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Hindi Section ( 7 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

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RELIGION & ETHICS: Importance of Animals in Islam धर्म और नैतिकताः इस्लाम में जानवरों की अहमियत


नीलोफर अहमद (अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

नवम्बर 2011

'वही तो है जिसने सब चीज़े जो ज़मीन में हैं, तुम्हारे लिए पैदा कीं। (कुरान 2:29)

इस्लाम ने जानवरों की तख्लीक (रचना) को एक बहुत ही ऊँचे पायेदान पर रखा है। इसके बावजूद मुसलमान बार बार इसकी अहमियत को तस्लीम करने से इंकार करते हैं। ऐसा लगता है कि इस आयत को मुसलमानों ने व्यापक रूप से गलत ढंग से समझा है। जब किसी को कोई तोहफा मिलता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वो तोहफे की कदर करेगा, उसका ख्याल रखेगा और उसका दुरुपयोग या उसे तबाह नहीं करेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि आम तौर पर मुसलमानों को इस दुनिया में जानवरों की बेशुमार नस्ले जो तोहफे के तौर पर मिली है उनका न तो कदर करता है और न ही उनकी हिफाज़त करने को बढ़ावा देता है।

कुरान में ऐसी छह आयतें हैं जिनके शीर्षक जानवरों के नाम पर हैं। इसके अलावा, जानवरों का ज़िक्र पूरे क़ुरान में पाया जाता है। सूरेः अल-अनाम में कहा गया है, और ज़मीन में जो चलने फिरने वाला (हैवान) या दो परों से उड़ने वाला जानवर है उनकी भी तुम लोगों की तरह जमातें हैं (6:38) शहद की मक्खियों और चींटियों को भी बिरादरी के तौर पर मुनज़्ज़म किया है ताकि वो अपने नैतिक और संगठन के कानून को तोड़े बिना काम कर सकें, आपस में संपर्क रख सकें और अपने वजूद को बरकरार रख सकें। दुनिया के सभी प्राणियों सहित जानवर भी अपने खुदा की तारीफ और तसबीह करते हैं (17:44)। जानदार अपनी ज़बान से और गैर जानदार अपने हालात के मुताबिक खामोश रज़ामंदी से खुदा की तारीफ करते हैं। हज़रत नूह अलैहिस्लाम को वही के ज़रिए हिदायत दी गयी कि वो एक बड़ी नाव को बनांयेः और एक किश्ती हमारे हुक्म से हमारे रुबरू बनाओ। और जो लोग ज़ालिम हैं उनके बारे में हमसे कुछ न कहना क्योंकि वो ज़रूर गर्क़ कर दिये जायेंगे।

सैलाब से महफूज़ किये जाने वालों में मोमिनीन के साथ साथ हर एक नस्ल के जानवरों के जोड़े थेः '...... हमने नूह को हुक्म दिया कि हर किस्म (के जानदारों) में से जोड़ा, जोड़ा (यानी) दो (दो जानवर-. एक एक नर और एक एक मादा) ले लो और जिस शख्स की निस्बत में हुक्म हो चुका है कि (हलाक हो जायेगा) उसको छोड़ कर अपने घर वालों को जो ईमान लाया हो उसको किश्ती में सवार कर लो......(11:40)। हकीकत ये है कि जानवरों को बचाने का हुक्म मोमिनों को बचाने से पहले आया और ये उन जानवरों की अहमियत की तरफ इशारा करता है जिनका अस्तित्व खतरे में थे।

कुरान नबी हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद की कहानी को बताता है जिसमें उन लोगों के तरीकों में सुधार के लिए आपको भेजा गया था ताकि लोगों को एक खुदा की तरफ बुलाएँ और गुजारे के लिए जो वसाएल (संसाधन) थे उनको इंसाफ के साथ बांटें। आपने उन नौ नेताओं के साथ समझौता किया जिनका पानी के स्रोतों पर कब्जा था, जिसे लोग और ऊँटनियाँ (जिन्हें खुदा की तरफ से बतौर निशानी या मोजेज़ा (चमत्कार) भेजा गया था) इस्तेमाल करतीं। उन लोगों को चारागाहों में भी लोगों को शामिल करने के लिए कहा गया था।' (यानी) यही खुदा की ऊँटनी तुम्हारे लिए मोजेज़ा है। तो उसे (आज़ाद) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में चरती फिरे और तुम उसे बुरी नीयत से हाथ भी न लगाना। वरना अज़ाबे अलीम तुम्हें पकड़ लेगा' (7: 73), लेकिन उन लोगों ने अपना वादा तोड़ा और ऊँटनी को मार डाला (7:77-78)। चूंकि पूरी क़ौम इस साजिश में शामिल थी, पूरी कौम तबाह हो गई। उनकी तबाही की फौरी वजह ये थी कि इन लोगों ने ऊँटनी को नुक्सान पहुंचाया था

पैगम्बर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अपनी फौज में जानवरों को भर्ती किया था और हुद हुद ने कासिद (संदेशवाहक) का काम किया था। पैग़म्बर हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को छोड़ने के खुदा के हुक्म से पहले ही मायूसी (निराशा) में अपने लोगों को छोड़ दिया था। रास्ते में आप को नाव से बाहर निकाल दिया गया था और एक व्हेल ने आपको निगल लिया। व्हेल ने आपको अपने पेट में लंबे समय तक रखे रखा और अपने मुंह को खुला रखा ताकि आप सांस ले सकें। आप खुदा से अपनी गल्ती के लिए माफी तलब करते रहे। आखीर में मछली ने आपको मुंह से निकाल कर जमीन के एक टुकड़े पर फेंक दिया। यहां पर मछली ने एक नबी के लिए एक मुहाफिज़ (संरक्षक) का किरदार अदा किया।

नबी करीम (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम स.अ.व.) ने कहा है कि अगर सबसे छोटे परिंदे को उसके हक़ के बगैर हलाक कर किया गया और फेंक दिया गया तो इस अमल की एक जुर्म को तौर पर पूछ ताछ की जायेगी।  आप (स.अ.व.) ने स्पष्ट किया कि उसका अधिकार था कि उसे सिर्फ खाने के लिए जरूरत की स्थिति में ज़बह किया जाना चाहिए और ये नहीं कि बिना जरूरत उसे मार दिया जाये और फेंक दिया जाए (मिश्कात)। केवल आनंद के लिए शिकार को हलाल नहीं माना जाता है। नबी करीम (स.अ.व.) ने यह भी हिदायत फ़रमाई है कि जानवर को जबह करने के लिए छुरी तेज होनी चाहिए ताकि पशुओं को अधिक दर्द न हो। एक बार नबी करीम (स.अ.व.) ने देखा कि एक जगह पर खेमा लगाने के दौरान किसी ने चींटियों के पहाड़ के पास आग रौशन कर दी है। आप (स.अ.व.) ने उसे तुरंत बुझा देने का आदेश दिया। एक बार किसी ने एक पक्षी के दो छोटे बच्चों को पकड़ लिया, इन पक्षियों की मां तकलीफ के साथ उनके सिर पर चक्कर लगाने लगी, जब रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने इस मंज़र को देखा तो आप (स.अ.व.) ने इस व्यक्ति को उन्हें आज़ाद करने के लिए कहा (बुखारी)।

नबी करीम (सल्ल.) ने एक बार एक ऐसे व्यक्ति की कहानी बताई जो खासतौर से एक कुत्ते की प्यास बुझाने के लिए चश्मे के अन्दर गया। फतेह मक्का के बाद पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने दस हजार की आबादी वाली सेना की कयादत (नेतृत्व) की। रास्ते में आप (स.अ.व.) ने देखा कि एक कुतिया अपने बच्चों की देखभाल कर रही है। इस आशंका से कि कोई उसे तंग या परेशान कर सकता है, आप (स.अ.व.) ने एक व्यक्ति को इस जगह पर तैनात किया औऱ उसे तब तक वहाँ रहने री हिदायत की जब तक कि पूरी फौज वहां से गुजर नहीं जाये। आप (स.अ.व.) ने फरमाया कि जानदार मखलूक (प्राणी) या सभी जीवित प्राणियों के साथ दया का बर्ताव करना वाला सवाब का हकदार है (बुखारी)।

आप (स.अ.व.) ने जानवरों को उनके चेहरे पर मारने और दागने से मना फरमाया है। आप (स.अ.व.) ने जानवरों की लड़ाई वाले खेल से भी मना फ़रमाया है (अबू दायोद)। नबी करीम (स.अ.व.) ने अपने उम्मतियों को हुक्म दिया है कि जब जानवर टहल रहे हों तो उन्हें रास्ते की हरियाली का फायदा लेने दें, लेकिन शुष्क मौसम में उन्हें तेजी से चलाना चाहिए और उनके कर्ब (दुःख) को कम करने के लिए टहलने के मसाफ़ात (दूरी) को कम करना चाहिए (मुस्लिम)। नबी करीम (स.अ.व.) ने प्यार से अपने सहाबियों में से एक को अबू हुरैरह यानी बिल्लियों के पिता का खिताब दिया था क्योंकि उन्हें बिल्लियों का शौक था और वह उन्हें अक्सर अपनी आस्तीनों में लिए रहते थे।

एक बार किसी ने हज या उमरा की नीयत कर ली और ऐहराम बांध लिया तो वह सम्मान की हालत में प्रवेश कर जाता है जिसमें कुछ हलाल चीजें भी अवैध हो जाती हैं (5:97)। उनमें से एक पशु की हत्या भी शामिल है, और चाहे वो कितना भी छोटा ही क्यों न हो। मक्का में काबे के 50,000 वर्ग किलोमीटर के दायरे (5:95-97) में किसी जानवर को मारना हराम है।

क़ुरान ने कुदरत की कुछ निशानियों का ज़िक्र किया है, ‘बेशक आसमानों और ज़मीन में ईमान वालों के लिए (खुदा की कुदरत की) निशानियाँ हैं। और तुम्हारी पैदाइश में भी। और जानवरों में भी जिनको वो फैलाता है यकीन करने वालों के लिए निशानियाँ हैं (45:4)’। इंसान की तख्लीक की अहमियत जानवरों की तख्लीक की अहमियत को बराबर कहा गया है। इस तरह, जानवरों की अहमियत और उनके साथ रहमदिली भरा बर्ताव पुख्ता ईमान की निशानियों में से है।

नीलोफर अहमद इस्लामी स्कालर हैं और वर्तमान समय की समस्याओं में इस्लाम के रौशन ख्याल पहलुओं की मानवीयत (उपादेयता) पर लिखती हैं। वो इंटरफेथ डायलाग (अंतर विश्वास संवाद) सहित स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में लेक्चर और मकाले पेश करती रहती हैं।

स्रोतः साउथ एशिया ग्लोबल अफेयर

URL for English article: http://www.newageislam.com/islam-and-environment/religion---ethics--importance-of-animals-in-islam/d/6057

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/religion-and-ethics--the-importance-of-animals-in-islam--مذہب-اور-اخلاقیات---اسلام-میں-جانوروں-کی-اہمیت/d/6525

URL for this article: http://www.newageislam.com/hindi-section/religion---ethics--importance-of-animals-in-islam--धर्म-और-नैतिकताः-इस्लाम-में-जानवरों-की-अहमियत/d/6582


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