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Hindi Section ( 9 Jan 2012, NewAgeIslam.Com)

Honour killing and Islam आनर किलिंग और इस्लाम


नीलोफर अहमद (अंग्रेज़ी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

सामंती संरचना वाला हमारा समाज बर्बर नियमों का पालन करता है और ये गैर-इंसानी और अत्याचारी व्यवस्था को इसलिए लागू करता है, जिससे सामाजिक दर्जे में सबसे ऊँचे मुकाम वाले कुछ लोगों को लाभ पहुँच सके। इन लोगों को इस बात की फिक्र नहीं होती है कि वो किस नाम से जाने जायेंगे। हर साल इज़्ज़त के नाम पर होने वाले अत्याचार के शिकार लोगों की संख्या सैकड़ों में होती है।

ये घिनौनी परम्परा शहरी और ग्रामीण सभी सामाजिक समूहों तक पहुँच चुकी है। नफरत के काबिल ये जुर्म इज़्ज़त के नाम पर जायदाद के झगड़ों, पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए या एक औरत जो अत्याचार करने वाले अपने पति से तलाक की मांग करती है या एक कातिल की रक्षा करने के लिए जिसने एक आदमी का खून कर दिया और उसे छिपाने के लिए एक मासूम औरत का भी खून कर दिया और कत्ल होने वालों पर कारो- कारी का इल्ज़ाम लगाते हैं और इसी तरह दूसरे मामलों को छिपाने के लिए कत्ल किया जाता है। कारो- कारी की ये शब्दावली गैरकानूनी सम्बंध, बीवी या शौहर के अलावा शारीरिक सम्बंध और आवारापन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

दोहरा कत्ल भी किया जाता है जब एक आदमी और एक औरत आपस में अपनी मर्ज़ी से शादी करने का फैसला करते हैं। ज़्यादातर मामलों में कत्ल हुई महिला कातिल की बहन, पूर्व पत्नी या कोई और रिश्तेदार होती है। चूंकि कातिल भी इस पूरे मामले में प्रभावित होने का दम भरता है और पूरे मामले को अपने पक्ष में करने के लिए दलील देता है कि उसकी इज़्ज़त तबाह हुई है और उसके पास सिवाय मुजरिम को कत्ल करने को कोई और चारा नहीं था। अगर उसे कभी कोई सज़ा मिलती है तो वो बहुत मामूली होती है और वो आसानी से अक्सर छूट जाता है। कत्ल होने वाले के रिश्तेदार भी कातिल को माफ कर देते हैं।

आज अगर एक पति अपनी बीवी को किसी के साथ दुराचार करते हुए पाये तो बहुत से मुस्लम देशों में ये काबिले कुबूल माना जाता है कि पति दोनों को कत्ल कर दे और बीवी को तो ज़रूर कर दे। लेकिन कुरान इससे अलग शिक्षा देता है। लियान वो प्रक्रिया है जब एक पति अपनी पत्नी पर दुराचार का आरोप लगाता है, लेकिन चार गवाह नहीं पेश कर पाता है तब उससे आशा की जाती है कि वो हुक्काम (अधिकारियों) के पास जाये और ये कसम चार बार खाये कि वो जो कुछ भी कह रहा है वो सच है। सूरे अल-नूर में ज़िक्र है, और जो लोग अपनी औरतों पर बदकारी की तोहमत लगायें और खुद उनके सिवा उनको गवाह न हो, तो हर एक की शहादत ये है कि पहले तो चार बार खुदा की कसम खाये, कि बेशक वो सच्चा है और पांचवी बार ये (कहे) कि अगर वो झूठा हो तो उस पर खुदा की लानत। और औरत से सज़ा को ये बात टाल सकती है कि वो पहले चार बार खुदा की कसम खाये कि बेशक ये झूठा है। और पांचवी दफा यूँ (कहे) कि अगर ये सच्चा हो तो मुझ पर खुदा का गज़ब (नाज़िल हो) (24:6-9)।

अगर वो जुर्म कुबूल करे या खामोश रहे, तो बदकारी के लिए जो सज़ा तय है उसे मिलेगी। अगर वो कसम खाती और कहती है कि वो बेकुसूर है, तो उसके अल्फाज़ शौहर के खिलाफ बरकरार रखे जायेंगे और वो तलाक ले सकती है।

नबी करीम स.अ.व. के फरमान की बुनियाद पर, इसके बाद पैदा हुआ बच्चा माँ का बच्चा कहलायेगा और वो किसी तरह अपने वालिद से नहीं जोड़ा जायेगा। इसके बाद अगर कोई इस औरत को बदकार कहता है और बच्चे को नाजायज़ कहता तो ऐसे शख्स को आरोप लगाने के कारण 80 कोड़े लगाने की सज़ा दी जा सकती है और जिसे दोबारा काबिले भरोसा गवाह भी नहीं माना जायेगा (देखें 24:4)। जब तक एक शख्स चार गवाह न पेश कर सकता हो, तब तक उसे इस तरह के इल्ज़ाम नहीं लगाने चाहिए। परम्परागत तौर से कारो- कारी के लिए कत्ल की गयी औरत की मुनासिब तदफीन (अंतिम संस्कार) भी नहीं की जाती है और न ही उसे उस तब्के के कब्रिस्तान में दफ्न किया जाता है जिससे उसका सम्बंध था। कोई भी उसकी कब्र पर नहीं जा सकता है और यहाँ तक कि बाद में भी नहीं जा सकता है। यहाँ हमारे लिए नबी करीम स.अ.व की हदीस पर गौर करना फायदेमंद होगा। एक बार एक औरत ने नबी करीम स.अ.व. के सामने ऐतराफ (स्वीकार) किया कि उसने बदकारी की है, सज़ा टालने के लिए नबी करीम स.अ.व. ने उसे चार बार वापिस कर दिया लेकिन वो औरत अपनी बात पर अड़ी रही। आखीर में उसे सज़ा दी गयी। इसके बाद नबी करीम स.अ.व. ने कहा कि इसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई जाये औऱ इसकी तद्फीन उसी तरह की जाये जिस तरह एक मुसलमान की होती है।

समस्या तब तक बरकरार रहेगी जब तक इज़्ज़त के नाम पर कत्ल को खत्म करने के लिए ठोस कदम न उठाये जायें। इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपनी सुधार योजना में पुलिस, पेश इमाम और क़ारी जैसे धार्मिक लीडरों को भी शामिल करें और इनकी ट्रेनिंग करें। धार्मिक लीडरों को इस बात के लिए मुत्मइन (संतुष्ट) किया जाना चाहिए कि ये अमल कुरान के खिलाफ है और उनसे कहा जाये कि वो अपने खुत्बे में लोगों को और मदरसे में छात्रों को बतायें कि काबिले नफरत ये कत्ल अत्याचार है और घिनौना जुर्म है। अगर अब शुरु करें तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि हमारी आने वाली नस्ल इस मामले में ज़्यादा रहम दिल बन जाये।

स्रोतः डॉन, कराची

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islamic-ideology/honour-killing-and-islam/d/3020

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/killing-for-honour-and-islam--عزت-کے-لئے-قتل-اور-اسلام/d/6323

URL for this article:

http://www.newageislam.com/hindi-section/honour-killing-and-islam--आनर-किलिंग-और-इस्लाम/d/6343

 

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