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Hindi Section ( 6 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Muslims: Remember the Khutba of Hajjat-ul-Vida मुसलमान हज्जतुल विदा का ख़ुतबा याद रखें

 

क़ारी इस्हाक़ गोरा

26 अक्टूबर, 2012

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज्जतुल विदा के मौक़े पर जो ख़ुत्बा (भाषण) दिया था, ऐसा मालूम होता है कि मुसलमान उस ख़ुत्बे को भुल गए हैं। शायद यही वजह है कि गुमराही मुसलमानों के स्वागत के लिए हर तरफ खड़ी नज़र आती है। इसकी वजह क्या है? इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर मुसलमान अल्लाह और उसके रसूल के बताए हुए रास्ते पर चलें तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि हर तरक्की उनके क़दमों को चूमेगी। और मुसलमान जो चाहेंगें वो होगा।

बहरहाल.... हज के दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अरफा तशरीफ लाए और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम वहाँ ठहरे। जब सूरज ढलने लगा तो आप ने क़सवा (अपनी ऊँटनी) को लाने का हुक्म दिया। ऊँटनी तैयार करके हाज़िर की गई, तो आप उस पर सवार होकर घाटी के बीच में तशरीफ लाये और अपना ख़ुत्बा दिया जिसमें धर्म के महत्वपूर्ण मामले बयान फरमाए थे। आपने खुदा की तारीफ करते हुए ख़ुत्बे की शुरुआत इस तरह की।

''ख़ुदा के सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक़) नहीं है। वो एक है कोई उसका साझी नहीं, ख़ुदा ने अपना वादा पूरा किया, उसने अपने बंदे (रसूल) की मदद फरमाई और अकेले उसी ने असत्य की सारी शक्तियों को हरा दिया।

लोगो! मेरी बात सुनो, मैं नहीं समझता कि आगे कभी हम इस तरह किसी सभा में एकत्र हो सकेगें। लोगों! अल्लाह का इरशाद है कि, ''इंसानों! हम ने तुम सबको एक ही मर्द और औरत से पैदा किया है और तुम्हें जमातों (समूहो) और क़बीलों में बाँट दिया कि तुम अलग अलग पहचाने जा सको। तुम में अधिक सम्मान और करामत वाला खुदा की नज़रों में वही है जो खुदा से ज़्यादा डरने वाला है।'' इसलिए इस आयत की रौशनी में न किसी अरबी को किसी अजमी पर कोई प्राथिकता हासिल है, न किसी अजमी को अरबी पर। न काला गोरे से श्रेष्ठ है, न गोरा काले से। हाँ! बुज़ुर्गी और फज़ीलत का कोई पैमाना है तो वो तक़वा (परहेज़गारी) है। इंसान सारे ही आदम की औलाद हैं और आदम की हक़ीक़त इसके सिवा क्या है कि वो मिट्टी से बनाए गए। अब फज़ीलत और श्रेष्ठता के सारे दावे, खून व माल की सारी मांगे और सारे इंतेक़ाम (प्रतिशोध) मेरे पाँव तले रौंदे जा चुके हैं। बस बैतुल्लाह की तौलियत और हाजियों को पानी पिलाने की किदमत बाक़ी रहेंगी फिर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ईरशाद फरमाया, ''कुरैश के लोगो! ऐसा न हो कि खुदा के सामने में तुम इस तरह आओ कि तुम्हारी गर्दनों पर तो दुनिया के बोझ लदे हों, और दुसरे लोग आफिरत (परलोक) का सामान ले कर पहुँचे, और अगर ऐसा हुआ तो मैं खुदा के सामने तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा।''

कुरैश के लोगो! खुदा ने तुम्हारी झूठी शान को खत्म कर डाला, और बाप दादा के कारनामों पर तुम्हारे गर्व की कोई गुंजाईश नहीं। लोगो! तुम्हारे खून व माल और इज़्ज़तें एक दुसरे पर बिल्कुल हराम कर दी गईं, हमेशा के लिए। इन चीज़ों का महत्व ऐसा ही है जैसी तुम्हारे उस दिन की और उस मुबारक महीने (ज़िल-हिज्जा) की खास कर उस शहर में है। तुम सब खुदा के आगे जाओगे और वो तुम से तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछताछ करेगा। देखो कहीं मेरे बाद गुमराह न हो जाना कि आपस ही में खून खराबा करने लगो।

अगर किसी के पास अमानत रखवाई जाए तो वो इस बात के लिए बाध्य रहे कि अमानत रखवाने वाले को अमानत पहुँचा दे। लोगो! हर मुसलमान दुसरे मुसलमान का भाई है और सारे आपस में भाई भाई हैं। अपने गुलामों का ख़याल रखो, उन्हें वही खिलाओ जो तुम खाते हो, वैसा ही पहनाओ जैसा तुम पहनते हो। जिहालत के दौर का सब कुछ मैंने पैरों से रौंद दिया। जिहालत के दौर के खुन के सारे बदले अब प्रतिबंधित हैं। पहला बदला जिसे मैं प्रतिबंधित क़रार देता हूँ मेरे अपने परिवार का है। रबीअतः बिन अल-हारिस के दूध पीते बेटे का खून जिसे बनू हज़ील ने मार डाला था, अब मैं माफ करता हूँ। जिहालत के दौर का सौदा अब कई हैसियत नहीं रखता। पहला सूद (ब्याज) जिसे मैं छोड़ता हूँ, अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के परिवार का सूद है, अब ये खत्म हो गया।

लोगो! अल्लाह ने हर हक़दार को उस का हक़ खुद दे दिया, अब कोई किसी वारिस के हक़ के लिए वसीयत न करे। बच्चा उसी की तरफ सम्बंधित किया जाएगा जिस के बिस्तर पर वो पैदा हुआ। जिस पर हरामकारी साबित हो उसकी सज़ा पत्थर है, हिसाब व किताब खुदा के यहाँ होगा। जो कोई अपना वंश बदलेगा या कोई गुलाम अपने आक़ा के मुक़ाबले में किसी और को अपना आक़ा ज़ाहिर करेगा, उस पर खुदा की लानत। क़र्ज़ अदा करने के लायक़ है। तोहफे का बदला देना चाहिए और जो कोई किसी का ज़मानतदार बने तावान (फिरौती) अदा करे। किसी के लिए ये जाएज़ नहीं कि वो अपने भाई से कुछ ले, सिवाए उसके जिस पर उसका भाई राज़ि हो और खुशी खुशी दे, खुद पर और एक दुसरे पर ज़्यादती न करो। औरत के लिए ये जाएज़ नहीं कि वो अपने पति की संपत्ति बिना अनुमति किसी को दे।

देखो! तुम्हारे ऊपर तुम्हारी औरतों के कुछ अधिकार हैं। इसी तरह उन पर तुम्हारे अधिकार अनिवार्य हैं। औरतों पर तुम्हारा ये अधिकार है कि वो अपने पास किसी ऐसे व्यक्ति को न बुलाएं जिसे तुम पसंद नहीं करते और वो कोई विश्वासघात न करें, कोई काम खुली बेहयाई का न करें और अगर ऐसा करें तो खुदा की तरफ से उस की इजाज़त है कि तुम उन्हें मामूली शारीरिक सज़ा दो और वो रुक जाएं तो उन्हें अच्छी तरह खिलाओ पहनाओ।

औरतों से अच्छा व्यवहार करो, क्योंकि वो तुम्हारी पाबंद हैं और खुद अपने लिए वो कुछ नहीं कर सकतीं। इसलिए उनके बारे में खुदा का लिहाज़ रखो कि तुम ने उन्हें खुदा के नाम पर हासिल किया और उसी के नाम पर वो तुम्हारे लिए जायज़ (हलाल) हुईं।

लोगो! मेरी बात समझ लो मैंने तब्लीग़ (धर्म प्रचार) का हक़ अदा कर दिया। मैं तुम्हारे बीच ऐसी चीज़ें छोड़े जाता हूँ कि तुम कभी गुमराह न हो सकोगे अगर उस पर क़ायम रहे और वो खुदा की किताब है। और हाँ देखो धार्मिक मामलों में गलत बात से बचना कि तुम से पहले के लोग इन्हीं बातों के कारण खत्म कर दिए गए।

शैतान को अब इस बात की कोई उम्मीद नहीं रह गई है कि अब उसकी इस शहर में इबादत की जाएगी। लेकिन इसकी सम्भावना है कि ऐसे मामलों में जिन्हें तुम कम महत्व देते हो, उसकी बात मान ली जाए और वो उसी पर राज़ी है, इसलिए तुम उससे अपने धर्म और ईमान की रक्षा करना।

लोगो! अपने रब की इबादत करो। पांच वक्त की नामज़ अदा करो, महीने भर के रोज़े रखो। अपने मालों का ज़कात खुशदिली से देते रहो, अपने खुदा के घर का हज करो और अपने बड़ों की मानो तो अपने रब की तो जन्नत में दाखिल हो जाओगे।

अब मुजरिम खुद अपने जुर्म का ज़िम्मेदार होगा और अब न बाप के बदले बेटा पकड़ा जाएगा, और न बेटे का बदला बाप से लिया जाएगा, सुनो! जो लोग यहाँ मौजूद हैं, उन्हें चाहिए कि ये हुक्म और बातें उन लोगों को बता दें, जो यहाँ नहीं हैं। हो सकता है कि कोई गैर मौजूद तुमसे अधिक समझने और सुरक्षित रखने वाला हो। और लोगो! तुम से मेरे बारे में (खुदा के यहाँ) सवाल किया जाएगा। बताओ तुम क्या जवाब दोगे?

लोगों ने कहा कि हम इस बात की गवाही देंगे कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अमानत (धर्म) पहुंचा दी और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हक़े रिसालत अदा फ़रमा दिया और हमारी खैरख्वाही फरमाई।

ये सुन कर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी शहादत की उंगली आसमान की तरफ उठाई और लोगों की तरफ इशारा करते हुए तीन बार इरशाद फरमाया ''खुदाया गवाह रहना! खुदाया गवाह रहना! खुदाया गवाह रहना।''

26 अक्टूबर, 2012 स्रोतः रोज़नामा हमारा समाज, नई दिल्ली

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