प्रोफेसर ताहिर महमूद (उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)
आजादी के इतने सालों बाद भी देश के कुछ नागरिक ये नहीं जानते हैं, या शायद जानना नहीं चाहते हैं कि इस धरती पर हुकूमत किसकी है, किसी विशेष धर्म की , धार्मिक बहुसंख्यकों की या कानून की? अगर किसी तरह उन्हें मालूम हो जाये कि हमारे संवैधानिक लोकतंत्र में कानून के राज का सिद्धांत पूरी तरह है तो उन्हें ये बिल्कुल भी स्वीकार नहीं। स्थिति जो भी हो ये महानुभाव लोग दिन दहाड़े देश की व्यवस्था के इस आधारभूत सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाते फिरते हैं। और कोई उनका कुछ बिगाड़ नही सकता है। उन लोगों के अनुसार देश में राज गुणडागर्दी का है और जिस की लाठी उसी की भैंस ही यहाँ कानून है। दूसरी ओर नागरिकों के एक समूह ने अपने ज़िम्मे ये बेवकूफी भरा काम ले रखा है कि गुण्डाराज के समर्थकों को उनकी इच्छा के अनुसार मौके उन्हें पहुँचाते रहें। इसलिए ईंधन मिलता रहता है और साम्प्रदायिकता की आग फैलाने का कर्तव्य पूरा होता रहता है।
‘भारत में यदि रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा’ ये वो नादिरशाही फरमान है, जो हिंदुस्तानियों के एक बहुत बड़े समुदाय को नागरिकों के एक दूसरे समूह के कुछ लोगों के द्वारा अक्सर सुनाया जाता है। ये आदेश न तो वर्तमान सरकार का होता है और न ही नागरिकों का बहुसंख्यक इसका समर्थक होते हैं। इसे जारी करने और मनवाने के लिए आपे से बाहर हो जाने वाले सिर्फ कुछ लोग होते हैं, जो खुद को मातभूमि का ठेकेदार मानते हैं। अफसोस की बात है कि कुछ गिने चुने न्यायप्रिय लोगों को छोड़कर नागरिकों की बड़ी संख्या दादागीरी की खामोश तमाशाई बनी रहती है और इस सच्चाई से बेखबर रहती है कि “अरे जफाओं पे चुप रहने वालों, खमोशी जफाओं की ताईद भी है”। इस फरमान के पीछे सिर्फ राजनीतिक हित छिपा रहता है न कि धर्म या देश भक्ति, लेकिन फरमान का विरोध करने वाले जमात से सम्बंध रखने वाले कुछ लोग इस शरारती चाल में फँसकर धार्मिक आधार पर इसका विरोध करना शुरु कर देते हैं और फिर आग और भी भड़कने लगती है। संस्कृत और बंगाली भाषा के इस मिले जुले राष्ट्र गीत की प्रकृति और अर्थ से बेखबर जनता दोनों ही ओर इस खेल का शिकार हो जाती है। मुसलमान समझते हैं कि उन्हें गैरुल्लाह का कोई ऐसा कलमा पढ़ने पर मजबूर किया जा रहा है, जिसके ज़बान से निकलते ही वो कुफ्र और शिर्क के गुनहगार होकर इस्लाम से खारिज हो जायेंगे और इधर हिंदुओं में मुसलमानों के देशभक्त न होने की बेबुनियाद राय पैदा होने लगती है।
आज़ादी के संघर्ष के दौरान कांग्रेस के अधिवेशनों में जो गीत जोश के साथ गाये जाते थे उनमें बंकिम चंद्र चटर्जी की रचना और अल्लामा इकबाल की नज़्म “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा” काफी प्रसिद्ध थी। जबकि कांग्रेसी मुसलमानों की राजनीतिक दुश्मनी पर अमादा मुस्लिम लीग इस गीत को लेकर उन्हें कुफ्र और शिर्क करने का ताना देती रहती थी। आखिर में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस लम्बे गीत का अकादमिक विश्लेषण करवाने के बाद इसकी सिर्फ शुरु की दो पंक्तियों को अपना लिया जिनके बारे में बताया गया था कि वो इस्लाम के एक ईश्वर में विश्वास के विरुद्ध नहीं हैं। इस ऐहतियाती कदम के बाद जब देश का संविधान बना तो संविधान सभा ने इस विवादित गीत की बजाये रवींद्रनाथ टैगोर के बंगाली गीत “जन गण मन” को राष्ट्र गान करार दिया गया। जिसके बाद वंदे मातरम और सारे जहाँ से अच्छा को राष्ट्र गीत कहा जाने लगा, हालांकि आम नागरिकों के लिए इन मिलते जुलते पदों का अंतर समझना और ख्याल रखना मुश्किल था, जब 1976 में संविधान में एक संशोधन के द्वारा नागरिकों के कर्त्तव्य की धारा बढ़ाई गयी, तो इसमें राष्ट्र गान के आदर को आवश्यक करार दिया गया, मगर किसी और राष्ट्र गीत का कोई ज़िक्र नहीं किया गया। इससे पहले 1971 में जब राष्ट्रीय गरिमा अपमान निषेध कानून के नाम से एक कानून पास हुआ तो इसमें भी सिर्फ राष्ट्र गान का ही ज़िक्र किया गया। 1986 में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक मुकदमा पेश हुआ, जिसमें एक खास ईसाई समूह के कुछ छात्रों को धार्मिक आधार पर राष्ट्र गान न गाने के अपराध में स्कूल से निकाल दिया गया। अदालत ने फैसला दिया कि “देश का कोई कानून राष्ट्र गीत के गाने को आवश्यक करार नहीं देता है, बस इसके सम्मान के लिए खड़े हो जाना काफी है।” इस सवाल पर कि राष्ट्र गीत क्या वास्तव में उक्त ईसाई समुदाय के विश्वास के खिलाफ है। विचार करने से इंकार करते हुआ अदालत ने कहा कि “निर्णायक बात ये है कि वो समुदाय खुद मन से क्या समझता है” और अब यही देश का कानून है जिसके तहत न तो राष्ट्र गान या कोई और राष्ट्र गीत गाने के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता है। और न ही इस सम्बंध में किसी धार्मिक समुदाय की आमराय को कानूनी रूप से चैलेंज किया जा सकता है।
मुश्किल ये है कि हिंदुस्तानियों की बड़ी आबादी कानूनी निरक्षरता या कानून से अनभिज्ञता का शिकार है और किसी भी मामले में इसकी कानूनी हैसियत जानने या जान लेने का कष्ट करे या फिर जानबूझ कर इसकी परवाह किये बगैर इसका विरोध या समर्थन शुरु कर देती है। वंदे मातरम की कानूनी हैसियत जानकर इस पर विचार किया जाता तो न इसके विरोधी इस पर किसी तरह के फतवे की ज़रूरत महसूस करते और न ही इसके समर्थक इसके गाये जाने पर ज़ोर देते। इस मामले का एक पहलू और भी है। हिंदुस्तानी मुसलमान अपनी प्रभावी आबादी की “मज़ारों पे दिन रात नज़रे चढायें, शहीदों से जा जा के मांगें दुआएं” की प्रसिद्ध परम्परा के बावजूद एक कौम (राष्ट्र) के रूप में इससे अलग होने के दावेदार हैं। वैसे मुस्लिम समाज में कब्र परस्ती के अलावा और एक ईश्वर के विश्वास के विरुद्ध और भी न जाने क्या क्या होता रहता है। आजकल एक फिल्मी गीत जिसमें एक आशिक अपनी माशूका से कहता है “तुझमें रब दिखता है, सज्दे में सिर झुकता है” रेडियों से न जाने कितनी बार प्रसारित होता है, जिसकी फरमाइश करने वालों में 90 फीसद मुसलमान होते हैं। इस प्रकृति के कुफ्र और शिर्क से भरे न जाने कितने और गीत भी दिन भर बजते रहते हैं, और मुसलमान घरों में दुहराये जाते हैं, लेकिन मिल्लत के एक ईश्वर के विश्वास पर चलने वाले किसी व्यक्ति ने इन गीतों के खिलाफ फतवा हासिल करने का कष्ट नहीं उठाया। फिर वंदे मातरम जैसे संवेनशील मामले ही में (वंदे शब्द का अर्थ बंदा या अब्द मान कर) फतवा मांगने और जारी करने की ज़रूरत क्यों महसूस की गयी? औऱ फिर जब इच्छित फतवा जारी हो गया था, उसके बाद भी कुछ लोगों ने एक बहुत बड़े आधे (अर्द्ध) राजनीतिक जलसे में इसी विषय का प्रस्ताव पास करना क्यों ज़रूरी समझा? ये समझना कोई मुश्किल नहीं। बहरहाल मुसलमानों के खिलाफ फितना खड़ा करने के सामान की हमेशा तलाश में रहने वाले तत्व को इसमें एक सुनहरा मौका नज़र आना ही था, वो भला क्यों चूकते। इसलिए अखबारों में कई पन्ने काले किये गये और रेडियों व टीवी पर इस विषय पर चर्चा के कार्यक्रम हुए, धरने दिये गये, धार्मिक संस्थानों के पुतले फूँके गये, न जाने और क्या क्या हुआ और दुनिया हम हिंदुस्तानियों का तमाशा देख देख कर मज़ाक उड़ाती रही। देश का कानून बिल्कुल स्पष्ट है। यह देश न तो किसी की जायदाद और न यहाँ किसी धर्म का राज है। जन गण मन हो या वंदे मातरम या कोई और राष्ट्र गीत न तो इसको गाना अनिवार्य है और न इसे गाने पर मजबूर किया जा सकता है, और न ही इसे न गाने पर किसी व्यक्ति या समुदाय को देश से गद्दारी का ताना दिया जा सकता है। वंदे मातरम के जिन भागों को राष्ट्र गीत माना जाता है, उनके शब्दों के संदर्भ पर शोध के आधार पर इन में कुफ्र और शिर्क होने की बात हमें सही नहीं लगती, फिर भी इसको गाने की ज़िद करने वालों से हम यही कहेंगे कि आज़ाद भारत के सभी मुसलमान तुम्हारे बराबर के नागरिक है और सौ फीसद देश भक्त हैं। इन पर देश भक्त होने का अपना विशेष पैमाना थोपने का तुम्हें कोई संवैधानिक, कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है और अपने लोगों से हम यही निवेदन करेंगे हर चीज़ को धर्म के चश्मे से देखने के बजाय विवादित मामलों में देश के कानून का सहारा लिया जाये, तो ऐसे मामले खड़े नहीं होंगे। हम सब हिंदुस्तानी, मातृभूमि के सपूत, भारत माता की वंदना करने या इसे सारे जहाँ से अच्छा बताने वाले मिलकर ऐसे गैर अहम मामलों में खुद को जग हँसायी से बचा सकते हैं। इसके लिए बस इतना करना है कि देश के कानून को सर्वोपरि मानते हुए हर मामले में पहले इसकी जानकारी हासिल की जाये और इसकी पूरी तरह पाबंदी को अनिवार्य समझा जाये। इतना कर लिया जाये तो देश भक्त की ठेकेदारी धार्मिक राजनीति, और राजनीति या पार्टी की दुश्मनी का ये खत्म न होने वाला सिलसिला समाप्त हो सकता है।
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