तारी जैसी घटनाओं की अनुमति दी जानी चाहिए।
क्या मिल्लत में ऐसे खुराफाती व्यवहार को बर्दाश्त किया जा सकता है जो आए दिन नत नई चुनौतियों से जूझ रही हैl दिल पर हाथ रख कर यह सोचा नहीं जा सकता कि हम कहाँ आ गए कहां जा रहे हैं किसके लक्ष्यों को पूरा कर रहे हैं । यह किस धर्म का पालन कर रहे हैं। जहां मुस्लिम के रक्त की पवित्रता अनिवार्य है। मरने वाले और मारने वाले दोनें को जहन्नमी करार दिया गया है। मुसलमानों को एक दूसरे का भाई बताया गया है कि एक अंग में तकलीफ हो तो पूरा बदन उसे महसूस करता है क्या भाईचारे और समानता की शिक्षा केवल सुनाने और उन पर अल्लाहु अकबर कहने के लिए है, क्या उनके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी केवल सुनने वालों पर है, मेम्बरों से किस प्रकार का शिक्षण प्रसारित हो रहा है कि दिल फटने लगे हैं, मोहब्बतें नफरत में बदल रही हैं क्या दिखने वाली उपस्थिति और स्थिति मुसलमानों जैसी होने से दीन की सभी आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं। ऐसी घटनाएं सुनकर दिल क्यों लरज़ते है। धर्म को अपनी मानसिक इच्छा के अधीन करने से दीन की कौन सी सेवा अंजाम दी जा रही है। क्या हम बदलते हालात की करवट को महसूस करने में विफल रहे हैं।
लखनऊ में घंटों मुठभेड़ में एक जवान की मौत, उज्जैन ट्रेन बम ब्लास्ट के कुछ घंटों के बीच अपराधियों की गिरफ्तारी और पूछताछ से पहले ही सैफुल्लाह का संबंध आईएसआईएस से जोड़ने का मतलब समझने में असफल क्यों हैं? एक मजबूर गरीब पिता के इस वाक्यांश में छिपी पीड़ा, दर्द और तड़प कौन महसूस करेगा कि मैं देशद्रोही बच्चे की शव को दफनाने के लिए नहीं लूँगा, इस देश भक्ति की परिभाषा हर तरफ हो रही है, लेकिन इसकी मूक चीखें सुनने वाला कोई नहीं है। क्या हम बहुलवादी समाज की आतंकवादी सोच के दबाव का विश्लेषण नहीं कर पा रहे हैं, जबकि सरताज का यह भी कहना है कि मोहल्ले में इतना शरीफ अच्छा और कोई लड़का नहीं था जितना सैफूल्लाह था। वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल आता, उसके पिता गरीब और बड़े भाई की चाय की दुकान जिसे मारने से पहले ही आतंकवादी और आईएसआईएस का आतंकवादी साथी कहा जाने लगा जिस पर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी एतराज़ हुवा तो पुलिस ने बयान दिया कि आईएसआईएस से अनुदान और संबंध का कोई सबूत नहीं मिला लेकिन उस पर मीडिया में दिन भर हंगामा होता रहा, आईएसआईएस दस्तक और युवाओं में रुचि का ढिंढोरा पीटा जाने लगा। हालांकि उसी दिन अजमेर ब्लास्ट मामले में कई हिंदू आरोपियों को आतंकवाद का दोषी करार दिया गया, इसे मां के दूध की तरह पी लिया गया क्योंकि हम केवल घर बैठकर कोसने वाले हैं, सीना कुबी और वैश्विक राजनीति के लिए तत्पर हैं। संसाधनों के बावजूद मीडिया सूत्रों की पहुंच से वंचित सभाओं और सम्मेलनों में करोड़ों खर्च करने के आदी हैं, लेकिन मीडिया के नाम पर कानों पर हाथ लगाने वाले इस दोहरे व्यवहार की झलक जीवन के पर पहलू में नज़र आ सकती है। अपनी हर कोताही और गलती का आरोप दूसरों पर डाल कर खुद को पाक साफ साबित करने की आदत अच्छी नहीं। आने वाले खतरों की घंटी बजती जा रही हैं कानों में उँगलियाँ देकर उन्हें सुनना नहीं चाहते। मौसमी चुनावी राजनीति के कर्ताधर्ता भी दूर बैठे केवल तमाशा देखते हैं और समय पर जरूरत हाथ सेंक लेते हैं उन्हें कभी कोई रुचि नहीं है।
सवाल यह है कि इस दर्द का दरमाँ क्या है। क्या नासूर को यूंही छोड़ दिया जाए किसी को भी आतंकवादी करार देकर उसकी मश्कें कस दी जाएं और हम इसका समर्थन करें तो देश भक्ति और विरोध करें तो देशद्रोही ऐसा समय आ गया है। उनके दामन में बिजलियां पोशीदा हैंl यह झगड़े चलते फिरते आत्मघाती हमलावर हैं, इस स्थिति का नोटिस लीजिए। मस्जिदों को अखाड़ा मत बनने दीजिए। विपक्ष को हस्तक्षेप का मौका मत दीजिए। अन्यथा सरकार को हस्तक्षेप का मौका मिल जाएगा, ये छोटी-छोटी घटनाएं टाइम बम हैं उनकी टिक-टिक सुनिए और उन्हें डीफ्यूज़ कीजिये।
10 मार्च, 2017, सौजन्य: रोजनामा ख़बरें, दिल्ली
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