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Hindi Section ( 20 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

Palestine, Al-Quds and We अर्ज़े फ़लस्तीन, अल-क़ुद्स और हम


अब सूरते हाल ये है कि फ़लस्तीनियों की कई नस्लें बेवतनी के शदीद तजुर्बे और इंतिफ़ादा के अमल से गुज़र कर एक ऐसी मंज़िल पर आ पहुंची हैं जहां माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल तीनों तारीक नज़र आते हैं

प्रोफ़ेसर अख़्तरुल वासे

21 जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

हमारी ये दुनिया जहां सदियों से ज़िंदगी का तमाशा जारी है, मुख़्तलिफ़ कौमें और तहज़ीबें आईं और अपना नाम और काम दिखा कर रुख़सत हो गईं। ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ नेज़ाम आए और चले गए। मुआशरे क़ायम हुए,  ममलकतें और हुकूमतें क़ायम हुईं और सफ़ए हस्ती से मिट गईं। हालात व वाकेआत के इस ना मुख़्ततम सिलसिले के पेशे नज़र दुनिया को एक स्टेज भी कहा गया है जहां अफ़राद, मुआशरे और कौमें आती हैं, अपना मुक़र्ररा किरदार अदा करते हैं और चली जाती हैं और उनकी जगह दूसरे लोग आ जाते हैं। इस स्टेज पर अक्सर ये भी होता कि जो आज एक किरदार कर रहा है वही हालात में तब्दीली के बाद इसका बरअक्स किरदार अदा करने लगता है। इसराईल और फ़लस्तीनियों के दरमियान गुज़श्ता निस्फ़ सदी से ज़्यादा अर्से से जारी ख़ूनीं कशाकश का हाल भी कुछ ऐसा ही है।

दूसरी आलमी जंग के दौरान जर्मनी में हिटलर के बाला दस्ती हासिल करने के बाद नाज़ियत का जो तूफ़ान उठा और जो लर्ज़ा ख़ेज़ इंसानियत सोज़ मज़ालिम किए गए वो अब तारीख़ का हिस्सा हैं। इंसानी तारीख़ में इंसानों पर इंसानों के मज़ालिम की किसी भी रूदाद में इन मज़ालिम का ज़िक्र नुमायां तरीन मज़ालिम में होगा जो नाज़ियत के ज़ेरे असर रवा रखे गए। इन मज़ालिम के सामने चंगेज़ और हलाकू के मज़ालिम भी मामूली मालूम होते हैं। इन मज़ालिम में जर्मनी के यहूदियों को जिस तरह इज्तेमाई व ग़ारतगिरी का शिकार बनाया गया उसने इंसानी तारीख़ में नस्ल कुशी का एक ऐसा स्याह तरीन बाब रक़म किया जिसकी मिसाल बहुत कम मिलती है। जंग के बाद यूरोप बल्कि पूरी मग़रिबी दुनिया जिस भयानक तबाही व बर्बादी की गिरफ़्त में आई उसमें यहूदीयों की इस नस्ल कुशी पर एहसासे जुर्म भी शामिल था। यहूदी उस वक़्त एक बेयारो मददगार और बेकस क़ौम थे और सारी दुनिया से मदद और सहारे के तालिब थे। मग़रिब ने अपने एहसासे जुर्म से छुटकारा पाने के लिए इसराईली रियासत क़ायम करने का डोल डाला जो बिला-आख़िर वजूद में आ गई। लेकिन यहां भी मग़रिब की इस्तेमारी जिबलत ने इसका पीछा नहीं छोड़ा, क्योंकि ये रियासत इस इलाक़े के अरब बाशिंदों को उनकी ज़मीनों और घरों से बेदख़ल करके वजूद में लाई गई। इस तरह एक ज़माने की एक बेसहारा, बेबस और मज़लूम क़ौम बहुत जल्द एक क़ौमी रियासत की शक्ल में ताक़तवर होते ही दूसरों को मज़लूम बनाने वाली ज़ुल्म की ताक़त में तब्दील हो गई। होना तो ये चाहिए था कि ख़ुद ज़ुलमो जब्र का शिकार रह चुकी यहूदी क़ौम ऐसे किसी फ़ैसले से ख़ुद को दस्तबरदार कर लेती लेकिन इसके बरअक्स- क़याम के अव्वल रोज़ से ही इसराईल हुकूमत तसलसुल के साथ ऐसे इक़दामात में मसरूफ़ है जो फ़लस्तीनियों के मसाइब और मसाइल में इज़ाफ़ा करने वाले हों। कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जिसमें फ़लस्तीनियों को उनकी मज़लूमियत और महरूमी का एहसास ना दिलाया जाता हो। इनके पुर अमन मुज़ाहिरों पर गोलियां बरसाई जाती हैं और जब रद्दे अमल में निहत्ते फ़लस्तीनी पत्थर उठाते हैं तो उन पर टैंकों से गोले दागे़ जाते हैं।

इसराईल ने अपने क़याम के फ़ौरन बाद एक तरफ़ मग़रिबी ताक़तों की इमदाद और पुश्तपनाही के ज़रिए अपनी ताक़त में इज़ाफ़ा शुरू किया तो दूसरी तरफ़ एक ऐसा तौसीई मंसूबा मुरत्तिब किया जिसमें अतराफ़ की अरब रियासतों पर क़ब्ज़ा करने और एक वसीअ तर यहूदी रियासत वजूद में भी था कि फ़लस्तीनियों की बेवतनी और बेघरी के ज़ख़्मों पर नमक छिड़का जाय। इसके जवाब में फ़लस्तीनियों की तरफ़ से पुरतशद्दुद और मुसल्लह मज़ाहेमत का सिलसिला शुरू हुआ जिसने सारी दुनिया में इसराईल की दराज़ दस्ती और मज़लूम फ़लस्तीनियों की अपने हुक़ूक़ की बहाली की जद्दोजहद को एक दूसरे के मुक़ाबिल खड़ा कर दिया। हिंदुस्तान समेत तीसरी दुनिया के बहुत से मुल्कों में फ़लस्तीनियों की हिमाक़त के जज़्बात पैदा हुए, माली और माद्दी इमदाद फ़राहम की गईं लेकिन दूसरी तरफ़ मग़रिबी ताक़तों ने इस बात को यक़ीनी बनाने की हर मुम्किन कोशिश भी की कि इसराईली अपनी रविश पर बरक़रार रहें। लेकिन जब इसराईल की तरफ़ से मंसूबा बंद, खुले और दरपर्दा तशद्दुद और जारहीयत नाक़ाबिले देफ़ा हो गई तो इस्तेमारी ताक़तों ने मुआहिदों की हिक्मते अमली अख़्तियार की। अगरचे इसराईल और फ़लस्तीनियों के दरमियान क़यामे अमन की ये कोशिश बज़ाहिर बहुत मुबारक थी मगर नीयतें दुरुस्त ना होने के सबब उसे ना सिर्फ कामयाबी नहीं मिली बल्कि इसके रद्दे अमल में सूरतेहाल में मज़ीद अबतरी पैदा हो गई। फ़लस्तीनियों के वजूदी मसाइल के अलावा मुसलमानों के क़िबलए अव्वल और इस्लामी तारीख़ के बहुत से आसार इसराईल के ज़ेरे तसल्लुत होने के सबब सारी दुनिया के मुसलमानों के मज़हबी जज़्बात भी इस कशमकश से वाबस्ता हैं।

अब सूरते हाल ये है कि फ़लस्तीनियों की कई नस्लें बेवतनी के शदीद तजुर्बे और इंतिफ़ादा के अमल से गुज़र कर एक ऐसी मंज़िल पर आ पहुंची हैं जहां माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल तीनों तारीक नज़र आते हैं। एक आज़ाद और ख़ुदमुख़्तार फ़लस्तीनी रियासत जिसे इसराईल के मुतवाज़ी अपना वजूद क़ायम रखने का हक़ हासिल हो, एक तजवीज़ से ज़्यादा एक ख़्वाब है जो बरसों से मशरिक़े वुसता के ख़ूनीं थियेटर में अमन के एक सराब की तरह कभी कभी चमक उठता है और फिर नज़रों से ओझल हो जाता है। लेकिन अगर मशरिक़े वुस्ता में मुस्तक़िल तशद्दुद की सूरते हाल को ख़त्म करना है और इसके हवाले से दुनिया को लाहक़ सियासी आसाबी तनाव के एक बड़े सबब से निजात दिलानी है तो एक आज़ाद और ख़ुदमुख़्तार फ़लस्तीनी रियासत के क़याम के सिवा कोई चारा नहीं। लेकिन ये रियासत फ़लस्तीनी अवाम की इज़्ज़ते नफ़स और हुक़ूक़ व इख़्तियारात की मुकम्मल बहाली का ज़रीआ तभी बन सकती है जब इस बात को यक़ीनी बनाया जाय कि ये इसराईल की तमाम तर ज़ाहिरी और दर पर्दा रेशा दवानियों और मुदाख़लतों का निशाना नहीं बनाई जाएगी। इस के साथ ही ये भी ज़रूरी है कि इसराईल को तमाम मक़बूज़ा इलाक़े ख़ाली करने और उन इलाक़ों में मौजूद आबादियों से दस्तबरदार होने पर आमादा किया जाय, क्योंकि इसके बगै़र आज़ाद व ख़ुदमुख़्तार फ़लस्तीनी रियासत पुर अमन और महफ़ूज़ नहीं रह सकेगी।

अमेरीका के अव्वलीन स्याह फ़ाम सदर बराक ओबामा ने अपने ओहदए सदारत का आग़ाज़ अमन पसंदी और मुसालेहत कोशी के जिस जज़्बे के साथ किया था और जिस खुले ज़हन के साथ इस्लामी दुनिया की तरफ़ इफ़हाम व तफ़्हीम और इश्तेराक व तआवुन का हाथ बढ़ाया था उससे उम्मीद बंधी थी कि शायद मसला फ़लस्तीन का कोई मुंसिफ़ाना और काबिले क़ुबूल हल जल्द तलाश कर लिया जाय मगर ये उम्मीदें पूरी ना हो सकें। मुम्किन है उनकी सियासी मजबूरियां इस राह में मज़ाहेम रही हों और मुमकिन है कि अगर वो दुबारा अमेरीकी सदर मुंतख़ब हों तो इस सिलसिले में पेशरफ़्त की कोई सूरत पैदा हो लेकिन सदर ओबामा हों या मग़रिब के दीगर ताक़तवर मुल्कों के सरबराहान हुकूमत वरयासत या तीसरी दुनिया के सियासी रहनुमा, फ़लस्तीनी अवाम के मसाइब और इब्तलाओं का मुंसिफ़ाना और पायदार हल तलाश करना इन सबके लिए एक इज्तेमाई चैलेंज है क्योंकि पुर अमन और बकाए बाहम और अदल व इंसाफ़ पर मबनी आलमी निज़ाम का कोई तसव्वुर मसला फ़लस्तीन के बरक़रार रहने की सूरत में नहीं किया जा सकता । हमारा हमेशा से ये मौक़िफ़ रहा है और बार बार हम इस का इआदा भी करते रहे हैं कि दुनिया में अमन क़ायम नहीं हो सकता जब तक कि मशरिक़े वुस्ता में अमन क़ायम ना हो और मशरिक़े वुस्ता में अमन उस वक़्त तक क़ायम नहीं होगा जब तक कि फ़लस्तीनियों को उनका हक़ और इंसाफ़ नहीं मिल जाता ।

आलमे इस्लाम में मुसलमानों की ग़ालिब तरीन अक्सरीयत बिलख़ुसूस हिंदुस्तानी मुसलमान हमेशा से अमन व आश्ती, मुसालेहत और मुफ़ाहेमत और बकाए बाहम की क़दरों के साथ साथ बैन मज़हबी मकालमे के हामी और इसके लिए कोशां रहे हैं। फ़लस्तीनियों के जायज़ हुक़ूक़ की बाज़याबी की जद्दोजहद की तहरीक से हम अपने आप को मुकम्मल तौर पर हम आहंग करते हुए दुनिया की बड़ी ताक़तों के सरबराहों और खासतौर पर हकूमते हिन्द से गुज़ारिश करते हैं कि वो फ़लस्तीनियों को उनका खोया हुआ वतन और इंसानी हुक़ूक़ वापिस दिलाने और मशरिक़ वुसता में पायदार अमन की बहाली के लिए अपनी बेहतरीन ज़हनी, अख़्लाक़ी, सियासी और माद्दी कोशिशों को बरुए कार लाएं ताकि कल के मुअर्रिख़ को इनके लिए अच्छे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करने में पसोपेश से ना गुज़रना पड़े।

मज़्मूननिगार जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के शोबाए इस्लामियात के सरबराह हैं।

21 जून, 2012 बशुक्रियाः इन्क़लाब, नई दिल्ली

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